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अस्पताल में आगे के मामले में अस्पताल प्रबंधन, ठेकेदार बिजली विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की संयुक्त जिम्मेदारी होती है- लेकिन अंतिम दोषसि(ि बहुत कम मामलों में होती है ऐसा क्यों

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर ओडिशा के कटक स्थित श्रीराम चंद्र भांजा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल में सोमवार 16 मार्च 2026 को अर्ली मार्निंग घटी भयावह आग की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस घटना ने एक बार फिर देश के अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था, फायर आडिट और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल उपचार का केंद्र या जोखिम का स्थल? अस्प ताल समाज के लिए जीवन रक्षक संस्थान माने जाते हैं। यहां आने वाला हर व्यक्ति यह उम्मीद करता है कि उसे सुरक्षित वातावरण में इलाज मिलेगा। लेकिन जब वही अस् पताल आग जैसी दुर्घट नाओं के कारण मौत का केंद्र बन जाएँ, तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।भारत में पिछले एक दशक में अस्पतालों में आग लगने की घटनाएँ बार- बार सामने आई हैं।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि इन घटनाओं में सैकड़ों मरीजों की जान जा चुकी है।
अधिकतर मामलों में जांच बैठती है, कुछ अधिकारियों को निलंबित किया जाता है, लेकिन अंतिम सजा बहुत कम मामलों में होती है। यही कारण है कि यह समस्या बार -बार दोहराई जाती है। अस्पतालों में आग की घटना ओं के बाद अक्सर जांच समि तियां गठित की जाती हैं। कई बार अस्पताल प्रबंधन और अद्दि कारियों को निलंबित भी किया जाता है। लेकिन अंतिम दोष सिद्धि और सजा बहुत कम मामलों में होती है। उदाहरण के लिए एएमआरआई अस्प ताल मामले में निदेशकों को गिरफ्तार किया गया और उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया, लेकिन लंबे समय बाद कई आरोपियों को जमानत मिल गई। अस्पताल आग दुर्घटनाओं में दोषसिद्धि कम होने का एक बड़ा कारण कानूनी प्रक्रिया की जटिलता भी है। अक्सर यह साबित करना कठिन होता है कि दुर्घटना सीधे किसी व्यक्ति की लापरवाही के कारण हुई है। कई मामलों में अस्पताल प्रबंधन, ठेकेदार, बिजली विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की संयुक्त जिम्मेदारी होती है, जिससे जिम्मेदारी तय कर ना मुश्किल हो जाता है।
इसके अलावा साक्ष्यों का अभाव भी बड़ी समस्या है। आग लगने के बाद कई महत्व पूर्ण दस्तावेज और तकनीकी प्रमाण नष्ट हो जाते हैं। इससे जांच कमजोर पड़ जाती है। रात लगभग तीन बजे अस्प ताल की पहली मंजिल पर स्थित ट्रामा केयर आईसीयू में अचानक आग लग गई। उस समय वहां करीब 23 मरीज भर्ती थे। आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते अस्पताल में अफरा- तफरी मच गई। अस्पताल प्रशासन और कर्मचारियों ने मरीजों को बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन तब तक कई मरीज गंभीर रूप से झुलस चुके थे। इस दुखद हादसे में 10 मरीजों की मौत हो गई, जिनमें से 7 मरीजों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि 3 मरीजों की मृत्यु इलाज के दौरान हुई। बचाव कार्य के दौरान अस्पताल के कम से कम 11 कर्मचारी भी झुलस गए। प्रारंभिक जांच में आग लगने का कारण शार्ट सर्किट बताया जा रहा है, हालां कि वास्तविक कारण विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
