एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को एक बार फिर अस्थिर कर दिया है। ईरान, इजरायल और अमे रिका के बीच टकराव केवल क्षेत्रीय संघर्ष भर नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्य वस्था और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंख ला पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है।खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के कारण दुनियाँ के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक, स्ट्रेट आफ होर्मुज में बाधा उत्पन्न हो गई है। यही मार्ग विश्व के बड़े हिस्से में तेल और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करता है।इस मार्ग में व्यवधान का असर भारत के ईंधन बाजार पर सीधा पड़ा है। एलपीजी टैंकरों के फंस जाने, कच्चे तेल की कीमतों के 100 डालर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने और गैस आपूर्ति में अनिश्चितता के कारण भारत के आटो- एलपीजी तथा औद्योगिक गैस बाजार में भारी दबाव पैदा हो गया है, ऐसे में घरेलू और कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है। नई दरों के अनुसार घरेलू एलपीजी सिलेंडर 60 रुपए और कमर्शियल सिलेंडर 115 रुपए महंगा हो गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि सरकार को 5 मार्च 2026 को आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 लागू करना पड़ा।
सामान्य परिस्थितियों में यह कानून कम ही इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन मौ जूदा संकट ने इसे फिर से सक्रिय करने के लिए सरकार को मजबूर कर दिया।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानी गोंदिया महा राष्ट्र यह मानता हूं कि दर असल यह संकट केवल ऊर्जा बाजार का नहीं बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा और आम नाग रिकों की दैनिक जरूरतों से जुड़ा हुआहै। भारत में करोड़ों परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं और औद्योगिक उत्पादन भी ऊर्जा आपूर्ति से सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे में पश्चिम एशिया की जंग भारत की रसोई और उद्योग दोनों के लिए सटीक गंभीर चुनौती बनकर सामने आई है। साथियों बात अगर हम भारत की ऊर्जा निर्भर तारूआयात पर आधारित संर चना को समझने की करें तो भारत दुनियाँ की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इसके साथ- साथ ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। लेकिन देश की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि घरेलू स्तर पर तेल और गैस का उत्पादन सीमित है। भारत अपनी कुल तेल जरू रत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है।एलपीजी के मामले में भी स्थिति लगभग यही है। देश में हर साल लगभग 3 करोड़ 13 लाख टन एलपीजी की खपत होती है, जबकि घरेलू उत्पादन करीब 1 करोड़ 28 लाख टन ही है। इसका मतलब है कि लग भग 58 प्रतिशत एलपीजी आ यात पर निर्भर है। इस आयात का लगभग 85 से 90 प्रति शत हिस्सा स्ट्रेट आफ होर्मुज के रास्ते भारत तक पहुंचता है। यह वही समुद्री मार्ग है जो ईरान और ओमान के बीच स्थित है और खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल और गैस का प्रमुख रास्ता माना जाता है।जब इस मार्ग में युद्ध के कारण बाधा आई तो एलपीजी टैंकरों की आवाजाही रुक गई। परिणाम स्वरूप भारत में गैस आपूर्ति की स्थिति अचानक अस्थिर हो गई।
सरकार के पास मौजूद बफर स्टाक के आधार पर देश लगभग 25 से 30 दिन तक एलपीजी की जरूरत पूरी कर सकता है, लेकिन अगर आपूर्ति लंबे समय तक बाद्दित रहती है तो संकट और भी बहुत गंभीर हो सकता है।
साथियों बात अगर हम कतर की एलएनजी सुविधा पर हमला और आपूर्ति संकट को समझने की करें तो, ऊर्जा संकट को और गहरा करने वाली एक अन्य घटना कतर की एलएनजी सुविधा पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमले थे। कतर दुनियाँ के प्रमुख गैस निर्यातकों में से एक हैऔर भारत के लिए भी एलएनजी का महत्वपूर्ण स्रोत है।
