एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर 21 वीं सदी को तकनीक, वैश्वीकरण और अभूतपूर्व अवसरों की सदी कहा जाता है।आज का युवा वर्ग,जिसे सामान्यतःजेन जेड या नई पीढ़ी कहा जाता है, डिजिटल दुनियाँ के साथ पैदा हुआ है और उसी के साथ विकसित हुआ है। यह पीढ़ी तकनीकी रूप से सबसे अधिक सक्षम, सूच नाओं से भरपूर और वैश्विक अवसरों से जुड़ी हुई मानी जाती है। परंतु इस चमकदार आधुनिकता के पीछे एक बेहद चिंताजनक और दर्दनाक सच्चाई भी छिपी है, युवाओं में आत्महत्या के मामलों में लगातार वृद्धि।
पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि युवा वर्ग के बीच आत्महत्या की घटनाएँ अचानक बढ़ती जा रही हैं। यह केवल किसी एक देश या समाज की समस्या नहीं है, बल्कि एक वैश्विक सामा जिक संकट बन चुकी है। भारत सहित अनेक देशों में यह चिंता का विषय है कि जीवन के सबसे ऊर्जावान और संभावनाओं से भरे चरण में ही युवा इतने निराश और असहाय क्यों महसूस कर रहे हैं कि वे अपने जीवन का अंत करने जैसा कदम उठा लेते हैं। मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महा राष्ट्र यह मानता हूं कि जेन जेड (युवा पीढ़ी) में आत्महत्या के मामलों में अचानक इतना इजाफा क्यों? जेड जेन आत्म हत्या करने के पहले सोचे कि क्या वे आत्महत्या करके पारि वारिक नैतिक और सामाजिक अपराधी तो नहीं बन रहे हैं? अपने माता-पिता को कितना कष्टदायक अति दुखी छोड़ कर जा रहे हैं?अपनी पत्नी छोटे बच्चों को कितना भयंकर दुख देकर जा रहे हैं? क्या परलोक में ईश्वर अल्लाह उन्हें क्षमा करेंगे? परलोक जाकर वे नरक यानें जहन्नुम में इस की सजा भुगतांगे ?इन सवालों के जवाब ढूंढने जाएंगे तो वें आत्महत्या कर नहीं पाएंगे इसी लिए ऐसा जनजागरण शासन प्रशासन व समाज द्वारा कर ना अत्यंत जरूरी है तथा आत्म हत्या के कारणों को खोज उन का समाधान ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए कि बच्चे टूट क्यों रहे हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढने जाएंगे तो वें आत्म हत्या कर नहीं पाएंगे इसीलिए ऐसा जनजागरण शासन प्रशा सन व समाज द्वारा करना अत्यं त जरूरी है,जब कोई युवा आत्महत्या करता है तो केवल एक जीवन समाप्त नहीं होता, बल्कि उसके साथ एक पूरा परिवार, अनेक सपने और अन गिनत भावनाएँ भी टूट जाती हैं माता-पिता, भाई- बहन, पत्नी और छोटे बच्चों के जीवन पर इसका गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ता है। इस लिए आत्महत्या केवल व्यक्ति गत निर्णय नहीं बल्कि एक सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी बन जाता है।
आज की युवा पीढ़ी पर जीवन के कई प्रकार के दबाव एक साथ काम कर रहे हैं। शिक्षा, करियर, आर्थिक स्थि रता, सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत संबंधों की जटिल ताएँ युवाओं को सटीक मान सिक रूप से अत्यधिक दबाव में डाल देती हैं।
साथियों बात कर हम जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है, उसकी पारिवारिक धार्मिक स्थिति की करें तो,उसके माता -पिता को जीवनभर का दुख और अपराधबोध झेलना पड़ता है। जिन माता-पिता ने अपने बच्चे को प्रेम और त्याग से बड़ा किया, उनके लिए यह आघात असहनीय होता है। यदि वह व्यक्ति विवाहित है और उसके छोटे बच्चे हैं,तो उनके जीवन पर इसका प्रभाव और भी गंभीर होता है।बच्चे अपने पिता या माता के बिना भावनात्मक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करते हैं।
इस दृष्टि से देखा जाए तो आत्महत्या केवल एक व्यक्ति का निर्णय नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज को प्रभावित करने वाला कार्य है। दुनियाँ की लगभग सभी द्दार्मि क और आध्यात्मिक परंपराएँ जीवन को ईश्वर का अमूल्य उपहार मानती हैं।
