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परीक्षा-पेपर लीक आंदोलन से कौशल – अंतर, उद्योग – अनुकूल शिक्षा और युवा, गतिशील शासन व्यवस्था तक – क्या भारत में प्रशासन की नई पीढ़ी का आरंभ हो रहा है?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
गोंदिया। वैश्विक स्तर पर वर्ष 2026 में भारत एक ऐसे ऐतिहासिक परिवर्तनकाल से गुजर रहा है, जहां कृत्रिम बु द्धिमत्ता अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आॅटोमेशन, रोबो टिक्स, डिजिटल अर्थव्यवस्था, साइबर सुरक्षा, हरित प्रौद्योगि की और डेटा-आधारित शा सन ने शिक्षा, रोजगार, उद्योग तथा प्रशासन की पारंपरिक संरचनाओं को तेजी से बद लना शुरू कर दिया है। आज देश और विश्व में बड़ी संख्या में इंजीनियर, वकील, डाॅक्टर, प्रबंधन विशेषज्ञ, तकनीकी पेशे वर तथा विभिन्न विषयों के स्नातक तैयार हो रहे हैं, लेकि न मैं एडवोकेट किशन सनमुख दास भावनानी गोंदिया महा राष्ट्र यह मानता हूं कि डिग्री प्राप्त करने और रोजगार के लिए वास्तव में सक्षम बनने के बीच एक गंभीर अंतर दिखा ई देता है। अनेक युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उद्योग की अपेक्षाओं के अनु रूप व्यावहारिक कौशल, तक नीकी दक्षता, समस्या-समा धान क्षमता, संवाद – कौशल टीमवर्क, डिजिटल समझ तथा बदलती तकनीक के साथ स्वयं को निरंतर अद्यतन करने की क्षमता में पीछे रह जाते हैं। दूसरी ओर उद्योग जगत को प्रशिक्षित और कार्य के लिए तैयार युवा नहीं मिलते। यही स्थिति शिक्षा और रोजगार के बीच नहीं, बल्कि डिग्री और दक्षता, ज्ञान और प्रयोग, युवा आकांक्षा और संस्थागत क्षम ता तथा सरकारी नीति और जमीनी परिणाम के बीच मौ जूद व्यापक अंतर को दर्शाती है। इसी पृष्ठभूमि में बीती 28 जुलाई 2026 को भारतीय पीएम द्वारा केंद्र सरकार के सचिवों के साथ दूसरी उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता विशेष महत्व रखती है। बैठक में वित्त एवं अर्थव्यवस्था, वा णिज्य एवं उद्योग तथा प्रौद्योगि की से जुड़े मंत्रालयों और वि भागों की भविष्य की कार्ययो जना पर विचार किया गया। प्रधानमंत्री ने सरकारी व्यवस्था में विभागीय स्तर पर मौजूद क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर बाधा ओं को कम करने, बेहतर स मन्वय स्थापित करने तथा शासन को अधिक युवा, गति शील नवाचारी और भविष्य के अनुरूप बनाने पर बल दिया। उन्होंने यह भी रेखांकित कि या कि सरकार को बदलती चुनौतियों और नए अवसरों के अनुसार निरंतर स्वयं को विकसित करना चाहिए। यह संदेश केवल प्रशासनिक सु धार का सामान्य विचार नहीं है, बल्कि तेजी से बदलती अर्थ व्यवस्था और युवा अपेक्षाओं के बीच शासन की नई भूमिका का संकेत है। साथियों, इस उच्च स्तरीय बैठक, उद्योग और शिक्षा के बीच कौशल-अंतर इंटर्नशिप की आवश्यकता ए आई युग की नई रोजगार चु नौतियां, परीक्षा-पेपर लीक के विरुद्ध युवा आंदोलन, डिजि टल लोकतंत्र का विस्तार और प्रशासन को युवा, गतिशील तथा अनुकूलनशील बनाने की आवश्यकता ये सभी अलग- अलग विषय नहीं हैं। ये भारत के भविष्य के एक ही बड़े प्र श्न के विभिन्न आयाम हैं क्या देश की शिक्षा, अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था युवा पी ढ़ी की बदलती आकांक्षाओं के अनुरूप स्वयं को समय पर बदल पाएगी? भारत के युवाओं ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वे केवल रोजगार नहीं, बल्कि निष्पक्ष अवसर चाहते हैं