एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर मानव सभ्यता ने हजारों वर्षों में जिन मूल्यों, सामाजिक रिश्तों और विश्वास की संरचनाओं को गढ़ा है, वे आज डिजिटल तक नीक की अभूतपूर्व गति से चुनौती का सामना कर रहे हैं। सोशल मीडिया और आन लाइन गेमिंग ने संवाद, मनो रंजन और सूचना के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। यह परिवर्तन अपने आप में न तो पूरी तरह नकारात्मक है और न ही पूर्णतः सकारात्मक, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब समाज, विशेष कर बच्चे इस परिवर्तन के मनो वैज्ञानिक, नैतिक और सामा जिक प्रभावों के लिए तैयार नहीं होते। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि भारत जैसे देश में, जहां आ ध्यात्मिक परंपरा, पारिवारिक मूल्य और सामाजिक सहभा गिता जीवन की आत्मा रहे हैं, वहां डिजिटल प्लेटफॉर्म का अनियंत्रित प्रभाव एक गंभीर चेतावनी के रूप में उभर रहा है। सामाजिक सद्भाव, विश् वास और सोशल मीडिया की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन कर ना बहुत जरूरी है, भारतीय समाज की विशेषता उसका सामाजिक ताना-बाना है,जो केवल कानून या संस्थाओं से नहीं बल्कि आपसी विश्वास, परंपराओं और सामूहिक चेतना से बना है। सोशल मीडिया ने इस ताने-बाने को एक ओर जोड़ने का माध्यम दिया है, वहीं दूसरी ओर गलत सूच ना, घृणा, तुलना और आभासी प्रतिस्पर्धा के जरिए इसे कम जोर भी किया है। नवीनतम आर्थिक सर्वे द्वारा सोशल मीडिया के सामाजिक प्रभावों पर चिंता जताना इस बात का संकेत है कि अब यह विषय केवल नैतिक बहस का नहीं, बल्कि नीति और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि हर समा धान केवल सरकारी नीतियों से नहीं आ सकता। समाज, शैक्षणिक संस्थान, सिविल सो सायटी और सबसे बढ़कर माता -पिता की भूमिका यहां निर्णा यक बन जाती है।
सरकार नियंत्रण और दिशा दे सकती है, लेकिन बच्चों के दैनिक जीवन में डिजिटल संतुलन लाने की जिम्मेदारी सामूहिक प्रयास से ही निभाई जा सकती है।
साथियों बात अगर हम गाजियाबाद घटना के बाद भारत में सोशल मीडिया का बच्चों के लिए बैन पर विचार करने की करें तो, मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार आर्थिक सर्वे में बच्चों पर डिजि टल प्रदूषण पर चिंता जताए जाने के बाद से यह मुद्दा विचा रणीय था लेकिन गाजियाबाद में सोशल मीडिया लत व आानलाइन गेमिंग के कारण तीन सगी बहनों की आत्महत्या को देश के नीति निर्माताओं की चर्चा का ट्रिगर पाॅइंट माना जा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण -26 में डिजिटल प्लेटफार्म्स के बढ़ते प्रभाव और युवाओं की मानसिक सेहत पर उसके असर को लेकर चिंता जताते हुए बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल इकोसिस्टम बनाने की दिशा में ठोस नीति बनाने का सुझाव दिया गया था। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी (आइ टी) सचिव ने कहा है कि सो शल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु सीमा तय करने का मुद्दा सरकार की समीक्षा के दायरे में है। बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव को देखते हुए सरकार विभिन्न हितधारकों से परामर्श कर रही है और उचित समय पर इस बारे में निर्णय किया जाएगा। साथियों बात अगर हम आनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया मनोरंजन से मानसिक दबाव तक की यात्रा को समझने की करें तो, आज का बच्चा एक ऐसे डिजिटल परिवेश में बड़ा हो रहा है जहां स्क्रीन उसकी पहली खिड़की बन चुकी है। आनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया अब के वल समय बिताने का साधन नहीं रहे, बल्कि वे बच्चों की सोच, भावनाओं और आत्म- छवि को आकार देने लगे हैं। टास्क- आधारित गेम्स बच्चों को लगातार नए लक्ष्य देते हैं, लेवल पूरा करो, चुनौती स्वी कार करो, आगे बढ़ो और यह प्रक्रिया धीरे-धीरे दबाव में बदल जाती है। कई बार इन चुनौतियों की प्रकृति भाव नात्मक रूप से असुरक्षित होती है, जहां हार का डर, असफलता की शर्म और आभासी दुनिया की स्वीकृति वास्तविक जीवन से अधिक महत्वपूर्ण लगने लग ती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चा आभासी दुनि या को वास्तविक जीवन के समकक्ष या उससे अधिक वास्त विक समझने लगता है, तब मानसिक जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। आत्म-सम्मान, धैर्य और भावनात्मक संतुलन पर इसका गहरा असर पड़ता है। साथियों बात अगर हम आस्ट्रेलिया का उदाहरण- वैश् िवक बहस की शुरुआत को समझने की करें तो,इसी खतरे को गंभीरता से समझते हुए आस्ट्रेलिया ने दो माह पहले एक ऐतिहासिक कदम उठाया। 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए टिकटाॅक, एक्स, फेस बुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, स्नैप चैट और थ्रेड्स जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर प्रतिबंध लगाया गया। न केवल नए खाते बनाने पर रोक लगी, बल्कि मौजूदा प्रोफाइल भी निष्क्रिय कर दी गईं। यह कदम अपनी तरह का पहला था और उसने पूरी दुनिया में एक नई बहस को जन्म दिया, क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए डिजिटल स्वतंत्रता को सीमित करना जरूरी हो गया है? यह निर्णय केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अन्य देश इस मॉडल को बारीकी से देख रहे हैं और अपने-अपने सामाजिक संदर्भ में इसके निहितार्थों का आक लन कर रहे हैं।
