एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी – गोंदिया (महाराष्ट)। वैश्विक स्तर पर भारत में किसी व्यक्ति, विशेषकर कि सी बच्चे का अचानक घर, स्कूल, सड़क, रेलवे स्टेशन या सार्वजनिक स्थान से गायब हो जाना केवल एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं है। यह कानून-व्यवस्था, मानवा धिकार, बाल-सुरक्षा, मानव तस्करी और प्रशासनिक जवा बदेही से जुड़ा गंभीर राष्ट्रीय प्रश्न है। मंगलवार 11 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इसी विषय पर सुनवाई करते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदे शों को बेहद स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया कि लापता व्यक्ति की सूचना मिलते ही उसकी उम्र या जेंडर की परवाह किए बिना तत्काल एफआईआर दर्ज करनी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उसके पिछले आदेश में इस्तेमाल किया गया शब्द “पर्सन”केवल बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति, बच्चा हो या वयस्क, महिला हो या पुरुष, सभपर पर लागू होता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि भारत को अब ऐसी व्य वस्था बनानी होगी जिसमें किसी थाने से यह आवाज न आए कि पहले 24 घंटे इंत जार कीजिए, किसी परिवार को एफआईआर के लिए भट कना न पड़े, कोई राज्य यह न कह सके कि मामला दूसरे राज्य का है और कोई ट्रैफि किंग नेटवर्क प्रशासनिक सी माओं का फायदा न उठा सके। क्योंकि किसी बच्चे का गुम होना केवल एक परिवार का बच्चा गुम होना नहीं है,यह भारत के भविष्य का एक हि स्सा गुम होना है और सुप्रीम कोर्ट का आज का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है, लापता व्यक्ति का हर मिनट महत्वपूर्ण हैय एफआईआर में देरी केवल प्रशासनिक देरी नहीं, किसी जिंदगी को बचाने का खोया हुआ अवसर हो सकती है। उधर अदालत ने चेतावनी दी कि यदि कोई राज्य या केंद्र शासित प्रदेश इस निर्देश का पालन नहीं करता है तो संबं धित मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को अवमानना की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है और उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर यह बताना पड़ सकता है कि उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए।
साथियों मंगलवार 11 मार्च 2026 को यह टिप्पणी दो ज स्टिस बेंच की पीठ ने, मानव तस्करी की रोकथाम और ला पता व्यक्तियों को खोजने के उपायों से संबंधित कार्यवाही में पिछले आदेशों के अनुपाल न की समीक्षा करते हुए की। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह बात आई कि कुछ राज्य उस के 22 मई 2026 के आदेश की ऐसी व्याख्या कर रहे थे मानो तत्काल एफआईआर का निर्देश केवल बच्चों के मामलों में लागू होता हो। अदालत ने इस व्याख्या को पूरी तरह खारिज करते हुए नाराजगी व्यक्त की और कहा कि उस के आदेश की भाषा साफ और स्पष्ट थी। अदालत के अनुसा र “पर्सन” का अर्थ हर व्यक्ति है, चाहे उसकी उम्र या जेंडर कुछ भी हो। यह स्पष्टी करण इसलिए महत्व पूर्ण है क्योंकि लापता होने के बाद शुरुआ ती समय केवल बच्चे के लिए ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के सुरक्षित मिलने के लिए नि र्णायक हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी व्यव स्था के केंद्र में गोल्डन अवर्स