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दिल्ली में लोकतंत्र पर पहरा या सुरक्षा का चक्रव्यूह? – 57 मेट्रो स्टेशन बंद,ट्रेनें रद्द और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा सियासी संग्राम

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन ने राष्ट्रीय राजधानी में राजनी तिक, प्रशासनिक और संवै धानिक बहस तेज कर दी है। प्रदर्शन से पहले सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने, दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों पर पाबं िदयों की तैयारी और दिल्ली पहुंचने वाली कुछ मेल एवं एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द करने के फैसलों ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं?। क्या यह कदम कानून- व्यवस्था बनाए रखने की एहतियाती रणनीति है या इसका असर नागरिकों के शांतिपूर्ण विरो ेध के अधिकार पर भी पड़ रहा है? यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र मीडिया के हवाले से बताना चाहूंगा कि यहाँ 57 मेट्रो स्टेशन और रेल सेवाओं पर पाबंदी से बढ़ा विवाद, रेलवे बोर्ड के 9 अक्टूबर के आदेशके अनुसार निर्धारित समयावधि में नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टे शनों पर पहुंचने वाली कुछ मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों को उनके शुरुआती स्टेशनों से रद्द किया गया था।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) ने 57 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद रखने की व्यवस्था की घोषणा की थी । उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पाबंदियों का प्रभाव रेड, येलो, ब्लू, वायलेट,पिंक और मैजेंटा लाइनों सहित कई मेट्रो मार्गों पर पड़ना है। इससे यात्रियों, विद्यार्थियों, कर्मचारियों और दूसरे जरूरी कामों से दिल्ली आने-जाने वाले लोगों को भी परेशानी हो सकतीहै।
हालांकि सभी ट्रेनों के रद्द होने या पूरी मेट्रो सेवा बंद होने का दावा करना सही नहीं होगा पाबंदियों का वास्तविक दायरा संबंधित आधिकारिक आदेशों से ही स्पष्ट होगा।
साथियों बात अगर हम सीजेपी का ऐलान युवाओं से डरती है सरकार तो पूरा देश बंद कर दे को समझने की करें तो, सीजेपी के संस्थापक ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि जंतर- मंतर निर्धारित प्रदर्शन स्थल है और पार्टी हर हाल में प्रद र्शन करेगी। उनका तर्क है कि शांतिपूर्ण विरोध लोक तांत्रिक अधिकार है और क थित चुनावी अनियमितताओं पर जवाबदेही तय होनी चाहि ए। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया है, जबकि जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ाई गई है। पार्टी ने देशभर में अपने कम से कम 10 हजार सदस्यों को हिरासत में लिए जाने का दावा भी किया है, लेकिन इस संख्या की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस दावे को स्थापित तथ्य के बजाय पार्टी के आरोप के रूप में ही सटीकता से देखा जाना चाहिए।
साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट में उठा सवाल सुरक्षा या नागरिक अधिकार? इसको समझने की करें तोअब इस विवाद ने न्यायिक स्तर पर भी ध्यान खींचा है।वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रद र्शन से पहले रेल सेवाओं, मेट्रो स्टेशनों तथा इंटरनेट सेवाओं पर संभावित पाबंदियों को लेकर चिंता जताई। सिब्बल ने सवाल उठाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए राजधानी आने वाले लोगों की आवाजाही पर इतनी व्यापक रोक क्यों लगाई जा रही है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस को खुली छूट देने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। मुख्य न्या या ाीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने युवाओं के भविष्य और उनके परिवारों पर कानूनी कार्रवाई के प्रभाव को ध्यान में रखने की बात कही। साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि आदतन अपराधियों या गंभीर अपराधों के आरोपियों को पूर्व आदेशों के तहत मिली सुरक्षा का लाभ स्वतः नहीं मिलेगा। न्यायालय की इस टिप्पणी का अर्थ कानून -व्यवस्था की आवश्यकता को नकारना नहीं,बल्कि कार्रवाई में सटीकता से उचित संतुलन बनाए रखना है।
साथियों बात अगर हम अघोषित आपातकाल का आरोप और 1942 के आंदोलन से तुलना को समझने की करें तो, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने वीडियो संदेश में गिरफ्तारियों,दिल्ली आने से रोके जाने और परिवहन प्रतिबंधों को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने इन परिस्थितियों की तुलना 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से करते हुए इसे अघोषित आपातकाल करार दिया। यह उनका राजनीतिक आरोप है, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं। उन्होंने लोगों से लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन जारी रखने की अपील की है। दूसरी ओर, प्रशासन के सामने संभावित भीड़, यातायात, सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। ऐसे में दोनों पक्षों की कार्रवाइयों और दावों का आकलन प्रमाणों के आधार पर होना जरूरी है। लोकतंत्र की असली परीक्षारू विरोध का अधिकार और व्यवस्था की सटीकता से जिम्मेदारी है।
साथियों बात अगर इस पूरे घटनाक्रम का महत्व किसी एक पार्टी या एक प्रद र्शन तक सीमित नहीं है इस को समझने की करें तो, चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवा ल उठते हैं तो उनका पारदर्शी और तथ्याधारित जवाब देना संस्थाओं की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है। उसी तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा करना भी लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। प्रशासन को सुरक्षा संबंधी कदम उठाने का अधि कार है, लेकिन उनकी आवश् यकता, अनुपात और नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव की समी क्षा भी जरूरी है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों को कानून का पालन करते हुए शांतिपूर्ण तरी के से अपनी बात रखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह घटनाक्रम इस बात की कसौटी बनेगा कि लोकतंत्र में असहमति को किस तरह संभाला जाता है। न तो बिना प्रमाण सरकार के डरने का निष्कर्ष निकालना उचित है और न ही सुरक्षा के नाम पर हर प्रतिबंध को स्वतः न्यायसंगत मानना। अस ली सवाल यह है कि क्या प्रशासन सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा कर सकता है और क्या चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों का जवाब पारदर्शिता से दिया जाएगा? लोकतंत्र की मज बूती का निर्धारण अंततः नारों से नहीं, बल्कि संस्थाओं की जवाबदेही, कानून के निष्पक्ष अनुपालन और जनता के विश्वास से होता है।

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