एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट)।
वैश्विक स्तर पर आज की दुनिया में किसी देश की आ र्थिक ताकत का आकलन केव ल उसके सकल घरेलू उत्पाद शेयर बाजार के सूचकांकों या विदेशी मुद्रा भंडार से नहीं किया जाता। वास्तविक शक्ति उस देश की इस क्षमता से तय होती है कि वह वैश्विक पूंजी कोकितना आकर्षित कर सक ता है, अपनी आपूर्तिश्रृंखलाओं को कितना सुरक्षित रख सक ता है, तकनीकी और रणनी तिक क्षेत्रों में कितनी आत्मनि र्भरता हासिल कर सकता है तथा बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी आवाज को कितना प्रभावशाली बना सकता है। इसी दृष्टि से वर्ष 2026 भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दि खाई देता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अमेरिका यात्रा, जी20 में भारत की सक्रिय भूमिका, ईओएस-05 जैसे अत् याधुनिक पृथ्वी अवलोकन उप ग्रह की सफलता, विदेशी मुद्रा भंडार का रिकार्ड स्तर और आगामी 12-13 सितंबर 2026 नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मे लन, ये सभी घटनाएं अलग- अलग दिखाई देती हैं,लेकिन वास्तव में इनके पीछे एक सा झा कहानी है- भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में केवल भागी दार नहीं, बल्कि प्रभावशाली शक्ति बनने की दिशा में सटी कता से आगे बढ़ रहा है।
साथियों, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की हालिया अंतर राष्ट्रीय आर्थिक कूटनीति इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकारी कार्यक्रम के अनु सार 25 अगस्त से 2 सितंबर 2026 तक कनाडा और अमे रिका की यात्रा के दौरान उन्हों ने निवेशकों, कंपनियों और वित्तीय क्षेत्र के प्रतिनिधियों से मुलाकात की तथा अमेरि का में शिकागो, एशविले और न्यूयॉर्क का दौरा किया।
एशविले में 31 अगस्त और 1 सितंबर को आयोजित जी 20 फाइनेंस मिनिस्टर्स एंड सेंट्रल बैंक गवर्नर्स बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करना विशेष महत्व रख ता है। इसका अर्थ यह है कि भारत वैश्विक आर्थिक संकटों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश मात्र नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक आर्थिक नियमों, वित्तीय स्थिरता और विकास की दिशा तय करने वाली बातचीत में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। ऐसे समय में जब व्या पार तनाव, ऊर्जा कीमतों, ऋण संकट और भू-राजनीतिक संघ र्षों ने वैश्विक निवेशकों के सामने अनिश्चितता बढ़ाई है, भारत का संदेश यह है कि उसकी अर्थव्यवस्था दीर्घकालि क निवेश, उत्पादन और तक नीकी विस्तार के लिए एक महत्वपूर्ण गंतव्य बनी हुई है।
इसका सीधा प्रभाव भार तीय शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है। जब वित्त मंत्री विश् व के बड़े निवेशकों के सामने भारत की आर्थिक क्षमता, निवे श अवसरों और वित्तीय क्षेत्र की संभावनाओं को प्रस्तुत कर ती हैं, तो इसका महत्व केवल कूटनीतिक नहीं होता। विदेशी संस्थागत निवेशक किसी बाजार में पैसा लगाने से पहले आर्थिक वृद्धि, मुद्रास्थिरता विदेशी मुद्रा भंडार राजकोषीय स्थिति, नीतिगत स्थिरता और कार्पोरेट संभावनाओं को देखते हैं। यदि इन मोर्चों पर विश्वास मजबूत होता है तो भारतीय इक्विटी बाजार में दीर्घका लिक विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ सकताहैहालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि शेयर बा जार लगातार ऊपर ही जाए गा। वैश्विक ब्याज दरें, अमेरि की बान्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतें, युद्ध और व्यापार नीतियां भारतीय बाजार में अस्थिरता पैदा कर सकती हैं। इसलिए भारत की कहानी मजबूत होने के बावजूद निवे शकों के लिए जोखिम प्रबंधन उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा।
