एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर पूरी दुनिया के व्यापार व्यवस्था में बढ़ते शुल्क, बदलती आपूर्ति शृंखलाओं और आर्थिक अनिश् िचतताओं के बीच भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक मह त्वपूर्ण नया अध्याय 20 अक्टू बर 2026 से खुलने जा रहा है। 20 सितंबर 2026 तक भा रत नेअपने विभिन्न व्यापारिक साझेदारों के साथ अनेक मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें श्रीलंका,दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र के सदस्य देश, सिंगापुर, आसि यान के दस देश, दक्षिण कोरिया, जापान, मलेशिया, मारीशस, संयुक्त अरब अमीरात, आस्ट्रेलि या तथा यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के चार देश शामिल हैं वहीं ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ जैसे हालि या समझौते हस्ताक्षर अथवा अंतिम क्रियान्वयन प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में हैं।
मैं एडवोकेट किशन सन मुख दास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि इन समझौतों का सकारात्मक प्रभाव भारतीय निर्यातकों को बड़े विदेशी बाजारों में कम शुल्क के साथ प्रवेश, निवेश के नए अवसर, आपूर्ति शृंखला ओं में विविधता, रोजगार तथा भारतीय विनिर्माण और सेवाओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षम ता बढ़ने के रूप में सामने आया है। भारत -आस्ट्रेलिया समझौते के बाद वस्त्र, औषद्दि रसायन और कृषि सहित कई क्षेत्रों में लाभ दर्ज हुआ है।
वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में जब संरक्षण वाद, शुल्क वृद्धि, आपूर्ति शृंखला का पुनर्गठन और भू- राजनीतिक तनाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं, तब एफ टीए भारत को अनेक बाजारों से जोड़कर जोखिमों को फैला ने और निर्यात के लिए वैकल् िपक रास्ते बनाने में मदद कर सकते हैं। लेकिन इन्हें स्वतः लाभ का सौदा मानना भी उ चित नहीं होगा, क्योंकि आयात बढ़ने, घरेलू उद्योग पर प्रतिस्प र्धात्मक दबाव, सीमा शुल्क राजस्व में कमी और व्यापार घाटे जैसी चुनौतियां भी सा मने आ सकती हैं। इसलिए भारत के लिए एफटीए की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाजार पहुंच का लाभ वास्तविक निर्यात, निवेश, उत्पादन, रोजगार और तकनी की क्षमता में कितना बदलता है। साथियों बात अगर हम भारत -न्यूजीलैंड 20 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला समझौते एफटीए की करें तो 27 अप्रैल 2026 को हस्ता क्षरित यह समझौता 20 अक्टू बर 2026 से प्रभावी होने वाला है।न्यूजीलैंड की संसद ने 16 सितंबर को इसे लागू करने के लिए आवश्यक विधायी प्रक्रिया पूरी करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया, जि सके बाद समझौते के प्रभावी होने का रास्ता और स्पष्ट हुआ। मुक्त व्यापार समझौता मूलतः ऐसा व्यापारिक प्रबंध है, जिस के अंतर्गत दो देश एक-दूसरे के उत्पादों पर लगने वाले सीमा शुल्क को कम या समाप्त करते हैं और वस्तुओं, सेवाओं, निवेश तथा पेशेवरों की आवा जाही के लिए बाजार तक पहुंच आसान बनाते हैं।भारत के लिए इसका महत्व केवल निर्यात बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय उद्योग, छोटे कारोबार, किसानों, रोज गार, निवेश, तकनीक और अंत रराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करने वाला व्यापक समझौता है। भारत सरकार के अनुसार, न्यूजीलैंड भारत से आने वाले सभी उत्पादों को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच देगा, जबकि भारत न्यूजीलैंड के लगभग 95 प्रतिशत द्विप क्षीय व्यापार मूल्य को समेटने वाले उत्पादों पर शुल्क में कमी अथवा समाप्ति की व्यवस्था कर रहा है।
