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दुनिया की नजरें भारत पर, बिर्क 2026 से वैश्विक व्यापार में नई क्रांति की उम्मीद -चावल-चीनी के बाजार में उथल-पुथल, एथेनाल पर बड़ा नीतिगत बदलाव और क्या बदल जाएगा दुनिया के खाद्य कारोबार का पूरा खेल

आम आदमी की थाली पर महंगाई का वार, चीनी पर सरकार की नई चाल, बिर्क 2026 में जुटेगी दुनिया – किसके हाथ लगेगा चावल के अरबों के कारोबार का मौका – क्या तीन दिनों में खुलेंगे वैश्विक खाद्य बाजार के नए रास्ते?
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर दुनिया के हर देश की अर्थव्यवस्था में खाद्य महंगाई, जलवायु परि वर्तन, परिवहन लागत और अंत र राष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं की अनिश्चितता ने सरकारों से लेकर व्यापारिक संस्थानों तक की चिंता बढ़ा दी है।
चावल और चीनी जैसे रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सीधे आम परिवारों के बजट पर पड़ता है। मैं एडवो केट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि इसी बीच भारत 23,24 और 25 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम, प्रगति मैदान में भारत इंटरनेशनल राइस कान्फ्रेंस (बिर्क 2026) के दूसरे संस्करण की मेजबानी करने जा रहा है। यह आयोजन केवल चावल की प्रदर्शनी नहीं बल्कि कृषि, खाद्य सुरक्षा, निर्यात, तकनीक, बैंकिंग, लाजिस्टिक्स और वैश्वि क व्यापार के परस्पर संबंधों को समझने का महत्वपूर्ण मंच है आधिकारिक सम्मेलन वेबसा इट के अनुसार, इसमें 120 से अधिक देशों की भागीदारी और 30,000 से अधिक प्रति भागियों को आकर्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।
साथियों बात अगर हम चावल की महंगाई – कीमतों में आग के पीछे कौन-से कारण इसको समझने की करें तो भारत में चावल की कीमतों का विश्लेषण करते समय स बसे पहले यह समझना आव श्यक है कि सभी किस्मों के भाव एक समान नहीं होते।
बासमती, सामान्य गैर- बासमती सोना मसूरी, पोन्नी, महीन और सुपर-फाइन चा वल की कीमतें उनकी गुणव त्ता, उत्पादन क्षेत्र, मांग, ब्रांड, पैकेजिंग और परिवहन लागत के अनुसार अलग- अलग रह ती हैं। दक्षिण भारत के कुछ बाजारों में 25 किलोग्राम की चावल की बोरी के 1,450 रूपए से बढ़कर 1,850- 2,000 रूपए तक पहुंचने तथा चेन्नई में कुछ विशेष किस्मों के भाव बढ़ने के आंकड़े बाजार संबंद्दी दावों के रूप में सामने आए हैं। हालांकि, इन सभी आंकड़ों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं होने के कारण इन्हें पूरे देश में लागू मूल्यवृद्धि नहीं माना जाना चाहिए।यदि किसी बोरी की कीमत 1,450 रूपए से बढ़कर 1,850 रूपए होती है, तो वृद्धि लगभग 27.6 प्रतिशत बैठती है, 2,000 रूपए होने पर यह लगभग 37.9 प्रतिशत होगी। इसलिए किसी विशेष किस्म या बाजार में हुई तेजी को बिना व्यापक मूल्य-आंकड़ों के देशभर में चावल के दाम 50 प्रतिशत बढ़ जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कीमतों में तेजी के संभावित कारणों में फसल की उत्पादकता मानसून और वर्षा का असमान वितरण, कीटों का प्रभाव, त्योहारी मांग, भंडा रण, मिलिंग लागत तथा परि वहन शामिल हैं। अल- नीनो जैसी जलवायु परिस्थितियों का संभावित प्रभाव भी कृषि उत्पादन के आकलन में महत्व पूर्ण हो सकता है, लेकिन किसी एक मौसम घटना को कीमतों में वृद्धि का निश्चित कारण बताने के लिए कृषि उत्पादन के आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत होती है। इसी प्रकार, जमाखोरी की आशंका की जांच वास्तविक स्टाक, थोक – खुदरा मूल्य अंतर और बा जार निरीक्षण के आधार पर होनी चाहिए। मीडिया के आंक ड़ों में उपलब्ध कराई गई जानकारी में सरकार के पास लगभग 38 मिलियन टन चावल और निर्धारित बफर मानक करीब 10 मिलियन टन होने का उल्लेख है। अंतरराष् ट्रीय बाजार के संदर्भ में भार तीय व्हाइट राइस का लगभग 385 डालर प्रति टन और वैश्विक भाव 420 डॉलर प्रति टन होने का दावा भी प्रस्तुत किया गया है। यदि दोनों कीमतें समान गुणवत्ता, समान व्यापारिक शर्तों और समान अवधि पर आधारित हों, तो भारतीय भाव लगभग 8.3 प्रतिशत कम बैठता है। लेकिन अलग- अलग किस्मों, गुणवत्ता और निर्यात शर्तों के भावों की सीधी तुलना से बचना चाहिए।
