एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक अर्थव्यवस्था सितंबर 2026 के अंतिम सप् ताह में ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है,जहां युद्ध, कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा,व्यापार शुल्क, महत्वपूर्ण खनिज, समुद्री मार्ग और शेयर बाजार एक- दूसरे से गहराई से जुड़ गए हैं।एक ओर ईरान ने अमेरिका के सामने होर्मुज जलडमरूम ध्य में सामान्य समुद्री आवाग मन बहाल करने के लिए सात – दिवसीय प्रस्ताव रखा है,तो दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति और चीनी राष्ट्रपति की वाशिं गटन वार्ता ने दुनियाँ की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के व्यापारिक रिश्तों में नए समी करण खड़े किए हैं।इसी बीच कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भारत जैसे बड़े तेल आया तक देशों की चिंता बढ़ा दी है और 24 सितंबर को भारती य शेयर बाजार में भारी बिक वाली देखने कोमिली। इसलि ए आने वाले कुछ दिन केवल पश्चिम एशिया की राजनीति के लिए नहीं, बल्कि तेल की कीमत, समुद्री व्यापार, महं गा ई, मुद्रा बाजार और वैश्विक निवेश धारणा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकते हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमु खदास भावनानीं गोंदिया महा राष्ट्र यह मानता हूं कि विश्व अर्थव्यवस्था की धड़कन इस समय फारस की खाड़ी के उस संकरे समुद्री द्वार पर टिकी है, जिसे होर्मुज जलड मरूमध्य कहा जाता है।
अमेरिका- ईरान टकराव के बीच तेहरान ने ऐसा सात -दिवसीय प्रस्ताव सामने रखा है,जिसके अंतर्गत अमेरिकी सैन्य एवं आर्थिक दबाव में राहत सहित निर्धारित शर्तें पूरी होने पर होर्मुज में सामान्य समुद्री आवागमन बहाल किया जा सकता है। अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच चरणबद्ध समाधान पर बात चीत की खबरें भी सामने आई हैं, लेकिन अंतिम समझौता अभी अनिश्चित है। यही अनि श्चितता वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन गई है। होर्मुज का संकट केवल तेल उत्पादक देशों की समस्या नहीं है। यहां व्यवधा न का अर्थ है, ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव, जहाजरानी और बीमा लागत में वृद्धि, महंगा कच्चा तेल और अंततः दुनिया भर में महंगाई का खतरा। 26 सितंबर को कूटनीतिक समा धान की उम्मीदों से ब्रेंट कच्चा तेल करीब दो प्रतिशत फिसल कर लगभग 104.30 डालर प्रति बैरल तक आया, लेकिन कीमत अभी भी ऊंचे स्तर पर है। खाड़ी-ए-ओमान में जहाज से जहाज तेल हस्तांतरण क्षमता भी अपनी सीमा तक पहुंचने की खबर है,जो आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव की गंभीर ता दर्शाती है। भारत के लिए यह संकट विशेष महत्व रखता है। महंगा तेल आयात बिल बढ़ा सकता है, रुपये पर दबाव डाल सकता है तथा परिवहन और उत्पादन लागत के रास्ते महंगाई को प्रभावित कर सक ता है। तेल कीमतों की अस्थि रता के बीच रुपया 22 सितंबर को 95.59 प्रति डालर पर बंद हुआ थाय वहीं भारतीय शेयर बाजार लगातार सातवें सप्ताह नुकसान में रहा।
साथियों, सबसे पहले होर्मुज जलडमरूमध्य की बात करें तो 25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र में ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि तेहरान ने अमेरिका को इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को खोलने के लिए एक ठोस सात-दिवसीय योजना दी है। उनके अनुसार आवश् यक परिस्थितियां पूरी होने पर सात दिनों के भीतर सामा न्य समुद्री आवागमन बहाल किया जा सकता है और अब निर्णय अमेरिका के हाथ में है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी पक्ष से अपेक्षित कदम नए नहीं हैं, बल्कि जून में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन से जुड़े हैं। हालांकि 26 सितंबर तक स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने की मीडिया रिपोर्ट सा मने आई है, लेकिन ईरान आद्दि कारिक अमेरिकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा है।