की अ वधारणा को रखा है। किसी व्यक्ति के लापता होने के बाद शुरुआती कुछ घंटे ऐसे होते हैं जिनमें उसके सु रक्षित मिलने की संभावना सबसे अधिक होती है। यदि पुलिस एफआईआर दर्ज कर ने में समय लगाती है, परिवार को इधर-उधर भेजती है या यह मानकर चलती है कि व्य क्ति स्वयं कहीं चला गया होगा, तो इस दौरान सीसीटीवी फु टेज, मोबाइल लोकेशन, डि जिटल गतिविधियों रेलवे और बस परिवहन संबंधी सुराग तथा संभावित आरोपियों की पहचान जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्य कमजोर हो सकते हैं। इस लिए सुप्रीम कोर्ट का संदेश मूलतः यह है कि पहले तत्का ल खोज और जांच शुरू करो, बाद में परिस्थितियों के आ धार पर अपराध की प्रकृति निर्धारित करो।
साथियों, इस मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी है कि अदालत ने एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की संबंधित धाराओं तथा अपह रण, तस्करी और अन्य लागू अपराधों से जुड़े कानूनी प्राव धानों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। यदि जांच एजेंसी के पास ठोस कारण हो कि मामला मानव तस्करी से जुड़ा है तो उसे केवल सामान्य मिसिंग – पर्सन इन्वेस्टीगेशन के रूप में लंबित नहीं रखा जा सक ता। ऐसी स्थिति में मामले को मानव तस्करी, अपहरण और संबंधित अपराधों से नि पटने वाली विशेष इकाई को चार महीने की अवधि पूरी होने का इंतजार किए बिना सौंपने का निर्देश दिया गया है। यह निर्देश जांच की गति को लेकर न्यायपालिका की गंभीरता को दर्शाता है।सुप्रीम कोर्ट ने एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिटस को भी प्रभावी बनाने पर जोर दिया है। केंद्र सर कार, राज्यों और केंद्रशासि त प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि संबंधित एंटी-ह्यूमन ट्रै फिकिंग यूनिटस निर्धारित अ वधि में पूरी तरह कार्यशील हों। इसके साथ ही केंद्र सर कार को देशभर में संबंधित पोर्टलों को आपस में जोड़ने का निर्देश दिया गया है, ताकि एक राज्य में दर्ज मिसिंग- पर्सन या ट्रैफिकिंग संबंधी जानकारी दूसरे राज्य की पुलिस और संबंधित एजेंसियों तक भी तेजी से पहुंच सके। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मानव तस्करी और अपहरण का अपराध किसी जिले या राज्य की सीमा तक सीमित नहीं रहता। अपराधी बच्चे या व्यक्ति को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जा सकते हैं और प्रशासनिक सीमाओं का सटीकता से फायदा उठा सकते हैं।
साथियों इस मामले की अगली सुनवाई 05 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2 बजे निर्धा रित की गई है। मामले का शीर्षक जी गणेश वर्सेज स्टेट आॅफ तमिलनाडु एंड अदर्स है। इसलिए बीती 11 अगस्त का आदेश केवल तत्काल नि र्देश नहीं बल्कि आगे चलने वाली एक व्यापक न्यायिक निगरानी प्रक्रिया का हिस्सा है। अदा लत अब यह देखना चाहती है कि उसके आदेशों को का गज पर स्वीकार करने के बजाय राज्यों ने वास्तव में पुलिस व्यवस्था, एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिटस एफआई आर प्रणाली, डिजिटल पोर्ट लों और अंतरराज्यीय समन्वय में क्या बदलाव किए हैं।