साथियों बात अगर हम चीनी की कीमतों पर बड़ा फैसला 19 अक्टूबर की एथे नाल नीति क्यों महत्वपूर्ण? इसको समझने की करें तो, चावल के साथ चीनी बाजार भी इस समय आर्थिक चर्चा के केंद्र में है। 19 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार ने 2026-27 आपूर्ति वर्ष के लिए तेल विप णन कंपनियों की एथेनॉल खरीद में गन्ने के रस,शुगर सिरप और बी-हेवी शीरे से बने एथेनॉल को शामिल नहीं करने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य घरेलू चीनी की उपलब्धता को सुरक्षित रखना और कीमतों पर दबाव कम करना है। यह बदलाव ऐसे समय आया है, जब कमजोर वर्षा, आगामी पेराई सत्र और त्योहारों की मांग को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। इस निर्णय का सीधा आर्थिक तर्क यह है कि यदि गन्ने से प्राप्त चीनी-युक्त कच्चे माल का उपयोग एथेनाल बनाने के बजाय चीनी उत्पादन के लिए किया जाता है, तो घरेलू बाजार के लिए उपलब्ध चीनी की मात्रा बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, कीमतों में वास्तविक गिरावट उत्पा दन, शुरुआती स्टाक, घरेलू खपत, मिलों कीपरिचालन स्थिति और वितरण पर निर्भर करेगी। इस फैसले का दूसरा पहलू चीनी मिलों का कारो बार है। जिन मिलों ने एथेनाल उत्पादन के लिए निवेश किया है, उन्हें अपने कच्चे माल के उपयोग और राजस्व की रण नीति में बदलाव करना पड़ सकता है। अनाज आधारित एथेनॉल की मांग भी प्रभावित हो सकती है, लेकिन उसका वास्तविक प्रभाव खरीद मूल्य, सरकारी प्रोत्साहन, उपलब्ध मक्का और चावल तथा संबं धित नीतियों पर निर्भर करेगा। अतः इस फैसले को चीनी उपभोक्ताओं के लिए संभावित राहत और मिलों के लिए नई व्यावसायिक चुनौती दोनों दृष्टियों से देखना चाहिए। चीनी के भाव में तेजी के पीछे कमजोर उत्पादन की आशंका, शुरुआती स्टाक, त्योहारी मांग, गन्ना पेराई में देरी और एथे नाल के लिए कच्चे माल के उपयोग जैसे कारक हो सकते हैं। दूसरी ओर, समय पर पेराई शुरू होने और पर्याप्त चीनी बाजार में पहुंचने से कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
साथियों बात अगर हम बिर्क 2026-भारत के चावल उद्योग का वैश्विक शक्ति-प्रद र्शन को समझने की करें तो भारत दुनियाँ के प्रमुख चावल उत्पादकों में शामिल होने के साथ वैश्विक चावल निर्यात में भी अग्रणी स्थान रखता है। ऐसे में बिर्क 2026 का महत्व केवल व्यापारिक बैठकों तक सीमित नहीं है। भारतीय चावल निर्यातकों को नए देशों के खरीदारों से संपर्क स्थापित करने, गुणवत्ता मानकों को समझने, बाजार विविधीकरण करने और दीर्घकालीन व्यापा रिक साझेदारियां बनाने का अवसर मिल सकता है।
आयोजन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, सम्मेल न 23-25 अक्टूबर को भारत मंडपम के हाल 4 और 5 में आयोजित होगा। इसके आयो जक के रूप में इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन का उल् लेख है और आयोजन से एपी ईडीए की संस्थागत भागीदारी भी जुड़ी है।
सम्मेलन की रूपरेखा में निर्यातक, आयातक, राइस मि लर्स, प्रसंस्करण कंपनियां, कृषि वैज्ञानिक, तकनीक प्रदाता, सरकारी एजेंसियां और वि त्तीय संस्थान शामिल हैं। इस आयोजन के पहले दिन नीति, खाद्य सुरक्षा और ज्ञान- विमर्श, दूसरे दिन व्यापारिक संपर्क और खरीदार-विक्रेता बैठकें तथा तीसरे दिन नवा चार भविष्य की तकनीक और उपभोक्ता-केंद्रित गतिविधियों पर जोर रहने की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। विस्तृत कार्य क्रम में सत्रों के समय और विषयों की पुष्टि सटिका से आयोजन के आधिकारिक एजेंडे से की जानी चाहिए।
साथियों बात अगर हम बी 2 बी और बी 2 सी – का रोबार से उपभोक्ता तक जुड़ने की दो महत्वपूर्ण कड़ियों को समझने की करें तो,बी2बी का पूरा नाम बिजनेस-टू -बिज नेस है। इसका अर्थ है एक व्यवसाय का दूसरे व्यवसाय के साथ व्यापार करना।