हमले में कतर की एलएन जी सुविधा को भारी नुकसान पहुंचा, जिसके बाद भारत की कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी ने कतर से गैस आपूर्ति पर फोर्स मैजर घोषित कर दिया। इस का मतलब यह हुआ कि अनु बंध होने के बावजूद गैस की आपूर्ति अस्थायी रूप से रोक दी गई। इस घटना ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया। एलएनजी और एल पीजी दोनों की आपूर्ति प्रभा वित होने लगी, जिससे ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई। ऐसी स्थिति में सरकार के सामने दोहरी चुनौती थी एक ओर घरेलू उपभोक्ताओं के लिए गैस की उपलब्धता सुनि श्चित करना और दूसरी ओर बाजार में जमाखोरी और काला बाजारी को रोकना। साथियों बात अगर हम आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 संकट में सरकार का सबसे बड़ा हथि यार इसको समझने की करें तो, ऊर्जा संकट से निपटने के लिए सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 को लागू किया। यह कानून भारत में आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन वितरण और व्यापार को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था।
इस अधिनियम के तहत सरकार को यह अधिकार मिलता है कि वह किसी भी जरूरी वस्तु के उत्पादन, स्टाक, वितरण और कीमतों पर नियंत्रण स्थापित कर सक ती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आम जनता को आवश्यक वस् तुएं उचित कीमत पर और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों। इस कानून को अक्सर सर कार का “ब्रह्मास्त्र” कहा जाता है, क्योंकि इसके तहत सरकार को असाधारण अद्दि कार मिलते हैं। वह कंपनियों और व्यापारियों को निर्देश दे सकती है कि वे कितना उत्पा दन करें, कितना स्टाक रखें और किस कीमत पर बिक्री करें। पेट्रोलियम और पेट्रोलि यम उत्पाद इस कानून के तहत शुरू से ही शामिल रहे हैं। हालांकि तेल क्षेत्र में इस का इस्तेमाल बहुत कम होता है। यही कारण है कि 2026 में एलपीजी संकट के दौरान इसका उपयोग एक बड़ा और असामान्य कदम माना जा रहा है। साथियों बात अगर हम सरकार ने यह कानून क्यों लागू किया? इसको समझने की करें तो सरकार के इस कदम के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं।सबसे पहला कारण गैस आपूर्ति में संभावित रुका वट है। खाड़ी देशों से होने वाली गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा युद्ध के कारण प्रभावित हो गया है। अनुमान है कि भारत को मिलने वाली लगभग 60 प्रतिशत गैस आपूर्ति पर इसका असर पड़ सकता है।
दूसरा कारण जमाखोरी और मुनाफाखोरी को रोकना है। जब भी बाजार में किसी आवश्यक वस्तु की कमी की आशंका होती है तो कुछ व्या पारी अधिक लाभ कमाने के लिए उसका स्टाक जमा कर ने लगते हैं। इससे कृत्रिम कमी पैदा हो जाती है और कीमतें बढ़ जाती हैं। तीसरा कारण घरेलू उपयोग को प्राथ मिकता देना है। सरकार ने रिफाइनरियों को निर्देश दिया है कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन जैसे गैस घटकों का इस्तेमाल अन्य उत्पादों के बजाय एल पीजी उत्पादन के लिए करें।
इससे घरेलू रसोई गैस की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी। इन सभी कदमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित कर ना है कि देश में गैस की आपूर्ति सामान्य बनी रहे और आम लोगों को संकट का सामना न करना पड़े।
साथियों बात अगर हम एल पीजी उत्पादन और वितरण पर सरकार का नियंत्रण को समझने की करें तोआवश्यक वस्तु अधिनियम लागू होने के बाद सरकार ने एलपीजी उत्पा दन और वितरण प्रणाली में कई बदलाव किए हैं। रिफाइन रियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा घरेलू एलपीजी जरूरतों को पूरा करने में ल गाएं। इसके अलावा व्यापारि यों और वितरकों के लिए स्टाक लिमिट तय की जा सक ती है। अगर कोई व्यापारी या कंपनी तय सीमा से अद्दि क स्टाक जमाकरती है तो प्रशासन उसके खिलाफ कार्र वाई कर सकता है इस कानून के तहत अधिकारियों को यह अधिकार है कि वे गोदामों की जांच करें और जरूरत पड़ने पर स्टाक जब्त कर लें। इस व्यवस्था का उद्देश्य बाजार में पारदर्शिता बनाए रखना और आपूर्ति श्रृंखला को संतुलित करना है। आवश्यक वस्तु अ धिनियम के तहत नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। इस कानून की धारा 7 के अनुसार अगर कोई व्यक्ति या संस्था जमाखोरी, कालाबा जारी या अवैध व्यापार में शा मिल पाई जाती है तो उसे 3 महीने से लेकर 7 साल तक की जेल हो सकती है।
इसके साथ ही भारी जुर्मा ना भी लगाया जा सकता है। इस सख्त प्रावधान का उद्देश्य यहसुनिश्चित करना है कि बाजार में कोई भी व्यक्ति या संस्था संकट की स्थिति का फायदा उठाकर अनुचित लाभ बिलकुल भी न कमा सके।
