एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर महंगाई जब केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित रहती है, थाली महंगी, बचत पर संकट और मध्यमवर्ग की बढ़ती बेचैनी, तब उसका प्रभाव बाजार की रिपोर्टों और सरकारी दस्तावे जों में दिखाई देता है, लेकिन जब वही महंगाई रसोई की चैखट पार करके आम आदमी की थाली, परिवार के मासिक बजट, बच्चों की शिक्षा, स्वास् थ्य खर्च और भविष्य की बचत पर चोट करने लगती है,तब वह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चुनौती बन जाती है। मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महा राष्ट्र बताना चाहूंगा कि भारत में 14 अक्टूबर को सामने आए थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपी आई) आधारित महंगाई दर के 11.39 प्रतिशत तक पहुंचने के दावे, सितंबर 2026 की महं गाई से जुड़े आंकड़ों ने इसी गंभीर परिस्थिति की ओर संकेत किया है। इसके पूर्व 13 अक् टूबर को जारी खुदरा महंगाई के आंकड़ों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारि त महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत पहुंचने और अभी थो क मूल्य सूचकांक ने आर्थिक बहस को तेज कर दिया है। यदि इन आंकड़ों की पुष्टि आधिकारिक मूल विज्ञप्तियों से होती है, तो यह स्थिति सर कार, भारतीय रिजर्व बैंक (आर बीआई), उद्योग जगत और करो ड़ों घरेलू उपभोक्ताओं के लिए गंभीर चिंता का विषय होगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब रसोई का खर्च ल गातार बढ़ने लगे, तो आम परि वार अपनी जरूरतों, इच्छाओं और बचत के बीच संतुलन आ खिर कैसे बनाए?
साथियों बात अगर हम रसोई के बजट पर महंगाई का सीधा हमला – इसको समझने की करें तो, शक्कर दालों से लेकर व प्याज से लेकर नींबू तक बढ़ती परेशानी भारतीय परिवारों के लिए रसोई केवल भोजन तैयार करने की जगह नहीं, बल्कि घरेलू अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। दाल, चावल, आटा, प्याज, आलू, लहसुन, अदरक, नींबू और खाद्य तेल जैसी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का असर लगभग हर आय वर्ग पर पड़ता है। विशेष रूप से निम्न आय वर्ग और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए खाद्य पदार्थों की महं गाई अधिक कष्टकारी होती है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की जरू रतों पर खर्च होता है। प्याज की कीमतों में असामान्य वृद्धि की खबरें, लहसुन और अदरक के महंगे होते भाव तथा नींबू जैसी सामान्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें घरेलू बजट को असंतुलित कर सकती हैं। श क्कर का खुदरा मूल्य 65 रुपये प्रति किलोग्राम बताए जाने का दावा भीउपभोक्ताओं की चिंता बढ़ाता है, हालांकि वास्तविक बाजार भाव शहर, गुणवत्ता और बिक्री केंद्र के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। महंगाई का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि परि वारों को समान आय में पहले की तुलना में कम वस्तुएं खरी दनी पड़ती हैं। कोई परिवार फल खरीदना कम करता है, कोई दूध और पौष्टिक खाद्य पदार्थों की मात्रा घटाता है, तो कोई मनोरंजन, कपड़े और अन्य जरूरी खर्चों में कटौती करता है। इस प्रकार महंगाई केवल जेब खाली नहीं करती, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और परिवार की आर्थिक सुरक्षा को भी सटीकता से प्रभावित कर ती है। साथियों बात अगर हम खुदरा महंगाई 5.54 प्रति शत, थोक महंगाई 11.39 प्रति शत- अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी? इसको सम झने की करें तो, महंगाई के इन दोनों आंकड़ों को समझना आवश्यक है। खुदरा महंगाई बताती है कि उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें पिछले वर्ष की समान अवधि की तुल ना में कितनी बदली हैं। दूसरी ओर, थोक महंगाई उत्पादकों और थोक बाजार में वस्तुओं की कीमतों में होने वाले बद लाव का संकेत देती है।