साथियों, इसी आर्थिक कहानी को भारत के रिकार्ड विदेशी मुद्रा भंडार ने और मज बूती दी है। 28 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 11.475 अरब डालर बढ़कर 740.803 अरब डालर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां लगभग 600.67 अरब डॉलर और स्वर्ण भंडार लगभग 116.41 अरब डालर रहा। यह उपलब्धि भारती य अर्थव्यवस्था के लिए महज एक आंकड़ा नहीं है। विशाल विदेशी मुद्रा भंडार वैश्विक झटकों के सामने सुर क्षा- कवच की तरह काम करता है। यदि डालर मजबूत होता है, पूंजी बाजारों में अचानक निकासी होती है या तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार में व्यवस्थित हस्तक्षेप और रुपये में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने की क्षमता देता है। यही कारण है कि रिकॉर्ड रिजर्व भारतीय और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के मन में भारत की बाहरी वित्तीय स्थिरता को लेकर विश्वास बढ़ा सकता है। रुपये के संदर्भ में भी इसका महत्व अत्यंत बड़ा है। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होने से बाजार में यह विश्वास पैदा होता है कि भारत के पास वैश्विक भुगतान दायित्वों और बाहरी झटकों से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी आवश् यक है, उच्च विदेशी मुद्रा भंडार अपने आप में रुपये को स्थायी रूप से मजबूत नहीं बनाता। कच्चे तेल का आयात, अमेरिकी डालर की वैश्विक मांग, ब्याज दरों का अंतर और पूंजी प्रवाह जैसे अनेक कारक रुपये की दिशा तय करते हैं। इसलिए रिकार्ड रिजर्व को भा रत की वित्तीय ताकत का संकेत माना जाना चाहिए,न कि शेयर बाजार या मुद्रा में सटीकता से निश्चित तेजी की गारंटी।
साथियो, अब इस आर्थिक तस्वीर में अंतरिक्ष शक्ति को जोड़ना आवश्यक है। ईओएस -05 मिशन भारत की रण नीतिक और तकनीकी क्षमता के विस्तार का संकेत देता है। इसरो के अनुसार जीएस एलवी -एफ 17 ने ईओएस – 05 को सब -जियोसिंचरोनास ट्रांसफर ओरबिट में स्थापित किया और ईओएस-05 भारत का पहला इमेजिग सटेलाइट है जिसे जियोसिंचरोनास ओर बिट से पृथ्वी अवलोकन के लिए डिजाइन किया गया है। लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाले जियोसिंक्रोनस क्षेत्र में पृथ्वी अवलोकन की क्षमता का महत्व केवल सैन्य निगरानी तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग मौसम, आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण निगरा नी और व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं में किया जा सकता है। इस तरह अंतरिक्ष तकनीक अब भारत की अर्थव्य वस्था का भी हिस्सा बन रही है। साथियों यहां से अंतरराष् ट्रीय निवेश के लिए एक नया क्षेत्र खुलता है। यदि भारत पृथ्वी अवलोकन, संचार, नेवि गेशन, लान्च सेवाओं, सैटेला इट डेटा और अंतरिक्ष-आधा रित सेवाओं में अपनी क्षमता बढ़ाता है तो इससे निजी अंतरि क्ष कंपनियों, रक्षा- तकनीक, इलेक्ट्रानिक्स, सेमीकंडक्टर, सेंसर, साफ्टवेयर और डेटा एनालिटिक्स कंपनियों के लिए नए बाजार बन सकते हैं। परिण् ााम स्वरूप भारतीय शेयर बाजार में केवल पारंपरिक बैंकिंग, आईटी या ऑटोमोबाइल कंपनियां ही नहीं, बल्कि स्पेस-टेक