एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर 19 सितंबर 2026 का दिन वैश्विक अर्थव् यवस्था के लिए केवल एक और कारोबारी दिन नहीं है, बल्कि यह उस बदलती आर्थि क व्यवस्था का संकेत है जिस में ऊर्जा, व्यापार प्रतिबंध, शुल्क, मुद्रा और शेयर बाजार एक- दूसरे से पहले से कहीं अद्दिक गहराई से जुड़ गए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोना ल्ड ट्रंप द्वारा रूस और ईरान से संबंधित नए प्रतिबंध कानून पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद भारत समेत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के सामने नई अनिश्चितता खड़ी हो गई है। इस कानून में रूस की ऊर्जा खरीद करने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने की शक्ति अमेरिकी रा ष्ट्रपति को दी गई है। हालां कि इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत पर आज से ही 100 प्रतिशत शुल्क लागू हो गया है, बल्कि यह अमेरिकी प्रशा सन को भविष्य में ऐसा कदम उठाने का वैधानिक अधिकार देता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि, भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर अगस्त में भारतीय वस्तु निर्यात 43.81 अरब डालर तक पहुंचा और कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात 82.68 अरब डालर रहने का अनुमान लगाया गया, वहीं दूसरी ओर रूस से ऊर्जा आयात और अमेरिकी बाजार के बीच संतु लन की चुनौती और जटिल हो सकती है। ऐसे समय में जब भारतीय रुपया लगभग 95.87 प्रति डालर पर है और भारतीय शेयर बाजार वैश्विक संकेतों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, अमेरिकी प्रतिबंद्दों का नया ढांचा केवल विदेश नीति का विषय नहीं रह जाता, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मुद्रा, महंगाई,उद्योग और निवेशकों की मनोदशा से सीधे जुड़ जाता है।
साथियों, बात अगर हम अमेरिकी कानून ने बदला आ र्थिक समीकरण, इसको सम झने की करें तो 18 सितंबर 2026 को ट्रंप ने लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंद्द अधिनियम 2026 पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दिया। अमेरिकी सरकार के अनुसार यह कानून रूस पर वैधानिक प्रतिबंधों, शुल्क और अन्य प्रतिबंधात्मक उपायों का विस् तार करता है तथा ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाता है। इसके अंतर्गत रूस के तेल या प्राकृतिक गैस के प्रमुख खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रावधान है। कानून में कुछ अपवाद और शर्तें भी हैं, इस लिए इसे भारत पर तत् काल 100 प्रतिशत शुल्क लगाए जाने के रूप में देखना तथ्या त्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन आर्थिक दृष्टि से अस ली चिंता इसी अधिकार के अस्तित्व में है। यदि भविष्य में अमेरिकी प्रशासन भारत के रूस से ऊर्जा आयात को लेकर अतिरिक्त शुल्क लागू करता है तोभारत के लिए चुनौती केवल अमेरिका को होने वाला निर्यात नहीं होगी, बल्कि रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल की उपलब्धता, भारतीय परि शोधन उद्योग की लागत, घरेलू ईंधन कीमतों, व्यापार संतुलन और मुद्रा बाजार पर भी असर पड़ सकता है। यही कारण है कि आज का घटनाक्रम एक संभावित शुल्क विवाद से आगे बढ़कर भारत की ऊर्जा और व्यापार नीति के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है।
साथियों बात अगर हम भारत के सामने दोहरी आर्थि क चुनौती को समझने की करें तो, भारत की वर्तमान स्थिति में सबसे दिलचस्प विरोधाभास यह है कि निर्यात क्षेत्र से अच्छी खबर आई है, लेकिन बाहरी आर्थिक जोखिम भी बढ़ा है। अगस्त 2026 में भारत का वस्तु निर्यात 43.81 अरब डालर रहा, जबकि पिछले वर्ष अगस्त में यह 34.74 अरब डालर था। इसी अवधि में कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात का अनुमान 82.68 अरब डालर रहा।
इंजीनियरिंग वस्तुओं, इलेक् ट्रानिक वस्तुओं और पेट्रोलियम उत्पादों सहित कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। अप्रैल से अगस्त 2026-27 के दौरान वस्तु निर्यात 215.91 अरब डालर रहा। इस आंकड़े का एक महत्वपूर्ण अर्थ यह है कि भारत का निर्यात क्षेत्र वैश्विक मांग का लाभ उठाने की क्षमता दिखा रहा है। लेकिन यदि अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लागू करता है तो भारत के लिए एक तर फ अमेरिकी बाजार में निर्यात को बनाए रखना और दूसरी तरफ अपनी ऊर्जा आवश्यकता के लिए रूस से तेल खरीदना दोनों लक्ष्यों के बीच संतुलन कठिन हो सकता है। यही वह बिंदु है जहां व्यापार नीति और ऊर्जा नीति एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।