सरकारी आंकड़ों के अनु सार, सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर 5.54 प्रतिशत और थोक महंगाई बढ़कर 11.39 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में ये क्रमशः 4.83 प्र तिशत और 9.92 प्रतिशत थीं।
खुदरा महंगाई के आधि कारिक आंकड़े 12 अक्टूबर को जारी हुए और थोक महं गाई के आंकड़े 14 अक्टूबर को सामने आए। यहां एक मह त्वपूर्ण बात समझनी होगी कि 11.39 प्रतिशत थोक महंगाई का अर्थ यह नहीं है कि बाजार की प्रत्येक वस्तु 11.39 प्रति शत महंगी हो गई है।
इसका अर्थ है कि थोक मूल्य सूचकांक में शामिल वस् तुओं के समग्र मूल्य स्तर में पिछले वर्ष की समान अवद्दि की तुलना में इतनी वृद्धि दर्ज हुई है। फिर भी, थोक महंगाई का लगातार ऊंचा रहना चिंता बढ़ाता है, क्योंकि इससे कंप नियों की उत्पादन लागत, परि वहन खर्च और व्यापारिक ग तिविधियों पर दबाव पड़ सक ता है। यदि कंपनियां इस अति रिक्त लागत को उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं, तो आने वाले महीनों में खुदरा बाजार में भी महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। साथियों बात अगर हम ईंधन और कच्चे तेल का झट का- महंगाई की आग में घी इसको समझने की करें तो सितंबर के थोक महंगाई आंक ड़ों में सबसे चिंताजनक पहलु ओं में ईंधन और ऊर्जा की की मतों में बढ़ोतरी शामिल है। ईंधन एवं बिजली समूह की महंगाई अगस्त के 22.93 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 25.85 प्रतिशत पहुंच गई। प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई 8.67 प्रतिशत और विनिर्मित उत्पादों की महंगाई 9.76 प्रतिशत दर्ज की गई। थोक खाद्य सूचकांक भी अगस्त के 7.05 प्रतिशत से बढ़कर 8.66 प्रतिशत हो गया। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव केवल पेट्रोल-डीजल तक सी मित नहीं रहता।माल ढुलाई महंगी होने से सब्जियों, अना ज और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं को बाजार तक पहुंचाने की लागत बढ़ सकती है। उद्योगों में बिजली, रसायन प्लास्टिक, पैकेजिंग और दूसरे कच्चे माल का खर्च भी बढ़ता है।
यही कारण है कि ऊर्जा की महंगाई अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में एक साथ लागत का दबाव पैदा कर सकती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और आपूर्ति संबं धी व्यवधान जारी रहते हैं, तो महंगाई पर नियंत्रण और कठिन हो सकता है।
साथियों बात अगर हम आर बीआई की अग्निपरीक्षा – ब्याज दरें बढ़ेंगी या आर्थिक विकास प्रभावित होगा? इस को समझने की करें तो, बढ़ती महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक के सामने नीतिगत चुनौती खड़ी करती है। सितंबर में खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत तक पहुंचने से यह दर आरबीआई के 2 से 6 प्रतिशत के निर्धा रित सहनशीलता दायरे की ऊपरी सीमा के अपेक्षाकृत करीब आ गई है। ऐसी परिस् िथति में केंद्रीय बैंक को महं गाई नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को गति देने के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। ब्याज दरें बढ़ाने से कर्ज महंगा हो सकता है और मांग पर दबाव पड़ सकता है, जिससे महंगाई को नियंत्रित करने में सहाय ता मिल सकती है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। गृह ऋण, वाहन ऋण और व्यावसा यिक कर्ज की लागत बढ़ने से परिवारों और कारोबारियों का खर्च बढ़ सकता है। निवेश तथा उपभोग प्रभावित होने पर आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है। इसलिए केवल रेपो दर में बदलाव से खाद्य पदार्थों की आपूर्ति या मौसम के कारण पैदा हुई महंगाई का समाधान नहीं किया जा सकता। इसके लिए मौद्रिक नीति के साथ- साथ आपूर्ति प्रबंधन, बाजार निगरानी और समय पर सरका री हस्तक्षेप की भी आवश्यकता है। साथियों बात अगर हम ग्रामीण परिवारों की चिंता और घटता आर्थिक भरोसा इसको समझने की करें तो, महंगाई का सबसे गहरा प्रभाव उन परिवारों पर पड़ सकता है जि नकी आय सीमित है और जिन के पास अचानक बढ़े खर्चों से निपटने के लिए पर्याप्त बचत नहीं है। ग्रामीण उपभोक्ता विश् वास सर्वे के संदर्भ में प्रस्तुत आंकड़े