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विपक्ष का सरकार को केवल विधेयकों पर नहीं, बल्कि महंगाई, बेरोजगारी, कृषि संकट, मणिपुर की स्थिति, नीट परीक्षा विवाद, छात्र आंदोलनों, अयोध्या मंदिर दान प्रकरण तथा परिसीमन जैसे विषयों पर घेरना शुरू

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर 20 जुलाई 2026 से प्रारंभ हुआ 13 अगस्त तक चलने वाले इस संसद के मानसून सत्र पर पूरे विश्व की नजरें लगी हुई है। कुल 19 बैठकें निर्धारित हैं। संसद में 28 विधेयक लंबि त हैं। इनमें से 5 नए विधेय क पेश किए जाने हैं और 2 लंबित विधेयकों को पारित कराने के लिए सूचीबद्ध किया गया है। यह केवल एक निय मित संसदीय सत्र नहीं,बल्कि भारत की राजनीति, अर्थव्यव स्था निवेश वातावरण और वैश्विक छवि के लिए एक मह त्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है। यह सत्र ऐसे समय शुरू हुआ है जब भारत दुनियाँ की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार सम झौता लागू हो चुका है, अंतर राष्ट्रीय निवेशकों की निगाह भारत पर है और विकसित भारत -2047 का रोडमैप निर्णा यक चरण में प्रवेश कर रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुख दास भावना ने गोंदिया महा राष्ट्र अपने विचार इस आर्टिकल के माध्यम से प्रकट कर रहा हूं कि ऐसे समय संसद में होने वाली प्रत्येक बहस, प्रत्येक विधेयक और प्रत्येक राजनीतिक टकराव का प्रभाव केवल नई दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक निवेशकों, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई देगा।
सत्र प्रारंभ होने से पहले माननीय पीएम ने संसद परिसर में मीडिया को संबोधित करते हुए सभी दलों से रचनात्मक सहयोग की अपील की। उन्हों ने कहा कि संसद का उत्पा दक संचालन देशहित, जनक ल्याण और विकास के लिए आवश्यक है तथा भारत की हाल की उपलब्धियों को आगे बढ़ाने के लिए सार्थक चर्चा होनी चाहिए। दूसरी ओर विपक्ष पहले से ही सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की रणनीति बनाकर आया था, जिससे पहले दिन से ही टकराव की स्थिति बन गई।
साथियों, सरकार ने इस मानसून सत्र के लिए लगभग आठ प्रमुख विधेयकों का वि धायी एजेंडा रखा है। इनमें इन्कम-टैक्स (अमेन्डमेंट) बिल, 2026, जिसमें विदेशी संस्था गत निवेशकों और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स को सरकारी प्रतिभूतियों से होने वाली आय पर कर छूट से संबंधित प्रावधान। माइक्रो, स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइ जेज डेवलपमेंट (अमेन्डमेंट ) बिल 2026 एमएसएमई को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की व्यवस्था मजबूत करना। मध्यस्थता (आरबिंस् ट्रेशन) के निर्णयों के प्रभावी क्रियान्वयन का प्रावधान। राज् यों को फेसिलिटेशन कौंसिल के गठन में अधिक अधिकार देना। रजिस्ट्रेशन आफ बर्थस एंड डेथस (अमेन्डमेंट) बिल, 2026 जन्म और मृत्यु के विलं बित पंजीकरण के नियमों को अधिक कठोर बनाना।
पंजीकरण प्रणाली को अद्दि क पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना। सुप्रीम कोर्ट (नंबर आफ जजेस) अमेन्डमेंट बिल, 2026 सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव। प्रेवेंशन आफ इंसल्ट्स टू नेश नल हाॅनर (अमेन्डमेंट ) बिल, 2026 राष्ट्रीय सम्मान अधि नियम, 1971 में संशोधन। रिपोर्टों के अनुसार इसमें ‘वंदे मातरम’ को वैधानिक संरक्षण देने और उसके अपमान को दंडनीय बनाने का प्रावधान शामिल है। इसके अलावापहले से लंबित प्रमुख कई विधेयक शामिल हैं। इसके अतिरिक्त राजनीतिक गलियारों में परिसीमन (डेलि मिटेशन) से जुड़े संभावित विधेयक पर भी व्यापक चर्चा रही, क्योंकि इसका संबंध भवि ष्य में महिलाओं के आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन और लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धा रण से जोड़ा जा रहा है। हा लांकि सरकार ने परिसीमन पर अंतिम निर्णय सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया,फिर भी यह विषय पूरे सत्र का स टीकता से सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन गया।
साथियों, उधर विपक्ष ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह सरकार को केवल वि धेयकों पर नहीं, बल्कि महंगा ई, बेरोजगारी, कृषि संकट, मणिपुर की स्थिति, नीट परी क्षा विवाद, छात्र आंदोलनों अयोध्या मंदिर दान प्रकरण तथा परिसीमन जैसे विषयों पर घेरेगा। विपक्ष का तर्क था कि जनता से जुड़े इन प्रश्नों पर पहले चर्चा होनी चाहिए, जबकि सरकार का जोर वि धायी कार्यों को आगे बढ़ाने पर था। यही टकराव पहले दिन काम काज शुरू होने के पहले घंटे से ही सदन के भीतर खुलकर दिखाई दिया।