केव ल डिग्री नहीं, बल्कि उपयोगी कौशल चाहते हैं केवल डिजि टल सुविधा नहीं, बल्कि डिजि टल अधिकार और पारदर्शिता चाहते हैंय केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध परिणाम चाहते हैं। सरकार के सामने चुनौती केवल अधिक योजना एं बनाने की नहीं, बल्कि योज नाओं को परिणामों से जोड़ने की है। यदि शिक्षा उद्योग से जुड़े, इंटर्नशिप वास्तविक अनु भव दे, कौशल भविष्य की अर्थ व्यवस्था के अनुरूप हों, परीक्षा प्रणाली विश्वसनीय बने, प्रशा सन संवादशील हो और युवा ओं को नीति-निर्माण में भागी दारी मिले, तो भारत की युवा शक्ति विश्व की सबसे बड़ी विकास-शक्ति बन सकती है।
साथियों, आज विश्व की अर्थव्यवस्था केवल श्रम-आ धारित नहीं, बल्कि ज्ञान, डेटा, नवाचार और कौशल-आधा रित अर्थव्यवस्था बन रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कई कार्यों को तेज, स्वचालित और अधिक सटीक बना रही है। इंजीनियरिंग में डिजाइन, को डिंग, परीक्षण और उत्पादन की प्रक्रियाएं बदल रही हैं कानून के क्षेत्र में कानूनी शोध, दस्ता वेजों का विश्लेषण और न्यायि क डेटा का उपयोग तकनीक से प्रभावित हो रहा हैय चि कित्सा में निदान-सहायता डिजिटल स्वास्थ्य और व्यक्ति गत उपचार के नए माॅडल विकसित हो रहे हैं बैंकिंग में एल्गोरिदम, फिनटेक और सा इबर सुरक्षा का महत्व बढ़ रहा है। इसलिए भविष्य में केवल किसी विषय की डिग्री पर्याप्त नहीं होगी। युवा को अपने मूल विषय के साथ डिजिटल साक्षरता, एआई की समझ, डेटा विश्लेषण, नैतिक निर्णय क्षमता, रचनात्मकता और मान व-केंद्रित समस्या-समाधान की दक्षता भी सटीकता से वि कसित करनी होगी।
साथियों, भारत में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में इंजीनियर तै यार होने के बावजूद रोजगार की उपलब्धता और कौशल की मांग के बीच अंतर पर ल गातार चर्चा होती रही है। एक अध्ययन में भारत में प्रतिवर्ष लगभग नौ लाख इंजीनियर तैयार होने और तकनीकी क्षेत्र में रोजगार- वृद्धि की तुलना में स्नातकों की संख्या अधिक होने का प्रश्न उठाया गया है। अध्ययन ने यह भी संकेत दिया कि केवल पारंपरिक नौ करी-आधारित माॅडल पर्याप्त नहीं हो सकता और तक नीकी शिक्षा को उद्यमिता स्था नीय नवाचार तथा नए प्रकार के सूक्ष्म उद्यमों से जोड़ने की आवश्यकता है। हालांकि ऐसे आंकड़ों को विभिन्न संस्थानों और क्षेत्रों की अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार सम झना चाहिए, लेकिन मूल चुनौ ती स्पष्ट है उच्च शिक्षा की संख्या बढ़ना अपने आप में रोजगार-योग्यता की गारंटी नहीं है। यही कारण है कि पीएम द्वारा उद्योग जगत के सहयोग से नए और कौशल- आधारित पाठ्यक्रम विकसित करने की आवश्यकता पर दि या गया जोर अत्यंत प्रासंगिक है। शिक्षा संस्थानों में पाठ्य क्रम कई बार उद्योग की बद लती आवश्यकताओं की तुल ना में धीमी गति से बदलते हैं। जब तक विश्वविद्यालय किसी नई तकनीक को पाठ्य क्रम में शामिल करते हैं, तब तक उद्योग अगले स्तर की तकनीक अपनाना शुरू कर देता है। इसलिए पाठ्यक्रम निर्माण केवल विश्वविद्यालयों या नियामक संस्थाओं का विषय नहीं रह सकता।
उद्योग, शिक्षा संस्थान, शोध संगठन, स्टार्टअप, स्था नीय प्रशासन और युवाओं को मिलकर भविष्य के कौशल की रूपरेखा तैयार करनी होगी। 2025 की सरकारी समीक्षा के अनुसार कौशल विकास कार्यक्रमों में एआई, इंडस्ट्री 4.0, हरित रोजगार और डिजि टल सेवाओं जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए विशेष पाठ्यक्रम तथा नई भूमिका-आधारित प्रशि क्षण संरचनाएं विकसित की गई हैं। अब आवश्यकता इन पहलों को व्यापक, गुणवत्ता पूर्ण और परिणाम-आधारित बनाने की है।