साथियों, इस समझौते की सबसे बड़ी विशेषता भारतीय निर्यातकों के लिए न्यूजीलैंड के बाजार का लगभग पूरी तरह खुलना है कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते, इंजीनिरी सामान, औषधि, रसायन, प्रसंस्कृत खाद्य और श्रम-प्रधान उद्योगों को इससे नए अवसर मिल सकते हैं।सीमा शुल्क समाप्त होने से भारतीय उत्पादों की न्यूजी लैंड के बाजार में पहुंच लागत कम हो सकती है और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सक ती है। विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि बड़े उद्यो गों की तुलना में छोटे निर्यात कों के लिए शुल्क और परिव हन लागत का प्रभाव अधिक होता है। सरकार ने भी इस समझौते में छोटे और मध्यम उद्यमों तथा महिला उद्यमियों को विशेष महत्व दिए जाने की बात कही है। यदि भार तीय कंपनियां गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने में सफल रहती हैं, तो न्यूजीलैंड का बाजार उनके लिए केवल वर्त मान निर्यात बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि आगे दूसरे विकसि त बाजारों में प्रवेश की प्रतिष्ठा और अनुभव हासिल करने का मंच भी बन सकता है।
साथियों, कृषि क्षेत्र में भी समझौते का स्वरूप संतुलित रखने की कोशिश दिखाई देती है। भारत ने न्यूजीलैंड के बा जार को व्यापक रूप से खोल ने के बदले अपने संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण दिया है।
दूध, क्रीम, पनीर, दही और अन्य प्रमुख दुग्ध उत्पादों के साथ कई संवेदनशील कृषि वस्तुओं को शुल्क रियायतों से बाहर रखा गया है।प्याज, चीनी मसाले, खाद्य तेल और कुछ अन्य संवेदनशील वस्तुओं पर भी संरक्षण बनाए रखा गया है। दूसरी ओर, लकड़ी ऊन, भेड़ के मांस और कच्ची खाल जैसे उत्पादों पर शुल्क समाप्त करने अथवा घटाने की व्यवस्था की गई है, जिस से भारतीय उद्योगों को कुछ आवश्यक कच्चे माल अधिक प्रतिस्पर्धी लागत पर मिल सक ते हैं। इस प्रकार समझौते में एक ओर निर्यात के लिए अव सर बढ़ाए गए हैं तो दूसरी ओर घरेलू किसान और संवे दनशील उद्योगों के लिए सुर क्षा कवच भी रखा गया है।
साथियों, इस समझौते का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ निवेश है। न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। यदि यह निवेश वास्तविक परियोज नाओं में परिवर्तित होता है तो विनिर्माण,आधारभूत ढांचे, नवाचार, कृषि उत्पादकता, आ धुनिक तकनीक और रोजगार के क्षेत्र में इसके प्रभाव दिखाई दे सकते हैं। समझौते में कौ शल और पेशेवरों की आवा जाही को भी महत्व दिया गया है। पांच हजार तक कुशल भारतीयों के लिए अस्थायी रोजगार मार्ग, युवाओं के लिए कार्य-अवकाश व्यवस्था तथा विद्यार्थियों और कुशल स्नात कों के लिए अध्ययन के बाद काम के अवसर भारतीय प्रति भाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुभव के नए रास्ते खोल सकते हैं। स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा, योग, शिक्षा, पर्यटन और खेल जैसे क्षेत्रों में सह योग भी भारत की सेवा क्षेत्रीय क्षमता को बढ़ाने में सटिका से सहायक हो सकता है।
साथियों, इसका प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर पड़ सकता है। निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा आय बढ़ सकती है,उत्पादन का विस्तार हो सकता है और श्रम-प्रधान उद्योगों में रोज गार के अवसर पैदा हो सकते हैं। यदि न्यूजीलैंड से आने वाला निवेश उत्पादन क्षमता और आधारभूत ढांचे में लगता है तो घरेलू आर्थिक गतिवि धियों को भी गति मिल सकती है। छोटे और मध्यम उद्यमों को विदेशी खरीदारों तक सी धी पहुंच मिलने से उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को अपनाने की प्रेरणा मिल सकती है।
साथ ही भारतीय किसा नों के लिए सेब, कीवी और मनुका शहद जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता सहयोग तथा तक नीकी ज्ञान के अवसर भी सटि का से समझौते का हिस्सा हैं।
