एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी – गोंदिया (महाराष्ट)। वैश्विक स्तर पर जीभ डैण, जीभ जंवाई-भारतीय लोक- संस्कृति का यह दोहा केवल वाणी की मर्यादा का संदेश नहीं देता, बल्कि राजनीति समाज और कूटनीति में शब्दों की असाधारण शक्ति को भी समझाता है। एक शब्द किसी को सम्मान दिला सकता है और वही शब्द दूसरे संदर्भ में विवाद,राजनीतिक ध्रुवीकर ण और सार्वजनिक बहस का कारण बन सकता है। पीएम मोदी के बीतें 15 अगस्त 20 26 के लालकिले के भाषण में प्रयुक्त दिमागी नक्सल शब्द अब इसी शब्द-शक्ति का ताजा उदाहरण बन गया है।
15 अगस्त को पीएम ने लालकिले की प्राचीर से नक्स लवाद पर सरकार की कार्र वाई का उल्लेख करते हुए कहा कि हथियार उठाने वाले नक्सलवाद के खिलाफ देश ने महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है, लेकिन अब ऐसीदिमा गी नक्सली मानसिकता को भी पहचानने और अलग- थलग करने की आवश्यकता है। उनका तर्क था कि चुनौती केवल बंदूक उठाने वाले व्यक्ति से नहीं है, बल्कि उस वैचारि क समर्थन से भी है जो हिंस क माओवादी विचारधारा को सामाजिक या बौद्धिक आधा र प्रदान कर सकता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यहीं से शब्द राजनीति का नया अध्याय शुरू हुआ। पीएम के बयान को सत्ता पक्ष ने हिंसक नक्सलवाद के वैचारिक समर्थकों के संदर्भ में प्रस्तुत किया, जबकि विपक्ष ने इसे सरकार के आलोचकों, बुद्धिजीवियों और लोकतांत्रि क असहमति रखने वालों को एक ही श्रेणी में डालने का प्रयास बताया। प्रमुख विपक्षी पार्टी के वरिष्ठ नेता ने पलट वार करते हुए कहा कि उन्हें दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। उनकी टिप्पणी ने उस शब्द को, जिसे पीएम ने चेतावनी के रूप में इस्तेमाल किया था, विपक्ष की ओर से राजनीतिक व्यंग्य और प्रतिरोध के प्रतीक में बदल दिया। साथियों बात अगर हम दिमागी नक्सल आखिर है क्या – और विवाद इतना बड़ा क्यों? इसको सम झने की करें तो यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दि मागी नक्सल कोई स्थापित संवैधानिक, वैधानिक या का नूनी श्रेणी नहीं है। यह राज नीतिक विमर्श में इस्तेमाल किया गया एक राजनीतिक शब्द है। इसलिए इसके अर्थ का निर्धारण उसी संदर्भ से होगा जिसमें इसे बोला गया। पीएम के समर्थक इसे उन लोगों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं जो माओवादी हिंसा, संविधान-विरोधी हिंसक राज नीति अथवा देश की अखंड ता के विरुद्ध गतिविधियों को वैचारिक समर्थन देते हैं।
दूसरी ओर विपक्ष पूछ रहा है कि क्या सरकार की आलो चना असहमति, वैकल्पिक वि चार या किसी सरकारी नीति का विरोध अपने-आप दिमागी नक्सलवाद बन जाएगा?
यही वह महीन रेखा है जहां लोकतंत्र और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप एक-दूस रे से टकराते हैं। लोकतंत्र में सरकार का विरोध और हिं सक विद्रोह का समर्थन एक ही बात नहीं है। किसी नीति की आलोचना करना, न्याया लय में सरकार के निर्णय को चुनौती देना, संसद में विरोध करना या शांतिपूर्ण आंदोलन करना लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है। इसके विपरीत हिंसक संगठन की गतिवि धियों को समर्थन देना बिल्कु ल अलग प्रश्न है। इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ जैसे व्यापक शब्द की परिभाषा जितनी स्पष्ट होगी, विवाद उतना ही सीमित रहेगा।
साथियों बात अगर हम प्रमुख विपक्षी नेता का गर्व वा ला जवाब, राजनीतिक पलट वार या शब्द को हथियार बनाने की रणनीति? इसको समझने की करें तो उनकी प्रतिक्रिया ने विवाद को दूसरी दिशा दे दी। यदि किसी व्यक्ति को दिमागी नक्सल कहकर राजनीतिक रूप से कलंकित करने का प्रयास किया जा रहा हो, तो उसका उसी शब्द को उलटकर अपने पक्ष में इस्तेमाल करना राजनीतिक भाषण-कला की पुरानी रण नीति है। उनका का संदेश मूलतः यह था कि वे पीएम द्वारा बनाए गए उस वैचारिक फ्रेम को स्वीकार नहीं करते जिसमें आलोचना करने वालों को नक्सली कहकर देखा जाए। लेकिन सत्ता पक्ष ने इस पलट वार को स्वीकार नहीं किया। सत्ताधारी पक्ष के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता ने प्रेस काॅन्फ्रेंस में उनपर पर पलटवार करते हुए दिमागी नक्सल की अप नी राजनीतिक व्याख्या प्रस्तुत की और आरोप लगाया कि वैचारिक स्तर पर देश-विरो धी एजेंडे को समर्थन देने वाले लोग इस श्रेणी में आ सकते हैं। इसके साथ ही एक केंद्री य ने पूर्व पीएम के पुराने न क्सलवाद संबंधी बयान का हवाला देकर प्रमुख विपक्षी पार्टी को घेरने की कोशिश की। उस बयान में पूर्व पीएम ने नक्सलवाद को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बताया था। इस राज नीतिक पलटवार का संदेश साफ था, सत्ताधारी पार्टी प्रमुख विपक्षी पार्टी से पूछ रही है कि जब उसके अपने पूर्व पीएम नक्सलवाद को गंभीर राष्ट्री य चुनौती मानते थे, तो आज दिमागी नक्सल शब्द पर इत नी आपत्ति क्यों?
