एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
(महाराष्ट्र) गोंदिया।
वैश्विक स्तर पर पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की लोक तांत्रिक राजनीति, संघीय ढांचे, वैचारिक संघर्ष और चुनावी रणनीतियों का एक ऐसा प्रयोग शाला बन चुका है जिस पर पूरे देश ही नहीं बल्कि वैश्विक राजनीतिक विश्लेषकों की भी पैनी नजर टिकी हुई है। जब मतदान के दोनों चरण अभूत पूर्व उत्साह और अत्यधिक मत दान प्रतिशत के साथ संपन्न हुए, तो यह अपने आप में कई संकेत देता है, पश्चिम बंगाल में मतदान संपन्न हो चुके हैं। अब इंतजार है तो सिर्फ 04 मई का जब नतीजे आएंगे और क्लियर हो जाएगा कि सत्ता में ममता बनर्जी की वापसी होगी या फिर इस बार पश्चिम बंगाल में कमल खिलेगा। ले किन उससे पहले जो एग्जिट पोल सामने आए हैं, वह कहीं ना कहीं ममता बनर्जी की जमीन हिला रहे हैं। तमाम टीएमसी नेताओं की धड़कनें बढ़ा रहे हैं। और कुछ नेता तो क्या कह रहे हैं टीएमसी के? टीएमसी के नेता कह रहे हैं कि बीजेपी हर बार इस तरीके का माहौल बनाती है और उसका माहौल उल्टा ही साबित होता है। इस बार जो बंगाल में 200 पार का यह लोग बातें कर रहे हैं। इस बार वो बातें हवा-हवाई ही साबित होंगी क्योंकि आज जो नतीजे आएंगे वो टीएमसी के पक्ष में आएंगे। हालांकि बीजेपी वाले जो हैं वो ये कह रहे हैं कि इस बार ममता बन र्जी के साथ खेला होगा। एक तरफ जनता की बढ़ती राज नीतिक भागीदारी, दूसरी तरफ सत्ता के प्रति गहरी असंतुष्टि या समर्थन का तीव्र भाव। प श्चिम बंगाल में 92 प्रतिशत से अधिक मतदान कोई साधा रण घटना नहीं है यह दर्शाता है कि चुनाव केवल औपचारि क प्रक्रिया नहीं बल्कि जन ता के लिए निर्णायक क्षण बन चुका है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि इस पृष्ठभूमि में बदला बनाम बदलाव की बहस, वोटों की बरसात और सत्ता परिवर्तन जैसे सवाल केवल नारे नहीं बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान के संकेतक बन जाते हैं। अगर हम ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो पश्चिम बंगाल लंबे समय तक वैचारिक राजनीति का केंद्र रहा है। वामपंथी शासन के तीन दशक और उसके बा द ममता बनर्जी के नेतृत्व में आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का उदय, ये दोनों ही चरण बताते हैं कि बंगाल की राजनीति हमेशा परिवर्तन शील रही है। लेकिन वर्तमान चुनाव में जो सबसे बड़ा बद लाव दिखता है, वह है बीजेपी का अभूतपूर्व उभार, जिसने राज्य की पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीति को त्रिकोणीय और अब लगभग द्विध्रुवीय (टीएम सी बनाम बीजेपी) संघर्ष में बदल दिया है।
साथियों बात अगर हम भारत भारत व पूरे विश्व की नजरों मेंअब पहले सबसे बड़े प्रश्न की करें,पूरी दुनिया की नजरें आज आने वाले नतीजों पर क्यों टिकी हैं?
इसका उत्तर केवल सीटों के गणित में नहीं बल्कि उस राजनीतिक कथा में छिपा है जो भारत के लोकतंत्र को परिभाषित करती है। बंगाल का चुनाव इस बात का संके त देगा कि क्या क्षेत्रीय दल अभी भी अपने मजबूत गढ़ों को बचा सकते हैं या राष्ट्रीय दलों का विस्तार अब लगभग हर राज्य में संभव हो गया है। यह चुनाव पीएम के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय राजनीति बनाम क्षेत्रीय पहचान की राजनीति का सीधा मुकाबला भी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लो कल बनाम नेशनल नैरेटिव के रूप में देखा जा रहा है, जो कई लोकतांत्रिक देशों में उभ रती प्रवृत्ति से मेल खाता है।
साथियों बात अगर हम बदला या बदलाव, इस प्रश्न को समझने की करें तो पश् िचम बंगाल की राजनीति के सबसे संवेदनशील पहलू को छूता है। बदला शब्द बंगाल में राजनीतिक हिंसा और प्रति शोध की उस संस्कृति की ओर इशारा करता है जो दशकों से चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा रही है। वहीं बदलाव विकास, प्रशासनिक सुधार और नई राजनीतिक दिशा का प्रतीक है। इस चुनाव में दिलचस्प बात यह रही कि व्यापक रूप से हिंसा की घटनाएं अपेक्षाकृत कम देखने को मिलीं, जिसका श्रेय केंद्रीय बलों की तैनाती और कड़ी निगरानी को दिया जा रहा है। यह बदलाव केवल चुनावी प्रक्रिया में नहीं बल्कि मतदाताओं के मनोविज्ञान में भी झलकता है, वे अब स्थिरता और सुरक्षा को सटीकता से प्राथमिकता दे रहे हैं।