साथियों, कौशल विकास का अर्थ केवल कुछ सप्ताह या महीनों का प्रमाणपत्र प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। वास्तविक कौशल वह है जिसे युवा कार्यस्थल पर प्रयोग कर सके, समस्या का समाधान कर सके और बदलती परिस्थितियों में विकसित कर सके। उदाह रण के लिए, एक इंजीनियर को केवल तकनीकी सिद्धांत नहीं, बल्कि वास्तविक परियो जना, टीम में कार्य, उत्पादन प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण और ग्राहक की आवश्यकता को समझना चाहिए। एक विधि स्नातक को केवल कानून की धाराएं नहीं, बल्कि डिजिटल कानूनी शोध, दस्तावेज नि र्माण, मध्यस्थता, साइबर का नून, डेटा संरक्षण तथा न्याय तक पहुंच की व्यावहारिक समझ भी होनी चाहिए। इसी प्रकार प्रबंधन स्नातक को केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि डेटा, बाजार, उद्यमिता और संगठनात्मक निर्णय की क्षम ता विकसित करनी होगी। इसलिए शिक्षा को परीक्षा में उत्तर देने से आगे बढ़ाकर वास्तविक जीवन की समस्या हल करने की दिशा में ले जाना आवश्यक है। इंटर्नशिप इस अंतर को कम करने का महत्व पूर्ण माध्यम बन सकती है। प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना का उद्देश्य युवाओं को वास्त विक व्यावसायिक वातावरण का अनुभव प्रदान करना और शिक्षा तथा उद्योग की आवश्य कताओं के बीच सेतु बनाना है। योजना के अंतर्गत युवाओं को 12 महीने तक कार्यस्थल अनुभव उपलब्ध कराने की संरचना बनाई गई है। लेकिन इंटर्नशिप की सफलता केव ल अवसरों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। यह देख ना होगा कि कितने युवा वा स्तव में प्रशिक्षण पूरा करते हैं, उन्हें कितना व्यावहारिक ज्ञान मिलता है, कितनों को रोजगार या उद्यमिता का अव सर मिलता है और क्या इंटर्न शिप के बाद उनकी आय तथा रोजगार-क्षमता में सुधार हो ता है। इंटर्नशिप को केवल औपचारिक प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि प्रशिक्षक, वास्तविक प रियोजना, कौशल मूल्यांकन और करियर मार्गदर्शन से जो ड़ना होगा।
साथियों, हाल के छात्र आंदोलनों और उनसे उत्पन्न राजनीतिक तथा प्रशासनिक प्रभावों को कुछ विशेषज्ञ युवा शक्ति की बढ़ती लोकतांत्रिक भूमिका के रूप में देख रहे हैं।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, परीक्षा-सुधार की मांगों तथा संसद और सार्वजनिक विमर्श पर आंदोलन के प्रभाव को यह संकेत माना जा सकता है कि युवा अब केवल नीतियों के निष्क्रिय लाभार्थी नहीं रह ना चाहते। वे पारदर्शिता, ज वाबदेही और समयबद्ध समा धान की मांग कर रहे हैं। हालांकि किसी भी आंदोलन के राजनीतिक परिणाम का अंतिम मूल्यांकन तथ्यों, संस्था गत निर्णयों और दीर्घकालिक सुधारों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। किसी एक घटना को सीधे किसी सरकार की राजनीतिक सुरक्षा या रा जनीतिक असुरक्षा का निश्चि त प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। फिर भी यह कहा जा सकता है कि सरकारों के लिए युवाओं की शिकायतों को समय पर सुनना, संवाद स्थापित करना और सुधारों के परिणाम दिखाना लोकतांत्रि क स्थिरता तथा जनविश्वास के लिए महत्वपूर्ण है।
