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युवा मनों पर बढ़ता दबाव – भारत का मौन मानसिक स्वास्थ्य संकट

(राममिलन शर्मा)
आज के युवाओं के मन में एक खामोश तूफान पनप रहा है। शैक्षणिक उपलब्धि यों और डिजिटल दुनिया की चमक के पीछे चिंता, अवसाद और भावनात्मक थकान की एक गंभीर समस्या तेजी से बढ़ रही है। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ के अनुसार, विश्व भर में लगभग हर सात में से एक किशोर मानसिक स्वास्थ्य विकार से जूझ रहा है जिनमें से अधिकांश अनसुने और बिना इलाज के रह जाते हैं। भारत में यह संकट शैक्षणिक प्रतिस् पर्धा, सामाजिक अपेक्षाओं और इंस्टाग्राम, फेसबुक जैसे प्लेट फार्म्स द्वारा बढ़ाई गई तुलना की संस्कृति के कारण और भी गहरा हो गया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो लगातार तनाव मानव शरीर की कार्यप्रणाली को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। यह सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे महत्वपूर्ण न्यूरो ट्रांसमीटर के संतुलन को बिगाड़ देता है। कोर्टिसोल स्तर को बढ़ाता है और स्मरण शक्ति तथा एकाग्रता जैसी संज्ञाना त्मक क्षमताओं को कमजोर करता है। समय के साथ यह न केवल भावनात्मक अस्थिरता उत्पन्न करता है बल्कि सिर दर्द, नींद की समस्या और कमजोर प्रतिरक्षा जैसे शारी रिक लक्षण भी पैदा करता है। इससे स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य केवल भाव नात्मक नहीं, बल्कि गहराई से जैविक भी है।
“एक समाज जो अपने युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी करता है, वह अपने भविष्य को स्वयं नष्ट कर रहा होता है।” इस सम स्या की गंभीरता कई दुखद घटनाओं से और भी स्पष्ट हो जाती है।
कोटा जैसे शिक्षा केंद्रों में बढ़ते आत्महत्या के मामले, परीक्षा में मनचाहा परिणाम न मिलने पर छात्रों द्वारा उठा ए गए कठोर कदम, कोविड -19 के बाद बढ़ा अकेलापन तथा सोशल मीडिया पर बढ़ती साइबर बुलिंग। ये सभी इस संकट की भयावहता को उजागर करते हैं। परीक्षा के दबाव से जुड़े छात्रों की लगातार बढ़ती आत्महत्या की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि यह केवल अलग-अलग घट नाएँ नहीं हैं बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का संकेत हैं जो युवा ओं के भावनात्मक स्वास्थ्य को लगातार नजरअंदाज कर रही है। “आज अनदेखा किया गया मानसिक स्वास्थ्य, कल एक बड़ा संकट बन जाता है।”
कठोर सच्चाई – आज का युवा आंतरिक और बाहरी दबावों के बीच फँसा हुआ है। असफलता का डर, पह चान का संकट, साइबर बुलिंग और भावनात्मक सहयोग की कमी। अत्यधिक स्क्रीन टाइम ने वास्तविक मानवीय संबंधों को कमजोर कर दिया है, जिस से आनलाइन जुड़े होने के बावजूद अकेलापन बढ़ रहा है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कलंक युवाओं को चुप रहने पर मजबूर करता है। जिससे सामान्य तनाव गंभीर मानसिक विकार में बदल जाता है।
आगे का मार्ग – इस गंभीर संकट से निपटने के लिए सरकार की पहलें जैसे राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और मनोदर्पण एक सशक्त आधार प्रदान करती हैं।
किंतु केवल नीतियाँ बना ना पर्याप्त नहीं है बल्कि इनका प्रभावी और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन अत्यंत आवश्यक है। राजनीतिक स्तर पर मान सिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए बजट, संसाधनों और प्रशिक्षित पेशेवरों की उपलब् धता सुनिश्चित करनी होगी। सामाजिक दृष्टि से, परिवारों और समुदायों को ऐसा वाता वरण बनाना होगा जहाँ खुल कर संवाद हो, भावनाओं को समझा जाए और सहायता लेने को कमजोरी नहीं बल्कि साहस माना जाए। सांस्कृ तिक रूप से, हमें उन पुरानी धारणाओं को बदलना होगा जो मानसिक स्वास्थ्य को ‘कम जोरी’ या ‘शर्म’ से जोड़ती हैं।
शैक्षणिक संस्थानों में प्रशिक्षित काउंसलरों की नियु क्ति, तनाव प्रबंधन और जीवन कौशल शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना अनिवार्य है। साथ ही, युवाओं को संतु लित जीवनशैली अपनाने, शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने और तकनीक के विवेक पूर्ण उपयोग के लिए प्रेरित करना होगा। मानसिक स्तर पर आत्म-जागरूकता, भाव नात्मक संतुलन और सहायता लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना समय की सबसे बड़ी आव श्यकता है। केवल सामूहिक प्रयास सरकार जैसे समाज, परिवार और व्यक्ति ही इस गहराते संकट को रोक सकते हैं और युवाओं को एक स्वस्थ, सुरक्षित और सशक्त भविष्य प्रदान कर सकते हैं।
निष्कर्ष – युवाओं का मान सिक स्वास्थ्य किसी भी राष्ट्र की शक्ति और भविष्य का आधार होता है। कलंक को तोड़ना, जागरूकता फैलाना और समय पर सहायता उपल ब्ध कराना अब विकल्प नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। यदि इस मौन संकट को आज नजरअं दाज किया गया, तो आने वाली पीढ़ी को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकता है।

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