साथियों शेयर बाजार पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष से अद्दि क क्षेत्र-विशेष के माध्यम से दिखाई दे सकता है। जिन भारतीय कंपनियों का न्यूजी लैंड में निर्यात बढ़ सकता है, उनके लिए लागत घटने और बाजार विस्तार की संभावना सकारात्मक मानी जा सकती है। कपड़ा, चमड़ा, जूते, इंजी नियरी, औषधि, प्रसंस्कृत खाद्य और कुछ सेवा क्षेत्रों की कंप नियां नए अवसरों की तलाश कर सकती हैं। हालांकि शेयर बाजार केवल किसी एक सम झौते से संचालित नहीं होता। ब्याज दरें, वैश्विक मांग, कच्चे तेल की कीमत, मुद्रा विनिमय दर,विदेशी निवेश और व्यापक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी बाजार को प्रभावित करती हैं। इसलिए इस समझौते को बाजार में तत्काल और सार्व भौमिक तेजी की गारंटी मान ना उचित नहीं होगा।
इसका वास्तविक प्रभाव कंपनियों के निर्यात आंकड़ों, लाभ, नए आदेशों और सटी कता से निवेश के वास्तविक प्रवाह में दिखाई देगा।
साथियों भारत की अंतररा ष्ट्रीय प्रतिष्ठा के दृष्टिकोण से भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। भारत अब केवल बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि विश्वसनीय उत्पादन और नि र्यात साझेदार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। न्यूजीलैंड जैसे विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश के साथ व्यापक व्यापारिक समझौता भारत की आर्थिक कूटनीति की बढ़ती सक्रियता को दर्शाता है। भा रत हाल के वर्षों में अनेक व्यापारिक साझेदारों के साथ समझौतों को आगे बढ़ा रहा है। सरकारी अभिलेखों के अनु सार भारत ने 16 मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, हालांकि नए समझौतों में से कुछ 20 सितंबर 2026 तक अभी लागू होने की अंतिम कानूनी प्रक्रिया में थे। इसलि ए केवल संख्या बताकर सभी को सक्रिय समझौते कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। इसी व्यापक व्यापार कूटनीति में कनाडा के साथ प्रस्तावित समझौते की बात चीत भी महत्वपूर्ण है। भारत और कनाडा के बीच अगले दौर की व्यापार वार्ता 5 अक्टू बर 2026 से शुरू होने वाली है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को गति मिलने की संभावना है। इसका अर्थ है कि भारत एक साथ अनेक विकसित और उभरते बाजारों में अपनी व्यापा रिक पहुंच बढ़ाने की सटीकता से कोशिश कर रहा है।
साथियों फिर भी मुक्त व्या पार समझौते को केवल लाभ का दस्तावेज मानना उचित नहीं होगा। सीमा शुल्क कम होने से सरकारी राजस्व पर प्रभाव पड़ सकता है, आयात बढ़ने पर कुछ घरेलू उद्योगों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव आ सकता है और यदि निर्यात की तुलना में आयात अधिक तेजी से बढ़े तो व्यापार घाटे की चुनौती सामने आ सकती है। इसके अलावा निर्यातकों को मूल-स्थान संबंधी नियम, गुणवत्ता मानक, प्रमाणन और विदेशी बाजार की नियामकीय आवश्यकताओं का पालन कर ना होगा। केवल शुल्क समाप्त हो जाने से निर्यात अपने आप नहीं बढ़ताय उत्पादन की गुण वत्ता, कीमत, आपूर्ति की विश्व सनीयता और वैश्विक मांग भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे के भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते की असली परीक्षा 20 अक्टूबर 2026 को इसके लागू होने के बाद शुरू होगी। समझौते ने भारतीय उत्पादों के लिए न्यूजीलैंड का बाजार खोला है, निवेश के नए रास्ते बनाए हैं और पेशेवरों तथा विद्यार्थियों के लिए अवसर बढ़ाए हैं।
साथ ही भारत ने डेयरी और संवेदनशील कृषि क्षेत्रों में सुरक्षा बनाए रखकर घरेलू हितों को भी महत्व दिया है। अगले चार-पांच वर्षों में यदि निर्यात, निवेश और रोजगार में वास्तविक वृद्धि होती है तथा द्विपक्षीय व्यापार लगभग 35 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचता है, तो यह समझौता भारत की बदलती व्यापार रण नीति की ठोस सफलता के रूप में सामने आ सकता है। अंततः भारत की चुनौती केवल अधिक समझौते करना नहीं, बल्कि उनका लाभ भारतीय किसान, श्रमिक, छोटे उद्यमी, निर्यातक और निवेशक तक पहुंचाना है। यही वह कसौटी होगी जिस पर भारत की नई व्यापारिक कूटनीति और वैश्विक आर्थिक प्रतिष्ठा का वास्तविक मूल्यांकन होगा।
भारत का एफटीए महाअभियान- न्यूजीलैंड से नए बाजारों तक वैश्विक व्यापार में बजा भारत का डंका! निर्यात, निवेश, रोजगार और अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा असर
