एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर मध्य -पूर्व में जारी संघर्ष, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की संभावित 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ की तलवार, इन तीनों घटना क्रमों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने एक साथ कई नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। भारत के लिए यह परिस्थिति इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरू रतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से आयात बिल, परिवहन लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका की संसद से पारित लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट आफ 2026 ने रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों के लिए नई अनिश्चितता पैदा कर दी है अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को यह विधे यक 262-159 मतों से पारित किया, जबकि सीनेट इसे अग स्त में 86ध्11 से पहले ही पारित कर चुकी थी। अब विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर की प्रक्रिया में है। यानी गेंद अप ट्रंप के पह ले में चली गई है। मैं एडवो केट किशन सनमु खदास भाव नानी गोंदिया महा राष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि यहां अमेरि की व्यवस्था को समझना भी जरूरी है। भारत की संसद में जिस प्रकार लोक सभा और राज्यसभा मिलकर कानून बनाने की प्रक्रिया पूरी करती हैं, उसी प्रकार अमेरि का में हाउस आफ रिप्रेजेन्टे टिव्स यानें प्रतिनिधि सभा और सेनेट यानें सीनेट कांग्रेस के दो सदन हैं। किसी विधेयक को कानून बनने के लिए दोनों सदनों से पारित होना और फिर राष्ट्रप ति की स्वीकृति मिलना आवश् यक होता है। इसलिए फिल हाल इसे भारत पर 100 प्रति शत टैरिफ लागू हो चुका मा नना सही नहीं होगा। मौजूदा स्थिति यह है कि दोनों सदनों से विधेयक पारित हो चुका है और राष्ट्रपति के पास पहुंच गया है। कानून बनने के बाद भी 100प्रतिशत टैरिफ भारत पर अपने आप नहीं लग जाएगा। राष्ट्रपति को उपलब्ध वैधा निक अधिकारों और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर कार्रवाई करनी होगी। रिपोर्टों के अनुसार कानून में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों पर सटीक 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति का प्रावधान है, जबकि कुछ परिस्थितियों में रूस की ऊर्जा परनिर्भरता घटाने की दिशा में कदम उठाने वाले देशों के लिए अपवादों की गुंजाइश भी बताई गई है। विदेश मंत्रा लय ने 17 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया कि भारत अपनी 140 करोड़ से अधिक आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए वि विध स्रोतों और बदलती बा जार परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेता रहेगा।
मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस विषय पर अमेरिका के साथ उच्चस्तरीय चर्चा हुई है और भारत अपने व्यापारिक तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा एगा। साथियों, भारत के लिए असली चुनौती यहीं से शुरू होती है। रूस से कच्चा तेल खरीदने का आर्थिक तर्क यह रहा है कि उपलब्ध परिस्थि तियों में रूसी क्रूड भारतीय रिफाइनरियों के लिए प्रतिस्प र्धी कीमत और आपूर्ति विवि धीकरण का महत्वपूर्ण स्रोत बना है। यदि अमेरिकी दबाव के कारण भारतीय कंपनियों को रूसी तेल की खरीद घटा नी पड़ती है, तो विकल्प के रूप में इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्राजील, नाइजीरिया और अंगो ला जैसे स्रोतों से खरीद बढ़ाई जा सकती है।लेकिन किसी एक स्रोत को अचानक बड़े पैमाने पर बदलना केवल राज नीतिक निर्णय नहीं होता।