साथियों बात अगर हम रूस का तेल भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? इसको समझने की करें तो भारत अपनी विशाल ऊर्जा आवश्यकता के कारण दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल आयातक देशों में है। ऐसे में तेल की कीमत में प्रत्येक बड़ी वृद्धि का असर केवल पेट्रोल और डीजल पर नहीं पड़ता।
परिवहन लागत, विमानन रसायन प्लास्टिक, उर्वरक, वि निर्माण और वस्तुओं की ढुलाई तक इसकी श्रृंखलाबद्ध प्रति क्रिया पहुंचती है। यदि रूस से मिलने वाले तेल पर प्रतिबं धों या अतिरिक्त शुल्क के का रण भारत को वैकल्पिक स्रोतों से अधिक महंगा तेल खरीद ना पड़ता है, तो भारतीय आ यात बिल बढ़ सकता है।
दूसरी ओर यदि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिका उस पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का निर्णय करता है तो भारत के अमेरिकी बाजार में निर्यात पर दबाव पैदा हो सकता है।
इसलिए भारत के सामने मूल प्रश्न यह है कि वह ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात बाजार और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन सटीकता से कैसे बनाए रखे।
साथियों बात अगर कर हम रुपये के लिए भी बढ़ सक ता है दबाव इसको समझने की करें तो,19 सितंबर को उपलब्ध ताजा जानकारी के अनुसार शुक्रवार को भारतीय रुपया 95.87 प्रति डालर पर बंद हुआ। उसे भारतीय रिजर्व बैंक की डालर बिक्री और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से कुछ सहारा मिला, लेकिन मजबूत अमेरिकी मुद्रा और आयातकों की डालर मांग ने उसकी मजबूती सीमित रखी। चालू वित्त वर्ष में रुपया अब तक लगभग 1.05 प्रतिशत कम जोर हो चुका है।यदि भविष्य में तेल का आयात महंगा होता है तो भारत को तेल खरीदने के लिए अधिक डालर की आव श्यकता होगी। इससे डालर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव आ सकता है। कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए कुछ परिस्थितियों में लाभ कारी हो सकता है, लेकिन महंगे आयात के कारण कच्चे माल, ऊर्जा और मशीनरी की लागत बढ़ सकती है।
इसलिए रुपये की कमजो री को केवल निर्यातकों के लिए लाभ के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
साथियों बात अगर हम शेयर बाजार के लिए असली परीक्षा को समझने की करें तो 18 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार में मिश्रित तस्वीर देखने को मिली। सेंसेक्स 19.63 अंक की मामूली गिरावट के साथ 74,294.96 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 में 75.80 अंक अथवा 0.33 प्रतिशत की बढ़त रही और वह 23,346.40 पर बंद हुआ। व्यापक बाजार में मध्य और छोटे आकार की कंपनियों के सूचकांकों में अपे क्षाकृत बेहतर प्रदर्शन हुआ।
लेकिन बाजार की इस स्थिरता को जोखिम समाप्त होने का संकेत नहीं माना जा सकता। कच्चा तेल, अमेरिकी ब्याज दरें, वैश्विक बांड प्रति फल विदेशी निवेश और भू-रा जनीतिक तनाव भारतीय बाजार की दिशा को प्रभावित करते रहेंगे। यदि रूस के तेल को लेकर अमेरिका की ओर से वास्तविक अतिरिक्त शुल्क लागू होता है तो निर्यात आ धारित कंपनियों, ऊर्जा- खपत वाले उद्योगों, रसायन, विमानन, परिवहन और अन्य क्षेत्रों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ सकता है। साथियों बात अगर हम निवेशकों के लिए सबसे बड़े संदेश को समझने की करें तो, निवेशकों के लिए वर्तमान परिस्थिति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल एक दिन के शेयर बाजार की तेजी या गिरावट के आधार पर भविष्य का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। बाजार इस समय कई परस्पर विरो द्दी संकेतों को एक साथ समा हित कर रहा है। एक ओर कच्चे तेल में कुछ नरमी आती है तो बाजार को राहत मिलती है,दूसरी ओर अमेरिका के नए प्रतिबंधों से ऊर्जा और व्यापार संबंधी अनिश्चितता बढ़ती है।एक तरफ भारत के निर्यात में तेज वृद्धि हुई है, तो दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा और रुपये पर बाहरी दबाव बना हुआ है। ऐसे वातावरण में भारतीय निवेशकों के लिए कंपनियों की आय, कर्ज, आयात पर निर्भरता, निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी और ऊर्जा लागत जैसे मूलभूत तत्व पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वैश्विक निवेशकों के लिए भारत की कहानी केवल आर्थि क वृद्धि की नहीं बल्कि बाहरी झटकों को सहने की क्षमता की भी होगी।
