एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र)। वैश्विक स्तर पर भारत का शहरी भविष्य – चुनौतियों से समाधान तक नीति आयोग की नई रूपरेखा का दुनियाँ में आगज हो रहा है, भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। आज के दौर में शहर केवल रहने की जगह नहीं रहे, बल्कि आर्थिक वि कास, नवाचार, रोजगार और सामाजिक गतिशीलता के प्र मुख केंद्र बन चुके हैं। लेकिन इसी के साथ शहरी क्षेत्रों में अव्यवस्थित विस्तार, कमजोर प्रशासनिक ढांचे, सीमित वि त्तीय संसाधन और जवाबदेही की कमी जैसी समस्याएं भी तेजी से सामने आई हैं। इसी पृष्ठभूमि में नीति आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट स्ट्रीथनिंग अर्बन गवर्नेंस इन इंडियारूए फ्रेमवर्क फाॅर रिफार्म, भारत के शहरी भविष्य को नई दिशा देने का प्रयास करती है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मान ता हूंकि यह रिपोर्ट न केवल वर्तमान समस्याओं की पहचान करती है, बल्कि एकदीर्घका लिक और संस्थागत समाधा न का खाका भी प्रस्तुत कर ती है,जो भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और टिका ऊ शहरी अर्थव्यवस्था बनाने में मदद कर सकता है। भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा हैजहां शहरीकरण उसके वि कास की दिशा तय करेगा।
साथियों बात अगर हम शहरी भारत की वास्तविक ता – अवसर और संकट का संगम इसको समझने की करें तो भारत में शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, 2030 तक भारत की लगभग 40 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करेगी। यह वृद्धि अवसरों का द्वार खोलती है जैसे रोजगार, निवेश और तक नीकी विकास लेकिन इस के साथ ही यह कई गंभीर चुनौतियों को भी जन्म देती है। आज के भारतीय शहरों में यातायात जाम, प्रदूषण, जल संकट, आवास की कमी और असमानता जैसी समस्याएं आम हैं। इन समस्याओं की जड़ में केवल संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि शासन प्रणाली की कमजोर संरचना भी है। यही वह बिंदु है जिस पर नीति आयोग की रिपोर्ट विशेष ध्यान केंद्रित करती है।
साथियों बात अगर हम शहरों में संस्थागत बिखराव – शहरी प्रशासन की सबसे बड़ी बाधा इसको समझने की करें तो भारत के अधिकांश शहरों में प्रशासनिक जिम्मेदा रियां कई एजेंसियों में बंटी हुई हैं नगर निगम, विकास प्राधि करण, राज्य सरकार की एजें सियां और केंद्रीय संस्थाएं। इस बिखराव के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी और जटिल हो जाती है। उदाहर ण के लिए, एक ही शहर में सड़क निर्माण,जल आपूर्ति और भूमि उपयोग जैसे कार्य अलग-अलग संस्थाओं द्वारा संचालित होते हैं। इससे न केवल संसाधनों का दुरुपयोग होता है, बल्कि जवाबदेही भी कमजोर पड़ जाती है। नीति आयोग की रिपोर्ट इस समस्या को शहरी शासन की मूल चुनौती के रूप में चिन्हित क रती है और एकीकृत प्रशासनि क ढांचे की आवश्यकता पर सटीक रूप से बल देती है।
साथियों बात अगर हम सीमित शक्तियों का हस्तांत रण – लोकतंत्र का अधूरा विकेंद्रीकरण इसको समझ ने की करें तो भारत में 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से शहरी स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने का प्रयास कि या गया था। लेकिन व्यवहा रिक स्तर पर यह विकेंद्रीकरण अधूरा ही रह गया। नगर नि गमों और नगर पालिकाओं को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए गए हैं। अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय राज्य सरकार के नि यंत्रण में ही रहते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन बाधि त होता है। नीति आयोग की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से सुझाव देती है कि शहरी निकायों को वास्तविक प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता दी जानी चाहिए, ताकि वे स्थानीय आव श्यकताओं के अनुसार निर्णय ले सकें।
साथियों बात अगर हम वित्तीय स्वायत्तता की कमी – विकास में सबसे बड़ी रुका वट इसको समझने की करें तो शहरी निकायों के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का अभाव एक गंभीर समस्या है। भारत में अधिकांश नगर निगम अपने खर्चों के लिए राज्य और केंद्र सरकार पर निर्भर हैं। स्थानीय कर संग्रहण की क्षमता कमजोर है और संपत्ति कर जैसी प्रमुख आय स्रोतों का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। इसके अलावा, बजट प्रबंधन और वित्तीय पारदर्शिता की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि नगर निकायों को अप ने राजस्व स्रोतों को मजबूत करना चाहिए, जैसे – संपत्ति कर सुधार, उपयोगकर्ता शुल्क (यूजर चार्जेज) नगर बाॅन्ड (म्युनि सिपल बोड्स ) यह कदम न केवल वित्तीय स्थिरता सुनि श्चित करेंगे, बल्कि शहरी वि कास को गति भी देंगे।
