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डाक्टर की कलम पर फार्मा का प्रभाव या मरीज के हित की रक्षा -महंगे उपहार, विदेशी यात्राओं और फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा- केंद्र को तीन – सदस्यीय विशेषज्ञ समिति बनाने का आदेश, 29 जनवरी 2027 को होगी सुनवाई

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर कभी चिकित्सा सेवा को मानवता की सबसे पवित्र सेवाओं में गिना जाता था। चिकित्सक को केवल उपचार करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवनदाता और संकट की घड़ी में भग वान के समान माना जाता था। भारत ही नहीं, विश्व की अनेक सभ्यताओं में वैद्य, चिकि त्सक और डाक्टर के प्रति इसी विश्वास और श्रद्धा की परंपरा रही है। लेकिन बदलते आर्थिक- सामाजिक परिवेश में स्वास्थ्य व्यवस्था के व्याव सायीकरण, अस्पतालों के बढ़ते खर्च, अनावश्यक जांचों और उपचारों की शिकायतों तथा सोशल मीडिया पर सामने आने वाली विभिन्न घटनाओं ने डाक्टर और मरीज के बीच विश्वास के रिश्ते पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। मामूली बीमारी में महंगे उपचार, आवश्यकता से अधिक जांच, अत्यधिक बिल आईसीयू या वेंटिलेटर के कथित दुरुपयोग और दवाओं की कीमतों को लेकर सामने आने वाली शिकायतों ने जन मानस में चिंता बढ़ाई है।
हालांकि किसी एक घटना या आरोप के आधार पर पूरे चिकित्सा समुदाय को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा, लेकिन जहां डाक्टर की प्रिस् िक्रप्शन शक्ति को किसी व्या वसायिक प्रलोभन से प्रभावित किए जाने की आशंका हो, वहां मामला सीधे मरीज के जीवन, स्वास्थ्य और आर्थिक अधिकार से जुड़ जाता है।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र एडवोकेट होने के नाते यह बताना चाहूंगा कि इसी व्यापक चिंता के बीच 8 अक्टू बर 2026 को सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया ने फेडरेशन आफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेन्टेटिव्स एसो सिएशन्स आफ इंडिया एंड अदर्स वर्सेस यूनियन आफ इंडिया एंड आदर्स, डब्लू.पी.(सी) नों.323ध् 2021 मामले में केंद्र सरकार को फार्मास्यु टिकल कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के वैधानिक निय मन की आवश्यकता पर विचार करने के लिए समिति गठित करने का निर्देश दिया अदालत ने कहा कि समिति संबंधित सुझावों और अभ्यावेदनों पर विचार करके केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें देगी और मामले को 29 जनवरी 2027 को केंद्र के अनुपालन हलफ नामे पर विचार के लिए सटी कता से सूचीबद्ध किया जाएगा।
साथियों, इस मुकदमे की जड़ वर्ष 2021 में दायर या चिका में है। एफएमआरएआई ने मांगकी थी कि फार्मास्युटि कल कंपनियों द्वारा स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रभावित करने वाली कथित अनैतिक मार्केटिंग गतिविधियों के लिए प्रभावी और कानूनी रूप से लागू होने वाला नियामक ढांचा बनाया जाए। याचिका कर्ताओं का आरोप था कि कुछ कंपनियां डाक्टरों को महंगे उपहार, आ तिथ्य, यात्रा सुविधाएं, विदेशी यात्राएं, नकद अथवा अन्य ‘फ्रीबीज’ देकर अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने और अधिक प्रिस्क्रिप्शन प्राप्त करने का प्रयास करती हैं। याचिका में यह चिंता भी व्यक्त की गई कि ऐसी गतिविधियां महंगी ब्रांडेड दवाओं अथवा अना वश्यक दवा-संयोजनों के प्रि स्क्रिप्शन को प्रभावित कर सकती हैं, जिसका अंतिम आर्थि क बोझ मरीज पर पड़ता है।
साथियों, सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान आदेश का सबसे मह त्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत ने केवल डाक्टर के आचरण पर प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि लाभ लेने वाले डाक्टर पर कार्रवाई, लेकिन लाभ देने वाली कंपनी पर क्या? जैसे मूल नियामक प्रश्न को केंद्र में ला दिया है। केंद्र ने अदा लत को बताया कि डाक्टरों द्वारा फार्मा कंपनियों से उप हार, यात्रा, आतिथ्य अथवा आर्थिक लाभ स्वीकार करने पर पेशेवर अनुशासनात्मक व्य वस्था मौजूद है, लेकिन फा र्मास्युटिकल कंपनियों के स्वयं के आचरण को सीधे और बाध्यकारी तरीके से नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट वैधानिक ढांचे की कमी है। प्रस्तावित समिति इसी नियामक खाई की जांच करेगी, क्या अलग कानून आवश्यक है और यदि आवश्यक है तो उसका स्वरूप क्या हो।