साथियों बात अगर हम महंगाई की चिंता क्यों लौट सकती है इसको समझने की करें तो, यदि कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो भारत के लिए महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है। तेल महंगा होने से परिव हन लागत बढ़ती है और उस का प्रभाव अनेक वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंच सकता है।
यदि उसी समय रुपया भी कमजोर होता है तो आया तित मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ सकता है। इसके विप रीत यदि तेल की कीमतों में पर्याप्त और स्थायी कमी आती है तो भारत के आयात बिल और महंगाई दोनों को राहत मिल सकती है। यही कारण है कि आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिकी प्रतिबंध कानून का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि उसका वास्तविक क्रियान्वयन किस रूप में होता है, तेल की वैश्विक कीमतें किस दिशा में जाती हैं और भारत वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों तथा व्यापारिक साझेदारियों का कितना प्रभावी उपयोग करता है।
साथियों बात अगर हम निर्यात की तेज रफ्तार के बीच नया प्रश्न इसको समझने की करें तो अगस्त के निर्यात आंक ड़ों ने भारत की अर्थव्यवस्था को एक सकारात्मक आधार दिया है। वस्तु निर्यात में 26 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक वृद्धि दर्ज हुई और कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात 82.68 अरब डालर तक पहुंचने का सटीक अनुमान रहा। लेकिन अब प्रश्न यह है कि क्या यह निर्यात गति आगे भी कायम रह सके गी। अमेरिका भारत के लिए एक महत्वपूर्ण निर्यात बाजार है। यदि रूस से तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त अमेरिकी शुल्क लागू होते हैं और उसके जवाब में व्यापारिक तनाव बढ़ता है,तो भारतीय निर्यातकों को नए बाजार खोजने, लागत घटाने और आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव करने की आवश्यक ता पड़ सकती है। इससे अल्प काल में अनिश्चितता बढ़ सक ती है, जबकि दीर्घकाल में भारत के लिए बाजारों का वि विधीकरण एक महत्वपूर्ण रण नीतिक आवश्यकता बन सक ता है। भारत के लिए अवसर भी मौजूद है, वर्तमान परिस्थि तियों में केवल जोखिम देखना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता की आवश्यकता बढ़ रही है। यदि कंपनियां किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भरता घटाना चाहती हैं तो भारत वि निर्माण इलेक्ट्रॉनिक्स, औष धि, इंजीनियरिंग, रसायन और अन्य क्षेत्रों में अपनी क्षमता का विस्तार कर सकता है। अगस्त के निर्यात आंकड़ों में इलेक्ट्रानिक वस्तुओं और इंजी नियरिंग वस्तुओं की मजबूत वृद्धि इसका संकेत देती है। इसलिए वर्तमान संकट भारत के लिए चुनौती के साथ- साथ व्यापारिक विविधीकरण का अवसर भी बन सकता है। यदि भारत अमेरिकी बाजार के साथ संबंध बनाए रखते हुए यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य उभरते बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाता है तो किसी एक बाजार पर अत्य धिक निर्भरता कम की जा सकती है।
साथियों बात अगर हम आने वाले सप्ताह में बाजार की नजर किन बातों पर होगी इसको समझने की करें तो अब बाजार की निगाह मुख्य रूप से पांच बातों पर रहेगी, अमेरिकी प्रशासन नए कानून का वास्तविक उपयोग किस प्रकार करता है, रूस से भार तीय तेल आयात को लेकर आगे क्या निर्णय सामने आता है, कच्चे तेल की कीमत किस स्तर पर टिकती है, रुपया 96 प्रति डालर के आसपास किस प्रकार व्यवहार करता है और विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार में वापसी कितनी मजबूत होती है। इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव भारतीय शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था की दिशा को प्रभावित कर सकता है।
ट्रंप की 100 प्रतिशत टैरिफ मिसाइल का भारत पर अगला वार, भारत के रुपया, बाजार, निर्यात, निवेशकों और महंगाई तक मचेगा कितना बड़ा तूफान?
