7.1प्रतिशत की आर्थिक छलांग, चुनाव आयोग पर सियासी संग्राम और सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर 21 वीं सदी के वैश्विक परिदृश्य में 6 अक्टूबर 2026 का दिन भारत के लिए केवल आर्थिक उपलब्धि या घरेलू राजनीतिक टकराव का दिन नहीं रहा, बल्कि यह दिन दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र की संस्थागत शक्ति, संवैधानिक परिपक्वता और न्यायिक संयम, तीनों को एक साथ परखने वाला दिन बन गया। एकओर पश्चिम एशि या सहित दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा असुरक्षा और आ र्थिक अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं, वहीं भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर विश्व बैंक ने अपने ताजा आकलन में वित्त वर्ष 2026- 27 के लिए विकास दर का अनुमान 6.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महा राष्ट्र बताना चाहूंगा कि विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की साउथ एशिया इकोनाॅमिक अपडेट इसी दिन प्रकाशित हुई। दूसरी ओर, उसी दिन राजधानी दिल्ली में लगभग 140 विपक्षी सांसदों और आई एनडीआईए गठबंधन के नेता ओं ने संसद से निर्वाचन आयोग की ओर मार्च कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्ती फे और मतदाता सूची के वि शेष गहन पुनरीक्षण यानें एस आईआर को वापस लेने की मांग की और इसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूलों की प्रार्थना सभा में संविधान की प्रस्ताव ना का दैनिक पाठ अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर न्या यिक संयम और नीति-निर्माण की सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। इस प्रकार 6 अक्टूबर का भारत एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करता है, जिसमें आर्थिक मजबूती के साथ राज नीतिक संघर्ष, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहस और संवै धानिक मूल्यों की न्यायिक व्याख्या एक ही राष्ट्रीय परिदृश्य में दिखाई देती है।
साथियों, भारत की आर्थिक कहानी आज वैश्विक अर्थव्यव स्था के लिए विशेष महत्व रखती है। जब अनेक विक सित और विकासशील अर्थव्यव स्थाएं युद्ध, ऊर्जा संकट, आ पूर्ति शृंखला में व्यवधान, महं गाई और भू- राजनीतिक तनाव से जूझ रही हैं, तब विश्व बैंक द्वारा भारत की विकास दर का अनुमान 7.1 प्रतिशत कर ना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि वैश्विक निवेशकों और आर्थिक संस्थानों के लिए भारत की अंतर्निहित क्षमता पर भरोसे का संकेत है। अप्रैल 2026 में विश्व बैंक ने एफवाय 2026-27 के लिए 6.6 प्रति शत का अनुमान लगाया थाय अक्टूबर में इसे बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया गया। मजबूत घरेलू मांग, उद्योग और सेवा क्षेत्र की गति तथा आर्थिक सुधारों की निरंतरता भारत की विकास कहानी के महत्व पूर्ण आधार बने हुए हैं।
हालांकि कृषि और मानसून से जुड़े जोखिमों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए 7.1 प्रतिशत का अनु मान भारत की आर्थिक मज बूती का प्रमाण जरूर है, लेकि न यह भी याद दिलाता है कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों, खाद्य महंगाई और भू-राजनीतिक संकटों से सुरक्षा के लिए आर्थिक नीतियों को लगातार गतिशील बनाए रखना होगा।
साथियों इसी आर्थिक उप लब्धि के समानांतर भारत के लोकतांत्रिक संस्थागत ढांचे को लेकर एक गंभीर राजनी तिक बहस भी सामने आई। आईएनडीआईए गठबंधन के नेताओं और सांसदों ने संसद भवन से निर्वाचन आयोग की ओर मार्च किया। विपक्ष की प्रमुख मांग मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को वापस लेने की रही। रिपोर्टों के अनुसार लग भग 140 विपक्षी सांसद इस विरोध में शामिल हुए।राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लि कार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव सहित कई प्रमुख विप क्षी नेताओं की मौजूदगी ने इस प्रदर्शन को राष्ट्रीय राजनी तिक विमर्श का केंद्र बना दिया। पुलिस ने मार्च को निर्वाचन आयोग के कार्यालय तक पहुंच ने से पहले रोक दिया और कई नेताओं को हिरासत में लिया गया। विपक्ष एसआइ आर के माध्यम से मतदाता सूचियों में कथित अनियमित ताओं और मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि निर्वाचन आयोग और सत्तापक्ष इन आ रोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करने की कवायद के रूप में प्रस्तुत कर ते हैं। ऐसे में लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी बात में निहित है कि संस्थाओं पर उठने वाले सवालों का समा धान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, दस्तावेजी प्रमाण, संवैधानिक प्रक्रिया और जनता के विश्वास के सटि का से माध्यम से हो।
साथियों यह घटनाक्रम इस लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि निर्वाचन आयोग भारत के लोक तांत्रिक ढांचे का एक केंद्रीय संवैधानिक संस्थान है।चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रि या नहीं होते, बल्कि वे नागरि कों के सार्वभौमिक मताधिकार और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तां तरण की आधारशिला होते हैं इसलिए यदि राजनीतिक दल निर्वाचन प्रक्रिया की निष्प क्षता पर प्रश्न उठाते हैं, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए संस्थागत पारदर्शिता और तथ्यात्मक स्पष्टीकरण दोनों आवश्यक हो जाते हैं। दूसरी ओर, राजनीतिक विरोध और संस्थागत आलोचना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन किसी संवैधानिक संस् था की विश्वसनीयता का अंतिम मूल्यांकन स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं, प्रमाणों और संवै धानिक प्रावधानों के आधार पर होना चाहिए। यही वह संतुलन है जो भारत के लोक तंत्र को वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विशिष्ट बनाता है। साथियों, इसी व्यापक लोकतांत्रिक विमर्श के बीच सर्वोच्चन्यायालय का स्कूलों में संविधान की प्रस्तावना के अनिवार्य पाठ से जुड़ा फैसला विशेष महत्व रखता है।
माननीय तीन सदस्यीय पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कालेज के सहा यक प्रोफेसर द्वारा दायर जन हित याचिका को स्वीकार कर ने से इनकार कर दिया। या चिका में केंद्रीय शिक्षा मंत्रा लय औरसीबीएसई को ऐसी राष्ट्रव्यापी नीति बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जिसके तहत स्कूलों की सुबह की प्रार्थना सभा में संवि धान की प्रस्तावना का नियमित पाठ कराया जाए। याचिकाक र्ता ने राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक में ऐसे प्रयासों का उल्लेख करते हुए अनुच्छेद 21ए तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति नागरिक चेतना विक सित करने की आवश्यकता का तर्क दिया था।
साथियों, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मांग को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि संवि धान की प्रस्तावना पहले से ही स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा है और विद्यार्थियों को कक्षा 6 से इसके बारे में पढ़ा या जाता है।
यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संदेश है, न्यायालय ने प्रस्ताव ना या संवैधानिक मूल्यों के महत्व को कम नहीं किया, बल्कि यह संकेत दिया कि शिक्षा की विषयवस्तु और उसके संचालन की पद्धति नि र्धारित करना मुख्यतः सरकार और विशेषज्ञ शैक्षणिक संस्थाओं का क्षेत्र है।
यदि संविधान पहले से ही पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा है, तो न्यायपालिका द्वारा किसी विशेष दैनिक अनुष्ठान को अनिवार्य बनाने का आदेश देना नीति-निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश का प्रश्न खड़ा कर सकता है। यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय संवैधानिक इतिहास से भी जुड़ता है। अमेरिका में 1943 का वेस्ट वर्जिनिआ स्टेट बोर्ड ऑफ एजुकेशन वर्सेस बारनेट मामला इस सिद्धांत का महत्व पूर्ण उदाहरण है, जिसमें अमेरि की सर्वोच्च न्यायालय ने विद्या र्थियों को राष्ट्रध्वज को सला मी देने और प्रतिज्ञा दोहराने के लिए बाध्य करने की व्यव स्था को अभिव्यक्ति की स्वतं