और डीप-टेक से जुड़ी कंपनियां भी भविष्य की निवेश कहानी का हिस्सा बन सकती हैं लेकि न ईओएस-05 की रणनीतिक अहमियत इससे भी आगे जा ती है। आज दुनिया में युद्ध की प्रकृति बदल रही है। भविष्य के संघर्षों में जमीन, समुद्र और हवा के साथ अंत रिक्ष और साइबर क्षेत्र की भूमि का लगातार बढ़ सकती है। अमेरिका और चीन के बीच अंतरिक्ष क्षमता, उपग्रह नेटवर्क, संचार, नेविगेशन और पृथ्वी निगरानी को लेकर प्रतिस्प द्र्दा इसी बड़े बदलाव का संकेत है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अंतरिक्ष को केवल वैज्ञानिक उपलब्धि न मानकर आर्थिक, रणनीतिक और राष्ट्री य सुरक्षा अवसंरचना के रूप में विकसित करे। यदि भारत ऐसा करता है तो अंतरिक्ष क्षेत्र विजन 2047 की तकनीकी शक्ति का महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है। साथियों, इसी बीच 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स सम्मिट भारत की वैश्वि क आर्थिक कूटनीति के लिए एक और बड़ा अवसर है। भा रत 2026 में ब्रिक्स की अध्य क्षता कर रहा है और उसका थीम बिल्डिंग फार रेसिलिन्स, इन्नोवेशन, कोआपरेशन एंड
सस्टेएबिलिटी रखा गया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार वर्षभर में 25 से अ धिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्र म आयोजित किए जा चुके हैं। इसका अर्थ है कि ब्रिक्स केवल नेताओं की एक शिखर बैठक नहीं, बल्कि व्यापार, वित्त, निवेश, तकनीक और विकास सहयोग का विस्तृत मंच बन रहा है। साथियों, ब्रिक्स और जी 7 की तुलना करते समय इसे कौन जीता कौन हारा के सरल प्रश्न में सीमित कर ना उचित नहीं होगा। जी 7 के पास विकसित गतिशील अर्थ व्यवस्थाओं वैश्विक वित्तीय संस्थानों तकनीकी कंपनियों और पूंजी बाजारों में भारी प्र भाव है, जबकि ब्रिक्स का मह त्व उभरती गतिशील अर्थव्यवस् थाओं ऊर्जा प्राकृतिक संसा धनों बड़े उपभोक्ता बाजारों और ग्लोबल साउथ की आवा ज से जुड़ा है। दोनों समूहों की ताकत अलग-अलग क्षेत्रों में है। असली बदलाव यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था अब एक ध्रुवीय ढांचे से अधिक बहुध्रु वीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। भारत के लिए यह परिस्थि ति चुनौती के साथ- साथ असाधारण अवसर भी है।नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मे लन भारत को ग्लोबल साउथ और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक सेतु के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर देगा। यदि भारत व्यापार, डिजिटल भुगतान, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार, ऊर्जा सुरक्षा, महत्व पूर्ण खनिजों, विकास वित्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आपूर्ति श्रृंखला सहयोग पर व्यावहा रिक पहल आगे बढ़ाता है,तो इसका लाभ भारतीय कंपनि यों को मिल सकता है।
भारतीय बैंकों, डिजिटल भुगतान कंपनियों, इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों, ऊर्जा क्षेत्र, फार्मा, ऑटोमोबाइल, आईटी और विनिर्माण क्षेत्र के लिए नए बाजार खुल सकते हैं। विदेशी निवेशकों के लिए भी भारत का आकर्षण केवल भारत में निवेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के माध्यम से वैश्विक बाजारों तक पहुंच का माडल बन सकता है।
