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नियोक्ताओं को हर महीने अतिरिक्त भुगतान वाली छुट्टियाँ देनी पड़ेंगी तो संभवतःवे महिलाओं की नियुक्त करने से बचें- सटीक दृष्टिकोण

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर 21वीं सदी में महिला सशक्तिकरण विश्व राजनीति,सामाजिक नीति और आर्थिक विकास का केंद्रीय विषय बन चुका है। आज अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में यह स्वीकार किया जा चुका है कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति तभी संभव है जब उसकी आधी आबादी, महिलाएं समान अवसरों सम् मान और संसाधनों तक बरा बरी से पहुँच प्राप्त करे। भारत भी इसी वैश्विक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते हुए महिला ओं के सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए अनेक योजनाएँ चला रहा है।भारत सरकार द्वारा संचालित कई कार्यक्रम जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री उज्ज्व ला योजना और सुकन्या समृद्धि योजना का उद्देश्य महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से सशक्त बनाना है। इन योजनाओं ने न केवल महिलाओं की स्थिति में सुधार किया है बल्कि समाज में उनके प्रति सम्मान की भाव ना को भी मजबूत किया है। मैं एडवोकेट किशन सनमुख दास भावनानीं गोंदिया महारा ष्ट्र यह मानता हूं कि महिलाएं केवल समाज की आधी आबा दी ही नहीं हैं, बल्कि वे मां, पत्नी, बहन, बेटी और परिवार की आधारशिला भी होती हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा, स्वा स्थ्य और सम्मान सुनिश्चित करना सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है। हा लांकि कई बार कुछ ऐसी नीति गत मांगें भी सामने आती हैं जिनका उद्देश्य भले ही महि लाओं की सुविधा और स्वास्थ्य हो,लेकिन उनके सामाजिक और आर्थिक परिणाम जटिल हो सकते हैं ऐसा ही एक मुद्दा हाल ही में सामने आया जब कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए मासिक धर्म अवकाश यानी पीरियड लीव को अनिवार्य बनाने की मांग को लेकर एक याचिका दायर की गई। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने 13 मार्च 2026 को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार के प्रावधान को कानूनन अनिवार्य करना महिलाओं के रोजगार अवसरों को प्रभावित कर सकता है। यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं बल्कि महिलाओं के अद्दि कारों, समानता और रोजगार के अवसरों के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता है।
साथियों बात अगर हम मासिक धर्म अवकाश की मांगरू पृष्ठभूमि और तर्क को समझने की करें तो मासिक धर्म महिलाओं केजीवन का एक स्वाभाविक जैविक चक्र है। हर महीने आने वाला यह शारीरिक परिवर्तन कई महि लाओं के लिए सामान्य होता है, लेकिन कईमहिलाओं को इस दौरान तीव्र दर्द कमजोरी हार्मोनल असंतुलन और मान सिक तनाव का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि कई सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने लंबे समय से यह मांग उठाई है कि कामकाजी महिलाओं और छात्राओं को इस दौरान विशेष अवकाश दिया जाना चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया था कि भारत में गर्भावस्था और प्रसूति के लिए छुट्टी का प्रावधान तो मौजूद है जैसे मातृत्व लाभ अधिनि यम 1961 लेकिन मासिक द्दर्म के दौरान होने वाली शारीरिक तकलीफों को लेकर कोई विशेष कानूनी व्यवस्था नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यदि महिलाओं को हर महीने एक या दो दिन का पीरियड लीव मिल जाए तो इससे उनके स्वास्थ्य और कार्यक्षमता दोनों में सुधार होगा। उनका यह भी कहना था कि कुछ राज्य सरकारों और निजी कंपनियों ने स्वेच्छा से ऐसे प्रावधान लागू किए हैं, इसलिए इसे पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए।
साथियों बात अगर हम इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के दृष्टिकोणको समझने की करें तो व्यावहारिकता बनाम भावनात्मकता, याचिका की सुनवाई के दौरान मुख्य न्या याधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मुद्दे को केवल भाव नात्मक दृष्टि से नहीं बल्कि व्यावहारिक और आर्थिक दृष्टि कोण से देखने की आवश्य कता पर जोर दिया अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी कंपनी या संस्थान द्वारा स्वेच् छा से महिलाओं को पीरियड लीव दिया जाता है तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन जब इसे कानून के रूप में अनिवार्य किया जाएगा, तो इसके कई अप्रत्याशित परिणाम सामने आ सकते हैं।
अदालत ने कहा कि यदि नियोक्ताओं को हर महीने अति रिक्त भुगतान वाली छुट्टियाँ देनी पड़ेंगी तो संभव है कि वे महिलाओं को नियुक्त करने से बचें। अदालत की यह टिप्पणी भारतीय श्रम बाजार की वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर की गई थी। भारत में अभी भी बड़ी संख्या में निजी कंपनियां लागत और उत्पादकता के आधार पर कर्म चारियों की भर्ती करती हैं।
ऐसे में यदि महिला कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से अतिरिक्त छुट्टियाँ देनी पड़ें, तो कई नियोक्ता पुरुष कर्मचारियों को प्राथमिकता दे सकते हैं। साथियों बात अगर हम याचिका खारिज करने के कर्म को समझने की करें तो रोजगार अवसरों पर संभावित प्रभाव, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि महिलाओं को कमजोर बताने वाली मान सिकता सेबचना चाहिए। अदा लत के अनुसार यदि कानून यह संदेश देता है कि महिलाएं हर महीने काम करने में सक्षम नहीं हैं, तो इससे कार्यस्थल पर उनके प्रति पूर्वाग्रह पैदा हो सकता है।
