एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट)।
वैश्विक स्तर पर भारत में जहरीली शराब से मौत की खबर कोई नई खबर नहीं है। वर्षों से अलग-अलग राज्यों से ऐसी त्रासदियां सामने आती रही हैं और हर बार मौतों के बाद जांच, छापे, गिरफ्तारी, निलं बन, मुआवजा और कठोर कार्रवाई के आश्वासन सुनाई देते हैं। लेकिन कुछ समय बाद वही कहानी किसी दूसरे जिले, दूसरे राज्य और दूसरे गांव में फिर सामने आ जाती है। 6 सितंबर 2026 को मध्य प्रदेश के सागर जिले के बंडा क्षेत्र से सामने आई कथित जहरीलीध्अवैध शराब की त्रासदी ने इसी पुराने प्रश्न को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है, आखिर जहरी ली शराब का नेटवर्क बार- बार क्यों लौट आता है और उसे स्थायी रूप से तोड़ने में व्यवस्था क्यों सफल नहीं हो पा रही? मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र मीडिया के हवाले से बताना चाहूंगा कि सागर में 6 सितंबर को सुबह से मृतकों की संख्या लगातार बदलती रही। शुरुआती रिपोर्टों में 8-9 मौतें सामने आईं, बाद में 11 और कुछ रिपोर्टों में 12 से 14 से अद्दि क मौतों की सूचना दी गई। 30 से अधिक लोगों के अस्प ताल में भर्ती होने की खबरें भी सामने आईं। प्रभावित क्षेत्र में बंडा तहसील के कई गांवों के नाम सामने आए हैं और प्रशासन ने मेडिकल तथा जांच टीमें तैनात की हैं।
शुरुआती चिकित्सकीय आकलन में मेथनॉल विषाक्तता की आशंका व्यक्त की गई, लेकिन अंतिम कारण पोस्ट मार्टम और रासायनिक जांच के बाद ही निश्चित होगा।
साथियों, इस घटना ने एक और गंभीर पहलू सामने रखा है। प्रारंभिक जांच संबं धी रिपोर्टों में उत्तर प्रदेश के ललितपुर से कथित नकली शराब नेटवर्क का कनेक्शन सामने आने की बात कही गई है। जांच रिपोर्टों के अनु सार नकली शराब को वास्त विक ब्रांड जैसा दिखाने के लिए नकली लेबल, ढक्कन और क्यूरआर कोड का इस्ते माल किए जाने का आरोप है तथा इसे वाहनों और मोटर साइकिलों के माध्यम से मध्य प्रदेश के गांवों तक पहुंचाने की बात सामने आई है।कुछ रिपोर्टों में पांच शराब दुकानों को सील किए जाने की जान कारी भी है। हालांकि इस पूरे नेटवर्क की वास्तविक संरचना और किस स्तर तक इसकी पहुंच थी, यह जांच पूरी होने के बाद ही सटीकता से स्पष्ट होगा।
साथियों, यहीं से पहला और सबसे बड़ा प्रश्न उठता है शराब माफिया आखिर इत ना संगठित कैसे हो जाता है कि नकली उत्पाद तैयार कर सके, उसे असली ब्रांड जैसा पैक कर सके, नकली क्यूर आर कोड लगा सके,सीमावर्ती जिलों में पहुंचा सके और अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचा सके? यदि किसी नेटवर्क में उत्पादन, पैकेजिंग, परिवहन, वितरण और स्थानीय बिक्री की अलग- अलग कड़ियां मौजूद हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति की आपराधिक गति विधि नहीं रह जाती। यह संगठित अवैध अर्थव्यवस्था का रूप ले लेती है। सागर की प्रारंभिक जांच में ललितपुर कनेक्शन की बात सामने आना इसी पहलू को गंभीर बनाता है। साथियों, बात अगर हम इस अवैध शराब से जुड़े पहले स्तररू शराब माफिया,नकली शराब की पूरी श्रृंखला को सम झने की करें तो, अवैध शराब का कारोबार सामान्यतः केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं होता जो अंतिम बोतल बेचता है। सवाल यह है कि नकली शराब बनती कहां है, उसके लिए कच्चा माल और रसायन कहां से आते हैं, उसे तैयार कौन करता है, बोतलों में कौन भरता है नकली ब्रां डिंग कौन करता है, परिवहन कौन करता है और स्थानीय स्तर पर उसे बेचने वाला