साथियों भारतीय शेयर बाजार के लिए इन सभी घट नाओं का संयुक्त प्रभाव मनोवै ज्ञानिक और वास्तविक दोनों हो सकता है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार बाजार को बाहरी झटकों के विरुद्ध भरोसा देता हैय वैश्विक आर्थिक कूटनीति विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ा सकती हैय अंतरिक्ष और रक्षा तकनीक नए औद्योगिक अवसर पैदा कर सकते हैं, जबकि ब्रिक्स और जी 20 में भारत की सक्रियता भारतीय कंपनियों के लिए नए वैश्विक बाजारों के दरवाजे खोल सक ती है। इसके साथ घरेलू उप भोग, बुनियादी ढांचा निवेश, विनिर्माण विस्तार और डिजि टल अर्थव्यवस्था जुड़ जाए तो भारत का इक्विटी बाजार दीर्घकाल में व्यापक विकास कहानी का प्रतिनिधि बन सक ता है। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए भारत की सबसे बड़ी ताकत अब केवल तेज जीडी पी ग्रोथ नहीं होगी। उन्हें भारत में एक साथ कई कहानियां दिखाई देंगी, बड़ा उपभोक्ता बाजार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, विनिर्माण क्षमता, ऊर्जा संक्रमण, अंतरिक्ष तकनी क, रक्षा उत्पादन, वित्तीय गह राई, स्टार्टअप इकोसिस्टम और ग्लोबल साउथ के साथ बढ़ते आर्थिक संबंध। लेकिन भारत को इस अवसर को स्थायी पूंजी में बदलने के लिए नियामकीय स्थिरता, न्यायिक और संविदात्मक निश्चितता, बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता, कौशल विकास और कारोबार करने की सरलता पर निरंतर काम करना होगा।
साथियो, विजन 2047 की दृष्टि से इन घटनाओं का मह त्व सबसे अधिक है। विकसित भारत केवल तब बनेगा जब भारत आर्थिक रूप से बड़ा होने के साथ- साथ वित्तीय रूप से मजबूत, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर, रणनीतिक रूप से सुरक्षित और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली बने। विदेशी मुद्रा भंडार भारत की वित्तीय ढाल को मजबूत करता है, अंतरिक्ष मिशन तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन करता है, जी 20 में आर्थिक कूटनीति वैश्विक नीति-निर्माण में भारत की आवाज को मजबूत करती है, और ब्रिक्स भारत को बदलती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में नेतृत्व का मंच देता है।
इन चारों को एक साथ देखने पर विजन 2047 का आर्थिक खाका अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारत के सामने अव सर बहुत बड़ा है, लेकिन इसे स्वतः मिलने वाली उपलब्धि समझना सबसे बड़ी भूल होगी। वैश्विक अर्थव्यवस्था में पूंजी आज उसी देश की ओर जाती है जहां विकास की संभावना के साथ नीति की विश्वसनी यता, संस्थागत मजबूती और भविष्य की तकनीकी क्षमता दिखाई देती है। भारत के रिकार्ड विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कूटनी ति, अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती क्षमता और ब्रिक्स नेतृत्व ने एक मजबूत आधार तैयार किया है। अब अगला चरण इस आ धार को रोजगार उत्पादकता, निर्यात, निजी निवेश, नवाचार और आम नागरिक की आय में बदलने का है। यदि भारत ऐसा करने में सफल रहता है तो 2047 केवल स्वतंत्रता की शताब्दी का उत्सव नहीं होगा, बल्कि उस समय तक भारत विश्व अर्थव्यवस्था का एक निर्णायक केंद्र, वैश्विक पूंजी का प्रमुख गंतव्य और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का प्रभा वशाली स्तंभ बन सकता है। यही इन चार घटनाओं का सबसे बड़ा संयुक्त संदेश है, भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को केवल देख नहीं रहा वह उसके अगले अध्याय को आकार देने की तैयारी कर रहा है।
अब भारत सिर्फ बाजार नहीं, वैश्विक शक्ति का केंद्र – शेयर बाजार, निवेश, अंतरिक्ष और ब्रिक्स से 2047 की निर्णायक छलांग
