(राममिलन शर्मा)
लालगंज रायबरेली।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’की जयंती की पूर्व संध्या पर मंगलवार को लाल गंज के रामलीला मैदान में साहित्य की ऐसी महफिल सजी, जिसमें कविता के अलग – अलग रंग एक साथ दिखाई दिए। श्री फाउंडेशन के बैनर तले आयोजित सम्मान समारोह एवं अखिल भारतीय कवि सम्मे लन में देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे कवियों ने प्रेम, रिश्तों, सामाजिक सरोकारों, समसाम यिक परिस्थितियों और जीवन के संघर्षों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया।
काव्य पाठ के दौरान कभी ठहाके गूंजे तो कभी गंभीर पंक्तियों ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर किया। कार्यक्रम में क्षेत्र की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के पदाधिकारियों को अंगवस्त्र एवं प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया। समारोह का शुभारंभ समाज सेवी मनोज द्विवेदी दादा श्री एवं समाजसेवी सुधा द्विवेदी ने किया।
इसके बाद शुरू हुई काव्य संध्या में गोरखपुर से पहुंचीं कवयित्री डा. चेतना पांडेय ने अपनी रचना के माध्यम से समय, समर्पण और जीवन के रिश्तों की संवेदनश् ाीलता को उकेरा।
“किसी दिन तो होता बड़ी का समर्पण, समय भोगता है सदी का समर्पण, कभी जब समय तुमको सागर बना दे, नहीं भूल जाना नदी का सम र्पण” सुनाकर उन्होंने श्रोताओं की खूब वाहवाही बटोरी।
लखनऊ की कवयित्री शशि श्रेया ने अपनी रचना में रिश्तों की विडंबना को सहज लेकिन प्रभावी अंदाज में सामने प्रदर्शित किया।
“मैंने माधव से कहा सामने सब अपने हैं, जवाब था अगर अपने हैं तो सामने क्यों हैं” पंक्तियों ने श्रोताओं को ठहरकर सोचने का अवसर दिया और सभागार तालियों से गूंज उठा।
प्रयागराज से आए कवि अखिलेश द्विवेदी ने रिश्तों की दृढ़ता को केंद्र में रखते हुए कहा,
“कोई परिचय नहीं तुमसे मगर संबंध पक्का है, नहीं टूटे जो अंतिम सांस तक अनुबंध पक्का है।”
उनकी रचना पर भी श्रोता ओं ने जमकर दाद दी।
मिश्रिख से आए कवि जग जीवन मिश्रा ने व्यंग्य के माध्यम से समसामयिक परिस्थि तियों पर अपनी बात रखी।
“बदले-बदले से अब मेरे सरकार हैं, कुछ तो वादे हुए बासी अखबार हैं”
सुनाते ही श्रोताओं ने तालि यों से उनका स्वागत किया।
कवि अंजनी कुमार सिंह ने प्रेम की अनुभूति को शब्द देते हुए-
“उठती-गिरती लहरें दिख ती सांसों के जलधार की, अभी -अभी आई जो चिट्ठी पहले- पहले प्यार की” सुनाई।
वहीं हसन रायबरेलवी ने सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे की भावना को अपनी कविता में स्थान दिया।
“एक ही घर है हमारा, फिर यह झगड़ा किस लिए, मिलकर रहने के अलावा रास्ता कोई नहीं” के जरिए उन्होंने साथ रहने का संदेश दिया।
कवि प्रियांशु गजेंद्र ने जीवन में आने वाले सुख-दुख और बदलाव को सहज शब्दों में प्रस्तुत किया।
“फूलों के दिन, शूलों के दिन, गुड़हल और बबूलों के दिन सबके आते हैं, दिन से क्या घबराना, दिन तो आते- जाते हैं” पर श्रोताओं ने खूब तालियां बजाईं।
कार्यक्रम में बैसवारा की सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान भी कविता के माध्यम से उभरी। लखनऊ से आए कवि डा. अतुल वाजपेयी ने बैसवारा की माटी, उसके सा हित्य और गौरवशाली परंपरा को अपनी रचना में पिरोया।
“यह धरा निराला महावीर की जननी है, यह नंद दुलारे, सुमन, सनेही, शर्मा जी की जननी है.. यह क्षेत्र हमारा और तुम्हारा प्यारा बैसवारा है”
सुनाकर उन्होंने स्थानीय श्रोताओं से सीधा जुड़ाव कायम किया। उनकी प्रस्तुति पर रामलीला मैदान तालियों से गूंज उठा।
कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे कवि नीरज पांडेय ने अपनी ओजपूर्ण पंक्तियों से श्रोताओं में उत्साह का संचार किया। “कदम जब तक हमें मंजिल तलक पहुंचा नहीं देंगे, थकान को पांव तक आने का हम मौका नहीं देंगे”
सुनाकर उन्होंने संघर्ष और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता का संदेश दिया।
स्वयं श्रीवास्तव, डा. विनय भदौरिया सहित अन्य कवियों ने भी काव्य पाठ किया।
कवि सम्मेलन के साथ आयोजित सम्मान समारोह में क्षेत्र में सामाजिक, साहि त्यिक और सांस्कृतिक गतिवि धियों को आगे बढ़ाने वाली विभिन्न संस्थाओं के पदाधि कारियों एवं प्रतिनिधियों को अंगवस्त्र और प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
आयोजन में क्षेत्र की अनेक संस्थाओं की सहभागिता रही, जिससे कार्यक्रम को व्यापक सामाजिक जुड़ाव मिला। समा जसेवी मनोज द्विवेदी एवं सु धा द्विवेदी ने कहा कि राष्ट्र कवि दिनकर की जयंती की पूर्व संध्या पर आयोजन का उद्देश्य उनकी साहित्यिक विरा सत को स्मरण करना और साहित्य को समाज तथा नई पीढ़ी से जोड़ना है।
उन्होंने कहा कि साहित्य समाज की संवेदनाओं को आ वाज देने का माध्यम है और ऐसे आयोजनों से साहित्यिक वातावरण को मजबूती मिलती है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता और क्षेत्रवासी मौजू द रहे। दिनकर की स्मृति में आयोजित इस काव्य संध्या में कविता के जरिए रिश्तों, समाज और जीवन के विविद्द पक्षों की अभिव्यक्ति हुई और लालगंज की शाम साहित्यिक रंग में डूबी रही।
दिनकर जयंती की पूर्व संध्या पर साहित्यिक रंग में रंगा लालगंज, कवियों की रचनाओं ने बांधा समां