साथियों बात अगर हम 2022 के बाद पहली बार इत ना बड़ा कदम इसको समझने की करें तो, तेल क्षेत्र में आवश् यक वस्तु अधिनियम का इस्ते माल बहुत कम होता है। इस से पहले 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान इसे सीमित रूप से लागू किया गया था। उस समय सरकार ने रिफाइन रियों को निर्यात रोककर घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के निर्देश दिए थे। लेकिन 2026 में एलपीजी उत्पादन के लिए सीधे निर्देश देना एक असाधारण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम इस बात का संकेत है कि सरकार ऊर्जा संकट को लेकर गंभीर है और घरेलू उपभोक्ताओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है।
साथियों बात अगर हम गैस सिलेंडर बुकिंग नियमों में बदलाव को समझने की करें तो ऊर्जा संकट के बीच सरकार ने गैस सिलेंडर बुकिंग के नियमों में भी बदलाव किया है। पहले उपभोक्ता किसी सिलेंडर की डिलीवरी के 21 दिन बाद नया सिलेंडर बुक कर सकते थे, लेकिन अब इस अवधि को बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है सरकार का कहना है कि यह बदलाव जमा खोरी को रोकने और वितरण प्रणाली को संतुलित बनाए र खने के लिए किया गया है। हालांकि कुछ परिवारों में गैस की खपत अधिक होती है, इसलिए यह चिंता भी सामने आई है कि अगर सिलेंडर 25 दिन से पहले खत्म हो जाए तो क्या होगा ऐसे में उप भोक्ताओं के लिए उपलब्ध विकल्प अगर किसी परिवार में गैस सिलेंडर जल्दी खत्म हो जाता है तो उपभोक्ता अप नी गैस एजेंसी या डिस्ट्रीब्यूटर से संपर्क कर सकते हैं। कई मामलों में एजेंसी विशेष अनु मति देकर जल्दी बुकिंग की सुविधा प्रदान कर सकती है।
इसके अलावा उपभोक्ता अतिरिक्त शुल्क देकर इमर जेंसी सिलेंडर भी प्राप्त कर सकते हैं। जिन परिवारों में गैस की खपत अधिक है उन के लिए डबल सिलेंडर कनेक् शन लेना एक बेहतर विकल्प हो सकता है। इस व्यवस्था में एक सिलेंडर खत्म होने के बाद दूसरा तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है और इस दौरान नया सिलेंडर बुक कर ने के लिए समय मिल जाता है।
साथियों बात अगर हम ऊर्जा संकट और भारत की दीर्घकालिक रणनीति को समझने की करें तो मौजूदा संकट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा के लिए दीर्घ कालिक रणनीति अपनानी होगी। सरकार पहले से ही कई कदम उठा रही है। इनमें रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास और इलेक् िट्रक वाहनों को बढ़ावा देना शामिल है। भारत सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों पर भी तेजी से काम कर रहा है। इसके अलावा जैव ईंधन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इन सभी प्रयासों का उद्देश्य तेल और गैस आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक राजनीति का नया समीकरण बना है, पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट यह दिखाता है कि वैश्विक राज नीति और ऊर्जा सुरक्षा एक- दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है बल्कि इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। भारत के लिए यह स्थिति एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। चेताव नी इसलिए क्योंकि ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता देश की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।
अवसर इसलिए क्योंकि यह संकट ऊर्जा क्षेत्र में आत्म निर्भरता की दिशा में तेज कदम उठाने का मौका भी देता है। आवश्यक वस्तु अद्दि नियम का उपयोग करके सर कार ने फिलहाल गैस संकट को नियंत्रित करने की कोशिश की है। लेकिन दीर्घकालिक समाधान तभी संभव है जब भारत ऊर्जा स्रोतों में विवि द्दता लाए और घरेलू उत्पादन तथा नवीकरणीय ऊर्जा को प्राथमिकता दे।
यदि ऐसा किया जाता है तो भविष्य में किसी भी वैश् िवक संकट का प्रभाव भारत की रसोई और उद्योग पर सीमित रहेगा और देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बना
भारत के लिए मौजूदा तेलीय पदार्थ संकट,ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता देश की आर्थिक स्थिरता के संकट की चेतावनी व ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में अवसर भी प्रदान करता है