कौन है? सागर मामले में यदि ललि तपुर से उत्पादन और सागर तक आपूर्ति की जांच सही साबित होती है, तो जांच एजें सियों को केवल स्थानीय विक्रे ता तक रुकने के बजाय पूरे सप्लाई नेटवर्क को खंगालना होगा। मई 2026 के पुणे मामले ने भी इसी नेटवर्क की गंभीरता दिखाई थी। वहां जांच में मेथनाल की आपूर्ति और उसे अवैध शराब में मिलाए जाने की कड़ी सामने आई तथा एफडीए ने हजारों किलो ग्राम मेथनाल जब्त किया था। यानें जहरीली शराब की सम स्या केवल कुछ लोग चोरी से शराब बना रहे हैं तक सीमित नहीं है इसके पीछे रसायनों की उपलब्धता, अवैद्द उत्पादन वितरण और स्थानीय बिक्री जैसी अनेक कड़ियां हो सकती हैं।
साथियों, बात अगर हम इस अवैध शराब से जुड़े दूसरे स्तर, प्रशासन और आबकारी व्यवस्था,निगरानी कहां टूटती है? इसको समझने की करें तो,दूसरा सवाल सीधे प्रशा सन और आबकारी विभाग की जिम्मेदारी से जुड़ता है। लाइसेंस प्राप्त शराब दुकानों की निगरानी, अवैध बिक्री की पहचान, संदिग्ध शराब की जांच, स्टाक और दस्तावेजों का सत्यापन तथा अवैध नेट वर्क के विरुद्ध कार्रवाई व्यव स्था की जिम्मेदारियों का हिस् सा हैं। यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक अवैध शराब बिकती रहती है, तो यह पूछ ना स्वाभाविक है कि स्थानीय सूचना तंत्र, पुलिस, आबकारी विभाग और जिला प्रशासन के बीच समन्वय कितना प्रभा वी था। लेकिन यहां एक मह त्वपूर्ण सिद्धांत भी जरूरी है, हर जहरीली शराब की घटना के बाद पूरे प्रशासन को बिना जांच दोषी घोषित करना उचित नहीं है। दोष व्यक्तिगत अधिकारियों का है? विभागीय
लापरवाही है? स्थानीय मिलीभगत है? या नेटवर्क ने निगरानी को चकमा दिया? यह स्वतंत्र जांच से तय होना चाहिए। फिर भी यदि जांच में यह सामने आता है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई, संदिग्ध दुकानों की निगरानी नहीं की गई या अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें बंद कीं, तो जवाबदेही केवल माफिया तक सीमित नहीं रह सकती। पुणे त्रासदी के बाद पुलिस और आबकारी विभाग के 22 कर्मचारियों के निलंबन? ने यही सिद्धांत सा मने रखा कि यदि सरकारी निगरानी में गंभीर चूक प्रमा णित होती है तो प्रशासनिक जवाबदेही भी सटीकता से तय की जा सकती है।
साथियों बात अगर हम इस अवैध शराब से जुड़े तीसरे स्तर-राजनीतिक और आर्थिक विरोधाभास, राजस्व बनाम जीवन इसको समझने की करें तो, भारत में शराब एक बड़ा आर्थिक क्षेत्र है और अनेक राज्य इससे महत्वपूर्ण राजस्व प्राप्त करते हैं। यही सबसे बड़ा विरोधाभास पैदा करता है। एक ओर सरकार शराब की बिक्री को नियंत्रित और लाइसेंस करती है तथा उससे राजस्व प्राप्त करती है, दूसरी ओर उसी व्यवस्था के समानांतर अवैध शराब का बाजार खड़ा हो जाता है, जो कभी-कभी सीधे मानव जीवन के लिए खतरा बन जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वैध शराब की बिक्री अपने आप जहरीली शराब की जिम्मेदार है। समस्या उस समय पैदा होती है जब वैध और अवैध बाजार के बीच निग रानी की दीवार कमजोर पड़ ती है। नकली बोतल, नकली लेबल, नकली क्यूरआर कोड और असली ब्रांड की नकल उपभोक्ता को यह समझने का अवसर ही नहीं देती कि वह क्या पी रहा है। सागर मामले में सामने आई कथित फर्जी पैकेजिंग इसी चिंता को और गंभीर बनाती है। इसलिए प्रश्न शराब के राजस्व को बंद करने या जारी रखने से पहले यह होना चाहिए कि क्या सरकार की नियामक क्षमता इतनी मजबूत है कि राजस्व व्यवस्था के साथ नागरिकों की सुरक्षा भी सटिका से सुनि श्चित की जा सके?