साथियों बात अगर हम दोनों चरणों में 92 प्रतिशत से अधिक हुई बंपर वोटिंग को समझने की करें तो अब सवाल आता है, वोटों की बरसात कि सके साथ? अत्यधिक मतदान प्रतिशत आमतौर पर दो तरह के संकेत देता हैरूया तो सत्ता के खिलाफ भारी असंतोष, या फिर सत्ता के समर्थन में जबर दस्त लामबंदी। इस बार बंगाल में दोनों ही संभावनाएं मौजूद हैं। एक तरफ टीएमसी ने अ पने कल्याणकारी योजनाओं, महिला वोट बैंक और ग्रामीण नेटवर्क के दम पर मजबूत प कड़ बनाए रखी है, वहीं बीजे पी ने हिंदुत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के मुद्दों के साथ -साथ संगठनात्मक विस्तार के जरिए शहरी और युवा मत दाताओं को आकर्षित करने की कोशिश की है। एग्जिट पोल्स ने इस जटिल समी करण को और भी रोमांचक बना दिया है। विभिन्न एजेंसि यों के अनुमान में बीजेपी को बढ़त दिखाई जा रही है,कुछ में तो स्पष्ट बहुमत का दावा भी किया गया है। हालांकि पोल ऑफ पोल्स एक करीबी मुकाबले की ओर इशारा कर ता है, जहां टीएमसी और बी जेपी के बीच सीटों का अंतर बहुत ज्यादा नहीं है। भारतीय चुनावी इतिहास में एग्जिट पोल कई बार गलत भी साबि त हुए हैं, इसलिए इन्हें अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। फिर भी ये राजनीतिक माहौल और मतदाताओं की संभावित दिशा का संकेत जरूर देते हैं। टीएमसी का दावा है कि ये एग्जिट पोल मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि वास्तविक नती जे उनके पक्ष में आएंगे और बीजेपी का 200 पार का दावा केवल प्रचार है। दूसरी ओर बीजेपी का आत्मविश्वास इस बात को दर्शाता है कि पार्टी को जमीनी स्तर पर अपने प्रदर्शन को लेकर भरोसा है। खेला होबे बनाम परिवर्तन होबे ये नारे अब केवल शब्द नहीं बल्कि दो अलग-अलग राज नीतिक दृष्टिकोणों का प्रति निधित्व करते हैं।
साथियों बात अगर हम इस चुनाव में एक और महत्व पूर्ण पहलू को समझने की करें तो वह है, भ्रष्टाचार के आरोप, विशेषकर कोयला घोटाला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस बार कोई बड़ा उलटफेर होता है, तो उसमें इन आरोपों की भू मिका महत्वपूर्ण हो सकती है। जांच एजेंसियों की कार्रवाई और उससे जुड़ी राजनीतिक बहस ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया है। साथ ही, चुनावी रणनीति में पेशेवर सं स्थाओं की भूमिका जैसे कि आईपैक भी चर्चा का विषय रही है, जिसने आधुनिक भार तीय चुनावों में डेटा-आधारि त रणनीति की अहमियत को उजागर किया है। मतदान के शांतिपूर्ण संपन्न होने का एक और बड़ा प्रभाव यह है कि इससे चुनाव की वैधता और विश्वसनीयता बढ़ी है अंतर राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लोक तंत्र को अक्सर उसकी जटि लता और विविधता के कारण सराहा जाता है, लेकिन चुनावी हिंसा उसकी छवि को प्रभावि त करती रही है। इस बार अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनाव ने यह संदेश दिया है कि भारत अपने चुनावी तंत्र को और म जबूत बना रहा है।
साथियों बात अगर हम सबसे बड़ा प्रश्न, क्या एग्जिट पोल के आंकड़े वास्तविक नतीजों में बदलेंगे? इसको समझने की करें तो, इसका उत्तर 4 मई को ही मिलेगा, लेकिन कुछ संकेतों के आधा र पर संभावनाओं का विश्लेष ण किया जा सकता है। अगर उच्च मतदान प्रतिशत एंटी- इंकंबेंसी का परिणाम है, तो बीजेपी को फायदा हो सकता है। लेकिन अगर यह “प्रो- इंकंबेंसी मोबिलाइजेशन” है, तो टीएमसी अपनी सत्ता बचा सकती है। इसके अलावा, स्थानीय उम्मीदवारों की लोक प्रियता, क्षेत्रीय मुद्दे और अंतिम समय में मतदाताओं का रुझा न भी निर्णायक भूमिका निभा एंगे। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि पश्चिम बंगाल का यह चुनाव भारतीय राजनीति के भविष्य की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है। यह केवल यह नहीं बताएगा कि सत्ता किसके हाथ में जा एगी, बल्कि यह भी संकेत देगा कि भारत में राजनीति का स्व रूप किस दिशा में विकसि त हो रहा है, क्या क्षेत्रीय दल अपनी पकड़ बनाए रखेंगे या राष्ट्रीय दलों का वर्चस्व और बढ़ेगा। बदला और बदलाव के बीच झूलता यह चुनाव लोक तंत्र के उस जीवंत स्वरूप का उदाहरण है, जहां अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। 04 मई का दिन केवल नतीजों की घोषणा नहीं होगा, बल्कि यह उस राजनीतिक कथा का निष्कर्ष होगा जो महीनों से लिखी जा रही है। क्या ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचा पाएंगी या बीजेपीपहली बार बंगाल में सरकार बनाएगी, यह सवाल जितना बंगाल के लिएमहत्वपूर्ण है, उतना ही भारत और विश्व की राजनी ति के लिए भी महत्व रखेगा।
पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक बंपर वोटिंग – ष्खेला होबेष् बनाम ष्परिवर्तन होबेष्- भारतीय राजनीति के भविष्य की दिशा तय होनें की संभावना
