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डिजिटल युग में बच्चों का भविष्य और बढ़ती चुनौतियां – क्या गोवा कसीनो ;संशोधनद्ध कानून माडल पूरे देश में लागू होना चाहिए

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बन ने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में देश के सामने केवल आर्थिक वि कास की चुनौती नहीं है, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व, कानून का प्रभावी शासन, युवाओं का भविष्य और डिजिटल युग में बदलती जीवनशैली के अनुरूप आधुनिक कानून बनाने की आवश्यकता भी उतनी ही मह त्वपूर्ण हो गई है। जुआ, कैसीनो और आनलाइन सट्टेबाजी इन्हीं विषयों में से एक है, जिसपर लंबे समय से देश में स्पष्ट, समग्र और आधुनिक नीति का अभाव दिखाई देता है। भारत में जुआ और कैसीनो के लिए कोई एक समान केंद्रीय (राष् ट्रीय) कानून नहीं है।अधिकांश मामलों में अभी भी पब्लिक गेब लिंग एक्ट,1867 (जहाँ लागू है) तथा राज्यों के अपने -अपने कानून लागू होते हैं। गोवा, सिक्किम और कुछ हद तक दमन-दीव में लाइसेंस प्राप्त कैसीनो की अनुमति है, जबकि कई राज्यों में जुआ पूर्ण या आंशिक रूप से प्रतिबंधित है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समान माॅडल कानून की आव श्यकता की चर्चा समय-समय पर होती रही है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते बताना चाहूंगा कि, वर्तमान डिजिटल प्रौद्योगि की के दौर में सोशल मीडिया, आनलाइन गेमिंग, आनलाइन कसीनो, बेटिंग ऐप्स, फैंटेसी स्पोर्ट्स प्लेटफार्म शार्ट वीडियो ऐप्स, लाइव स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म, एआई आधारित चैट प्लेटफार्म, वीडियो शेयरिंग साइट्स तथा अन्य डिजिटल माध्यमों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। इनका सकारात्मक उपयोग शिक्षा, नवाचार और संचार के लिए उपयोगी है,लेकिन अनियंत्रित और कम उम्र में उपयोग बच्चों एवं युवाओं में नशे जैसी डिजि टल लत, मानसिक तनाव, पढ़ाई में गिरावट, आर्थिक नुकसान और सामाजिक समस्याओं का कारण भी बन रहा है। इसी चिंता को देखते हुए आस्ट्रेलिया ने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर कड़े प्रतिबंधों की दिशा में कदम उठाए हैं, जबकि ब्रिटेन सहित कई देशों ने आयु सत्यापन आनलाइन सुरक्षा और बाल संरक्षण संबंद्दी नियमों को सख्त बनाया है।
भारत में भी डिजिटल सुर क्षा, आनलाइन गेमिंग और बच्चों की सुरक्षा को लेकर नीतिगत स्तरपर लगातार विचार-विमर्श और नियामकीय सटीकता से प्रयास जारी हैं।
साथियों, इसी क्रम में गोवा सरकार ने 16 जुलाई 2026 को अधिसूचित गोवा कसीनो (संशोधन) कानून के तहत कसीनो में प्रवेश के लिए न्यून तम आयु 21 वर्ष निर्धारित कर दी। इसका उद्देश्य युवाओं को जुए की लत और उसके सामा जिक – आर्थिक दुष्प्रभावों से बचाना है वर्तमान में अधिकांश भारतीय राज्यों में कसीनो या आनलाइन जुए के संबंध में अलग-अलग कानून हैं, लेकिन गोवा की तरह 21 वर्ष की स्प ष्ट आयु-सीमा का माडल सभी राज्यों में समान रूप से लागू नहीं है। कई राज्यों ने जुए पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगाया है, जबकि कुछ राज्यों ने आन लाइन गेमिंग और सट्टेबाजी पर अलग-अलग नियम बनाए हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सर कारें मिलकर बच्चों और युवाओं की सुरक्षा के लिए सोशल मी डिया, आनलाइन गेमिंग, आन लाइन कसीनो और अन्य व्यस नी डिजिटल प्लेटफार्म पर प्रभा वी आयु सत्यापन, समय- सीमा, अभिभावकीय नियंत्रण तथा कठोर नियामकीय व्यवस्था लागू करें। यदि गोवा का 21 वर्ष आयु-सीमा माडल अन्य राज्यों में भी अपनाया जाता है, तो यह युवा पीढ़ी को डिजिटल और जुए की लत से बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकता है।
साथियो 16 जुलाई 2026 से गोवा सरकार द्वारा उठाए गए दो महत्वपूर्ण कदम, 21 वर्ष से कम आयु के युवाओं के कैसीनो में प्रवेश पर प्रतिबंध तथा कैसीनो उद्योग पर कर एवं नियामक व्यवस्था को अ धिक सुदृढ़ बनाने की पहल ने राष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस को जन्म दिया है। यह बहस केवल गोवा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न पूरे भारत के सामने खड़ा करती है कि यदि किसी राज्य में कै सीनो या जुए की अनुमति है, तो क्या उसे सख्त कानून पार दर्शी कर व्यवस्था और सामा जिक उत्तरदायित्व के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए? और यदि किसी राज्य में इस की अनुमति नहीं है, तो क्या अवैध जुआ और आनलाइन सट्टे बाजी पर नियंत्रण के लिए सटी कता से आधुनिक कानून नहीं बनने चाहिए?
