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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश – अब हर राज्य में एक जैसी होगी समयपूर्व रिहाई की नीति, ई-प्रिजन्स पोर्टल से होगी डिजिटल निगरानी

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारत की न्यायपालिका ने बीती 16 जुलाई 2026 को एक ऐसा ऐतिहासिक और मानवीय क दम उठाया है, जो केवल जेल प्रशासन या कैदियों तक सी मित नहीं है, बल्कि यह भार तीय लोकतंत्र, संविधान, मान वाधिकार और न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता का भी प्रती क बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा दायर जनहि त याचिका पर सुनवाई करते हुए देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर 70 वर्ष से अधिक आयु के, गंभीर एवं लाइलाज बीमा रियों से पीड़ित तथा शारीरि क रूप से अक्षम कैदियों की समयपूर्व अथवा अनुकंपा के आधार पर रिहाई के लिए एक समान, व्यापक, पारदर्शी और मानवीय नीति तैयार करें। यह आदेश भारतीय न्यायिक इतिहास में इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि पहली बार सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे देश में एकरूपता लाने के उद्देश्य से स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते इस आर्टिकल के माध्यम से आम जनता को जानकारी देना चाहूंगा कि भारतीय संविधान का मूल दर्शन केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं,बल्कि उन्हें सुधार का अवसर देना भी है। संविधान का अनुच्छेद 21 प्र त्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार प्र दान करता है। यह अधिकार जेल की चारदीवारी के भीतर भी समाप्त नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति जीवन के अंति म पड़ाव पर है, कैंसर, एड्स, अंतिम चरण की किडनी या अन्य असाध्य बीमारी से जूझ रहा है अथवा ऐसा दिव्यांग है जो अपना दैनिक कार्य स्वयं नहीं कर सकता, तो उसके साथ मानवीय व्यवहार करना एक सभ्य लोकतंत्र का नैतिक और संवैधानिक दायित्व है।
सुप्रीम कोर्ट का यह आ देश इसी संवैधानिक दर्शन को व्या वहारिक रूप देने की दि शा में उठाया गया एक निर्णाय क कदम है। अदालत ने इस दलील को स्वीकार किया कि गंभीर रूप से अक्षम और मृत्यु शय्या पर पड़े कैदियों को जेल में बंद रखना न केवल क्रूरता है, बल्कि यह देश के नागरिकों को मिलने वाले स मानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और जीवन के अधिका र (अनुच्छेद 21) का भी खुला उल्लंघन है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब कोई बुजुर्ग या गंभीर रूप से बीमार कैदी जेल से बाहर आए, तो उसे अचानक लावारिस न छोड़ दिया जाए। रिहाई के बाद भी उसे निरंतर चिकित्सा सहायता मिलती रहे, यदि उसका परिवार उसे अपनाने से इनकार कर दे तो उसे वृद्धाश्रम या सरकारी आ श्रय गृहों में जगह मिले, और सामाजिक कल्याण योजना ओं के माध्यम से उसे वित्तीय सहायता या पेंशन मिल सके। यह समग्र दृष्टिकोण इस फै सले को एक सामान्य अदाल ती आदेश से ऊपर उठाकर एक महान सामाजिक सुधार और मानवीय क्रांति का दस्ता वेज बनाता है, जिसकी गूंज आगामी 19 जनवरी 2027 को होने वाली सुनवाई में देश के सामने होगी।
साथियों बात अगर हम देश में अभी तक समयपूर्व रि हाई की व्यवस्था को समझने की करें तो यह प्रत्येक राज्य में अलग – अलग नियमों पर आधारित रही है। कहीं कैदी को 14 वर्ष बाद विचार का अवसर मिलता है, कहीं 20 वर्ष बाद, तो कहीं अनेक प्रशासनि क औपचारिकताओं के कारण पात्र कैदियों की फाइलें वर्षों तक लंबित रहती हैं। कई बार मेडिकल रिपोर्ट समय पर नहीं बनती, कई बार जेल प्रशासन और गृह विभाग के बीच पत्रा चार में महीनों निकल जाते हैं, तो कहीं राजनीतिक अथ वा प्रशासनिक उदासीनता के कारण आवेदन फाइलों में दबे रह जाते हैंपरिणामस्वरूप अनेक बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदी न्याय मिलने से पहले ही जेल में दम तोड़ देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस असमानता और प्रशासनिक ढिलाई को संविधान की भावना के विप रीत माना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश सभी कैदियों के लिए नहीं है। इस का उद्देश्य केवल उन विशेष परिस्थितियों वाले कैदियों के लिए मानवीय राहत सुनिश्चित करना है जो 70 वर्ष से अधि क आयु के हैं, जिनकी बीमा री लाइलाज है या जो गंभीर