एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर दुनिया का ऊर्जा बाजार सितंबर 2026 में एक ऐसे दौर से गुजर रहा है,जिसमें तेल की आपूर्ति के कई महत्वपूर्ण रास्तों पर एक साथ दबाव बन गया है।
अमेरिका- ईरान संघर्ष के बीच स्ट्रेट आफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बेहद कम हो गई है, लाल सागर और बाब अल-मंदेब क्षेत्र में हूती हमलों ने समुद्री परिवहन को जोखिम में डाल दिया है और अब सऊदी अरब की लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन भी ड्रोन हमलों के बाद अस्था यी रूप से बंद कर दी गई है। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर के यानबू बंदरगाह से जोड़ती है और प्रतिदिन लग भग 40-50 लाख बैरल तेल ले जाने की क्षमता रखती है। मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि इस घटनाक्रम की गंभीर ता इसलिए बढ़ जाती है क्यों कि होर्मुज स्वयं दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में से एक है। सामान्य परिस्थितियों में इसके जरिए विश्व के लगभग पांचवें हिस्से के तेल और एलएनजी का परिवहन होता है,लेकिन 17 सितंबर की रॉयटर्स रिपोर्ट के अनुसार बुधवार को होर्मुज से केवल तीन कमोडिटी वैसेल्स गुजरे, जबकि 10- दिन का औसत करीब 17 था इसका अर्थ यह नहीं है कि वैश्विक तेल आपूर्ति पूरी तरह बंद हो गई है, परंतु सा मान्य रूप से खुला तेल मार्ग कहना मुश्किल है लेकिन यह अवश्य बताता है कि युद्ध ने ऊर्जा परिवहन की सामान्य व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसी के समानांतर बाब अल-मंदेब भी महत्वपूर्ण हो गया है।लाल सागर से होकर यूरोप और एशिया के बीच जाने वाले जहाजों के लिए यह रणनीतिक समुद्री मार्ग है। 17 सितंबर 2026 को उपलब्ध ताजा बाजार आंकड़ों में ब्रेंट क्रूड लगभग 104 डालर प्रति बैरल और डब्लूटीआई लगभग 101 डालर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा थाय यानी कीमतें 100 डालर से ऊपर बनी हुई हैं। हूती हमलों और क्षेत्रीय सैन्य तनाव के कारण जहाजरानी कंपनियों को जो खिम, बीमा लागत और वैक ल्पिक मार्गों की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।ऐसे वातावरण में सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का बंद होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाइपलाइन होर्मुज से बचकर सऊदी तेल को लाल सागर तक पहुंचाने वाला प्रमुख वैकल्पिक मार्ग रही है। वैश्विक तेल संकट के बीच भारत सरकार ने 16 सितंबर से पेट्रोल, डीजल और एटीएफ के निर्यात पर लेवी घटाई है, हालांकि इसका घरे लू पेट्रोल- डीजल की खुदरा कीमतों पर सीधा असर नहीं है। साथियों सऊदी अरब से सामने आए तेल उत्पादन के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। ओपेक को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार अगस्त में सऊदी अरब का कच्चे तेल का उत्पादन लगभग 62.4 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो जुलाई के लगभग 81 लाख बैरल प्रति दिन से करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन कम था। यह 1990 के बाद का सबसे निचला मासि क उत्पादन स्तर बताया गया है। हालांकि उत्पादन और बाजार में वास्तविक आपूर्ति अलग- अलग अवधारणाएं हैं, इसलिए इन आंकड़ों को सी धे वैश्विक उपलब्ध तेल में उतनी ही मात्रा की कमी के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल अब सऊदी अरब के निर्यात भंडार और पाइपलाइन की बहाली को लेकर है। रायटर्स के अनु सार, यदि ईस्ट-वेस्ट पाइप लाइन शीघ्र चालू नहीं होती तो सऊदी अरब के पास यानबू क्षेत्र में उपलब्ध निर्यात योग्य तेल का स्टॉक केवल लगभग पांच से सात दिनों के लिए पर्याप्त रह सकता है और लंबे व्यवधान की स्थिति में वैश्विक आपूर्ति का लगभग 4 प्रतिशत तक हिस्सा प्रभा वित होने का जोखिम है।यह एक संभावित जोखिम का आकलन है, तत्काल 4 प्रति शत की वास्तविक कमी नही।
साथियों तेल बाजार ने इस जोखिम पर तत्काल प्रति क्रिया भी दिखाई। 15 सितंबर को यानबू से तेल लदान रुकने और यूरोप के लिए कुछ शिप मेंट रद्द होने की खबरों के बीच ब्रेंट लगभग 108.75 डालर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई करीब 105.83 डालर पर बंद हुआ। हालांकि अगले दिन सऊदी अरब द्वारा ओमान के सोहार बंदरगाह के जरिए वैकल्पिक शिपमेंट बढ़ाने की खबर आने पर कीमतों में कुछ नरमी आई और 16 सितंबर को ब्रेंट करीब 105.83 डालर तथा डब्ल्यूटीआई करीब 102.43 डॉलर पर बंद हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि बाजार केवल युद्ध की खबर पर नहीं, बल्कि वैकल्पिक आपूर्ति उपलब्ध होने की संभावना पर भी तेजी से प्रतिक्रिया कर रहा है। यही कारण है कि 120 डालर प्रति बैरल का स्तर अभी एक संभावित जोखिम या बाजार- चर्चा का विषय है,निश्चित भविष्यवाणी नहीं। यदि होर्मुज में व्यवधान लंबा चलता है, बाब अल- मंदेब क्षेत्र में हमले बढ़ते हैं और सऊदी पाइपलाइन की मरम्मत में लंबा समय लगता है, तो उपलब्ध वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। इसंके विपरीत, यदि वैकल्पिक समुद्री मार्ग सक्रिय रहते हैं, सऊदी पाइपलाइन जल्दी बहाल होती है या अतिरिक्त उत्पादन बाजार में आता है, तो दबाव सीमित भी रह सकता है।
