एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारत में राष्ट्रबोध केवल भूगोल या सत्ता से नहीं, बल्कि प्रतीकों, भावनाओं और सांस्कृतिक चेतना से निर्मित होता है। वंदे मातरम ऐसा ही एक गीत है, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को शब्द दिए भावनाओं को स्वर दिया और जनमानस को एक सूत्र में बांधा। वर्ष 2026 में, जब भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है और वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर केंद्र सरकार साल-भर उत्सव आयो जित कर रही है, तब यह प्रश्न फिर से केंद्र में आ गया है कि क्या राष्ट्रीय गीत वंदे मात रम को भी राष्ट्रगान जन गण मन जैसा औपचारिक दर्जा और प्रोटोकाल मिलना चाहिए।वंदे मातरम केवल गीत नहीं, स्व तंत्रता संग्राम की आत्मा -वंदे मातरम की रचना 1870 के दशक में बंकिम चंद्र चट्टोपा ध्याय ने की थी। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह गीत केवल साहित् ियक कृति नहीं था, बल्कि औप निवेशिक दमन के दौर में उभ रती राष्ट्रीय चेतना का घोष था। 1905 से 1908 के स्व देशी आंदोलन के दौरान यह गीत नारे में बदल गया।
ब्रिटिश सत्ता को यह गीत इतना असहज करता था कि कई स्थानों पर इसके गायन पर प्रतिबंध लगाया गया। इस प्रकार वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा बन गया, जिसने लाखों भारतीयों को त्याग, बलिदान और संघर्ष के लिए प्रेरित किया। संविधान में राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत का अंतर- भारतीय संविधान ने राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत के बीच एक स्पष्ट भेद स्थापित किया है। जन गण मन को आधिकारिक रूप से राष्ट्रगान का दर्जा प्राप्त है, जबकि वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 51ए(ए) के तहत नागरिकों पर राष्ट्र गान का सम्मान करना एक मौलिक कर्तव्य है।
इसके पाठ, अवधि, प्रस्तुति और सम्मान से जुड़े नियम गृह मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी किए गए हैं। इसके विपरीत, वंदे मातरम को लेकर न तो संविधान में स्पष्ट प्राव धान हैं और न ही इसके गायन या सम्मान से जुड़े कोई बा ध्यकारी कानूनी नियम।
सरकार की नई तैयारी और हाई-लेवल बैठक-हालिया मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गृह मंत्रालय ने एक हाई- लेवल बैठक बुलाई, जिसमें वंदे मात रम को राष्ट्रगान जैसा दर्जा देने की संभावनाओं पर विचार किया गया। इस बैठक में यह चर्चा हुई कि क्या वंदे मातरम के गायन के लिए भी कोई तय नियम, आचार संहिता या प्रोटो काल होना चाहिए। बैठक में यह भी विचार किया गया कि क्या इस गीत के गायन के समय खड़ा होना अनिवार्य किया जाए और क्या इसके अपमान पर सटीक दंडात्मक प्रावधान बनाए जाएं।
साथियों बात अगर हम 1971 का अधिनियम और उसकी सीमाओं को समझने की करें तो, राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनि यम,1971 राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान के प्रति अनादर को रोकने के लिए बनाया गया था। इस कानून के तहत राष्ट्रगान के गायन में बाधा डालना या उसका अपमान करना दंडनीय अपराद्द है। हालांकि, इस अधिनियम में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के लिए कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं है। यही कारण है कि वर्षों से यह बहस चल रही है कि क्या इस कानून के दायरे को बढ़ाकर राष्ट्रीय गीत को भी शामिल किया जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में याचि काएं दायर की गई हैं, जिनमें मांग की गई है कि राष्ट्रीय गीत के गायन के लिए एक स्पष्ट ढांचा तैयार किया जाए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है, तो उस के सम्मान और अपमान को लेकर भी कानूनी स्पष्टता होनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर, कुछ याचिकाओं में यह चिंता भी जताई गई है कि अनिवार्यता थोपना व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक विविधता के सिद्धांतों से टकरा सकता है।
साथियों बात अगर हम खड़ा होना- सम्मान या बा ध्यता? इसको समझने की करें तो, राष्ट्रगान के समय खड़ा होना कानूनी और सामा जिक रूप से स्थापित मानक है। इसके पीछे तर्क यह है कि राष्ट्रगान संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। लेकिन वंदे मातरम के मामले में स्थिति भिन्न है। ऐतिहासिक रूप से, इस गीत के कुछ शब्दों को लेकर धार्मिक आपत्तियां भी उठती रही हैं, विशेषकर कुछ अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा। इसी कारण संविधान सभा ने भी इसे राष्ट्रगान के बराबर कानूनी दर्जा नहीं दिया था। अब यदि खड़ा होना अनिवार्य किया जाता है, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह स्वैच्छिक सम्मान से अधिक बाध्यकारी राष्ट्रवाद को जन्म देगा?