उदाहरण के लिए, भारतीय चावल निर्यातक का किसी विदेशी आयातक से बड़े आर्डर पर समझौता, राइस मिल का पैकेजिंग कंपनी से अनुबंध, अथवा निर्यातक का बैंक और लॉजिस्टिक्स कंपनी के साथ वित्तपोषण तथा माल ढुलाई की व्यवस्था करना बी 2 बी गतिविधियां हैं। बिर्क जैसी कॉन्फ्रेंस में बी 2बी बैठकों से खरीदार और विक्रेता एक- दूसरे की जरूरतों, गुणवत्ता मानकों, कीमतों, भुगतान शर्तों, डिलीवरी समय और संभावित ऑर्डर पर बातचीत कर सकते हैं। इससे नए बाजारों तक पहुंचने, व्यापारिक जोखिम समझने और दीर्घकालीन अनुबंध बनाने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, बैठक होना अपने-आप में आर्डर या निर्यात सौदे की गारंटी नहीं है। इसके विपरीत, बी 2 सी का अर्थ बिजनेस-टू -कंस्यूमर है अर्थात व्यवसाय का सीधे अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचना। यदि सम्मेलन के तीसरे दिन प्रस्तावित राइस फेस्टिवल में आम लोग चावल की विभिन्न किस्मों, चावल आधारित खाद्य उत्पादों और नई तकनीकों को देख सकें, तो इससे उपभोक्ताओं की पसंद समझने, ब्रांड पहचान बढ़ाने और नए उत्पादों के प्रति जाग रूकता पैदा करने में मदद मिलेगी। 200 से अधिक किस् मों को प्रदर्शित करने का दावा आयोजन की आधिकारिक पुष्टि के अधीन समझा जाना चाहिए।
साथियों बात अगर हम बैंकिंग पैकेजिंग, बीमा और लाॅजिस्टिक्स चावल के कारो बार के अनदेखे नायक को समझने की करें तो चावल के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में केवल किसान, मिलर, निर्या तक और आयातक ही महत्व पूर्ण नहीं होते।
बैंक निर्यात ऋण, कार्यशी ल पूंजी, भुगतान व्यवस्था और विदेशी मुद्रा संबंधी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। बीमा कंप नियां माल ढुलाई, भंडारण और अन्य स्वीकृत जोखिमों के लिए बीमा समाधान देती हैं। पैकेजिंग कंपनियां उत्पाद की सुरक्षा, शेल्फ लाइफ, ब्रां डिंग और विभिन्न बाजारों की आवश्यकताओं के अनुरूप पैकेज तैयार करती हैं।
लाॅजिस्टिक्स कंपनियां, शिपिंग लाइनें, बंदरगाह संचा लक, कंटेनर प्रदाता, कस्टम्स एजेंट और माल अग्रेषण कंप नियां चावल को उत्पादक क्षेत्र से घरेलू बाजार या विदेशी खरीदार तक पहुंचाने की प्रक्रिया संभालती हैं। गुणवत्ता जांच एजेंसियां, प्रयोगशालाएं और निरीक्षण संस्थान उत्पाद की गुणवत्ता तथा निर्धारित मानकों के अनुपालन की जांच में सहयोग करते हैं।
इसके अतिरिक्त किसान, किसान उत्पादक संगठन, कृषि सहकारी संस्थाएं, बीज एवं कृषि-तकनीक कंपनियां, गोदाम संचालक, साफ्टवेयर प्रदाता, खुदरा विक्रेता सुपर मार्केट खाद्य प्रसंस्करण कंप नियां स्टार्टअप, व्यापार संघ, दूतावास और सरकारी नीति- निर्माता भी इस व्यापक इको सिस्टम का हिस्सा हैं। इन सभी के बीच बेहतर तालमेल उत्पादन से लेकर अंतिम उप भोक्ता तक लागत, गुणवत्ता और आपूर्ति को प्रभावित कर ता है। साथियों बात अगर हम नौ नाॅलेज सेशंस और भविष्य का चावल उद्योग को समझने की करें तोसम्मेलन में ज्ञान- सत्रों की उपयोगिता इस बात में है कि व्यापारिक अवसरों के साथ उद्योग की दीर्घकालीन चुनौतियों पर भी विचार हो। फसल पूर्वानुमान, वैश्विक मांग और कीमतों का आकलन नए निर्यात बाजार, टिकाऊ खेती, जल उपयोग, आधुनिक मिलिंग, गुणवत्ता नियंत्रण, खाद्य सुरक्षा, पैके जिंग डिजिटल ट्रेसबिलिटी और जलवायु- अनुकूल कृषि जैसे विषय चावल उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने में उपयोगी हो सकते हैं। यदि नौ सत्रों का उल्लेख किया जाता है, तो उनकी संख्या और विषयों को आधिकारिक कार्यक्रम से मिलाना जरूरी है। भारतीय निर्यातकों के लिए केवल कम कीमत पर चावल बेचना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें लगातार गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय मानकों का अनुपालन, पारदर्शी व्यापा रिक दस्तावेज और विश्वसनीय भुगतान व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा। इसी प्रकार, टिकाऊ खेती और संसाधनों के कुशल उपयोग पर जोर देना भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए अति आवश्यक है।

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