साथियों, इस संकट का असर केवल कच्चे तेल की कीमत तक सीमित नहीं है। महंगा क्रूड परिवहन, पेट्रोल- डीजल, विमानन ईंधन, पेट्रो केमिकल, प्लास्टिक, उर्वरक और बिजली उत्पादन जैसी अनेक गतिविधियों की लागत बढ़ा सकता है। तेल आयात पर अत्यधिक निर्भर देशों में इसका असर चालू खाते,मुद्रा विनिमय दर, सरकारी सब्सि डी और महंगाई पर पड़ सकता है। पहले से ऊंची ऊर्जा ला गत के बीच यदि डीजल और जेट फ्यूल की उपलब्धता भी प्रभावित होती है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। विभिन्न देशों में इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव भी अलग-अलग दि खाई दे सकते हैं। जहां सर कारें ईंधन कीमतों को नियं त्रित करने या सब्सिडी देने की स्थिति में हैं, वहां तत्काल उपभोक्ता प्रभाव कुछ समय के लिए सीमित किया जा सकता है, लेकिन राजको षीय बोझ बढ़ेगा। जिन देशों के पास सीमित विदेशी मुद्रा भंडार और कम रणनीतिक तेल भंडार हैं, उनके लिए महंगा तेल आयात अधिक कठिन हो सकता है।
इसलिए पाकिस्तान, बांग्ला देश, श्रीलंका जैसे आयात- निर्भर देशों के लिए वैश्विक तेल कीमतों का लंबा उछाल विशेष चुनौती बन सकता है। अलग-अलग देशों में विरोद्द- प्रदर्शन की खबरें भी सामने आई हैं, लेकिन उनके कारण और स्थानीय परिस्थितियां सटिका से अलग-अलग हैं।
साथियों भारत के लिए तस्वीर अपेक्षाकृत अलग है, लेकिन जोखिम समाप्त नहीं हुआ है।भारत दुनियाँ के बड़े तेल आयातकों में है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतों और समुद्री मालभाड़े में लंबे समय तक वृद्धि का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। दूसरी ओर भारत के पास विविध आयात स्रोत रण नीतिक पेट्रोलियम भंडार, घरेलू रिफाइनिंग क्षमता और बड़ी सरकारी तेल कंपनियों का नेटवर्क है, जो अचानक आए बाहरी झटके को कुछ हद तक एबसोर्ब करने में मदद कर सकते हैं। फिर भी यदि 100-120 डालर के आसपास तेल लंबे समय तक बना रहता है तो महंगाई, व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव जैसे प्रभावों की निगरानी सटीकता से महत्वपूर्ण होगी।
साथियों, दिलचस्प बात यह है कि संकट के बीच सऊदी अरब वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है। 16 सितंबर की रायटर्स रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब ने ओमान के सोहार बंदरगाह के पास शिप -टू-शिप ट्रांसफर्स के जरिए एशियाई खरीदारों को कच्चा तेल उपलब्ध कराने की कोशि श बढ़ाई है। साथ ही खाड़ी के भीतर स्थित रासतनुरा और जुयैमाह बंदरगाहों से लदान भी बढ़ा है। इससे संकेत मिल ता है कि सऊदी अरब और बाजार के अन्य खिलाड़ी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हैं, बल्कि आपूर्ति को वैकल्पिक मार्गों से बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा वैश्विक सबक ऊर्जा सुरक्षा है। जिस समय दुनिया तेल की स्थिर और सस्ती आपूर्ति पर निर्भर है, उसी समय एक युद्ध कई समु द्री चैक पाॅइंट्स और बुनियादी ऊर्जा ढांचे को एक साथ प्रभा वित कर रहा है।
होर्मुज, बाब अल-मंदेब और सऊदी ईस्ट-वेस्ट पाइप लाइन अलग-अलग रास्ते हैं, लेकिन वर्तमान संकट में इनके जोखिम आपस में जुड़ गए हैं। यही इंटरकनेक्टेड रिस्क ऊर्जा बाजार के लिए सबसे गंभीर चुनौती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि वर्तमान स्थिति को तत्काल वैश्विक तेल आपूर्ति पूरी तरह ठप कहना सही नहीं होगा, लेकिन ऊर्जा बाजार में असाधारण अनिश्चितता जरूर बढ़ी है। सऊदी उत्पादन में भारी गिरावट, होर्मुज में बेहद कम जहाज आवाजाही, बाब अल -मंदेब में सुरक्षा संकट और ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की क्षति, ये सभी संकेत बताते हैं कि आने वाले दिनों में बा जार की दिशा मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करेगी-युद्ध और समुद्री मार्गों की स्थिति, सऊदी पाइपलाइन की बहा ली और वैकल्पिक तेल आपूर्ति की वास्तविक क्षमता।
यदि इन तीनों मोर्चों पर सुधार नहीं हुआ तो महंगे तेल का असर ऊर्जा से निकलकर महंगाई, परिवहन, उद्योग और वैश्विक आर्थिक वृद्धि तक पहुंच सकता है, लेकिन वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग सक्रिय रहे तो बा जार इस झटके को धीरे-धीरे एबसोरब भी कर सकता है।
क्या वैश्विक अर्थव्यवस्था पर आयल शाक का सबसे बड़ा वार, क्या दुनिया फिर आयल क्राइसिस की आग में झुलसने वाली है- अमेरिका-ईरान जंग से होर्मुज संकट, हूती हमलों से लाल सागर अशांत, सऊदी पाइपलाइन बंद