20 जुलाई की सुबह जैसे ही लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही प्रारंभ हुई, विप क्षी सांसदों ने नारेबाजी शुरू कर दी। विपक्ष ने छात्र आंदोल नों और परीक्षा संबंधी मुद्दों पर तत्काल चर्चा की मांग की। अध्यक्ष द्वारा बार-बार व्यवस्था बनाए रखने की अपील की गई, किंतु शोर- शराबा जारी रहा। परिणामस्वरूप दोनों सद नों की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। समाचा रों के अनुसार दोपहर तक लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही कम से कम पाँच बार स्थगित हुई और बाद में दोनों सदनों को पूरे दिन के लिए स्थगित कर दिया गया। पहले दिन कोई बड़ा विधायी कार्य नहीं हो सका।
साथियों, पहले दिन की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि आगामी 25 दिन सरकार और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। सरकार का लक्ष्य आर्थिक सुधारों, कर प्रणाली, उद्योग, निवेश और प्रशासनिक सुधारों से जुड़े विधेयकों को पारित कराना है, जबकि विपक्ष जनहित से जुड़े मुद्दों पर सर कार को जवाबदेह बनाने की रणनीति अपनाए हुए है। यदि दोनों पक्षों के बीच संवाद स्था पित नहीं होता, तो संसदीय उत्पादकता प्रभावित हो सक ती है। आर्थिक दृष्टि से यह सत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। विदे शी निवेशक केवल आर्थिक आंकड़े ही नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि किसी देश की संसद कितनी स्थिर ता और दक्षता से निर्णय लेने में सक्षम है। यदि महत्वपूर्ण आर्थिक विधेयक समय पर पारित होते हैं, तो इससे भारत की निवेश क्षमता और वैश्विक विश्वसनीयता मजबूत होगी। इसके विपरीत लगातार गति रोध से निवेशकों में अनिश्चि तता का संदेश जा सकता है।
साथियों, भारतीय शेयर बाजार भी इस सत्र पर निकट दृष्टि रखे हुए है। बैंकिंग, कर सुधार, एमएसएमई विनिर्माण डिजिटल अर्थव्यवस्था और आधारभूत संरचना से जुड़े विधेयकों का सीधा प्रभाव विभि न्न क्षेत्रों के शेयरों पर पड़ सकता है। यदि सरकार सुद्दा रवादी एजेंडा आगे बढ़ाने में सफल रहती है, तो दीर्घकाल में निवेशकों का विश्वास और मजबूत हो सकता है। अंतररा ष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का यह सत्र महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत आज भी जी- 20 ब्रिक्स क्वाड तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में संसद की कार्यक्षमता यह संदे श देती है कि भारत केवल तेज आर्थिक विकास ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती के साथ भी आगे बढ़ रहा है। इसलिए विदेशी सरकारें, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और वैश्विक रेटिंग एजेंसियाँ भी इस सत्र के परिणामों पर नजर रख रही हैं।
साथियों, विजन-2047 के संदर्भ में भी यह मानसून सत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। विकसित भारत का लक्ष्य केवलआर्थिक वृद्धि से प्राप्त नहीं होगा, इस के लिए कर सुधार, औद्योगिक विस्तार, रोजगार सृजन, शिक्षा, कृषि, डिजिटल प्रशासन और राजनीतिक सहमति जैसे अने क क्षेत्रों में निरंतर सुधार आवश् यक हैं। संसद इन सभी सु धारों का सबसे बड़ा लोकतां त्रिक मंच है। इसलिए अगले कुछ सप्ताहों में लिए जाने वाले निर्णय दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं। 20 जुलाई 2026 को शाम लगभग 5 बजे तक की स्थिति यह रही कि सदन का पहला दिन राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया। दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित हुई और अंततः पूरे दिन के लिए स्थ गित कर दी गई। सरकार ने अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की इच्छा दोहराई, जब कि विपक्ष ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह जनहित और राजनी तिक मुद्दों पर व्यापक चर्चा के बिना सदन को सामान्य रूप से चलने नहीं देगा।