साथियों बात अगर हम अस्पतालों में आग लगने के प्रमुख कारणों को समझने की करें तो, विश्लेषकों और अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अस्पतालों में आग लगने के कई प्रमुख कारण होते हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण शार्ट सर्किट और खराब विद्युत व्यव स्था है। कई अस्पतालों में पुरा नी वायरिंग होती है, जो अत्य धिक विद्युत भार के कारण गर्म होकर आग पकड़ लेती है। इसके अलावा आईसीयू और अन्य वार्डों में उपयोग होने वाले इलेक्ट्रानिक उप करण भी अत्यधिक गर्मी उत्प न्न करते हैं। दूसरा बड़ा कारण आक्सीजन सिलेंडरों की अ धिकता है। कोविड-19 महा मारी के दौरान यह समस्या और स्पष्ट हुई। आक्सीजन अत्यधिक ज्वलनशील वाता वरण बनाती है, जिससे छोटी सी चिंगारी भी बड़े विस्फोट का रूप ले सकती है।तीसरा कारण फायर एनओसी का अभाव या उसका नवीनीकरण न होना है। कई अस्पताल बिना उचित फायर सुरक्षा प्रमा णपत्र के ही संचालित होते रहते हैं। चैथा कारण आपात कालीन निकास मार्गों का अभाव है। कई अस्पतालों में निकास मार्ग या तो बंद रहते हैं या उनमें अवैध निर्माण कर दिया जाता है। इसके अलावा अवैध निर्माण, भवन की खराब डिजाइन, फायर अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम का अभाव तथा कर्मचारियों को फायर सुरक्षा का प्रशिक्षण न होना भी बढ़ी महत्व पूर्ण सटीक समस्या है।
साथियों बात कर हम सबसे अधिक खतरा आईसीयू और नवजात वार्ड में क्यों? इसको समझने की करें तो अस्पतालों में होने वाली अद्दि कांश मौतें आईसीयू और नवजात शिशु वार्ड में होती हैं। इसके कई कारण हैं।
आईसीयू में भर्ती मरीज अक्सर गंभीर स्थिति में होते हैं और स्वयं चलने-फिरने में सक्षम नहीं होते। इसलिए आग लगने की स्थिति में उन्हें तुरंत बाहर निकालना कठिन हो जाता है। दूसरा कारण यह है कि आईसीयू में आक्सी जन सिलेंडरों की संख्या अद्दिक होती है। तीसरा कारण यह है कि वहां कई प्रकार के इले क्ट्रानिक उपकरण लगातार चलते रहते हैं, जिससे शार्ट सर्किट की संभावना बढ़ जाती है। चैथा कारण यह है कि बंद कमरों में धुआं बहुत तेजी से फैलता है, जिससे मरीजों का दम घुटने का खतरा बढ़ जाता है। साथियों बात कर हम कागजों में फायर आडिट- जमीन पर लापरवाही को सम झने की करें तो विशेषज्ञों के अनुसार अस्पतालों में आग की घटनाएं इसलिए भी नहीं रुक रही हैं क्योंकि फायर आडिट अक्सर केवल कागजों में ही सीमित रह जाते हैं। कई अस्पताल निरीक्षण से पहले ही अस्थायी व्यवस्था कर लेते हैं और निरीक्षण के बाद फिर लापरवाही शुरू हो जाती है। कई राज्यों में फायर विभाग के पास निरीक्षण के लिए पर्याप्त कर्मचारी भी नहीं होते। इसके अलावा अस्पतालों में सुरक्षा उपकरण तो लगाए जाते हैं, लेकिन उनका निय मित रखरखाव नहीं होता। फायर अलार्म सिस्टम काम नहीं करते, स्प्रिंकलर जाम हो जाते हैं और अग्निशमन यंत्रों की समय-समय पर जांच नहीं होती।