साथियों भारत में बच्चों के लापता होने के आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बना देते हैं। उपलब्ध एनसीआर बी – आधारित आंकड़ों के अनुसार 2024 में 98,375 बच्चे लाप ता दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या लगभग 91,296 थी। अर्थात एक वर्ष में लग भग 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2024 के आंकड़ों में लगभग 75,603 लड़कियां और 22,768 लड़के शामिल थे। औसतन देखें तो यह स ंख्या लगभग 270 बच्चों प्रति दिन के बराबर बैठती है। लेकि न यहां एक जरूरी सावधा नी है “मिसिंग” का अर्थ यह नहीं कि सभी बच्चे स्थायी रूप से गायब हो गए। अनेक बच्चे बाद में खोज लिए जाते हैं। वास्तविक चिंता उन बच्चों की है जो लंबे समय तक अ नतट्रास्ड रहते हैं और जिनके मामलों में परिवार वर्षों तक जवाब की प्रतीक्षा करता रह ता है। लापता बच्चों में लड़ कियों की बड़ी संख्या विशेष चिंता का विषय है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर मिसिंग गर्ल मानव तस्करी की शि कार है, लेकिन बाल विवाह, यौन शोषण, ट्रैफिकिंग घरेलू हिंसा,प्रेम- संबंध पारिवारिक तनाव, आॅनलाइन संपर्क और अन्य परिस्थितियों के कारण बालिकाओं की वुलनेराबिलि टी कई मामलों में बढ़ सकती है। इसलिए बच्चा घर से चला गया होगा जैसे सामान्य अनु मान के आधार पर जांच को कमजोर करना गंभीर भूल हो सकती है। प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर वैज्ञानिक और संवेदनशी ल जांच जरूरी है। साथियों, यह समस्या केवल मिसिंग चिल्ड्रन तक सीमित नहीं है। 11 अगस्त के सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण का सबसे बड़ा म हत्व यही है कि अब “मिसिंग पर्सन”की अवधारणा को व्या पक बनाया गया है। बच्चा हो या वयस्क, महिला हो या पुरुष, पुलिस की पहली जिम्मे दारी सूचना मिलने पर तत्का ल एफआई आर और खोज अभियान शुरू करना है। यह निर्देश परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बन सकता है क्योंकि कई बार लापता वयस्कों के मामलों में भी शुरुआती शिकायत को गंभीरता से न लेने की शि कायतें सामने आती रही हैं। इस मुद्दे का दूसरा और शाय द सबसे भयावह पहलू मानव तस्करी है। प्रत्येक मिसिंग चाइल्ड ट्रैफिकिंग विक्टिम नहीं होता, लेकिन ट्रैफिकिंग के मा मलों में मिसिंग-पर्सन कंप्लेंट अक्सर शुरुआती वार्निंग सि ग्नल हो सकती है। यदि कोई बच्चा किसी संगठित नेटवर्क के हाथ में चला गया तो उसे दूसरे शहर, राज्य या यहां तक कि देश के बाहर ले जाने का खतरा हो सकता है। यही का रण है कि सुप्रीम कोर्ट अब मिसिंग केसेस को ट्रैफिकिंग के संभावित कोण से भी दे खने पर जोर दे रहा है। अदा लत ने विभिन्न राज्यों से आं कड़े एकत्र कर किसी संभा वित नेशनवाइड पैटर्न या संग ठित नेटवर्क की पहचान करने की आवश्यकता पर भी ध्यान दिया है। यदि देश में एक प्र भावी -टाइम मिसिंग-पर्सन प्लेटफार्म हो जिसमें पुलिस एफआईआर फोटो, सीसी टीवी अलर्टस, रेलवे और बस परिवहन नेटवर्क, चाइल्ड वेल फेयर कमिटीस, एंटी -ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिटस और अन्य संबंधित एजेंसियां सुरक्षित तरीके से जुड़ी हों तो किसी व्यक्ति के एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने की स्थिति में भी उसकी खोज तेज हो स कती है।
