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पेपर लीक से पीड़ित छात्रों की आवाज, विपक्ष का विरोध मतदान का बहिष्कार और ध्वनि मत से विधेयकों के पारित होने पर लोकतांत्रिक विमर्श

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और भारतीय संसद उसकी लोकतांत्रिक आत्मा का सर्वोच्च संस्थागत मंच है। संसद केवल कानून बनाने की इमारत नहीं, बल्कि जनता की आशाओं, सम स्याओं असहमतियों और अप ेक्षाओं को राष्ट्रीय नीति में बद लने वाली संवैधानिक व्यवस्था है। संसद में सरकार बहुमत के आधार पर शासन करती है, किंतु लोकतंत्र की वास्त विक शक्ति केवल बहुमत में नहीं,बल्कि बहससंवाद विपक्ष की भागीदारी, विधेयकों की गहन जांच ,मतदान की पारद र्शिता और जनता के प्रति जवा बदेही में निहित होती है, इसलिए मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं की कि संसद का मूल्य केवल इस बात से नहीं आंका जाना चाहिए कि कितने विधेयक पारित हुए,बल्कि इस बात से भी आंका जाना चाहिए कि वे कितनी चर्चा,कितनी जांच और कितनी लोकतांत्रिक भागीदारी के बाद पारित हुए। वर्ष 2026 के मानसून सत्र के अंतिम चरण में पेपर लीक और छात्रों से जुड़े मुद्दे ने संसद के भीतर एक गंभीर राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रश्न खड़ा किया। विपक्ष ने परीक्षा अनियमितताओं,छात्र आंदोलनों और कथित पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा। इसके बाद विपक्षी दलों ने विरोध दर्ज क राया और कुछ अवसरों पर मतदान की प्रक्रिया का बहिष् कार किया। इसी राजनीतिक तनाव के बीच सार्वजनिक परी क्षा (अनुचित साधनों की रोक थाम) संशोधन विधेयक, 2026 संबंधी संशोधन विधेयक, 20 26 लोकसभा में ध्वनि मत से पारित हुआ। तथा इस पर राष्ट्र पति द्रौपदी मुर्मू ने 31 जुलाई 2026 को अपनी स्वीकृति (मंजू री) दे दी है, और कानून मंत्रा लय द्वारा इसी दिन इसकी राजपत्र (गजट) अधिसूचना जारी कर दी गई है और यह अब कानून लागू हो चुका है।
साथियों उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार विधेयक पर बहस हुई, लेकिन सदन में तीखी नोक झोंक और व्यवधान के बीच अंतिम स्वीकृति ध्वनि मत से दी गई। बता दे कि संसद के मानसून सत्र 2026 में 31 जुलाई तक कम-से- कम 3 प्रमुख विधेयक (1) लोक परी क्षाएं (अनुचित साधनों की रोक थाम) संशोधन विधेयक,2026 (2) राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विद्दे यक, 2026 दोनों सदनों से पारित ध्वनि मत (3) जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) वि धेयक, 2026, यानें तीनों वि धेयक ध्वनि मत से पारित किए गए, इस अवधि में किसी विधेयक पर औपचारिक विभा जन (रिकार्डेड वोटिंग) का स्पष्ट मामला सामने नहीं आ या। यह घटनाक्रम केवल एक विधेयक के पारित होने का प्रश्न नहीं है। इसके माध्यम से एक बड़ा लोकतांत्रिक प्रश्न सामने आता है, जब किसी कानून का संबंध लाखों विद्या र्थियों के भविष्य, परीक्षा की विश्वसनीयता और युवाओं के विश्वास से हो, तब क्या केवल ध्वनि मत पर्याप्त लोकतांत्रिक संतुष्टि प्रदान करता है? और यदि विपक्ष मतदान का बहिष् कार करता है, तो क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल बहुमत के आधार पर कानून पारित करना है, या उसे व्यापक राज नीतिक सहमति और सार्वज निक विश्वास भी सुनिश्चित करना चाहिए? पेपर लीक केव ल परीक्षा की गड़बड़ी नहीं, युवाओं के भविष्य और लोक तांत्रिक विश्वास का प्रश्न।
साथियों, सरकार का पक्ष यह रहा कि पेपर लीक जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए कठोर कानून और त्वरित न्या यिक व्यवस्था आवश्यक है। यह तर्क अपने आप में महत् वपूर्ण है, क्योंकि संगठित परीक्षा अपराधों पर प्रभावी दंड, जांच और समयबद्ध सुन वाई की आवश्यकता से इन कार नहीं किया जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में कानून की कठोरता के साथ उसकी विश् वसनीयता भी आवश्यक होती है। यदि कानून बनाने की प्रक्रि या में व्यापक चर्चा, संशोधनों पर विचार और विपक्ष की भागी दारी कम दिखाई दे, तो कानून की वैधानिकता तो बनी रहती है, किंतु उसके प्रति राजनी तिक और सामाजिक स्वीका र्यता का प्रश्न उठ सकता है।