हिंदू, इस्लाम, ईसाई और अन्य धर्मों में आत्महत्या को सामान्यतः अनुचित या पाप पूर्ण माना गया है। धार्मिक दृष्टिकोण यह संदेश देता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, उन्हें धैर्य, साहस और विश्वास के साथ सामना करना चाहिए। यदि युवा यह सोचें कि उनके इस कदम से उनके परिवार को कितना दुख होगा और क्या ईश्वर इस निर्णय को स्वीकार करेगा, तो संभव है कि वे अपने निर्णय पर बिल कुल पुनर्विचार करें।
साथियों बात अगर हम स्कूल कालेज के छात्रों द्वारा परिवार की अपेक्षा से आत्म हत्या के दृष्टिकोण से देखें तो, स्कूल और कालेजों में प्रति स्पर्धा इतनी तीव्र हो गई है कि कई बार विद्यार्थी पढ़ाई को सीखने की प्रक्रिया के बजाय एक मानसिक युद्ध की तरह अनुभव करने लगते हैं।
परीक्षा में अच्छे अंक लाने, प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने और सफल करियर बनाने का दबाव कई युवाओं के लिए असहनीय हो जाता है। इसके साथ ही परिवार की अपेक्षाएँ भी अक्सर युवाओं के लिए मानसिक बोझ बन जाती हैं। माता-पिता अपने बच्चों के उज् ज्वल भविष्य की कल्पना कर ते हुए उनसे बड़ी-बड़ी उम्मी दें रखते हैं, लेकिन कई बार यह उम्मीदें बच्चों के मन में भय और असुरक्षा की भावना पैदा कर देती हैं। जब कोई युवा इन अपेक्षाओं को पूरा करने में असफल महसूस कर ता है, तो वह स्वयं को असफल, अयोग्य और समाज से अलग – थलग समझने लगता है। यही भावना धीरे- धीरे निरा शा और अवसाद का रूप ले सकती है।
साथियों बात अगर हम सट्टा जुआ शेयर मार्केटिंग सो शल मीडिया और तुलना की मानसिकता के दृष्टिकोण से देखें तो सट्टा जुआ शेयर मार्के टिंग डिजिटल गेम के बढ़ते प्रचलन जिसमें लंबी हार से आर्थिक देवता बनती है डिजि टल युग में सोशल मीडिया युवाओं के जीवन का महत्व पूर्ण हिस्सा बन चुका है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और अन्य प्लेटफार्म पर लोग अपने जीवन की केवल सफल और चमकदार तस्वीरें साझा करते हैं। जब कोई युवा लगातार दूसरों की सफलता, सुंदरता, विलासिता और लोकप्रियता को देखता है,तो उसके मन में अनजाने में तुलना की भा वना पैदा हो जाती है।
उसे लगता है कि उसका जीवन दूसरों की तुलना में कम सफल या कम आकर्षक है। यह तुलना धीरे-धीरे आ त्मविश्वास को कमजोर कर देती है और व्यक्ति अपने जीवन से असंतुष्ट होने लगता है। कई बार यह असंतोष गहरी मानसिक पीड़ा और अवसाद में बदल जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मी डिया ने युवाओं के बीच पर फेक्ट लाइफ का एक ऐसा भ्रम पैदा कर दिया है जो वास् तविकता से बहुत दूर है, लेकिन युवा उसे सच मानकरे जीवन से निराश होने लगते हैं।
साथियों बात कर हम भावनात्मक अकेलापन और संवाद की कमी के दृष्टिकोण से सोचने की करें तो आधुनिक जीवन में भौतिक सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन भावनात्मक संबंध कमजोर होते जा रहे हैं। परिवारों में संवाद कम होता जा रहा है और कई युवा अपने मन की बात किसी से साझा नहीं कर पाते।कई बार युवा अपने माता-पिता, मित्रों या जीवनसाथी से अपनी परेशानियों को बताने से हिचकिचाते हैं। उन्हें डर होता है कि लोग उन्हें कमजोर समझेंगे या उनकी समस्या को गंभीरता से नहीं लेंगे।यह भावनात्मक अकेलापन धीरे-धीरे भीतर ही भीतर उन्हें तोड़ने लगता है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक अपने दुख और तनाव को अकेले सहता है, तो उसकी मानसिक स्थिति अत्यंत नाजुक हो सकती है। पारिवारिक और वैवाहिक संबंद्दों की जटिलताएँ आज के समाज में व्यक्तिगत संबंद्दों में भी कई प्रकार की जटि लताएँ दिखाई देती हैं। प्रेम संबंधों का टूटना, वैवाहिक विवाद, या पारिवारिक तनाव कई युवाओं को गहरे मान सिक संकट में डाल देते हैं। कई मामलों में यह देखा गया है कि विवाह के बाद पति- पत्नी के बीच विवाद होने पर या जीवनसाथी के अलग हो जाने पर युवा मानसिक रूप से टूट जाते हैं।
कुछ लोग इस स्थिति को जीवन की असफलता के रूप में देखने लगते हैं।