साथियों बात अगर हम इस अवैध शराब से जुड़े, चैथे स्तर- मानव जीवन बनाम सरकारी राजस्व को समझने की करें तो,सबसे बड़ा प्रश्न आखिरकार आर्थिक नहीं, मानवीय है। एक व्यक्ति की मृत्यु का मूल्य किसी सरकारी राजस्व तालिका में दर्ज नहीं किया जा सकता। जहरीली शराब से मरने वाले व्यक्ति के पीछे एक परिवार होता है बच्चे होते हैं, माता-पिता होते हैं, पत्नी या पति होते हैं, भविष्य की योजनाएं होती हैं और परिवार की आर्थिक सुरक्षा होती है। यदि कोई व्यक्ति जहरीली शराब पीकर मरता है तो नुकसान केवल एक जीवन का नहीं होता। परिवार की आय समाप्त हो सकती है, बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो सकती है, चिकि त्सा खर्च बढ़ सकता है, परि वार कर्ज में जा सकता है और सामाजिक सुरक्षा की आवश् यकता पैदा हो सकती है।
इसलिए जहरीली शराब की वास्तविक सामाजिक लाग त उस तत्काल सरकारी राज स्व से कहीं अधिक हो सकती है जो शराब के वैध कारोबार से प्राप्त होता है। भारत की जनता अब बार-बार सामने आने वाली ऐसी खबरों से केवल दुखी नहीं है, वह जवाब चाहती है। सवाल अब यह नहीं होना चाहिए कि अगली घटना के बाद कितने लोगों को गिरफ्तार किया जाएगा।
सवाल यह होना चाहिए कि अगली घटना होने ही न देने की सटिका से व्यवस्था कब बनेगी?
साथियों बात अगर हम इस अवैध शराब से जुड़े, गंभीर प्रश्न क्या केंद्र और रा ज्यों को नई राष्ट्रीय रणनीति चाहिए? इसको समझने की करें तो, अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इस समस्या को केवल कानून -व्यवस्था की स्थानीय घटना मानने के बजाय राष्ट्रीय सार्वजनिक- सुरक्षा चुनौती के रूप में देखें। केंद्र के स्तर पर अवैध शराब के अंतररा ज्यीय नेटवर्क, संदिग्ध औद्यो गिक रसायनों की आपूर्ति, डिजि टल ट्रैकिंग, फर्जी लेबल और नकली क्यूरआर कोड जैसी तकनीकों के दुरुपयोग पर राज्यों के बीच बेहतर सूचना- साझाकरण का मजबूत ढांचा बनाया जा सकता है।राज्यों को अपने स्तर पर आबकारी, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, फारें सिक प्रयोगशालाओं और जिला प्रशासन के बीच एकीकृत तंत्र बनाना चाहिए। संदिग्ध शराब की तत्काल जांच, संवेदनशील क्षेत्रों की जोखिम-मैपिंग, लाइ सेंस धारी दुकानों की डिजि टल निगरानी अवैध बिक्री की शिकायतों पर समयबद्ध कार्र वाई और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही को संस्थागत बनाया जाना चाहिए। साथ ही आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था भी उतनी ही महत्व पूर्ण है। जहरीली शराब के मामले में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। गांवों में तत्काल चिकित्सा पहुंच, विषाक्तता की पहचान, रेफरल व्यवस्था और चिकित्सकों के लिए स्पष्ट प्रोटोकाल कई जानें बचा सक ते हैं। साथियों सवाल आखिर किससे है? इसको समझने की करें तो, सागर की त्रासदी को केवल शराब पीने वालों की गलती कहकर समाप्त कर देना समस्या की जड़ से आंखें चुराना होगा।
व्यक्तिगत जिम्मेदारी अप नी जगह है, लेकिन जब नक ली शराब उत्पादन, संगठित परिवहन, नकली पैकेजिंग, अ वैध बिक्री और संभावित अंतर राज्यीय नेटवर्क जैसी कड़ियां सामने आती हैं, तब शासन की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। शराब माफिया दोषी है तो उसका नेटवर्क टूटना चाहिए।संभवतः अधिकारी दोषी हैं तो उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। निगरानी व्यवस्था कमजोर है तो उसे बदला जाना चाहिए। कानून अपर्याप्त हैं तो उन्हें मजबूत किया जाना चाहिए। और यदि किसी स्तर पर मिली भगत सिद्ध होती है तो कार्र वाई केवल छोटे विक्रेता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
अतः अगर उपरोक्त पूरे वि वरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि सागर से उठता सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या राज्य व्य वस्था शराब माफिया से हमेशा एक कदम पीछे चलेगी, या अब ऐसी व्यवस्था बनेगी जो माफिया के बाजार तक पहुंचने से पहले ही उसकी पूरी सप्लाई चेन को पहचानकर रोक दे?भारत की जनता अब केवल आंकड़े नहीं सुनना चाहती। उसे हर नई त्रासदी के बाद मृतकों की संख्या, गिरफ्तार आरोपियों और जांच समिति की घोषणा नहीं चा हिए। उसे यह भरोसा चाहिए कि अगली सुबह किसी गांव में नकली शराब की बोतल किसी परिवार के दरवाजे पर मौत बनकर नहीं पहुंचेगी। क्योंकि अंततः सवाल शराब का नहीं, मानव जीवन की की मत का है। और किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए नागरिक का जीवन किसी भी राजस्व से बड़ा होना चाहिए।
हर बार मौत, हर बार जांच, फिर वही जहरीली शराब – आखिर कब टूटेगा माफिया का नेटवर्क