साथियों, यहां यूनिफार्म कोड फार फार्मेसीटिकल मार्के टिंग प्रैक्टिसस, यूसीपीएमपी 2024 की भूमिका अत्यंत मह त्वपूर्ण हो जाती है। औषधि विभाग ने 2024 में इस सं हिता को लागू किया, जिस का उद्देश्य फार्मा कंपनियों और स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच पारदर्शी तथा नैतिक संबंध सुनिश्चित करना है।
सरकारी पोर्टल के अनुसा र यूसीपीएमपी 2024 में फा र्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रथाओं के लिए एथिक्स कामिटी व्यव स्था और अपील के लिए डिपा र्टमेंट आफ फार्मेसीटीकल्स के स्तर पर अपैक्स कमिटी का तंत्र मौजूद है। कंपनियों और संबंधित संगठनों के लिए शिकायतों तथा अनुपालन संबंधी प्रक्रियाएं भी निर्धारित की गई हैं। यूसीपीएमपी का मूल संदेश स्पष्ट है,दवा का प्रचार वैज्ञानिक, तथ्यात्मक और अनुमोदित चिकित्सकीय उपयोग के अनुरूप होना चाहिए। डाक्टर को व्यक्तिगत लाभ देकर उसके पेशेवर नि र्णय को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। उपहार, नकद अथवा मौद्रिक लाभ और अनु चित आतिथ्य जैसी गतिवि धियों पर रोक का उद्देश्य यही है कि डाक्टर की कलम मरी ज की चिकित्सा आवश्यकता से चले, न कि किसी कंपनी के व्यावसायिक प्रोत्साहन से। यूसीपीएमपी के तहत शिका यत -निवारण और पारदर्शिता की व्यवस्था भी विकसित की गई है तथा फार्मास्युटिकल संघों को अपनी एथिक्स कमि टी गठित करनी होती है।
साथियों, मुफ्त नमूनों, प्रचार सामग्री, सीएमई तथा अनुसं धान जैसी गतिविधियों को भी नैतिक सीमाओं के भीतर रखने का प्रयास किया गया है। यहां यह अंतर समझना आवश्यक है कि हर चिकित्स कीय सम्मेलन या डाक्टर और फार्मा कंपनी का प्रत्येक संपर्क अपने-आप में अनैतिक नहीं है। वैज्ञानिक अनुसंधान, चि कित्सकीय शिक्षा और अनुमो दित दवा संबंधी जानकारी का आदान -प्रदान स्वास्थ्य व्यव स्था के लिए आवश्यक है। समस्या तब पैदा होती है जब शिक्षा और प्रचार की सीमा समाप्त होकर निजी लाभ, प्रिस् िक्रप्शन प्रभावित करने अथवा मरीज के हित से समझौते की स्थिति पैदा हो। फिर भी सबसे बड़ा प्रश्न उपम्प की वैधानिक शक्ति और प्रवर्तन क्षमता का है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष स्वीकार किया कि फार्मास्युटिकल कंपनियों के आचरण को सीधे नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट स्टेटटरी मैकेनिज्म की कमी एक मह त्वपूर्ण मुद्दा है। इसी कारण अब तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति यह देखेगी कि वर्तमान व्यवस्था पर्याप्त है या इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बना ने के लिए अलग वैधानिक ढांचे की आवश्यकता है। तब तक यूसी पी एम पी 2024 लागू रहेगा। साथियों यह विवाद नया नहीं है। वर्ष 2022 के मेसर्स अपैक्स लबोरटोरीज प्राइवेट लिमिटेड वर्सेस डिप्टी कमिश्नर आफ इन्कम टैक्स मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फार्मा स्युटिकल कंपनियों द्वारा डाक्टरों को दिए जाने वाले ‘फ्रीबीज’ के आर्थिक और नैतिक प्रभाव पर गंभीर टिप्प णी की थी। अदालत ने कहा था कि डाक्टर और मरीज के बीच विश्वास का रिश्ता ऐसा है जिसमें डाक्टर का प्रिस्क्रि प्शन अत्यंत प्रभावशाली होता हैय इसलिए उपहार, महंगे सामान अथवा विदेश यात्राओं जैसे लाभों से प्रभावित प्रिस् िक्रप्शन सार्वजनिक हित की गंभीर चिंता बन सकता है। उस मामले में अदालत ने यह भी माना कि डाक्टरों को दिए गए ऐसे निषिद्ध लाभों पर फार्मा कंपनी को आयकर का नून की धारा 37(1) के तहत व्यावसायिक खर्च की कटौती का लाभ नहीं मिल सकता।