जब भावनात्मक समर्थन नहीं मिलता और व्यक्ति को लगता है कि उसका जीवन पूरी तरह बिखर गया है, तब वह निराशा के उस स्तर तक पहुँच सकता है जहाँ उसे आत्म हत्या ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है। साथियों बात अगर हम नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से आत्महत्या के समा धान को देखने की करें तो आत्महत्या को केवल व्यक्ति गत पीड़ा का परिणाम मानना पर्याप्त नहीं है। यह एक नैतिक और सामाजिक प्रश्न भी है। आत्महत्या की समस्या का समाधान केवल व्यक्तिगत स्तर पर संभव नहीं है। इसके लिए समाज, परिवार, शिक्षा प्रणाली और सरकार सभी को मिलकर काम करना होगा। स्कूलों और कालेजों में मान सिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। विद्यार्थि यों को केवल पढ़ाई में ही नहीं बल्कि भावनात्मक संतुलन और जीवन कौशल सिखाने की भी आवश्यकता है। वैसे ही सरकार को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाना चाहिए काउंसलिंग सेंटर, हेल्पलाइन और मनोवैज्ञा निक सहायता केंद्र युवाओं के लिए उपलब्ध होने चाहिए ताकि संकट के समय वे सहायता प्राप्त कर सकें। परिवार की भूमिका-सुनना औरसमझना विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं को डांटने या केवल सलाह देने से अधिक महत्व पूर्ण है उनकी बातों को ध्यान से सुनना। माता-पिता और परिवार के सदस्यों को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिस में बच्चे बिना डर या झिझक के अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकें। यदि कोई युवा अपनी समस्या साझा करता है, तो उसे गंभीरता से सुनना और समझना अत्यंत आवश्यक है। कई बार केवल सहानुभूति और भावनात्मक समर्थन ही व्यक्ति को कठिन परिस्थिति यों से बाहर निकाल सकता है। साथियों बात अगर हम जनजागरण और सामाजिक अभियान की आवश्यकता को समझने की करें तो आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाना आवश्यक है। समाज में यह संदेश फैला ना चाहिए कि जीवन की कठि नाइयाँ अस्थायी होती हैं, लेकिन आत्महत्या का निर्णय स्थायी और अपरिवर्तनीय होता है। मीडिया, सामाजिक संस्थाएँ और धार्मिक संगठन मिलकर लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर सकते हैं। यह भी आवश्यक है कि समाज में ऐसी संस्कृति विकसित की जाए जिसमें मान सिक समस्याओं को कमजोरी नहीं बल्कि सामान्य मानवीय अनुभव के रूप में समझा जाए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि जीवन का मूल्य और आशा का संदेश युवा किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति और भविष्य होते हैं। उनकी ऊर्जा, रचनात्मकता और सपने ही राष्ट्र के विकास की नींव बनाते हैं। यदि युवा निराशा और अवसाद के कारण अपना जीवन समाप्त करने लगें, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। आत्म हत्या की समस्या का समाधा न केवल उपदेश देने से नहीं बल्कि संवेदनशीलता, संवाद और सहयोग से संभव है। हमें युवाओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि जीवन की हर कठिनाई का समाधान संभव है और कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसके कारण जीवन समाप्त कर दिया जाए। जब परिवार, समाज और सरकार मिलकर युवाओं को सहारा देंगे,उनकी बात सुनेंगे और उन्हें आशा का मार्ग दिखाएंगे, तब ही हम इस गंभीर सामाजिक संकट को कम कर पाएंगे। जीवन अनमोल है, और हर युवा का जीवन केवल उसका नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज की अमूल्य धरोहर है।
इस लिए हमें यह सुनि श्चित करना होगा कि कोई भी युवा अकेला, असहाय और निराश महसूस न करे।
आत्महत्या करने के पहले जेड जेन सोचें माता-पिता,पत्नी छोटे बच्चों को कितना कष्टदायक अति दुखी छोड़ कर जा रहे हैं? क्या ईश्वर अल्लाह उन्हें क्षमा करेंगे? नरक यानें जहन्नुम में इसकी सजा भुगतेंगे? तो वें आत्महत्या कर नहीं पाएंगे