साथियों बात अगर हम विपक्ष का तर्क भी कम महत्व पूर्ण नहीं इस एंगल से इस को समझने की करें तो विपक्ष का सवाल लोकतांत्रिक दृष्टि से गंभीर है। उसका कहना है कि लालकिला केवल सर कार का मंच नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का संवैधानिक प्रतीक है। इसलिए स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में प्रयुक्त शब्दों का प्रभाव सामान्य राजनीति क सभा में बोले गए शब्दों से कहीं अधिक होता है। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्द के जरिए आलोचकों और वै चारिक विरोधियों को कलंकि त करने की कोशिश की जा रही है। यहीं भारतीय संस्कृति का वह पुराना संदेश फिर सामने आता है, बोलत बोलत बड़े बिखात। बोलने से पहले शब्द का अर्थ,उसका संदर्भ और उसके संभावित परिणा मों को समझना आवश्यक है। क्योंकि आज का राजनीतिक शब्द केवल सभा में समाप्त नहीं होताय वह टीवी स्क्रीन, सोशल मीडिया, मीम, हैशटैग और लाखों लोगों की राजनी तिक बातचीत में प्रवेश कर जाता है।
साथियों बात अगर हम दिमागी नक्सल पार्टी, शब्द से सोशल मीडिया ब्रांड तक इसको समझने की करें तो इस विवाद का सबसे दिलच स्प पहलू इसका सोशल मीडिया प्रभाव है। प्रधानमंत्री के बयान के बाद ‘दिमागी न क्सल पार्टी’ नाम से एक पै रोडी/सैटिरिकल सोशल मी डिया पहचान के उभरने की चर्चा शुरू हुई। इसे किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिएय उपलब्ध रिपोर्टों में इसके वास्तविक राजनीतिक संगठन होने की पुष्टि नहीं है। इसका महत्व इसलिए है कि उसने पीएम के शब्द को ही व्यंग्य में बदल दिया।यहां भारतीय राजनीति में हाल का काॅकरोच जनता पार्टी उदाह रण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। सीजेपी की शु रुआत सोशल मीडिया व्यंग्य और नीट – 2026 परीक्षा विवाद से जुड़े छात्र आंदोलन के संदर्भ में हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार, एक कथित अपमा नजनक टिप्पणीध्मीम से शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे जंतर-मंतर के प्रदर्शन और व्यापक छात्र आंदोलन में बदल गया। मई 2026 के मध्य में सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान, सीजेआई द्वारा बे रोजगार युवाओं और व्यवस्था की आलोचना करने वाले कुछ वर्ग को कथित तौर पर काॅक रोच(समाज के परजीवी) कहा गया था। मीम में रूपांतरण- इस टिप्पणी के सामने आते ही सोशल मीडिया (विशेषकर इंस्टाग्राम और एक्स) पर युवा ओं ने इसे अपमानित महसूस करने के बजाय खुद पर ढाल बनाया। काॅकरोच जनता पार्टी प्रमुख द्वारा 16 मई 2026 को एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक ध्युवा मंच के रूप में काॅकरोच जनता पार्टी की स्थापना की गई, जिसका नारा वाॅइस आॅफ द लेजी एंड अनएम्प्लाड रखा गया। इसके डिजिटल मीम्स, एआई- जनरेटेड इमेजरी और रील्स कुछ ही दिनों में लाखों -करोड़ों युवाओं तक पहुंच गए। बाद में सीजेपी ने केंद्री य शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को प्रमुख मांग बनाया। सरकार के साथ बातचीत में भी यह मांग रखी गई और 25 जुलाई 2026 को शिक्षामंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि किसी आंदोलन की एकमात्र वजह इस्तीफा थी, ऐसा नि ष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, उसके पीछे परीक्षा वि वाद, छात्रों का आंदोलन, राज नीतिक दबाव और अन्य परि स्थितियां भी थीं। डिजिटल युग में कोई व्यंग्यात्मक शब्द या प्रतीक यदि व्यापक जन- असंतोष से जुड़ जाए तो वह तेजी से राजनीतिक पहचान सटिका से बन सकती है।
