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12 फरवरी को मनाई जायेगी महर्षि दयानद की जयंती-प्रधान चंद्र कांत आर्य

(करण मूवाल) नरवाना। आधुनिक भारत के महान चिंतक, समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती की जयंती 12 फरवरी को पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जा रही है।
महर्षि दयानंद, जिनका मूल नाम मूलशंकर था, ने समाज को “वेदों की ओर लौटो” का अमर संदेश दिया और तर्क, समानता व नैतिकता पर आद्दा रित समाज की स्थापना का आह्वान किया। इसी कड़ी में नरवाना स्थित आर्य समाज के प्रांगण में आर्य वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में 12 फरवरी 2026 को आर्य समाज नरवाना के प्रांगण में महर्षि दयानंद। इस कार्यक्रम का आयोजन आर्य समाज नरवाना के यशस्वी प्रधान चंद्र कांत आर्य के नेतृत्व में किया जा रहा है। प्रधान चंद्र कांत आर्य, सम्बन्धित आर्य प्रतिनिधि सभा रोहतक ने कहा की आर्य समाज नरवाना के अंतर्गत संचालित तीनों शिक्षण संस्थानोंकृआर्य वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, आर्य कन्या महाविद्यालय तथा महर्षि दयानंद पब्लिक स्कूल के छात्र-छात्राएं सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों द्वारा देशभक्ति गीत, महर्षि दयानंद सरस्वती के जीवन एवं विचारों पर आधारित भजन गायन, नाटक, डाक्यूमेंट्री प्रस्तुति तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी प्रतिभा का अद्भुत प्रदर्शन किया जा रहा है।
प्रधान चंद्र कांत आर्य का कहना है की महर्षि दयानंद के वेदों की ओर लौटो, समानता, तर्कशीलता और नैतिक सुधार जैसे विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का संदेश इस महृषि दयानद सरस्वती के जन्मदिवस के माध्यम से दिया जा रहा है और बच्चो की वार्षिक परीक्षा नजदीक है और उनकी पढ़ाई पर प्रतिकूल असर ना पड़े इस बात का भी विशेष ख्याल रखा जा रहा है। और प्रधान चंद्र कांत आर्य ने कहा महर्षि दयानद सरस्वती का योगदान अमिट है, और महर्षि दयानंद सरस्वती का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आज देशभर में उनके जन्म दिवस को न केवल श्रद्धा से मनाया जा रहा है, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का संकल्प भी लिया जा रहा है। प्रधान चंद्र कांत आर्य ने दयानद सरस्वती का जन्म मनाने का उद्देश्य बताते हुए कहा की महर्षि दयानंद सरस्वती, आर्य समाज के संस्थापक, वैदिक संस्कृति के महान पुनरुद्धारक और सामाजिक कुरीतियों के प्रखर विरोधी थे। उन्होंने “वेदों की ओर लौटो” का संदेश देकर समाज को अंद्द विश्वास, पाखंड और कुप्रथाओं से मुक्त करने का प्रयास किया। आधुनिक भारत में महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म दिवस मनाने का प्रमुख उद्देश्य उनके सुधारवादी विचारों को जन-जन तक पहुँचाना है। उन्होंने नारी शिक्षा, विधवा विवाह, जाति भेद की समाप्ति और समानता पर बल दिया जो आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा की महर्षि दयानंद का मानना था कि सच्ची शिक्षा वही है जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर, चरित्रवान और राष्ट्रभक्त बनाए। इसी सोच से प्रेरित होकर उन्होंने गुरुकुल पद्धति और वैदिक शिक्षा को बढ़ावा दिया, जिससे भारत में शिक्षा के क्षेत्र में एक नई चेतना का संचार हुआ। उनकी शिक्षाएँ आज के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो सत्य, साहस, अनुशासन और राष्ट्र सेवा का मार्ग दिखाती हैं। जन्म दिवस के अवसर पर आयोजित यज्ञ, विचार गोष्ठियाँ और प्रभात फेरियाँ उनके विचारों के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम बन रही हैं।

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