जवाबदेही का अभाव – नागरिकों का सटीक भरोसा कमजोर, किसी भी लोकतां त्रिक प्रणाली की सफलता उसकी जवाबदेही पर निर्भर करती है। लेकिन भारतीय शहरों में नागरिकों के प्रति जवाबदेही का स्तर अभी भी कमजोर है। पारदर्शिता की कमी, भ्रष्टाचार और नागरिक सहभागिता का अभाव प्रशा सनिक दक्षता को प्रभावित करता है। नीति आयोग की रिपोर्ट इस दिशा में सुधार के लिए डिजिटल गवर्नेंस सामा जिक आॅडिट और नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देने की बात करती है।
साथियों बात अगर हम तकनीक की भूमिका – स्मार्ट शहरों की दिशा में कदम इ सको समझने की करें तो डि जिटल तकनीक शहरी शास न को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बना सकती है। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत कई शहरों में तकनीकी समाधान लागू किए गए हैं,लेकिन अभी भी इनका विस्तार सीमित है।
नीति आयोग की रिपोर्ट सुझाव देती है कि –
(1) डेटा-आधारित निर्णय प्रणाली विकसित की जाए
(2) ई-गवर्नेंस प्लेटफाॅर्म को मजबूत किया जाए
(3) नागरिक सेवाओं को डिजिटल बनाया जाए, यह न केवल प्रशासन को कुशल बनाएगा, बल्कि नागरिकों के जीवन स्तर को भी सुधार क रेगा।
साथियों बात अगर हम पर्यावरणीय चुनौतियां – टि काऊ शहरीकरण की आवश्य कता इसको समझने की करें तो ऐसा महसूस होता है कि जलवायु परिवर्तन और पर्या वरणीय संकट शहरी क्षेत्रों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। बढ़ता प्रदूषण, जल संकट और हरित क्षेत्रों की कमी शहरों की जीवन गुण वत्ता को प्रभावित कर रही है। रिपोर्ट में टिकाऊ विकास (सस्टेनबल डेवलपमेंट) पर विशेष जोर दिया गया है। इ समें हरित बुनियादी ढांचे, जल संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने की बात कही गई है।
साथियों बात अगर हम नीति आयोग की रूपरेखा – समाधान का समग्र दृष्टिकोण इसको समझने की करें तो रिपोर्ट में प्रस्तुत रूपरेखा बहु आयामी है, जिसमें निम्नलिखि त प्रमुख बिंदु शामिल हैं – (1) संस्थागत एकीकरण
(2)वास्तविक विकेंद्रीकरण
(3) वित्तीय सुधार
जवाबदेही और पारदर्शिता
(4) तकनीकी नवाचार यह रूपरेखा केवल समस्याओं का समाधान नहीं देती, बल्कि एक दीर्घ कालिकदृदृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
साथियों बात अगर हम भारत के लिए आगे की राह – चुनौतियां और संभावनाएं इसको समझने की करें तो नीति आयोग की यह रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव इस के क्रियान्वयन पर निर्भर क रेगा। भारत को निम्नलिखित कदम उठाने होंगे –
(1)राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रदर्शन
(2) संस्थागत सुधारों का प्रभावी कार्यान्वयन
(3) नागरिकों की सक्रिय भागीदारी
(4) निजी क्षेत्र के साथ सहयोग, यदि इन पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तो भारत अपने शहरी क्षेत्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना सक ता है।
साथियों बात अगर हम इस पूरे मुद्दे को वैश्विक परि प्रेक्ष्य – दुनियाँ से क्या सीख सकता है भारत इसको सम झने की करें तो, दुनियाँ के कई देशों ने शहरी शासन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
उदाहरण के लिए –
सिंगापुर में केंद्रीकृत लेकि न अत्यधिक कुशल शहरी प्र बंधन प्रणाली, लंदन में मजबूत स्थानीय प्रशासन और वित्तीय स्वायत्तता, न्यूयाॅर्क में सार्वज निक-निजी भागीदारी का प्रभावी उपयोग, इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सफल शहरी शासन के लिए तीन तत्व आ वश्यक हैं, स्पष्ट अधिकार, म जबूत वित्तीय आधार और जवा बदेही। भारत भी इन मॉडलों से सीख लेकर अपनी परिस्थि तियों के अनुसार सुधार कर सकता है। अतः अगर हम उप रोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि शहरी भारत का भविष्य तय करने का नि र्णायक क्षण हैं भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां शहरी करण उसके विकास की दिशा तय करेगा।
नीति आयोग की रिपोर्ट स्ट्रीथनिंग अर्बन गवर्नेंस इन इंडिया – ए फ्रेमवर्क फाॅर रिफार्म इस दिशा में एक म हत्वपूर्ण कदम है। यह रिपोर्ट केवल एक दस्तावेज नहीं है, बल्कि एक दृष्टि है, एक ऐसे भारत की, जहां शहर केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि अवसरों, नवाचार और समृद्धि के केंद्र हों। यदि इस रूपरेखा को गंभीरता से लागू किया गया, तो भारत न केवल अप नी आंतरिक चुनौतियों को पार कर सकता है, बल्कि वैश्विक शहरी विकास के क्षेत्र में एक उदाहरण भी बन सकता है।