साथियों बात अगर हम भारत में बढ़ती डिजिटल लत और सुरक्षा चिंताओं को सम झने की करें तो, भारत में भी हाल के वर्षों में बच्चों में डिजि टल एडिक्शन के मामले तेजी से बढ़े हैं। गाजियाबाद और भोपाल जैसी घटनाओं ने समाज को झकझोर दिया है, जहां आनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया की लत ने मासूम जिंद गियों पर गंभीर असर डाला। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाली पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभा वित करेगा। हालांकि केंद्रीय आईटी मंत्रालय की ओर से अभी कोई आधिकारिक आदेश नहीं आया है, लेकिन 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या सख्त नियम बनाने पर गंभीर मंथन चल रहा है। यह बहस केवल तक नीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के भविष्य, समाज की स्थिरता और राष्ट्रीय मानव पूंजी से जुड़ा प्रश्न है।
साथियों बात अगर हम क्या आनलाइन गेमिंग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभा वित कर रही है? इसको सम झने की करें तो, लगातार स्क्रीन टाइम बच्चों में अकेलापन, चिड़ चिड़ापन तनाव और अवसाद को बढ़ा सकता है। कई अध्य यन बताते हैं कि डिजिटल एडिक्शन बच्चों के व्यवहार और भावनात्मक संतुलन को कम जोर करता है। जब गेमिंग टास्क बच्चों पर लगातार दबाव डालते हैं, जीतने की मजबूरी, हार का डर और सामाजिक तुलना, तो वे मानसिक रूप से टूट सकते हैं। यह स्थिति धीरे-धीरे आत्म-विश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव में बदल जाती है।
साथियों बात अगर हम सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी – मुनाफा बनाम नैतिकता को समझने की करें तो, सोशल मीडिया और गेमिंग कंपनियां एल्गोरिदम के जरिए उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक प्लेटफार्म पर बनाए रखने का प्रयास करती हैं। इससे उनका आर्थिक लाभ बढ़ता है, लेकिन बच्चों के संदर्भ में यह रणनीति खतर नाक साबित हो सकती है। आयु सत्यापन, कंटेंट फिल्टर और बच्चों के लिए अलग सुरक्षा ढांचे की कमी इस समस्या को और गहरा करती है।
विशेषज्ञों का मत है कि कंपनियों को केवल मुनाफे के बजाय सामाजिक जिम्मेदारी को भी अपने व्यापार माडल का हिस्सा बनाना चाहिए।
साथियों बात अगर हम माता-पिता की भूमिका- पह ली और सबसे मजबूत सुरक्षा दीवार तथा बैन या नियमनरू इसको समझने की करें तो समाधान की जटिलता, पूर्ण प्रतिबंध एक सरल उत्तर प्रतीत हो सकता है, लेकिन व्यवहार में यह जटिल है। तकनीक को पूरी तरह रोकना न तो संभव है और न ही व्यावहारिक। हालांकि, सख्त नियम, समय सीमा, आयु- आधारित एक्सेस और कंटेंट माॅडरेशन जैसे उपाय प्रभावी हो सकते हैं। कई देशों ने बच्चों के लिए डिजिटल प्लेटफार्म पर विशेष नियम बनाए हैं। भारत में भी अब इस दिशा में मांग तेज हो रही है कि बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। माता-पिता बच्चों को इस खतरे से बचाने में केंद्रीय भूमिका निभा सकते हैं। बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखना, स्क्रीन टाइम सीमित करना और सबसे मह त्वपूर्ण खुलकर संवाद करना, आज की आवश्यकता है।
भावनात्मक समर्थन और भरोसे का वातावरण बच्चों को आभासी दबाव से बाहर निकाल सकता है। डिजिटल उपकरणों को पूरी तरह बच्चों के भरोसे छोड़ देना जोखिम भरा हो सकता है।
स्कूल और समाज- सामूहिक समाधान की दिशा में, स्कूलों में डिजिटल एडिक् शन पर काउंसलिंग और जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। बच्चों को खेल, कला, संगीत और सामा जिक गतिविधियों से जोड़ना डिजिटल संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।
समाज को भी यह समझना होगा कि यह केवल व्यक्तिगत सम स्या नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि संतुलन ही समाधा न है, डिजिटल युग को नका रा नहीं जा सकता, लेकिन उसे विवेक और संवेदन शीलता के साथ अपनाया जा सकता है। बच्चों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक विका स को प्राथमिकता देना सरका र, उद्योग परिवार और समाज, सभी की साझा जिम्मेदारी है। सवाल यह नहीं है कि तकनीक रहे या न रहे, बल्कि यह है कि तकनीक किसके नियंत्रण में और किस उद्देश्य से रहे। यदि आज संतुलित और साहसी निर्णय नहीं लिए गए, तो कल इसकी कीमत आने वाली पीढ़ि यों को चुकानी पड़ सकती है।