साथियों, यदि भारतीय लोक तंत्र की कार्यप्रणाली का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि विश्व की लगभग सभी प्रमुख लोकतांत्रिकव्यवस्थाओं में संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि आर्थिक विश्वास का भी सबसे महत्व पूर्ण आधार होती है। अमेरिका में कांग्रेस केगतिरोध ब्रिटेन में हाउस आफ कामन्स की राजनीतिक अस्थिरता, फ्रांस में संसद में बहुमत के संकट अथवा जापान में नीति निर्माण में देरी का सीधा प्रभाव वहां के शेयर बाजारों, विदेशी निवे श तथा मुद्रा बाजार पर पड़ता रहा है। भारत भी अब पाँच ट्रिलियन डालर की अर्थव्य वस्था बनने की दिशा में अग्रसर एक वैश्विक शक्ति है, इसलिए भारतीय संसद की कार्यवाही पर विदेशी पोर्टफोलियो निवे शक, वैश्विक निवेश बैंक, अंत रराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियाँ, विश् व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ निरं तर निगाह रखती हैं। यदि संसद में महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों,कर प्रणालीऔद्योगिक विकास, डिजिटल गवर्नेंस, रोज गार सृजन, कृषि आधुनिकी करण तथा न्यायिक सुधारों से जुड़े विधेयकों पर सार्थक चर्चा होती है और समयबद्ध निर्णय लिए जाते हैं, तो भारत की ईजी आफ डूइंग बिजनेस, निवेश आकर्षण और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को नई गति मिल सकती है। इसके विपरीत यदि पूरा सत्र केवल राजनीतिक टकराव, नारेबा जी और बार-बार स्थगन तक सीमित रह जाता है, तो इससे सुधारों की गति प्रभावित हो सकती है। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था आज पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और विविधतापूर्ण है, फिर भी संसदीय उत्पादकता वैश्विक निवेशकों के लिए राजनीतिक स्थिरता का एक महत्वपूर्ण संकेतक बनी रहती है। यही कारण है कि 20 जुलाई 2026 से प्रारंभ हुआ यह मानसून सत्र केवल भार तीय राजनीति का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक समु दाय की दृष्टि से भी सटीकता से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
साथियों दूसरी ओर, यह मानसून सत्र भारत के लोकतां त्रिक परिपक्वता की भी एक बड़ी परीक्षा है। सरकार के सामने चुनौती है कि वह अपने विकास, आर्थिक सुधार और विकसित भारत 2047 के एजें डे को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाए, जबकि विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है कि वह जनहित से जुड़े प्रश्नों, महंगाई, बेरो जगारी, कृषि, शिक्षा, मणिपुर परिसीमन सामाजिक न्याय और संघीय ढाँचे पर सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करे। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति तब दिखाई देती है जब सत्ता और विपक्ष दोनों टकराव के बजाय तर्क, संवाद और समा धान को प्राथमिकता देते हैं। यदि आगामी 25 दिनों में संसद सार्थक बहस, उच्च स्तर की संसदीय मर्यादा और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च रखते हुए महत्वपूर्ण विधेयकों पर सह मति बनाने में सफल रहती है, तो यह न केवल भारत की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा को विश्व स्तर पर और मजबूत करेगा, बल्कि निवेशकों का विश्वास बढ़ाकर अर्थव्यवस्था,उद्योग रोजगार, स्टार्टअप, विनिर्माण शेयर बाजार और ‘विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को भी नई गति देगा। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मानसून सत्र 2026 केवल एक संसदीय कैलेंडर का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह उन ऐतिहासिक निर्णयों का मंच बन सकता है जो आने वाले दो दशकों में भारत की आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक भूमिका की दिशा और दशा दोनों निर्धारित करेंगे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि इस प्रकार मानसून सत्र का पहला दिन यह संकेत देता है कि अगले 25 दिन केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि भारत की आर्थिक नीतियों, निवेश वातावरण, शेयर बाजार की दिशा और विकसित भारत -2047 के रोडमैप के लिए भी निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं। यदि सरकार और विपक्ष लोकतांत्रिक संवाद तथा रचनात्मक सहयोग का मार्ग अपनाते हैं, तो यह सत्र भारत के लिए ऐतिहासिक उपलब्द्दि यों का आधार बन सकता है, अन्यथा बार-बार का गतिरो ध आर्थिक सुधारों की गति को प्रभावित कर सकता है।
यही कारण है कि देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की निगाह आज भारतीय संसद पर टिकी हुई है।

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