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दो दशकों में क्यों सबसे अलग रहा महानगर पालिकाओं का ये चुनाव, चला फडणवीस-शिंदे का जादू

बीएमसी सहित राज्य की 29 महानगर पालिकाओं का चुनाव कई मायनों में पिछले दो दशक में हुए चुनावों में सबसे अलग रहा। बीएमसी चुनाव में ढाई दशक की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के लिए जहां 20 साल बाद शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे साथ आए।

(राजेश कुमार वर्मा)
बीएमसी चुनावों में भाजपा -शिव सेना गठबंधन विजयी रहा है, जिससे एशिया के सबसे धनी नगर निकाय पर ठाकरे परिवार का लंबे समय से चला आ रहा वर्चस्व समाप्त हो गया है। इसके परिणाम स्वरूप, मुंबई को लंबे अंतराल के बाद भाजपा-शिव सेना (शिंदे गुट) का महापौर मिलने वाला है। मुंबई नगर निकाय में भाजपा के ऐतिहासिक प्रद र्शन के बाद, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस चर्चा का विषय बन गए हैं। उनके नेतृत्व में, भाजपा ने 2017 में हासिल की गई अपनी पिछली सर्वोच्च 82 सीटों की संख्या को पार कर लिया है और अब तक बीएमसी के 227 वार्डों में से 88 में जीत हासिल की है या आगे चल रही है। मुंबई में उसकी सहयोगी शिवसेना 28 सीटों पर आगे है, जिससे गठबंधन 114 सीटों के बहुमत के पार आराम से पहुंच गया है। नगर निकाय में भाजपा का लगभग एकदलीय दबदबा इस बात को भी रेखांकित करता है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, पार्टी की कमान संभालने के बाद से शिवसेना के गढ़ में उसके पारंपरिक आधार को बनाए रखने के लिए कितना संघर्ष कर रहे हैं। 2017 में अविभाजित शिव सेना के 84 पार्षदों में से अद्दिकांश शिंदे के साथ होने के बावजूद, उनका गुट मुश् िकल से 30 सीटों का आंकड़ा पार कर पाया है।
बीएमसी सहित राज्य की 29 महानगर पालिकाओं का चुनाव कई मायनों में पिछले दो दशक में हुए चुनावों में सबसे अलग रहा। बीएमसी चुनाव में ढाई दशक की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के लिए जहां 20 साल बाद शिव सेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे साथ आए।
वहीं, सत्ता के लिए धुर विरोधी एआईएमआईएम और बीजेपी का गठबंधन भी हुआ, जबकि विचारधारा को त्याग कर कांग्रेस और बीजेपी ने हाथ मिलाने की खबरों ने भी खूब सुर्खियां बटोरी। वहीं, सत्ताधारी बीजेपी, शिंदे सेना और एनसीपी अजित पवार गुट ने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा और आरोप-प्रत्या रोप लगाए। जबकि 2023 में पार्टी पर कब्जा करने वाले उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने चाचा शरद पवार की एनसीपी के साथ गठबंधन कर पुणे महा नगरपालिका का चुनाव लड़ा। चुनाव प्रचार में भी राजनी तिक दलों और उम्मीदवारों ने काफी अलग-अलग तरीके अपनाए। इस चुनाव में डिजि टल प्रचार पर काफी जोर दिया गया।
महाराष्ट्र के अकोट में एमआईएम और बीजेपी का गठबंधन सबसे अप्रत्याशित घटना रही। हालांकि कुछ ही घंटों में यह गठबंधन टूट गया। लेकिन इससे बीजेपी की काफी किरकिरी हुई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को स्थानीय नेताओं को स्पष्ट निर्देश देना पड़ा कि यह गठ बंधन स्वीकार्य नहीं है। फडण वीस ने कहा कि अनुशासन हीनता करने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बीजेपी ने इस मामले में स्था नीय विधायक प्रकाश भारखा सले को कारण बताओ नोटिस भी दिया है। अंबरनाथ में बीजेपी – कांग्रेस एक संगः अंबरनाथ में सत्ता के लिए कांग्रेस और बीजेपी के बेमेल गठबंधन की पूरे चुनाव में चर्चा रही। इसके लिए बीजेपी को आलोचना का भी सामना करना पड़ा। अंबरनाथ नगर परिषद में बीजेपी और कांग्रेस के हाथ मिला लेने से सियासी गलियारों में हलचल मच गई थी। हालांकि यह गठबंधन भी कुछ ही घंटों में टूट गया और निकाले गए 12 पार्षद बीजेपी में शामिल हो गए। जबकि उपनगराध्यक्ष पद के चुनाव में शिंदे सेना ने अजित पवार की एनसीपी से मिलकर बीजेपी उम्मीदवार को मात दे दी।
सत्ताधारी बीजेपी, शिंदे सेना और अजित पवार की एनसीपी ने राज्य की 29 महा नगर पालिकाओं में से कई महानगर पालिकाओं में एक- दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा। मुंबई, ठाणे, कल्याण-डोबिवली, वसई-विरार, भिवंडी, पनवेल में जहां बीजेपी और शिंदे सेना ने मिलकर चुनाव लड़ा। वहीं नवी मुंबई, मीरा-भाईंदर और उल्हास नगर में दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़े। जब कि अजित पवार की एनसीपी ने महायुति से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ा। पुणे, पिंपरी -चिंचवड़ में अजित और शरद पवार ने साथ में चुनाव लड़ा।

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