इसलिए इस समय यह कहना जल्दबाजी होगी कि सात दिनों के भीतर संकट समाप्त हो जाएगा इतना जरूर है कि प्रस्ताव ने कूटनीतिक समाधान की एक नई खिड़की खोली है। होर्मुज का सवाल इतना महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह केवल ईरान और अमेरिका के बीच शक्ति-संघर्ष का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा अर्थव्यवस्था की संवेदन शील नस है। तनाव बढ़ने पर जहाजरानी, बीमा ऊर्जा आपूर्ति और परिवहन लागत प्रभावित होने का जोखिम बढ़ता है, जबकि तनाव घटने और सामान्य आवागमन बहाल होने की संभावना तेल बाजार को राहत दे सकती है। इसी अनिश्चितता का असर कच्चे तेल की कीमतों में साफ दिखाई दिया है। 22 सितंबर को संभावित अमेरिका-ईरान वार्ता की उम्मीदों के बीच ब्रेंट कच्चा तेल 98.9 डालर प्रति बैरल तक आया था, लेकिन 24 सितंबर को यह 2.4 प्रतिशत बढ़कर लगभग 105.6 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। अर्थात बाजार केवल वास्तविक आपूर्ति नहीं,बल्कि होर्मुज से निकलने वाले प्रत्ये क राजनीतिक और कूटनी तिक संकेत पर प्रतिक्रिया दे रहा है।
साथियों इस तेल संकट की तपिश भारत के शेयर बा जार तक पहुंच चुकी है। गुरुवार 24 सितंबर 2026 को भारतीय शेयर बाजार ने लगभग दस सप्ताह का सबसे खराब कारोबारी दिन देखा। बीएसई सेंसेक्स 1.67 प्रतिशत अर्थात लगभग 1,248 अंक गिरकर 73,580.54 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी-50 1.64 प्रतिशत गिरकर 23,063.10 पर आ गया। वित्तीय शेयरों पर बीमा कमीशन सीमा संबंद्दी प्रस्ताव की चिंता का अति रिक्त दबाव रहा, लेकिन तेजी से महंगा होता कच्चा तेल भी बाजार की बेचैनी का प्रमुख कारण था। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है, इसलिए महंगा कच्चा तेल आयात बिल, कंपनियों की लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर दबाव बढ़ा सकता है। इसीलिए होर्मुज में होने वाली घटना को मुंबई के दलाल पथ से अलग कर के नहीं देखाजा सकता, इस वैश्विक आर्थिक तस्वीर का दूसरा बड़ा अध्याय ट्रंप-शी मुलाकात है। राष्ट्रपति शी जिन पिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान दोनों देशों ने व्यापार और निवेश से जुड़े कई महत्व पूर्ण कदम आगे बढ़ाए। व्हाइट हाउस के अनुसार दोनों देशों ने एक-दूसरे की दिशा में लग भग 30 अरब डालर मूल्य की गैर-संवेदनशील वस्तुओं को अधिक अनुकूल शुल्क व्यवहार देने संबंधी सिफारिशों पर सहमति बनाई। अमेरिकी निर्यात की ओर कृषि उत्पाद, मछली एवं समुद्री खाद्य, लकड़ी उत्पा द, सौंदर्य प्रसाधन और चि कित्सा उपकरण जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जबकि अमेरिका में चीन से आने वाले छोटे घरेलू उपकरण खिलौने और कुछ उपभोक्ता वस्तुएं इसमें शामिल हैं। कृषि बाजार तक पहुंच की बाधाओं पर कार्य दल बनाने और निवेश संबंधी मुद्दों के लिए संरचित व्यवस्था को भी आगे बढ़ाया गया है।
साथियों, ऊर्जा के मोर्चे पर भी ट्रंप-शी वार्ता उल्लेखनीय रही। चीन ने 2027 और 2028 में अमेरिका से प्रत्येक वर्ष कम-से-कम एक करोड़ मीट्रिक टन कोयला आयात करने की प्रतिबद्धता जताई। दोनों देश दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति से जुड़ी अमेरिकी चिंताओं पर भी बातचीत जारी रखेंगे। ट्रंप ने शी से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर करने के उद्देश्य से परिष्कृत पेट्रोलि यम उत्पादों का उत्पादन बढ़ा ने का आग्रह किया। दोनों नेताओं की बातचीत में ईरान भी आया और व्हाइट हाउस के अनुसार दोनों इस बात पर सहमत हुए कि ईरान पर माणु हथियार हासिल नहीं करे तथा कोई देश या संस्था अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर शुल्क न लगाए। उभरती प्रौद्योगि कियों को लेकर अमेरिका-चीन संवाद का नया तंत्र स्थापित करने की घोषणा भी हुई। इसलिए इस मुलाकात को के वल अमेरिका-चीन द्विपक्षीय व्यापार समझौते के रूप में देखना अधूरा होगा, इसके तार ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, आपूर्ति शृंखला और नई प्रौ द्योगिकी से भी सटीकता से जुड़े हैं। साथियों, इसी समय न्यूयार्क में चल रही 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा विश्व की राजनीतिक बेचैनी का मंच बनी हुई है। 24 सितंबर को इजराइल के प्रधानमंत्री जैसे ही महासभा को संबोद्दित करने पहुंचे, 77 से अधिक याने दर्जनों प्रतिनिधि सदन से बाहर निकल गए। उन्होंने अपने संबोधन में इजराइल की क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाइयों का बचाव किया और ईरान सहित क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर अपना पक्ष रखा। यह घट नाक्रम बताता है कि पश्चिम एशिया का संकट अब संयुक्त राष्ट्र के कूटनीतिक मंच से लेकर ऊर्जा बाजार तक अंतर राष्ट्रीय व्यवस्था पर दबाव बना रहा है। भारत के लिए चुनौती दोहरी है। एक ओर भारत दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है और विशाल घरेलू बाजार उसे बाहरी झटकों के विरुद्ध कुछ सहारा देता है, लेकिन दूसरी ओर तेल की ऊंची कीमतें महंगाई और मौद्रिक नीति के समीकरण को कठिन बना सकती हैं।
अगस्त में भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति के सदस्यों ने आगे ब्याज दर बढ़ाने की संभावना के संकेत दिए थे और आपूर्ति-जनित महंगाई के व्यापक अर्थव्य वस्था में फैलने के जोखिम पर नजर रखने की बात कही थी। यदि ऊर्जा लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो सरकार, रिजर्व बैंक, उद्योग और निवेशकों सभी के लिए महंगाई बनाम विकास का सं तुलन सटिका से अधिक चुनौ तीपूर्ण हो सकता है।
साथियों सितंबर 2026 का अंतिम सप्ताह विश्व अर्थव् यवस्था के लिए कई परस्पर जुड़ी घटनाओं का संगम बन गया है। एक तरफ अमेरिका और चीन व्यापार, निवेश, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों पर संवाद बढ़ाकर आर्थिक तनाव कम करने का संकेत दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका- ईरान तनाव और होर्मुज की अनिश्चितता उसी वैश्विक अर्थ व्यवस्था के सामने ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा जोखिम खड़ा कर रही है।
भारतीय शेयर बाजार की 24 सितंबर की तेज गिरा वट इस बात का उदाहरण है कि हजारों किलो मीटर दूर समुद्री मार्ग पर पैदा हुआ भू- राजनीतिक तनाव कितनी तेजी से निवेशकों की संपत्ति और बाजार मनोविज्ञान को प्रभावित कर सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यदि ईरान के सात -दिवसीय प्रस्ताव पर अमेरि का और ईरान किसी व्यावहा रिक समझ तक पहुंचते हैं और होर्मुज में सामान्य समुद्री आवा गमन बहाल होता है, तो तेल तथा वैश्विक बाजारों के लिए तनाव घटने की संभावना बन सकती है, लेकिन यदि कूट नीति विफल होती है और टकराव बढ़ता है, तो ऊर्जा कीमत, जहाजरानी लागत, महं गाई और निवेश धारणा पर दबाव जारी रह सकता है। यही कारण है कि दुनिया की निगाह अब केवल वाशिंगटन, तेहरान, बीजिंग या न्यूयार्क पर नहीं, बल्कि होर्मुज के उस समुद्री रास्ते पर भी टिकी है जहां से आने वाला अगला संकेत दुनिया के बाजारों की दिशा बदल सकता है। भारत के लिए संदेश स्पष्ट है, ऊर्जा स्रोतों का विविधी करण, रण नीतिक भंडार, मजबूत आपूर्ति शृंखला और घरेलू आर्थिक स्थिरता वैश्विक अनि श्चितता के दौर में पहले से कहीं अ धिक महत्वपूर्ण हो गई है।
होर्मुज खुला तो राहत,टकराव बढ़ा तो महंगा तेल ! अगले 7 दिनों पर टिकी वैश्विक अर्थव्यवस्था, भारत के बाजार- रुपये-महंगाई की भी अग्निपरीक्षा