साथियो, यहां सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। गुडिया स्वयंम सेवी संस्थान की याचिका से जुड़ी न्यायिक कार्यवाही ने वर्षों से लापता बच्चों और मा नव तस्करी के मुद्दे को सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखा है। बचपन बचाओ आंदोलन जैसे बाल-अधिकार संगठनों ने भी बाल तस्करी, बाल मजदूरी और बच्चों के शोषण के खि लाफ लंबे समय से अभियान चलाए हैं। इन संगठनों की मूल चिंता यही रही है कि मि सिंग चाइल्ड को केवल पुलि स रिकाॅर्ड की एक एंट्री नहीं, बल्कि तत्काल चाइल्ड – प्रो टेक्शन इमरजेंसी माना जाना चाहिए।
साथियों, विपक्षी दलों और नागरिक समाज की व्यापक चिंता भी इसी दिशा में है कि इतने बड़े देश में लापता व्यक्तियों और बच्चों के मामलों के लिए केंद्र और राज्यों के बीच डेटा तथा जांच का सेम लेस कोआॅर्डिनेशन कैसे सुनि श्चित किया जाए। हालांकि 11 अगस्त 2026 के सुप्रीम कोर्ट आदेश पर किसी एक विपक्षी दल की सर्वमान्य आ धिकारिक प्रतिक्रिया को प्रमा णित किए बिना उद्धृत कर ना उचित नहीं होगा, लेकिन राजनीतिक विमर्श में पुलिस की जवाबदेही, ट्रैफिकिंग नेट वर्क्स, राज्यों के बीच कोआॅ र्डिनेशन और सरकारों द्वारा मिसिंग केसेस की माॅनिटरिंग जैसे प्रश्न लगातार उठते रहे हैं। वास्तव में इस मुद्दे को रा जनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाने की आवश्यक ता है, क्योंकि गुम हुआ बच्चा किसी राजनीतिक दल का नहीं, पूरे समाज की सटीकता से जिम्मेदारी है।
साथियों, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे के मिल जाने पर भी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होनी चाहिए। यदि बच्चा शोषण, ट्रैफिकिंग या यौन अ पराध का शिकार रहा है तो उसे केवल उसके परिवार के पास वापस भेजना पर्याप्त न हीं। उसे मेडिकल केयर, साइकोलॉजिकल सपोर्ट, ली गल असिस्टेंस, सुरक्षित पुन र्वास और सामाजिक पुनर्स्था पन की जरूरत हो सकती है।
साथ ही उस अपराधी ने टवर्क की जांच भी आवश्यक है जिसने बच्चे को निशाना बनाया। 11 अगस्त 2026 का सुप्रीम कोर्ट का संदेश इस लिए भारत की मिसिंग – प र्सन पाॅलिसी में एक संभावित टर्निंग पाॅइंट है। अदालत ने मूलतः प्रशासन को यह बता दिया है कि लापता व्यक्ति की शिकायत कोई सामान्य काग जी प्रक्रिया नहीं है। यह संभा वित अपराध की शुरुआत हो सकती है और शुरुआती गोल्डन होउर्स को खोना किसी व्यक्ति की जिंदगी और सुरक्षा के लिए भारी पड़ सक ता है। यदि राज्यों के मुख्य सचिव और डीजीपी तक व्य क्तिगत जवाबदेही के दायरे में आते हैं, तो इससे पुलिस प्रशासन पर आदेशों को गंभी रता से लागू करने का दबाव निश्चित रूप से बढ़ेगा। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका वि श्लेषण करें तो हम पाएंगे कि सवाल केवल यह नहीं हो ना चाहिए कि भारत में कित ने बच्चे गुम होते हैं? असली सवाल यह होना चाहिए कि गुम होने के बाद उन्हें खोजने के लिए भारत की व्यवस्था कितनी तेज, संवेदनशील तकनीकी रूप से सक्षम और जवाबदेह है? 2024 में लगभ ग 98 हजार बच्चों के मिसिंग होने का आंकड़ा हमें चेतावनी देता है कि यह समस्या छोटी या स्थानीय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की 11 अगस्त की स ख्ती इस चेतावनी को न्यायि क दिशा देती है, हर लाप ता व्यक्ति महत्वपूर्ण है, हर घंटा महत्वपूर्ण है और हर परिवार कोतत्काल राज्य की मदद मिलने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट का प्रहार-हर लापता व्यक्ति की तुरंत एफआईआर, गोल्डन आॅवर्स में चूक पर अब मुख्य सचिव – डीजीपी जवाबदेह