साथियों बात अगर हम विपक्ष का विरोध और मतदान का बहिष्कार – लोकतांत्रिक अधिकार या संसदीय प्रक्रिया की कमजोरी? इसको समझने की करें तो लोकतंत्र में विपक्ष का कार्य केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है। विप क्ष जनता के उन वर्गों की आ वाज भी है जिनकी अपेक्षाएं, शिकायतें या असहमति सर कार की प्राथमिकताओं से अलग हो सकती हैं। संसद में विपक्ष का विरोध, नारेबाजी, बहिर्गमन या मतदान का बहि ष्कार राजनीतिक असहमति व्यक्त करने के संसदीय साधन हो सकते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि लगा तार व्यवधान और मतदान से दूरी विपक्ष की विधायी भूमि का को कमजोर कर सकती है।पेपर लीक के मुद्दे पर विपक्ष ने यह तर्क रखा कि पहले छात्रों के प्रश्नों, आंदोलन और कथित प्रशासनिक कार्रवाई पर स्पष्ट चर्चा होनी चाहिए। यदि विपक्ष को लगता है कि उसके मुद्दों को पर्याप्त समय नहीं दिया गया, तो विरोध उसकी राजनीतिक रणनीति बन सकता है। दूसरी ओर, य दि विपक्ष मतदान का बहिष्कार करता है, तो वह विधेयक की धाराओं में संशोधन प्रस्तावित करने, सरकार से स्पष्टीकरण मांगने और रिकार्डेड वोट के माध्यम से अपनी स्थिति दर्ज कराने का अवसर भी सीमित कर देता है। इसलिए लोकतां त्रिक जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है। सरकार को विपक्ष की बात सुनने और महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश् िचत करनी चाहिए, जबकि विपक्ष को भी विरोध के साथ विधायी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए। लोकतंत्र में केवल विरोध करना पर्याप्त नहींय वैकल्पिक सुझाव देना, संशोधन प्रस्तुत करना और मतदान में अपनी स्थिति सटी कता से दर्ज कराना भी आवश् यक है। साथियों बात अगर हम ध्वनि मत क्या है और इस की संवैधानिक- संसदीय स्थि ति क्या है? इसको समझने की करें तो ध्वनि मत भारतीय संसद की एक मान्य और लंबे समय से प्रचलित संसदीय प्रक्रिया है। इसमें अध्यक्ष या सभापति सदन से पूछते हैं कि प्रस्ताव के पक्ष में कौन है और विरोध में कौन है। सदस्य “हाँ” या “नहीं” कहकर अपनी राय व्यक्त करते हैं। अध्यक्ष ध्वनि की तीव्रता के आधार पर निर्णय देते हैं कि प्रस्ताव स्वीकार हुआ या अस्वीकार। भारतीय संस दीय परंपरा में ध्वनि मत कोई असंवैधानिक या अवैध प्रक्रिया नहीं है, यह सामान्य संसदीय निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन ध्वनि मत की एक मह त्वपूर्ण सीमा यह है कि इसमें प्रत्येक सांसद का व्यक्तिगत मतदान रिकार्ड सार्वजनिक नहीं होता। जनता यह नहीं जान पाती कि किस सांसद ने किसी विधेयक के पक्ष या विरोध में मतदान किया। यदि किसी सदस्य को अध्यक्ष के निर्णय पर आपत्ति हो, तो निय मों के अनुसार वह विभाजन अर्थात डिवीजन की मांग कर सकता है। विभाजन में मतों की गिनती या इलेक्ट्रानिक रिकार्डिंग के माध्यम से स्पष्ट परिणाम प्राप्त किया जा सक ता है। यहीं से लोकतांत्रिक बहस शुरू होती है। ध्वनि मत सामान्य और गैर-विवा दित मामलों में त्वरित निर्णय का प्रभावी माध्यम हो सकता है। लेकिन जब विधेयक अत्यंत महत्वपूर्ण हो, व्यापक जनहित से जुड़ा हो, राजनीतिक विवाद का विषय बना हो या विपक्ष उसकी धाराओं पर गंभीर आप त्ति कर रहा हो, तब रिकार्डेड मतदान लोकतांत्रिक पारदर्शिता को अधिक मजबूत कर सकता है। साथियों बात अगर हम क्या ध्वनि मत से विधेयक पारित होना लोकतंत्र के लिए अच्छा है? इसको समझने की करें तो इस प्रश्न का उत्तर केवल “हाँ” या “नहीं” में नहीं दिया जा सकता। ध्वनि मत स्वयं लोकतंत्र- विरोधी नहीं है। संसद के नियमों में इसका स्थान है और अनेक मामलों में यह समय बचाने तथा सर्व सम्मति या स्पष्ट बहुमत वाले निर्णयों के लिए उपयोगी है। यदि सदन में पर्याप्त चर्चा हुई हो, सदस्य अपनी राय रख चुके हों और किसी सदस्य ने विभाजन की मांग न की हो, तो ध्वनि मत से निर्णय को संसदीय प्रक्रिया के अंतर्गत वैध माना जाता है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब ध्वनि मत विस्तृत बहस के विकल्प के रूप में दिखाई देने लगे। यदि किसी विधेयक पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई, उसे संसदीय समिति के पास नहीं भेजा गया, विपक्ष की आपत्तियों पर गंभीर विचार नहीं हुआ और अंत में केवल ध्वनि मत से उसे पारित कर दिया गया, तो लोकतांत्रिक गुणवत्ता पर प्रश्न उठना स्वा भाविक है। लोकतंत्र में बहुमत सरकार को निर्णय लेने का अधिकार देता है, किंतु बहस की आवश्यकता समाप्त नहीं करता। बहुमत शासन का आधार हैय संवाद लोकतंत्र की आत्मा है। इसलिए किसी विधेयक का केवल पारित हो जाना यह प्रमाण नहीं कि उस पर सटीकता से पर्याप्त लोक तांत्रिक विचार-विमर्श हुआ है।