शारीरिक अक्षमता के कारण सामान्य जीवन जीने में अस मर्थ हैं। ऐसे मामलों में राज्य सरकारें चिकित्सकीय परीक्ष ण, सुरक्षा मूल्यांकन तथा अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए समयपूर्व अथवा अनु कंपा के आधार पर रिहाई का निर्णय लेंगी। अर्थात यह स्वतः रिहाई का आदेश नहीं बल्कि पारदर्शी और समयबद्ध निर्ण य प्रक्रिया सुनिश्चित करने का निर्देश है। इस निर्णय का स बसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में एक समान नीति बनाने पर जोर दिया है। साथियों, आज तक विभिन्न राज्यों की नीतियों में इतनी अधिक भिन्नता रही है कि समान परिस्थितियों वाले दो कैदियों को केवल अलग- अलग राज्यों में होने के कारण अलग-अलग व्यवहार का सा मना करना पड़ता था। न्याय के सिद्धांत के अनुसार समान परिस्थितियों में समान व्यवहार होना चाहिए। यही कारण है कि अदालत ने राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता लाने का सटी क निर्देश दिया है। डिजिटल गवर्नेंस को बढ़ावा देने की दिशा में भी यह आदेश अत्यंत महत्व पूर्ण है। अदालत ने निर्देश दिया है कि समयपूर्व रिहाई की पूरी प्रक्रिया को ई-प्रि जन्स पोर्टल से जोड़ा जाए। इससे आवेदन जमा होने से लेकर मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, जेल प्रशासन की अनुशंसा,गृह विभाग की स्वीकृति और अंति म निर्णय तक प्रत्येक चरण डिजिटल रूप से दर्ज होगा। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि भ्रष्टाचार,फाइलों के गायब होने, अनावश्यक देरी और जवाबदेही की कमी जैसी समस्याओं पर भी प्रभा वी नियंत्रण लगेगा। यदि कि सी स्तर पर आवेदन लंबित रहेगा तो यह स्पष्ट होगा कि देरी किस अधिकारी या विभाग के स्तर पर हुई है।
साथियों, डिजिटल माॅनि टरिंग का यह माॅडल भारत में न्यायिक प्रशासन के आधुनि कीकरण का उत्कृष्ट उदाहर ण बन सकता है। जिस प्रकार आयकर, पासपोर्ट, भूमि अभि लेख, जीएसटी और न्यायाल यों की ई-फाइलिंग प्रणाली ने प्रशासन को अधिक पारदर्शी बनाया है, उसी प्रकार जेल प्रशासन में डिजिटल निगरानी भविष्य में व्यापक सुधारों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल निर्देश देकर अपने दायित्व की औप चारिकता पूरी नहीं की है। उसने इस पूरे मामले की नि रंतर निगरानी का भी निर्णय लिया है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर अनु पालन हलफनामा प्रस्तुत कर ने का निर्देश दिया है। इसमें यह स्पष्ट करना होगा कि नीति बनाई गई या नहीं, उसे अधिसूचित किया गया या नहीं, कितने मामलों पर विचार हुआ और कितने पात्र कैदियों को सटीकता से रिहा किया गया। साथियों, इस मामले की अगली सुनवाई 19 जनवरी 2027 को निर्धारित की गई है, जब सर्वोच्च न्यायालय स्वयं प्रत्येक राज्य की प्रगति की समीक्षा करेगा। यह दर्शाता है कि न्यायपालिका इस विषय को केवल सैद्धांतिक नहीं ब ल्कि व्यावहारिक परिणामों तक पहुँचाना चाहती है। यह निर्णय भारतीय जेलों की गं भीर समस्या अत्यधिक भीड़ को कम करने की दिशा में भी सहायक हो सकता है। देश की अनेक जेलें अपनी स्वीकृत क्षमता से कहीं अधिक कैदियों को रखने के लिए विवश हैं। भीड़भाड़ के कारण स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छता, सुरक्षा, मान सिक स्वास्थ्य और पुनर्वास जैसी व्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं। यदि वास्तव में अति वृद्ध, असाध्य रोगग्रस्त और अक्षम कैदियों के मामलों का समयब द्ध समाधान होता है तो जेलों पर दबाव कम होगा और प्रशा सन उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकेगा।
साथियों, आर्थिक दृष्टि से भी यह निर्णय महत्वपूर्ण है। गंभीर बीमार कैदियों के इलाज पर राज्य सरकारों को बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। कई मामलों में जेल अस्पताल पर्याप्त नहीं होते और उन्हें बाहरी अस्पतालों में भर्ती क राना पड़ता है, जहाँ सुरक्षा व्यवस्था पर भी अतिरिक्त व्य य होता है। यदि ऐसे कैदियों को कानून के अनुरूप मानवीय आधार पर रिहा किया जाता है तो सरकारी संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव होगा। हालांकि आर्थिक लाभ इस आदेश का प्रमुख उद्देश्य नहीं हैय इसका मूल आधार मानव गरिमा और संवैधानिक करुणा है।