साथियों बात अगर हम क्या दिमागी नक्सल भी सत्ता के लिए शब्दों का मायाजाल बन सकता है? इसको समझ ने की करें तो, यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न है। किसी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल विरोधी विचार नहीं होतेय चुनौती यह भी होती है कि उसके द्वारा चुने गए शब्दों का अर्थ उसके नि यंत्रण से बाहर जाकर किस रूप में इस्तेमाल होने लगता है। ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का उद्देश्य यदि हिंसक माओवा दी विचारधारा के वैचारिक समर्थन को चिन्हित करना है, तो उसे स्पष्ट, प्रमाण-आधा रित और सीमित परिभाषा के साथ प्रस्तुत करना अधिक प्र भावी होगा। लेकिन यदि यही शब्द सरकार के प्रत्येक आलो चक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता या वि पक्षी नेता के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो इसका अर्थ क मजोर होगा और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा। उलटा अ सर भी संभव है। जिस प्रकार चिदंबरम ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को अपने ऊपर लेकर उसे राजनीतिक व्यंग्य में बदल दिया, उसी प्रकार सोशल मी डिया उस शब्द को मीम, पै रोडी और डिजिटल आंदोल न का प्रतीक बना सकता है। तब सरकार द्वारा बनाया गया राजनीतिक फ्रेम सरकार के विरुद्ध ही राजनीतिक हथि यार बन सकता है।
साथियों बाते कर हम असली बहस ‘नक्सल’ शब्द पर नहीं, लोकतांत्रिक सीमा रेखा पर है इसको समझने की करें तो भारत ने वास्तविक सशस्त्र नक्सलवाद के विरुद्ध लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी है। सुरक्षा बलों की कार्रवाई और माओवादी हिंसा में कमी को एक राष्ट्रीय सुरक्षा उपल ब्धि के रूप में देखा जा सक ता है। लेकिन सशस्त्र नक्सल वाद और वैध लोकतांत्रिक असहमति के बीच अंतर कर ना लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। इसीलिए पीएम के समर्थ कों का प्रश्न है, यदि कोई व्यक्ति हिंसक माओवादी विचा र धारा का समर्थन करता है तो उसकी विचारधारा की आलोचना क्यों न की जाए? और विपक्ष का प्रश्न है, यदि कोई व्यक्ति सरकार की आलो चना करता है तो उसे नक्सल वादी मानसिकता का प्रमाण पत्र कौन और किस आधार पर देगा? इन दोनों प्रश्नों के बीच ही इस विवाद का वास्त विक समाधान छिपा है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि जीभ डैण, जीभ जं वाई का लोक ज्ञान आज की डिजिटल राजनीति में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। एक शब्द लालकिले से निकल कर संसद, प्रेस काॅन्फ्रेंस और सोशल मीडिया तक पहुंच सकता है। फिर वही शब्द मीम बनकर वापस सत्ता के सामने खड़ा हो सकता है। ‘दिमागी नक्सल’ से ‘दिमागी नक्सल पार्टी’ तक की यात्रा इसी राजनीतिक शब्द-माया जाल का संकेत है। इसलिए सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए सबक एक ही है – शब्दों से राजनीति जरूर कीजिए, ले किन शब्दों को इतना व्यापक मत बनाइए कि उनकी परि भाषा ही विवाद बन जाए। क्योंकि लोकतंत्र में बंदूक से निकली गोली एक दिशा में जाती है, लेकिन मुंह से निकला शब्द लाखों दिशाओं में जाता है। और आज सोशल मीडि या के युग में एक शब्द केवल सुना नहीं जाता वह शेयर हो ता है, मीम बनता है, आंदोल न बनता है और कभी-क भी सत्ता की राजनीति को भी आईना दिखाने लगता है।
जीभ डैण या जीभ जंवाई? दिमागी नक्सल से राजनीति गरमाई – एकशब्द अनेक मायने और सत्ता – विपक्ष के बीच छिड़ा नया संग्राम – राजनीतिक तपिश में फंस रही सियासत?