साथियों बात अगर हम पिछले बारह वर्षों में ध्वनि मत से कितने विधेयक पारित हुए? आंकड़ों की चुनौती को समझने की करें तो पिछले बा रह वर्षों में ध्वनि मत से पारित विधेयकों की एकल, समेकित और आधिकारिक संख्या सार्व जनिक संसदीय आंकड़ों में आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि संसद के विधायी आंकड़े सामान्यतः विधेयकों के प्रस्तुत होने, पारित होने समिति को भेजे जाने और कानून बनने की जानकारी देते हैं,लेकिन प्रत्येक विधेयक के लिए मत दान की पद्धति, ध्वनि मत, मत -विभाजन, इलेक्ट्रानिक मत दान या अन्य प्रक्रिया का एक संयुक्त दशकवार आंकड़ा अलग से प्रकाशित नहीं किया जाता। इसलिए यह कहना कि पिछ ले बारह वर्षों में ठीक इतने विधेयक ध्वनि मत से पारित हुए बिना प्रत्येक विधेयक की कार्यवाही और मतदान रिकार्ड की जांच के तथ्यात्मक रूप से सुरक्षित नहीं होगा। संसद की वेबसाइट, लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही तथा विधेयक-वार रिकार्ड के आ धार पर अलग-अलग गणना की जा सकती है, लेकिन एक आधिकारिक समेकित संख् या उपलब्ध न होने के कारण किसी अनुमानित आंकड़े को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।फिर भी व्यापक संसदीय प्रवृत्तियों से यह स्पष्ट है कि पिछले एक दशक में बड़ी संख्या में विधेयक ध्वनि मत से पारित हुए हैं और कई महत्वपूर्ण कानूनों पर रिकार्डेड मतदान नहीं हुआ। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या संसद को प्रत्येक महत्वपूर्ण विधेयक के मतदान की पद्धति का एक सार्वजनिक, डिजिटल और आ सानी से उपलब्ध डेटाबेस तैयार करना चाहिए।
बहुमत के साथ सहमति और विश्वास का निर्माण इस को समझने की करें तो, सरकार के पास यदि स्पष्ट बहुमत है तो उसे कानून पारित करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन लोकतांत्रिक नेतृत्व की उच्चतम कसौटी केवल बहुमत का प्रयोग नहीं, बल्कि असहम ति को सुनना और जहां संभव हो वहां सहमति बनाना है। विशेष रूप से शिक्षा, रोजगार, युवाओं, चुनाव, नागरिक अ धिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर व्यापक चर्चा लोकतांत्रिक विश्वास को मजबूत करती है।पेपर लीक के संदर्भ में सरकार का कठोर कानून लाने का उद्देश्य महत्व पूर्ण है। लेकिन कानून के साथ यह भी आवश्यक है कि परीक्षा प्रणाली की संस्थागत कमियों, जिम्मेदारी तय करने, तकनी की सुरक्षा, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही और प्रभावित विद्यार्थियों के लिए न्यायपूर्ण उपायों पर भी स्पष्ट नीति हो। केवल दंड बढ़ाना पर्याप्त नहीं अपराध रोकने की प्रशासनिक क्षमता भी मजबूत होनी चाहिए।
विरोध के साथ विधायी भागीदारी को समझने की करें तो, विपक्ष को सरकार से जवाब मांगने का पूरा अधिकार है। छात्र हितों, परीक्षा अनियमित ताओं और जन आंदोलनों पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक भूमि का का हिस्सा है। लेकिन संस द में लंबे समय तक व्यवधान, मतदान का बहिष्कार और विधायी चर्चा से दूरी अंततः विपक्ष की अपनी प्रभावशीलता को भी कम कर सकती है। यदि विपक्ष किसी विधेयक से असहमत है, तो उसे संशोधन प्रस्तुत करने, विस्तृत बहस कर ने, समिति को भेजने की मांग करने और जहां आवश्यक हो वहां मत-विभाजन की मांग करके अपना रुख रिकार्ड में दर्ज कराना चाहिए। लोकतंत्र में विरोध की आवाज जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्व पूर्ण संसदीय रिकार्ड भी है।

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