अपैक्स लबोरटोरीज फैस ले का महत्व इसलिए भी है कि उसने इस पूरे प्रश्न को केवल डाक्टर ने क्या लिया? तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उस व्यापक चक्र की ओर संकेत किया जिसमें प्रचार का खर्च अंततः दवा की की मतों में शामिल हो सकता है और उसका बोझ मरीज तक पहुंच सकता है। इसीलिए आज का सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप केवल फार्मा उद्योग के लिए नियमन का प्रश्न नहीं है, यह सस्ती, तर्कसंगत और मरीज- केंद्रित चिकित्सा व्यवस्था के निर्माण का प्रश्न भी है।
साथियों, सरकार के अनु सार पहले भी यूसीपीएमपी को वैधानिक आधार देने पर वि चार किया गया था। विभिन्न चरणों में एसेंशियल कमोडि टीज एक्ट 1955 तथा ड्रग्स एंड कास्मेटिक्स एक्ट,1940 जैसे कानूनों के माध्यम से निय मन की संभावनाओं पर चर्चा हुई, लेकिन उनके अधिकार -क्षेत्र और उपयुक्तता से जुड़े प्रश्न सामने आए। बाद में डा. वी. के. पाल की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने पारदर्शिता स्वतंत्र निगरानी, शिकायतों की बेहतर निगरानी और आईटी आधारित डिस्का लोजर जैसे उपायों पर जोर दिया। इसी पृष्ठभूमि में यूसीपी एमपी 2024 आया, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का प्रश्न इस से आगे बढ़कर है,क्या नैतिक संहिता को पर्याप्त कानूनी दांत भी दिए जाए। इस बीच केंद्र के हलफनामे में शिकायत- प्रणाली की वास्तविक स्थिति भी सामने आई। उपलब्ध विव रण के अनुसार एसी पीएमपी को तीन शिकायतें मिलींय एक मामले में लगभग 30 डाक्टरों को महंगी यात्राएं उप लब्ध कराने का आरोप था, जिस पर कंपनी को यूसीपी एमपीउल्लंघन के लिए फट कार लगाई गई और डॉक्टरों की सूची उचित कार्रवाई के लिए नेशनल मेडिकल कमि शन को भेजी गई। इससे स्प ष्ट होता है कि शिकायत- निवारण तंत्र अस्तित्व में है, लेकिन सवाल उसकी पहुंच, गति, पारदर्शिता और दंडा त्मक प्रभावशीलता का है।
साथियों, इस पूरे घटना क्रम को केवल सुप्रीम कोर्ट ने फार्मा कंपनियों की गर्दन पकड़ ली जैसे सनसनीखेज वाक्य तक सीमित करना उचित नहीं होगा। वास्तविक महत्व इससे कहीं अधिक गहरा है। अदालत मूलतः यह सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है कि दवा लि खने वाला हाथ स्वतंत्र हो, मरीज का हित सर्वोच्च हो और दवा बेचने वाली कंपनी का व्यावसायिक उद्देश्य चिकि त्सकीय निर्णय पर हावी न हो। यह डाक्टरों के विरुद्ध कोई सामूहिक अविश्वास का संदेश भी नहीं है। देश में ला खों चिकित्सक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में ईमानदारी से सेवा करते हैं और उन्हें किसी अनैतिक गतिविधि के आरोप के आधार पर संदेह की दृष्टि से देखना भी अनुचित होगा। अब निगाहें 29 जनवरी 2027 पर रहेंगी, जब केंद्र को अपने अनुपालन हलफनामे के मा ध्यम से समिति के गठन और आगे की कार्रवाई की स्थिति बतानी होगी। उस दिन केवल एक समिति की प्रगति की समीक्षा नहीं होगी। उससे भार त की स्वास्थ्य -व्यवस्था में एक बड़े नीति-प्रश्न की दिशा भी स्पष्ट हो सकती है, क्या यूसीपीएमपी जैसी नैतिक संहिता पर्याप्त है, या फार्मास्यु टिकल मार्केटिंग को नियंत्रित करने के लिए संसद द्वारा बना या गया कठोर, बाध्यकारी और दंडात्मक कानून आवश् यक है? अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगेकि चिकित्सा व्यवस्था का मूल मंत्र यही होना चाहिए कि मरीज ग्राहक नहीं, पहले इंसान है, डाक्टर विक्रेता नहीं, स्वास्थ्य का संरक्षक हैयऔर दवा व्यापार का उद्देश्य लाभ कमाना हो सकता है, लेकिन वह मरीज के जीवन और चिकि त्सकीय निर्णय की स्वतंत्रता से ऊपर नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल इसी मूल विश्वास को पुनर्स्थापित कर ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जहां डाक्टर की कलम पर किसी उपहार का प्रभाव नहीं, मरीज की जरूरत, वैज्ञा निक प्रमाण और चिकित्सा का प्रभाव होना चाहिए।

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