साथियों, गोवा भारत का प्रमुख पर्यटन राज्य है, जहाँ वर्षों से लाइसेंस प्राप्त कैसीनो संचालित हो रहे हैं। देश और विदेश से आने वाले पर्यटक राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्व पूर्ण योगदान देते हैं। कैसीनो उद्योग से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है, हजारों लोगों को रोजगार मिलता है और पर्यटन क्षेत्र को गति मिलती है। किंतु दूसरी ओर जुए की लत, आर्थिक बर्बादी, पारिवारिक विवाद, मानसिक तनाव, अपरा ध और युवाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव जैसी चिंताएँ भी सा मने आती रही हैं। इसलिए गोवा सरकार ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि आर्थिक गतिविद्दि तभी स्वीकार्य है, जब वह सामा जिक उत्तरदायित्व और सख्त कानूनी निगरानी के साथ संचा लित हो। 21 वर्ष से कम आयु के युवाओं के कैसीनो में प्रवेश पर प्रतिबंध एक अत्यंत दूरदर्शी कदम माना जा सकता है। विश्वभर के मनोवैज्ञानिक और न्यूरोसाइंस विशेषज्ञ मानते हैं कि किशोरावस्था और प्रारंभिक युवावस्था में निर्णय लेने की क्षम ता पूरी तरह परिपक्व नहीं होती। इस आयु में जोखिम उठाने की प्रवृत्ति अधिक होती है और तत्काल लाभ का आकर्षण व्य क्ति को गलत निर्णयों की ओर ले जा सकता है।
यदि इस अवस्था में जुए की लत लग जाए तो उसका प्रभाव केवल आर्थिक नहीं बल्कि मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। इसलिए गोवा का यह निर्णय केवल प्रवेश रोकने का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा का निर्णय है।
साथियों गोवा सरकार का दूसरा महत्वपूर्ण कदम कैसीनो उद्योग को अधिक उत्तरदायी कर व्यवस्था और नियामक ढाँचे के अंतर्गत लाने का है। किसी भी आर्थिक गतिविधि का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं होना चाहिए। यदि सर कार कर के माध्यम से प्राप्त राजस्व का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, नशामुक्ति, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर करती है, तो यह व्यवस्था समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है। कराधान का अर्थ केवल सरकारी आय बढ़ाना नहीं, बल्कि आर्थिक गतिवि धियों में सटिका से पारदर्शि ता, जवाबदेही और वैधता स्था पित करना भी होता है।
साथियों, भारत में वर्तमान स्थिति काफी असमान है। गोवा सिक्किम और दमन जैसे कुछ क्षेत्रों में सीमित रूप से कैसीनो की अनुमति है, जबकि अधिकांश राज्यों में सार्वजनिक जुआ प्रतिबंधित है।
इसके बावजूद आनलाइन जुआ विदेशी बेटिंग प्लेटफार्म और डिजिटल सट्टेबाजी का तेजी से विस्तार हो रहा है। लाखों भारतीय मोबाइल फोन के माध्यम से ऐसे प्लेटफार्म तक पहुँच रहे हैं, जिन पर राज्य सरकारों का प्रत्यक्ष नियं त्रण नहीं है। इससे कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, साइबर अपरा ध और युवाओं में जुए की लत जैसी समस्याएँ बढ़ने की आशं का बनी रहती है। यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि केवल पुराने कानूनों के सहारे आधु निक डिजिटल चुनौतियों का सटीकता से समाधान संभव नहीं है।
साथियों, भारत में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जुआ और सट्टेबाजी से जुड़े अनेक कानून औपनिवेशिक काल के हैं, जबकि आज की दुनियाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल भुग तान और आनलाइन गेमिंग के युग में प्रवेश कर चुकी है। आज कोई व्यक्ति कुछ ही मि नटों में मोबाइल फोन से अंतर राष्ट्रीय बेटिंग वेबसाइट पर पैसा लगा सकता है। यदि सरकार केवल प्रतिबंध की नीति अपनाती है, तो अवैध गतिवि धियाँ भूमिगत हो जाती हैं। यदि पूर्ण स्वतंत्रता देती है, तो सामाजिक नुकसान बढ़ सक ता है। इसलिए आवश्यकता एक संतुलित नीति की है,जहाँ सटीकता से कानून भी हो, निगरानी भी हो और सामा जिक उत्तरदायित्व भी हो।
