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नए यात्रि वाहनों पर सरकार का बड़ा फैसला ! 5 साल में ईंधन खपत घटाने का लक्ष्य, वाहन कंपनियों को बनानी होगी कम ईंधन खाने वाली कारें! 2027 से लागू होगा नया नियम, आम जनता को मिलेंगे क्या फायदे

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर केंद्र सरकार ने यात्री वाहनों के लिए कारपोरेट एवरेज फ्यूल इकोनाॅमी यानें सीएएफई-3के नए मानदंड अधिसूचित किए हैं। ये नियम 1 अप्रैल 2027 से 31 मार्च 2032 तक लागू रहेंगे और भारत में बिक्री के लिए बनाए या आयात किए जाने वाले नए यात्री वाहनों पर लागू होंगे। इसका सीधा संबंध किसी एक यात्री वाहन के माइलेज से नहीं, बल्कि किसी वाहन निर्माता द्वारा एक वर्ष में बेची गई उसकी पूरी यात्री वाहन (कारों) की औसत ईंधन खपत और उनसे होने वाले कार्बन उत्सर्जन से है। यानें सरकार किसी कंपनी से यह कह रही है कि वह केवल ज्यादा यात्री वाहन बेचने पर ध्यान न दे, बल्कि उसके पूरे वाहन समूह की औसत ईंधन दक्षता भी लगातार बे हतर हो। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि सबसे पहले समझिए कि सीएएफई -3 आखिर है क्या? सीएएफई को बिल्कुल सरल भाषा में समझें तो यह रात्रि वाहनों, कार कंपनियों के लिए ईंधन बचत और प्रदूषण नियं त्रण का सामूहिक नियम है।
उदाहरण के लिए, किसी कंपनी की कुछ यात्री वाहन, कारें ज्यादा ईंधन खर्च करती हैं और कुछ कारें कम ईंधन खर्च करती हैं। सरकार प्रत्येक माडल को अलग-अलग एक ही सीमा में बांधने के बजाय कंपनी के पूरे वाहन समूह का औसत देखती है।इसीलिए इसे कारपोरेट औसत कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि समय के साथ कंपनियां ऐसे यात्री वाहन ऐसी कारें बनाएं जो समान दूरी तय करने में कम पेट्रोल या अन्य ईंधन खर्च करें और कम का र्बन डाइआक्साइड छोड़ें। नए सीएएफई-3 नियमों में यह व्यवस्था वर्ष-दर-वर्ष अधिक कड़ी होगी, ताकि वाहन उद्योग को अचानक नहीं बल्कि चरणबद्ध तरीके से नई तक नीक अपनाने का अवसर मिले।
साथियों बात अगर हम आम नागरिक केलिए इसका सबसे बड़ा मतलब क्या है? इसको समझने की करें तो आम आदमी के लिए इसका सबसे आसान अर्थ है भविष्य की कारों यात्री वाहनों को अधिक ईंधन-कुशल बनाने का दबाव अब वाहन कंपनियों पर बढ़ेगा। नए ढांचे में संदर्भ स्तर पर ईंधन खपत का मानक 2027-28 में 3.996 लीटर प्रति 100 किलोमीटर से घटा कर 2031 -32 में 3.3273 लीटर प्रति 100 किलोमीटर किया गया है। यह लगभग 16.7 प्रतिशत सुधार का लक्ष्य है।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि ये आंकड़े किसी एक सामान्य कार के वास्तविक सड़क-मा इलेज का दावा नहीं हैं। यह कंपनियों के पूरे वाहन समूह की नियामकीय औसत गणना का हिस्सा है। वास्तविक माइ लेज कार के माडल, वजन, इंजन, सड़क, यातायात और ड्राइविंग शैली के अनुसार अलग हो सकता है।
साथियों बात अगर हम क्या इसका मतलब है कि पेट्रोल – डीजल कारें यात्री वाहन बंद हो जाएंगी? इसको समझने की करें तो, नहीं। सीएएफई-3 का अर्थ यह नहीं है कि 2027 से पेट्रोल या डीजल कारों की बिक्री बंद हो जाएगी। इसका उद्देश्य वाहन कंपनियों को अधिक ईंधन- कुशल और कम – उत्सर्जन वाले वाहनों की ओर ले जाना है। इसके लिए कंप नियों को केवल इलेक्ट्रिक कार बनाने के लिए बाध्य कर ने के बजाय कई तकनीकी रास्ते उपलब्ध कराए गए हैं। इनमें बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहन, रेंज बढ़ाने वाली विद्युत तकनीक, प्लग- इन हाइब्रिड, मजबूत हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल वाहन शा मिल हैं। इस तरह सरकार ने एक ही तकनीक को अनि वार्य करने के बजाय अलग- अलग तकनीकों को अपनाने की सटीकता से गुंजाइश रखी है। साथियों बात अगर हम सुपर क्रेडिट को भी आसान भाषा में समझने की करें तो सीएएफई -3 की चर्चा में सबसे ज्यादा तकनीकी शब्दों में से एक है सुपर क्रेडिट। इसे सामान्य भाषा में कंपनियों के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन अंक समझा जा सकता है। यदि कोई कंपनी इलेक्ट्रिक, हाइब्रिड या कुछ निर्धारित वैकल्पिक-ईंधन वाली कारें बेचती है, तो सीएएफई की गणना में उन्हें सामान्य कारों की तुलना में अतिरिक्त लाभ मिलता है। इसका उद्देश्य कंप नियों को ऐसी स्वच्छ तकनीक वाले वाहनों का उत्पादन और बाजार में विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित करना है। अंतिम अधिसूचित व्यवस्था में अलग- अलग स्वच्छ वाहन तकनीकों के लिए अलग- अलग गुणक रखे गए हैं। इसलिए इसे यह समझना अ धिक सही होगा कि सरकार कंपनियों को स्वच्छ तकनीक अपनाने पर अनुपालन में अति रिक्त सुविधा दे रही है, न कि ग्राहक को सीधे कोई नकद छूट दे रही है।
साथियों बात अगर हम इथेनॉल, जैव ईंधन और सीबी जी को भी मिलेगा महत्व को समझने की करें तो नए ढांचे की एक महत्वपूर्ण विशेषता कम-कार्बन वाले ईंधनों को मान्यता देना है। इथेनाल- मिश्रित पेट्रोल, जैव ईंधन और संपीड़ित जैव गैस जैसे विक ल्पों को कार्बन न्यूट्रैलिटी फैक् टर के माध्यम से सीएएफई- की गणना में मान्यता देने की व्यवस्था की गई है। सरल शब्दों में इसका मतलब है कि सरकार केवल इलेक्ट्रिक वाहन को ही भविष्य का रास्ता नहीं मान रही, बल्कि भारत में उपलब्ध वैकल्पिक और अपे क्षाकृत कम-कार्बन ईंधनों को भी संक्रमण के हिस्से के रूप में देख रही है। इससे भारत के लिए पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू वैकल्पिक ईंधनों के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में भी मदद मिल सकती है।
साथियों बात अगर हम कार कंपनियां सिर्फ इंजन बद लकर ही लक्ष्य पूरा नहीं करेंगी इसको समझने की करें तो, सीएएफई-3 में ईंधन बचाने वाली विभिन्न तकनीकों को भी मान्यता दी गई है। इनमें बेहतर कांच, सूर्य की गर्मी को कम करने वाली तकनीक और अधिक दक्ष वातानुकूलन जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि भविष्य की कार में केवल इंजन या बैटरी ही महत्वपूर्ण नहीं होगीय कार की पूरी बनावट और उसमें इस्तेमाल होने वाली तकनीक भी ईंधन बचाने में भूमिका निभाएगी। सरकार ने मान्यता प्राप्त ईंधन-बचत तकनीकों की संख्या बढ़ाकर 12 की है और पात्र तकनीकों के माध्य म से उत्सर्जन गणना में निद्र्दा रित लाभ दिया जा सकता है, जिसकी कुल सीमा 9 ग्राम कार्बन डाइआक्साइड प्रति किलोमीटर तक है।
साथियों बात अगर हम यात्री वाहनों, कार के वजन का भी नियम में महत्वपूर्ण स् थान है इसको समझने की करें तो, नए नियमों में कार के वजन को भी ध्यान में रखा गया है। हल्के और भारी वाहनों के लिए लक्ष्य एक जैसा नहीं रखा जाता, क्यों कि भारी वाहन को चलाने में सामान्यतः अधिक ऊर्जा की जरूरत पड़ती है।