साथियों, युवा आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश संभवतः यह है कि शासन को प्रतिक्रि यात्मक नहीं बल्कि पूर्वानुमान -आधारित होना चाहिए। यदि परीक्षा प्रणाली में तकनीकी क मजोरी है, तो समस्या उत्पन्न होने के बाद जांच करने के बजाय पहले से सुरक्षा परीक्षण, स्वतंत्र आॅडिट, एन्क्रिप्शन, नि यंत्रित पहुंच, साइबर निगरानी और जवाबदेही की स्पष्ट व्यव स्था होनी चाहिए। यदि रोज गार के लिए कौशल की कमी है, तो युवाओं के स्नातक बनने के बाद प्रशिक्षण देने के बजाय विद्यालय और महाविद्यालय स्तर से ही उद्योग-अनुकूल कौशल विकसित किए जाने चाहिए। यदि युवाओं में किसी नीति को लेकर भ्रम है, तो वि वाद बढ़ने के बाद स्पष्टीकरण देने के बजाय नीति निर्माण के समय से ही सार्वजनिक संवाद होना चाहिए। यही आ धुनिक, संवेदनशील और दूर दर्शी प्रशासन की पहचान है। आज की समस्याएं एक मंत्रा लय या एक विभाग तक सी मित नहीं रहतीं। उदाहरण के लिए, युवा रोजगार का प्र श्न शिक्षा कौशल उद्योग वित्त प्रौद्योगिकी सामाजिक सुरक्षा और राज्य सरकारों से जुड़ा है। इसलिए संपूर्ण सरकार दृष्टिकोण आवश्यक है।
साथियों, भारत के सामने सबसे बड़ी संभावना उसकी युवा आबादी है, लेकिन जन सांख्यिकीय लाभांश तभी वा स्तविक लाभ बनेगा जब शिक्षा गुणवत्तापूर्ण हो, कौशल बाजा र की आवश्यकता से जुड़े हों, रोजगार के अवसर बढ़ें और उद्यमिता को प्रोत्साहन मिले। हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है इसलिए रोजगार की अ वधारणा को व्यापक बनाना होगा। स्टार्टअप, सूक्ष्म उद्यम, स्थानीय डिजिटल सेवाएं, हरित उद्योग, कृषि-प्रौद्योगि की स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी, सा इबर सुरक्षा और सामाजिक उद्यमिता भविष्य के अवसर बन सकते हैं। युवाओं को नौकरी खोजने वाले के साथ -साथ रोजगार सृजक बनने के लिए भी तैयार करना हो गा। भारत/ 2047 के लक्ष्य के लिए युवाओं के लिए शास न से आगे बढ़कर युवाओं के साथ शासन की अवधारणा अपनानी होगी। युवा नीति- निर्माण में केवल प्रतीकात्मक रूप से नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से शामिल हों। विश्वविद्या लयों, स्थानीय निकायों, सर कारी विभागों, नीति मंचों और डिजिटल परामर्श प्रणालियों में युवाओं के सुझाव लिए जाएं। उनकी राय पर क्या निर्णय हुआ, इसका सार्वजनिक उत्तर भी दिया जाए। इससे युवाओं को केवल विरोध कर ने का नहीं, बल्कि समाधान निर्माण का अवसर मिलेगा। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इस का सटीक विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि एआई युग में भारत की सफलता इस बात से निर्धारित नहीं होगी कि देश कितने इंजीनियर, वकील, प्रोफेशनल या स्नातक तैयार करता है, बल्कि इस बात से होगी कि उनमें से कितने युवा नवाचार कर सकते हैं, सम स्याओं का समाधान कर सक ते हैं, नई तकनीक के साथ स्वयं को बदल सकते हैं, रोज गार और उद्यमिता के अवसर उत्पन्न कर सकते हैं तथा लो कतांत्रिक शासन में रचनात्म क भागीदारी कर सकते हैं। यदि सरकार, उद्योग, शिक्षा संस्थान और युवा मिलकर इस कौशल-अंतर को समाप्त करने की दिशा में कार्य करें, तो भारत में केवल डिजिटल इंडिया नहीं, बल्कि कौशल- संपन्न, रोजगार-सक्षम, नवा चारी और जवाबदेह भारत की नई पीढ़ी का निर्माण संभव होगा। यही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला और युवा शक्ति की सबसे बड़ी लोक तांत्रिक उपलब्धि हो सकती है।

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