भी इसी चिंता को सामने रखते हैं। यदि परिवारों को लगता है कि आने वाले महीनों में खाद्य पदार्थों, परि वहन और घरेलू जरूरतों की कीमतें और बढ़ेंगी, तो वे गैर- जरूरी खरीदारी टाल सकते हैं और बचत को प्राथमिकता दे सकते हैं। इसका प्रभाव ग्रामीण बाजार में दोपहिया वाहनों, टिकाऊ उपभोक्ता वस् तुओं और अन्य उत्पादों की मांग पर पड़ सकता है। हालां कि, उपभोक्ता विश्वास और वास्तविक खरीदारी अलग -अलग संकेतक हैं। बाजार की वास्तविक स्थिति आय, रोजगार, कृषि उत्पादन, सर कारी सहायता और कीमतों के भविष्य के रुख पर निर्भर करेगी। इसलिए सरकार के लिए जरूरी है कि वह महंगा ई के आंकड़ों के साथ आम परिवारों की क्रय शक्ति और वास्तविक जीवन- स्तर पर भी ध्यान दे।
साथियों बात अगर हम 2027 के विधानसभा चुनाव- क्या महंगाई बनेगी बड़ाराज नीतिक मुद्दा? इसको समझने की करें तो, भारत में महंगाई का असर केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहताय वह राजनीतिक विमर्श को भी प्र भावित कर सकती है। वर्ष 2027 में सात राज्यों, उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश, में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है।
यदि चुनाव से पहले खाद्य पदार्थों, ईंधन और घरेलू जरूर तों की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो महंगाई विपक्ष के लिए प्रमुख मुद्दा और सत्तारूढ़ दलों के लिए कठिन परीक्षा बन स कती है। मतदाता अपने दैनिक अनुभवों के आधार पर सरकारों के कामकाज का मूल्यां कन करते हैं। रोजगार, आय, कानून -व्यवस्था और विकास के साथ रसोई का बजट भी उनके नि र्णय को प्रभावित कर सकता है। इसी प्रकार, युवाओं के असं तोष, रोजगार संबंधी अपेक्षाओं और विभिन्न आंदोलनों का चुनावी वातावरण पर प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन यह मान लेना उचित नहीं होगा कि महंगाई अपने आप किसी निश्चित चुनावी परिणाम को जन्म देगी। मतदाताओं का फैसला अनेक मुद्दों, स्थानीय परिस्थितियों, नेतृत्व, सरकारी योजनाओं और राजनीतिक विकल्पों के सम्मिलित प्रभाव से बनता है। फिर भी, लगातार बढ़ता घरेलू खर्च सरकारों के लिए एक स्पष्ट जनविश्वास संबंधी चुनौती सटीकता से बन सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इस का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आंकड़ों से आगे बढ़कर रसोई को राहत देना जरूरी, सितंबर 2026 के महंगाई आंकड़े सरकार और आर्थिक नीति निर्माताओं के सामने एक महत्वपूर्ण चेतावनी प्रस्तुत करते हैं। खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत और थोक महं गाई 11.39 प्रतिशत तक पहुं चना इस बात का संकेत है कि कीमतों का दबाव व्यापक हो रहा है। खाद्य वस्तुओं, ईंधन और विनिर्मित उत्पादों की महंगाई का संयुक्त प्रभाव परिवारों की क्रय शक्ति, कंप नियों की लागत और बाजार की मांग को प्रभावित कर सकता है। ऐसे समय में सर कार को आवश्यक खाद्य वस्तु ओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने, जमाखोरी पर प्रभावी कार्रवाई करने, आपूर्ति शृंखला में बाधाएं दूर करने और कम जोर आय वाले परिवारों को राहत देने पर ध्यान देना चाहिए। वहीं, आरबीआई को महंगाई के रुझान, भविष्य के जोखिम और आर्थिक विकास के बीच संतुलित नीति अपना नी होगी। सरकार की आर्थिक सफलता का वास्तविक पैमाना केवल विकास दर या शेयर बाजार की चमक नहीं, बल्कि आम नागरिक की थाली में पौष्टिक भोजन, महीने के अंत में बची हुई बचत और भविष्य के प्रति उसका विश्वास भी है। यदि महंगाई का बोझ ल गातार बढ़ता है, तो उसका असर बाजार से लेकर जन मानस तक दिखाई दे सकता है। और लोकतंत्र में जनता कीआर्थिक चिंताएं अंततः चुना वी बहस का हिस्सा बनती हैं।
इसलिए समय रहते महं गाई पर प्रभावी नियंत्रण और आम आदमी को राहत देना ही सरकार के लिए सब से बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
शक्कर, तेल, प्याज, दाल चावल लहसुन अदरक,नींबू और ईंधन की बढ़ती कीमतों से आम आदमी की जेब पर दोहरी मार, के बीच सरकार, आरबीआई और अर्थव्यवस्था के सामने कठिन परीक्षा!