साथियों बात अगर हम आरोपियों को सजा नहीं होने व शीघ्र जमानत पर छूटने को समझने की करें तो यही वह बिंदु है जहां भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की कम जोरी सामने आती है। जब जवाबदेही तय नहीं होती, तो लापरवाही दोहराई जाती है। भंडारा महाराष्ट्र अस्पताल आग मामले में डाक्टरों और कर्मचारियों को निलंबित किया गया और तकनीकी कर्मचारि यों पर केस दर्ज किया गया। विरार अस्पताल आग मामले में अस्पताल मालिक के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और प्रशा सनिक जांच बैठाई गई। दिल्ली के नवजात अस्पताल मामले में अवैध लाइसेंस के कारण अस्पताल संचालक को गिरफ् तार किया गया। अहमदाबाद के श्रेय अस्पताल में आग लग ने के बाद अस्पताल को सील कर दिया गया और प्रबंधन पर केस दर्ज किया गया। लेकिन इन अधिकांश मामलों में अंतिम सजा या दोषसिद्धि बहुत कम हुई। साथियों बात अगर हम भारत का सबसे बड़ा अस्पताल अग्निकांड- एक भयावह स्मृति को समझने की करें तो भारत के इतिहास में सबसे बड़ा अस्पताल अग्निकांड वर्ष 2011 में कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल में हुआ था।
इस दुर्घटना में 89 से 93 लोगों की मौत हो गई थी। अधिकांश मरीजों की मृत्यु धुएं से दम घुटने केकारण हुई थी। जांच में पता चला कि अस्पताल के बेसमेंट में ज्वलनशील सामान का अवैद्द भंडारण किया गया था, जिस से आग तेजी से फैल गई। इस घटना के बाद अस्पताल के छह निदेशकों को गिरफ्तार किया गया, अस्पताल का लाइ सेंस रद्द कर दिया गया और कई अधिकारियों पर आपराद्दि क मुकदमे दर्ज किए गए। हालांकि वर्षों बाद कई आरोपि यों को जमानत भी मिल गई। यह घटना आज भी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एकसटीक चेतावनी के रूप में याद की जाती है।
साथियों बात अगर हम पिछले दशक में अस्पतालों में आग की भयावह तस्वीर को समझने की करें तो पिछले लगभग 10 से 15 वर्षों में भारत में अस्पतालों में आग लगने की कई बड़ी घटनाएँ सामने आई हैं। विभिन्न सरकारी रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों के अनुसार वर्ष 2011 से 2024 के बीच कम से कम 13 बड़े अस्पताल अग्निकांडों में लग भग 180 लोगों की मृत्यु हुई।
यह आंकड़ा केवल प्रमुख घटनाओं का है।इसके अलावा हर वर्ष छोटे-मोटे कई आग हादसे भी होते हैं, जिनमें कई मरीज घायल होते हैं। यह आंकड़ा इस बात का संकेत देता है कि अस्पतालों में आग की समस्या केवल आकस्मिक दुर्घटना नहीं बल्कि एक संर चनात्मक और प्रशासनिक विफ लता का परिणाम है। हाल के वर्षों की प्रमुख अस्पताल अग्नि कांड घटनाएँ यदि हाल के वर्षों की प्रमुख घटनाओं पर नजर डालें तो यह समस्या और स्पष्ट दिखाई देती है। वर्ष 2026 में कटक के सरकारी मेडिकल कालेज अस्पताल में आईसीयू में आग लगने से 10 से अधिक मरीजों की मौत हुई। वर्ष 2024 में झांसी मेडिकल कालेज के नवजात शिशु वार्ड में आग लगने से 10 नवजातों की मृत्यु हुई। उसी वर्ष दिल्ली के विवेक विहार स्थित एक निजी अस्पताल में आग लगने से 7 नवजात शिशुओं की जान चली गई, जहां बाद में पता चला कि अस्पताल अवैध लाइ सेंस पर संचालित हो रहा था। वर्ष 2022 में जबलपुर के एक अस्पताल में आईसीयू में आग लगने से 8 मरीजों की मौत हो गई। वर्ष 2021 भारत में अस्पताल आग दुर्घटनाओं के लिए विशेष रूप से भयावह रहा। महाराष्ट्र के अहमदनगर कोविड अस्पताल में आईसीयू में आग लगने से 11 मरीजों की मौत हुई। उसी वर्ष पाल घर जिले के विरार स्थित विजय वल्लभ कोविड अस्प ताल में एसी यूनिट से लगी आग ने 15 मरीजों की जान ले ली। महाराष्ट्र के भंडारा जिला अस्पताल में नवजात शिशु वार्ड में आग लगने से 10 नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई। वर्ष 2020 में भी कई बड़े हादसे हुए। विजयवाड़ा के एक कोविड सेंटर में आग लगने से 10 मरीजों की मौत हो गई। अहमदाबाद के श्रेय अस्पताल में आईसीयू में आग लगने से 8 