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह निर्णय भारत की न्यायिक सोच को आधुनिक मानवाधिकार मूल्यों के अनु रूप स्थापित करता है। संयुक्त राष्ट्र के नेल्सन मंडेला नियम तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मानवा धिकार मानक इस बात पर बल देते हैं कि कैदियों के साथ भी गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाए और गंभीर रूप से बीमार अथवा वृद्ध कैदियों के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए। अनेक विकसित देशों में कंपानसेट रिलीज या मेडि कल परोले जैसी व्यवस्थाएं पहले से लागू हैं। साथियों, भारत का यह कदम वैश्विक मानकों की दिशा में एक सका रात्मक प्रगति माना जा सक ता है। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मानवीय दृष्टि कोण का अर्थ न्याय से सम झौता नहीं है। समाज की सु रक्षा सर्वोपरि है। इसलिए प्रत्ये क मामले में अपराध की प्र कृति, पीड़ित पक्ष के अधिकार, कैदी का व्यवहार, चिकित्स कीय स्थिति और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे पहलुओं पर विधि के अनुसार विचार किया जा एगा। इस नीति का उद्देश्य अपराध को क्षमा करना नहीं बल्कि उन विशेष परिस्थितियों में संवेदनशील निर्णय लेना है जहाँ कठोर दंड का उद्देश्य लगभग समाप्त हो चुका हो और मानवीय गरिमा को प्राथ मिकता देना अधिक न्यायसं गत हो। इस आदेश का एक अप्रत्यक्ष सकारात्मक प्रभाव जेल सुधारों पर भी पड़ेगा।
यदि डिजिटल रिकाॅर्डिंग, समय बद्ध प्रक्रिया, मेडिकल मूल्यांकन और नियमित निगरा नी प्रभावी ढंग से लागू होती है तो भविष्य में पैरोल, फर्लो, कानूनी सहायता, वीडियो काॅ न्फ्रेंसिंग, स्वास्थ्य सेवाओं और पुनर्वास कार्यक्रमों में भी व्याप क सुधार का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। यह भारतीय जेल प्रशासन को अधिक उत्तरदा यी, पारदर्शी और आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्व पूर्ण शुरुआत सिद्ध हो सकती है।
साथियों, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका भी इस निर्णय में उल्लेखनीय है। समाज के कमजोर, गरीब और असहाय वर्गों को न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कार्यरत इस संस्था ने जनहित याचिका के माध्यम से एक ऐसे वर्ग की आवाज सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचाई, जो स्वयं अपनी पीड़ा प्रभावी ढंग से व्यक्त करने की स्थिति में नहीं था। यह भारतीय न्याय व्यवस्था में संस्थागत संवेदन शीलताका सकारात्मक उदा हरण है। साथियों, यदि राज्य सरकारें निर्धारित समयसीमा के भीतर स्पष्ट नीति बनाकर उसे प्रभावी ढंग से लागू करती हैं तो इसका लाभ केवल कुछ सौ या कुछ हजार कैदियों त क सीमित नहीं रहेगा। इससे शासन-प्रशासन की कार्यसं स्कृति में भी सुधार आएगा। अधिकारियों को समयसीमा के भीतर निर्णय लेने की आ दत विकसित होगी, डिजिटल रिकॉर्डिंग से जवाबदेही बढ़ेगी और न्यायिक निर्देशों के पाल न की संस्कृति मजबूत होगी। आगे की सबसे बड़ी चुनौती नीति बनाना नहीं बल्कि उस का निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्व यन होगा। राज्यों को विशेष ज्ञ चिकित्सकों, जेल प्रशासन, विधि विशेषज्ञों, मानवाधिका र आयोगों और समाजसेवी संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित कर ऐसी नीति तैयार करनी होगी जो मानवीय होने के साथ-साथ विधिसम्मत और संतुलित भी हो। यदि क्रियान्वयन पारदर्शी रहा तो यह आदेश आने वाले वर्षों में भारतीय जेल सुधारों का मील का पत्थर बन सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन का कर का इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बीती 16 जुलाई 2026 का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की उस संवेदनशील सोच का प्रमाण है जिसमें न्याय केवल दंड तक सीमित नहीं बल्कि सुधार, पुनर्वास, करुणा और मानव गरिमा से भी जुड़ा है। तीन महीने में एक समान नीति, ई -प्रिजन्स पोर्टल के माध्यम से डिजिटल निगरानी, छह महीने में अनुपालन रिपोर्ट और 19 जनवरी 2027 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वयं समीक्षा ये सभी पहलू इस बात का संकेत हैं कि अदालत इस वि षय पर केवल निर्देश देकर पी छे हटने वाली नहीं है।
यदि यह पहल सफल हो ती है तो भारत की जेल व्यव स्था अधिक मानवीय, पारद र्शी, जवा बदेह और संविधान के मूल आदर्शों के अनुरूप बन सकती है। यही किसी भी विकसित लोकतंत्र और वि कसित भारत की पहचान है।

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