त्रता के संदर्भ में असंवैधानिक माना था। भारत में भी 1986 का बिजोए एम्मानुल वेर्सेस. स्टेट आफ केरला फैसला मह त्वपूर्ण है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रगान के दौरा न सम्मान पूर्वक खड़े रहने वाले, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यता के कारण उसे न गाने वाले विद्यार्थियों के अद्दि कारों की रक्षा की थी। इन दोनों उदाहरणों से यह व्या पक संवैधानिक सिद्धांत उभ रता है कि देशभक्ति, संवैधा निक निष्ठा और नागरिक चेत ना का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उनमें समझ, स्वीकृति और स्वतंत्र चेतना का तत्व मौजूद हो।
साथियों, भारत के 2026 के प्रस्तावना संबंधी फैसले को इसी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह न्यायिक सक्रिय ता के बजाय न्यायिक संयम का उदाहरण दिखाई देता है। अदालत ने यह नहीं कहा कि प्रस्तावना महत्वपूर्ण नहीं हैय बल्कि उसने यह माना कि संवैधानिक मूल्यों को मज बूत करने का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा, संवाद और समझ है। सुबह की सभा में सामूहिक पाठ एक प्रतीकात्मक गतिवि धि हो सकता है, लेकिन संवि धान की वास्तविक आत्मा विद्या र्थियों को न्याय, स्वतंत्रता समा नता और बंधुता के अर्थ सम झाने से विकसित होगी। संवि धान केवल प्रतिदिन दोहराए जाने वाले शब्दों का समूह नहीं, बल्कि नागरिकों और राज्य के बीच विश्वास, अधि कार और कर्तव्यों का सटी कता से जीवंत सामाजिक अनु बंध है। इन तीनों घटनाओं, विश्व बैंक द्वारा विकास अनु मान में वृद्धि, आईएनडीआईए गठबंधन का निर्वाचन आयोग के खिलाफ प्रदर्शन और सर्वो च्च न्यायालय का प्रस्तावना पाठ संबंधी निर्णय, को एक साथ देखने पर भारत की लोक तांत्रिक यात्रा की एक अत्यंत महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है। आर्थिक शक्ति किसी देश की वैश्विक प्रतिष्ठा को बढ़ाती है, लेकिन आर्थिक मजबूती को स्थायी वैश्विक प्रभाव में बदलने के लिए संस्थागत विश् वसनीयता भी उतनी ही आवश् यक है। दुनिया भारत को केवल एक तेजी से बढ़ती अर्थव्य वस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे लोकतंत्र के रूप में भी देखती है जहाँ सरकार, विपक्ष, निर्वाचन आयोग और न्याय पालिका के बीच शक्ति यों का संवैधानिक संतुलन कायम रहना आवश्यक है।
साथियों, आज जब दुनि या के अनेक हिस्सों में युद्ध की आशंका, राजनीतिक ध्रु वीकरण और संस्थागत संकट दिखाई दे रहे हैं, भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केव ल सात प्रतिशत से अधिक आर्थिक विकास बनाए रखने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि आर्थिक विकास के साथ लोकतांत्रिक विश्वास, चुनावी पारदर्शिता, न्यायिक स्वतंत्रता और नागरिक अधि कारों की रक्षा समान गति से आगे बढ़े। विश्व बैंक का 7.1 प्रतिशत अनुमान भारत की आर्थिक क्षमता का उत्साह जनक संकेत है, लेकिन निर्वा चन प्रक्रिया को लेकर उठे प्रश्न और न्यायपालिका के संयमपूर्ण फैसले यह भी याद दिलाते हैं कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सकल घरेलू उत्पाद में नहीं मापी जाती।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि 6 अक्टूबर 2026 का भारत दुनिया को एक बहुआयामी संदेश देता है, अर्थव्यवस्था में आत्मविश्वास, लोकतंत्र में बहस और न्याय पालिका में संयम। यही तीनों मिलकर किसी आधुनिक राष्ट्र की वैश्विक प्रतिष्ठा को स्थायी बनाते हैं। भारत की आर्थिक गति यदि निवेश और रोजगार को मजबूत करती है, लोक तांत्रिक संस्थाएं यदि जनता के विश्वास को बनाए रखती हैं और न्यायपालिका यदि संवि धान की रक्षा करते हुए नीति – निर्माण की उचित सीमाओं का सम्मान करती है, तो भारत की वैश्विक साख केवल आ र्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसकी संस्थागत परिपक्वता से भी मजबूत होगी।
युद्ध और अनिश्चितता से घिरी दुनिया में यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है, विकास की गति के साथ लोकतंत्र की गहराई और संविधान की गरिमा।
दुनिया यु( के मुहाने पर, भारत विकास की उड़ान पर