इसमें कीमत, क्रूड की गुण वत्ता, रिफाइनरी की तकनीकी जरूरत, समुद्री मालभाड़ा, बीमा, भुगतान व्यवस्था और उपलब्धता जैसे अनेक आर्थिक पहलू शामिल होते हैं।
इसलिए भारत का घोषित रुख, ऊर्जा सुरक्षा के लिए विभिन्न देशों से खरीद का विविधीकरण व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी 17 सितंबर को स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता देश की 140 करोड़ विशाल आबा दी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है और वह घटना क्रम पर नजर रख रहा है।
साथियों क्या इसे 12-13 सितंबर 2026 को भारत की मेजबानी में हुए ब्रिक्स सम्मे लन और भारत-रूस- चीन की सक्रिय कूटनीतिक निक टता की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। इसे सीधे तौर पर ब्रिक्स सम्मेलन की प्रति क्रिया कहना अभी प्रमाणित तथ्य नहीं होगा। समय का मेल जरूर ध्यान आकर्षित करता है, ब्रिक्स बैठक के तुरंत बाद अमेरिकी विधेयक का अंतिम चरण में पहुंचना और रूस-चीन-भारत के बीच आर्थिक एवं रणनीतिक संवाद का लगातार बढ़ना एक व्याप क भू- राजनीतिक संदर्भ बना ता है। लेकिन किसी कानून के पीछे सम्मेलन को प्रत्यक्ष कारण बताने के लिए ठोस सरकारी या विधायी प्रमाण आवश्यक होंगे। इसलिए इसे फिलहाल रणनीतिक प्रतिस्प र्धा की व्यापक पृष्ठभूमि और समय का संयोग, दोनों संभाव नाओं के रूप में देखना अद्दि क तथ्यपरक होगा। अमेरिका का घोषित उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय से मिलने वाले आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना है, जबकि भारत का घोषित उद्देश्य अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय आर्थिक हितों की रक्षा करना है। इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा बड़ा पहलू कच्चे तेल की कीमत है। यदि मध्य-पूर्व का संघर्ष लंबा चलता है और वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बना रहता है, तो महंगा रूसी तेल ही नहीं बल्कि गैर-रूसी तेल भी महंगा हो सकता है। ऐसे में भारत के सामने समस्या केवल यह नहीं होगी कि रूस से कितना तेल खरीदना है, बल्कि यह भी होगी कि यदि रूसी आपूर्ति घटती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपल ब्द्द अतिरिक्त तेल कितनी की मत पर मिलेगा। महंगा कच्चा तेल भारत के आयात बिल को बढ़ाता है, रुपये पर दबाव डाल सकता है और पेट्रोल- डीजल, परिवहन, विमानन, रसायन, प्लास्टिक तथा अनेक औद्योगिक क्षेत्रों की लागत को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा सुरक्षा को केवल पेट्रोलियम मंत्रालय का विषय नहीं बल्कि पूरी अर्थ व्यवस्था, महंगाई और आम उपभोक्ता से जुड़ा ठीक था से विषय माना जाता है।
साथियों, फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। मूडीज के आकलन में मज बूत घरेलू मांग, निवेश और अर्थव्यवस्था की अब तक दिखा ई गई मजबूती महत्वपूर्ण कार क हैं। एजेंसी ने साथ ही यह चेतावनी भी दी है कि लंबे समय तक ऊंची ऊर्जा कीमतें और अल नीनो से जुड़ी खाद्य महंगाई भविष्य में जोखिम बढ़ा सकती है। यानी भारत की अर्थव्यवस्था ने बाहरी झट कों को अब तक काफी हद तक संभाला है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि महंगा तेल लंबे समय तक बिना प्रभाव के सटीकता से गुजर जाएगा।