इसी कारण सीएएफई -3 में औसत वाहन वजन से जुड़ी गणना को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है। शुरुआती मसौदे में छोटे और हल्के वाहनों के लिए अलग रियायतों की चर्चा थी, लेकिन अंतिम व्यवस्था में छोटे पेट्रोल वाहनों के लिए प्रस्तावित विशे ष छूट को बरकरार नहीं रखा गया। इसका अर्थ यह है कि केवल छोटी कार होने के आ धार पर निर्माता को अलग से आसान रास्ता नहीं मिलेगा। उसे अपने पूरे वाहन समूह के औसत प्रदर्शन को सटीकता से सुधारना होगा।
साथियों बात अगर हम यदि कोई कंपनी लक्ष्य पूरा नहीं कर पाई तो क्या होगा? इसको समझने की करें तो सरकार ने इसके लिए भी लचीली व्यवस्था बनाई है। जो निर्माता निर्धारित लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करेगा, वह क्रेडिट अर्जित कर सकता है। वहीं किसी निर्माता की कमी होने पर वह उपलब्ध नियमों के अनुसार पिछले क्रे डिट का उपयोग कर सकता है, अन्य निर्माताओं के साथ क्रेडिट का लेन-देन कर सक ता है या ऊर्जा दक्षता ब्यूरो की व्यवस्था के माध्यम से आवश्यक क्रेडिट खरीद सक ता है। इसका उद्देश्य कंपनियों को एक झटके में दंडित करने के बजाय उन्हें तकनीकी बदलाव के लिए व्यावहारिक रास्ता देना है, जबकि लक्ष्य पूरा करने की जिम्मेदारी भी बनी रहेगी।
साथियों बात अगर हम आम नागरिक को आखिर क्या फायदा होगा? इसको समझने की करें तो, इस पूरे नियम का अंतिम उद्देश्य केवल कार कंपनियों के आंकड़े सु धारना नहीं है। इसका असर लंबे समय में ईंधन खर्च, प्रदू षण, तेल आयात और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। यदि नई कारें औसतन कम ईंधन में समान दूरी तय करने लगती हैं, तो वाहन उपयोग कर्ताओं के लिए ईंधन की खपत घटाने की संभावना बढ़ेगी। इलेक्ट्रिक और हाइ ब्रिड विकल्पों की संख्या बढ़ने से उपभोक्ताओं के सामने तक नीक के अधिक विकल्प भी आ सकते हैं। साथ ही कम कार्बन उत्सर्जन का अर्थ श हरों और राजमार्गों पर परिव हन से होने वाले पर्यावरणीय दबाव को कम करने की दिशा में आगे बढ़ना है। हालांकि किसी व्यक्ति की वास्तविक बचत इस बात पर निर्भर करे गी कि वह कौन-सी कार खरीदता है, उसका ईंधन खर्च कितना है, वह कितनी दूरी चलाता है और वाहन की की मत क्या है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यात्री वाहनों कार उद्योग के लिए नया लक्ष्य, उपभोक्ता के लिए बदलता बाजार, सीएएफई-3 को इस लिए केवल माइलेज का नया नियम समझना अधूरा होगा। यह वास्तव में भारत के यात्री वाहन बाजार को अगले पांच वर्षों में कम ईंधन खपत, कम कार्बन उत्सर्जन और अधिक स्वच्छ वाहन तकनीक की दि शा में ले जाने वाला नियामकीय ढांचा है।
1 अप्रैल 2027 से शुरू होने वाली यह व्यवस्था कंपनियों को इलेक्ट्रिक, हाइ ब्रिड, फ्लेक्स- फ्यूल और ईं धन- बचत तकनीकों में निवे श करने के लिए प्रेरित करेगी, जबकि उपभोक्ताओं के सामने धीरे-धीरे अधिक तकनीकी विकल्प आने की संभावना है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने केवल एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय कई रास्ते खुले रखे हैं। इसलिए आने वाले वर्षों में भारतीय कार बाजार का मुकाबला केवल कौन-सी कार ज्यादा ताकतवर है तक सीमि त नहीं रहेगा, बल्कि कौन-सी कार कम ऊर्जा में बेहतर काम करती है, कम प्रदूषण करती है और उपभोक्ता के लिए व्या वहारिक विकल्प देती है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

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