उदाहरण के लिए यदि कोई कंपनी दो उम्मीदवारों में से एक का चयन कर रही हो एक पुरुष और एक महिला तो नियोक्ता यह सोच सकता है कि महिला कर्मचारी को अति रिक्त छुट्टियाँ देनी पड़ेंगी, जि ससे उत्पादकता प्रभावित होगी। ऐसी स्थिति में महि लाओं के रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं।
अदालत ने कहा कि यह विडंबना होगी कि महिलाओं के हित में बनाई गई नीति ही उनके लिए बाधा बन जाए।
साथियों बात अगर हम महिला सशक्तिकरण और समानता की वास्तविक चुनौती को समझने की करें तो महि ला सशक्तिकरण केवल सुवि धाएँ देने से नहीं बल्कि समान अवसर सुनिश्चित करने से आता है। यदि कोई नीति महि लाओं को विशेष सुविधा देती है लेकिन उसके परिणामस् वरूप उन्हें रोजगार के अवसर कम मिलते हैं, तो वह नीति अंततः उनके हितों के विपरीत हो सकती है। इसलिए नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा करते हुए उन के रोजगार अवसरों को भी सुरक्षित रखना है मासिक द्दर्म से जुड़ी समस्याओं का समा धान केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं बल्कि सामाजिक संवे दनशीलता से भी जुड़ा हुआ है। कार्यस्थलों को महिलाओं के लिए अधिक संवेदनशील और सहयोगी वातावरण बना ना चाहिए। कई कंपनियां पह ले से ही लचीले कार्य समय, वर्क फ्राम होम और स्वास्थ्य अवकाश जैसी सुविधाएँ दे रही हैं। यदि इन व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए तो महिलाओं को बिना किसी अतिरिक्त कानूनी बोझ के भी सटीक रूप से राहत मिल सकती है।
साथियों बात अगर हम अदालत की सामाजिक चेता वनी को समझने की करें तो सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मासिक धर्म को किसी दुर्भाग् यपूर्ण घटना की तरह प्रस्तुत करना भी सही नहीं है। महिलाओं की जैविक प्रक्रिया को सम्मान और सामान्यता के साथ देखा जाना चाहिए। अदालत के अनुसार यदि पीरि यड लीव को अनिवार्य कानून बना दिया गया, तो इससे समाज में यह धारणा बन सकती है कि महिलाएं निय मित रूप से कार्य करने में सक्षम नहीं हैं।
इस प्रकार अदालत ने महिला सशक्तिकरण के उस सिद्धांत पर जोर दिया जिसमें महिलाओं को कमजोर या निर्भर नहीं बल्कि सक्षम और बराबरी के भागीदार के रूप में देखा जाता है। नियोक्ताओं की चिंता और आर्थिक वास्तविकतासुनवाई के दौरान न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची ने भी यह टिप्पणी की कि याचिका का विचार अच्छा है, लेकिन नियोक्ताओं की स्थिति को भी समझना जरूरी है। यदि हर महिला कर्मचारी को महीने में दो दिन अतिरिक्त पेड लीव देनी पड़े, तो इसका आर्थिक बोझ कंपनियों पर पड़ेगा। खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए यह बोझ अधिक हो सकता है।
भारत जैसे विका सशील देश में जहां रोजगार सृजन एक बड़ी चुनौती है, वहां किसी भी नई नीति को लागू करते समय उसके आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करना आवश्यक है। साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार को नीति बनाने का सुझाव को समझने की करें तो हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन उसने इस मुद्दे को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया। अदा लत ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष अपना ज्ञापन दे चुके हैं।
अदालत ने सुझाव दिया कि सरकार इस विषय पर सभी हितधारकों महिला संगठनों, नियोक्ताओं, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं से चर्चा कर एक संतुलित नीति बनाने पर विचार कर सकती है। इसका अर्थ यह है कि अदालत ने इस मुद्दे को नकारा नहीं बल्कि इसे नीति निर्माण के दायरे में भेज दिया। साथियों बात अगर हम इस पूरे मामले को वैश्विक परिप्रेक्ष्य मैं समझने की करें व दुनिया में पीरियड लीव की व्यवस्था को देखें तो दुनिया के कुछ देशों में पीरियड लीव का प्रावधान मौजूद है। उदा हरण के लिए जापान, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान छुट्टी लेने का अधिकार दिया गया है।हाल ही में स्पेन ने भी महिलाओं को पीरियड लीव देने का कानून लागू किया। लेकिन कई देशों में यह व्यवस्था विवादित भी रही है क्योंकि इससे महिला ओं की भर्ती में भेदभाव की आशंका बढ़ सकती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं कि पीरियड लीव को अनिवार्य कानून बनाने के बजाय कंपनियों को लचीली नीतियाँ अपनाने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि संतुलित नीति ही समाधान, मासिक धर्म अवकाश का मुद्दा महिलाओं के स्वास्थ्य समानता और रोजगार के अवसरों से जुड़ा एक जटिल विषय है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह संकेत देता है कि किसी भी सामाजिक नीति को लागू करने से पहले उसके दूरगामी परिणामों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। महिलाओं को कमजोर या असहाय बताने के बजाय उन्हें सक्षम और स्वतंत्र नागरिक के रूप में देखना ही वास्तविक सशक्ति करण है। भ्
ाविष्य में संभव है कि सरकार व्यापक चर्चा के बाद ऐसी नीति तैयार करे जो महिलाओं के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखे और उनके रोज गार अवसरों को भी सुरक्षित रखे। अंततः महिला सशक्ति करण का लक्ष्य केवल विशेष सुविधाएँ देना नहीं बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहाँ महि लाएं बिना किसी भेदभाव के अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सकें। यही वह संतुलन है जिसे बनाए रखना किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

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