साथियों, इसी संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक की मौ द्रिक नीति और नकदी प्रबंधन भी महत्वपूर्ण हो जाता है। 17 सितंबर को 50,000 करोड़ रूपए की सरकारी प्रतिभूतियों की ओपन मार्केट आपरेशन बिक्री के जरिए अतिरिक्त बैंकिंग लिक्विडिटी को सोखने की प्रक्रिया बाजार के लिए महत्व पूर्ण संकेत है। सामान्य भाषा में समझें तो जब आरबीआई सरकारी बान्ड बेचता है, तो बैंकिंग प्रणाली से रुपये की अतिरिक्त नकदी बाहर जाती है। आरबीआई स्वयं स्पष्ट करता है कि ओएमओ बिक्री का उद्देश्य प्रणालीगत तरलता को कम करना है, जबकि ओ एमओ खरीद तरलता बढ़ाती है। आम ग्राहक के लिए इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके बैंक खाते से पैसा निकाल लिया गया या उसकी जमा राशि पर कोई सीधा खतरा पैदा हो गया। यह बैंकिंग प्रणा ली और वित्तीय बाजार के स्तर पर होने वाला संस्थागत ऑपरेशन है। हालांकि इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव ब्याज दरों के माध्यम से सामने आ सकता है। यदि बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त नकदी कम होती है तो बाजार की फंडिंग परिस् िथतियां बदल सकती हैं और भविष्य में जमा तथा ऋण दरों पर असर पड़ सकता है। लेकि न किसी मौजूदा ऋण की ईएमआई केवल इस ओएमओ बिक्री के कारण तुरंत बढ़ना जरूरी नहीं है, इसका वास्त विक प्रभाव ऋण के प्रकार, ब्याज दर की संरचना और भविष्य में आरबीआई के व्यापक मौद्रिक रुख पर सटी कता से निर्भर करेगा।
साथियों, इस प्रकार सितं बर 2026 में भारत के सामने एक असाधारण आर्थिक संतु लन की स्थिति है। एक तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध, दूसरी तरफ रूस से प्रतिस्पर्धी ऊर्जा आपूर्ति, तीसरी तरफ मध्य-पूर्व का भू-राजनी तिक संकट और चैथी तरफ घरेलू आर्थिक विकास को बनाए रखने की आवश्यकता। भारत के लिए समाधान किसी एक देश पर निर्भर रहने में नहीं बल्कि ऊर्जा स्रोतों, व्यापा रिक साझेदारों, भुगतान प्रणा लियों और रणनीतिक भंडार का लगातार विविधीकरण कर ने में दिखाई देता है। रूस से खरीद, पश्चिम एशिया के पारंपरिक आपूर्तिकर्ता, अमेरि का और अफ्रीकी तथा लैटिन अमेरिकी स्रोत, सभी को परि स्थितियों के अनुसार संतुलित करना भारत की ऊर्जा रण नीति का हिस्सा बन सकता है। दीर्घकाल में घरेलू उत्पा दन, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक् िट्रक मोबिलिटी, ऊर्जा दक्षता और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार आयात जोखिम को कम करने में सटी कता से मदद कर सकता है।
साथियों सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के सा मने फिलहाल कोई तत्काल 100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लागू नहीं हुआ है, बल्कि उसके लागू होने की संभावित शक्ति वाला अमेरिकी कानून राष्ट्रपति के स्तर पर लंबित है। इसलिए आने वाले दिनों में ट्रंप प्रशासन का निर्णय, भारत -अमेरिका व्यापार वार्ता, रूस से भारतीय तेल खरीद की दिशा, मध्य-पूर्व में संघर्ष की अवधि और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, ये सभी कारक मिलकर आगे की तस् वीर तय करेंगे।
मूडीज द्वारा 7 प्रतिशत वृद्धि अनुमान यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर घरेलू मांग और नि वेश की ताकत मौजूद है, लेकिन महंगा तेल इस मज बूती की परीक्षा ले सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह केवल रूस बनाम अमेरिका या तेल बनाम टैरिफ का मामला नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता, महंगाई नियंत्रण,आर्थिक विकास और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन, इन सभी की एक साथ परीक्षा है। आने वाले समय में भारत की नीति का सबसे बड़ा प्रश्न यही रहेगा कि वह सस्ती और विश्वसनीय ऊर्जा की जरूरत को पूरा करते हुए अमेरिका समेत अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ संबंधों को किस प्रकार संतुलित करता है। यही संतुलन यह तय करेगा कि मौजूदा वैश्विक संकट भारत की विकास गति पर अस्थायी दबाव बनता है या देश की आर्थिक और ऊर्जा रणनीति को और अधिक विविध एवं आत्मनिर्भर बनाने का अवसर साबित होता है।
अमेरिकी टैरिफ तलवार, महंगा तेल और भारत की अर्थव्यवस्था – ऊर्जा सुरक्षा की अग्निपरीक्षा