साथियों बात अगर हम राजनीतिक और वैचारिक आया म के दृष्टिकोण से समझने की करें तो सत्ताधारी पार्टी का कहना है कि यह पहल वंदे मातरम के सम्मान को बढ़ाने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का प्रयास है। पार्टी इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखती है।
वहीं विपक्षी दलों और कुछ नागरिक समूहों का आरोप है कि यह कदम भावनात्मक मुद्दों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने जैसा है। उन का तर्क है कि राष्ट्रभक्ति कानून से नहीं, भावना से आती है।
साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय दृष्टि कोण- प्रतीक और स्वतंत्रता के एंगल से समझने की करें तो, दुनियाँ के कई लोकतांत्रिक देशों में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के नियम मौजूद हैं, लेकिन वहां भी व्यक्तिगत स्व तंत्रता का ध्यान रखा जाता है। अमेरिका में राष्ट्रगान के समय खड़े होना सामाजिक परंपरा है, कानूनी बाध्यता नहीं। यूरोपीय देशों में भी सम्मान की अपेक्षा की जाती है, लेकिन दंडात्मक प्रावधान सीमित हैं। भारत यदि वंदे मातरम के लिए सख्त कानूनी नियम बना ता है, तो यह वैश्विक लोकतांत्रि क मानकों के साथ संतुलन का प्रश्न खड़ा करेगा। यह पूरी बहस संविधान और सांस् कृतिक भावना के बीच संतुलन की है। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, वहीं राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान राष्ट्र की गरिमा से जुड़ा है। वंदे मातरम भावना त्मक रूप से अत्यंत शक्तिशाली गीत है, लेकिन उसे कानूनी अनिवार्यता में बदलना संवेदन शील कदम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को दंडात्मक कानून बनाने के बजाय स्पष्ट दिशा- निर्देश जारी करने चाहिए। जैसे किन अवसरों पर वंदे मातरम गाया जाए, उसके दौरान सम्मानज नक आचरण क्या हो, और किस प्रकार इसे राष्ट्रगान के समा नांतर सम्मान दिया जाए, बिना इसे बाध्यता बनाए। इससे सम्मान भी बढ़ेगा और विवाद भी कम होंगे। 26 जनवरी 2026 की थीम वंदे मातरम रखना प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यह भारत की ऐतिहासिक स्मृति और आधुनिक राष्ट्र-राज्य के बीच सेतु बनाता है। यदि सरकार इस अवसर को संवाद, सह मति और संवैधानिक मूल्यों के साथ जोड़ती है, तो वंदे मातरम न केवल एक गीत, बल्कि राष्ट्रीय एकता का साझा प्रतीक बन सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा प्रोटोकॉल देने की बहस केवल कानूनी नहीं, बल्कि भावनात्मक, ऐतिहासिक और वैचारिक है। यह प्रश्न केवल खड़ा होने या न होने का नहीं, बल्कि इस बात का है कि भारत अपने राष्ट्रवाद को कैसे परिभाषित करता है, अनिवार्यता से या स्वैच्छिक सम्मान से।
यदि यह संतुलन साधा गया, तो वंदे मातरम अपनी ऐतिहासिक गरिमा को बनाए रखते हुए आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक आत्मा का प्रतीक बन सकता है।
वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा प्रोटोकाल देने की बहस केवल कानूनी नहीं, बल्कि भावनात्मक, ऐतिहासिक और वैचारिक है- परंपरा, संविधान और आधुनिक भारत की नई बहस?