साथियों, मेरे विचार से भारत को अब एक माडल जुआ एवं कैसीनो विनियमन कानून (माडल गंबलिंग एंड कैसीनो रेगुलेशन लाॅ) तैयार करना चाहिए। यह कानून पूरे देश पर अनिवार्य रूप से लागू न होकर राज्यों के लिए एक आ दर्श माडल हो सकता है। प्रत् येक राज्य अपनी सामाजिक सांस्कृतिक और आर्थिक परि स्थितियों के अनुसार इसे अप नाने या संशोधित करने का अधिकार रखे।इससे देशभर में न्यूनतम कानूनी मानक (मिनि मम् लीगल स्टैण्डर्ड्स) स्थापित होंगे और कानूनी अस्पष्टता दूर होगी। इस माडल कानून का पहला सिद्धांत होना चाहिए, युवाओं की सुरक्षा सर्वोपरि। पूरे देश में 21 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के कैसीनो या उच्च जोखिम वाले जुआ प्लेटफार्म तक पहुँचने पर प्रति बंद्द होना चाहिए। आधार, पास पोर्ट या अन्य सरकारी पहचान – पत्र के माध्यम से डिजिटल आयु सत्यापन अनिवार्य बनाया जाए। नियमों का उल्लंघन कर ने वाले संचालकों पर भारी जुर्माना, लाइसेंस रद्द करने और आपराधिक कार्रवाई का सटी कता से प्रावधान होना चाहिए।
साथियों, दूसरा महत्वपूर्ण प्रावधान जिम्मेदार जुआ (रिस्पां सिबल गेबलिंग) होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को जुए की लत से बचाना चाहता है, तो उसे स्वैच्छिक प्रतिबंध का अधिकार मिलना चाहिए। परि वार के सदस्यों को भी विशेष परिस्थितियों में न्यायिक प्रक्रि या के माध्यम से ऐसे व्यक्ति के प्रवेश पर रोक लगाने का अधिकार मिल सकता है। प्रत्ये क कैसीनो में सटीकता से मनोवैज्ञानिक परामर्श, हेल्पला इन चेतावनी संदेश और नशा मुक्ति सहायता केंद्र अनिवार्य किए जाने चाहिए।
साथियों, तीसरा व चैथा महत्वपूर्ण पहलू पारदर्शी कर व्यवस्था है। कैसीनो उद्योग से प्राप्त राजस्व का निश्चित प्रति शत शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, मान सिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति अभि यान और महिला सुरक्षा कार्य क्रमों पर खर्च करना कानून द्वारा अनिवार्य किया जा सक ता है। इससे जनता को यह विश्वास मिलेगा कि सरकार केवल कर संग्रह नहीं कर रही, बल्कि सामाजिक कल्याण के लिए उसका उपयोग भी कर रही है। चैथा पक्ष डिजिटल और आनलाइन जुए का निय मन है। विदेशी बेटिंग प्लेट फार्म, अवैध ऐप और अनधिकृत वेबसाइटें भारतीय युवाओं को तेजी से आकर्षित कर रही हैं। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रा लय, गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रा लय, रिजर्व बैंक, प्रवर्तन निदेशा लय, साइबर पुलिस और राज्यों की एजेंसियों के बीच समन्वित व्यवस्था विकसित कर ऐसे प्लेट फार्मों पर प्रभावी नियंत्रण सटी कता से स्थापित किया जाना चाहिए। साथियों, कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि जुआ सामा जिक बुराई है और इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर देना चा हिए। यह विचार अपनी जगह सम्माननीय है। वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि जहाँ माँग मौजूद है, वहाँ पूर्ण प्रतिबंध से अवैध बाजार और संगठित अपराध बढ़ते हैं। विश्व के अनेक देशों का अनुभव बताता है कि कठोर नियमन, पारदर्शी कर व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा उपाय पूर्ण प्रतिबंध की तुलना में अ धिक प्रभावी सिद्ध हुए हैं इस लिए प्रत्येक राज्य को अपनी परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए, किंतु किसी भी स्थिति में अवै ध जुए और डिजिटल सट्टेबाजी को कानून से बाहर नहीं छोड़ा जा सकता।
साथियों, मेरे मत में भारत सरकार को विधि आयोग, नीति आयोग, गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रा लय, पर्यटन मंत्रालय, इलेक्ट्रा निक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा सभी राज्यों के प्रतिनिधियों की एक उच्चस्त रीय समिति गठित करनी चा हिए। यह समिति विश्व के सफ ल माडलों का अध्ययन कर भारतीय परिस्थितियों के अनु रूप एक व्यापक माडल कानून तैयार करे।
इस कानून में 21 वर्ष की न्यूनतम आयु, डिजि टल पहचान सत्यापन, लाइसेंस प्रणाली, सीसीटीवी निगरानी, मनी लाॅन्ड्रिंग विरोधी नियम, जिम्मेदार जुआ कार्यक्रम, स्वैच्छिक प्रतिबंध व्यवस्था, कर पारदर्शिता, नियमित आडिट, आनलाइन प्लेटफार्म का पंजी करण, भ्रामक विज्ञापनों पर रोक तथा कठोर दंड जैसी व्यवस् थाएँ शामिल होनी चाहिए।

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