मरीजों की मृत्यु हुई, जबकि राजकोट के कोवि ड अस्पताल में आईसीयू में आग लगने से 5 मरीजों की जान चली गई। वर्ष 2018 में मुंबई के ईएसआईसी अस्पताल में आग और धुएं के कारण 8 लोगों की मृत्यु हुई। इससे पहले 2016 में भुवनेश्वर के एसयूएम अस्पताल में लगी आग में 20 से 22 लोगों की मौत हुई थी। इन सभी घट नाओं को जोड़कर देखें तो 2016 से 2026 के बीच केवल प्रमुख मामलों में ही लगभग 120 से 150 लोगों की मौत हुई है। यदि छोटे मामलों को भी शामिल किया जाए तो यह संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। साथियों बात अगर हम समाधान-अस्पताल सुर क्षा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता को समझने की करें तो यदि भारत को अस्प ताल आग दुर्घटनाओं को रो कना है तो कई स्तरों पर सु धार करने होंगे। सबसे पहले सभी अस्पतालों के लिए निय मित और पारदर्शी फायर आडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए। दूसरा, अस्पताल भवनों की डिजाइन और विद्युत व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मान कों के अनुसार बनाया जाना चाहिए। तीसरा, अस्पताल कर्म चारियों को नियमित रूप से फायर सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और समय-समय पर मॉक ड्रिल आयोजित की जानी चाहिए।
चैथा, आपात कालीन नि कास मार्गों को हमेशा खुला और सुरक्षित रखा जाना चाहि ए। सबसे महत्वपूर्ण कदम यह होगा कि दुर्घटनाओं में दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई की जाए। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय मानकों से तुलना करके समझने की करें तो, दुनिया के कई विकसित देशों में अस्पतालों में फायर सुरक्षा को अत्यंत गंभीरता से लिया जाता है। वहां अस्प ताल भवनों की डिजाइन से लेकर बिजली व्यवस्था, आक् सीजन पाइपलाइन अग्निशमन उपकरण और कर्मचारियों के प्रशिक्षण तक सभी चीजों के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। नियमित फायर ड्रिल कराई जाती है और किसी भी प्रकार की लापरवाही पाए जाने पर भारी जुर्माना और आपराधिक कार्रवाई की जाती है। भारत में भी ऐसे नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कमजोर है। यही कारण है कि दुर्घट नाएँ लगातार हो रही हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि जीवन बचाने वाले संस्थानों को सुरक्षित बनाना होगा कटक मेडिकल कालेज अस्पताल की घटना केवल एक दुर्घटना नहीं बल्किभारत की स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों का प्रतीक है। पिछले एक दशक में सैक ड़ों लोग अस्पतालों में आग लगने की घटनाओं में अपनी जान गंवा चुके हैं। हर बार जांच और मुआवजे की घो षणा होती है, लेकिन यदि व्यवस्था में वास्तविक सुधार नहीं होता तो ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती रहेंगी। अस्पताल वह स्थान है जहां लोग जीवन की आशा लेकर आते हैं। यदि वही स्थान असु रक्षित हो जाए तो यह पूरे समा ज के लिए चिंता का विषय है। इस लिए अब समय आ गया है कि अस्पताल सुरक्षा, फायर आडिट और प्रशासनिक जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमि कता दी जाए। केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, उनका कठोर पालन और पारदर्शी निगरानी भी उतनी ही आवश् यक है। तभी अस्पताल वास्तव में जीवन बचाने वाले सुरक्षित केंद्र बन सकते हैं।

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