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क्रिकेट के मैदान पर लौटा अमन, बीमारी से थमी जिंदगी फिर हुई सामान्य

(राममिलन शर्मा)
रायबरेली। शाम होते ही जब मोहल्ले के बच्चे क्रिकेट खेलने मैदान की ओर निकलते हैं, तो 11 वर्षीय अमन (बदला हुआ नाम) भी अब उनके साथ होता है। कुछ महीने पहले तक यही मैदान उसके लिए सिर्फ दूर से देखने की जगह बन गया था। उसका जुड़वां भाई नमन (बदला हुआ नाम) उसका सबसे खास खेल साथी था। दोनों साथ स्कूल जाते, साथ खाते और शाम को घंटों क्रिकेट खेलते थे। लेकिन लगा तार बीमारी ने अम न की यह दिनचर्या बदल दी थी।
बार-बार खांसी-जुकाम और बुखार, कमजोरी और उम्र के हिसाब से वजन न बढ़ने के कारण वह खेल से दूर होता गया। बीमारी के चलते स्कूल जाना भी नियमित नहीं रहा। स्कूल पहुंचता तो पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना मुश् िकल होता। मां सीमा (बदला हुआ नाम) भी उसकी सेहत को लेकर लगातार चिंतित रहती थीं और दूसरे बच्चों की तुलना में अमन पर अधि क ध्यान देने लगी थीं।
स्कूल के शिक्षकों ने भी उसके व्यवहार में बदलाव मह सूस किया। जब उन्हें अमन की बीमारी के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने उसका सह योग किया और पढ़ाई के साथ उसकी स्थिति पर भी विशेष ध्यान दिया। अमन के माता- पिता ने उसकी लगातार खराब तबीयत को देखते हुए कई चिकि त्सकों से सलाह ली, लेकिन बीमारी की वजह स्पष्ट नहीं हो सकी। इस बीच परि वार के एक परिचित ने सलाह दी कि वजन न बढ़ने और बार – बार बीमार पड़ने के कारण अमन की टीबी की जांच भी कराई जाए।
पिता रवींद्र (बदला हुआ नाम) उसे सामुदायिक स्वास् थ्य केंद्र बछरावां लेकर पहुंचे। बलगम की जांच में टीबी की पुष्टि नहीं हुई। हालांकि, चि कित्सकों ने उसके गले में गांठ देखी और आगे की जांच के लिए जिला अस्पताल रेफर किया। जिला अस्पताल में एफएनएसी जांच के बाद गले की गांठ में टीबी की पुष्टि हुई। लंबे समय से चली आ रही परेशानी की वजह सामने आने के बाद परिवार ने राहत महसूस की और अमन का उपचार शुरू हुआ।
सीएचसी पर अमन का उप चार करीब नौ महीने चला। इस दौरान आशा कार्यकर्ता सुधा लगातार परिवार के संप र्क में रहीं। उन्होंने माता-पिता को नियमित उपचार और नि र्धारित फालोअप के महत्व के बारे में समझाया तथा बच्चे की स्थिति पर नजर रखने में सहयोग किया।
लंबे उपचार के दौरान आशा की नियमित काउंसलिंग से परिवार उपचार की प्रक्रिया से जुड़ा रहा। वह परिवार और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी रहीं और अमन के उपचार एवं फा लोअप से संबंधित जरूरी सह योग देती रहीं।
उपचार शुरू होने के समय अमन का वजन 21 किलो था। उपचार के दौरान उसकी सेहत में धीरे-धीरे सुधार दिखाई देने लगा। इलाज पूरा हुए करीब तीन महीने हो चुके हैं और अब उसका वजन बढ़कर 27 किलो हो गया है। वजन बढ़ने के साथ उसकी कम जोरी भी कम हुई और सक्रि यता वापस आने लगी।
उसने स्कूल जाना निय मित किया और पढ़ाई में भी उसका ध्यान पहले की तरह लगने लगा। इसके बाद वह फिर से क्रिकेट खेलने मैदान में पहुंचने लगा। अमन के लिए यह सिर्फ खेल में वापसी नहीं थी। यह उस रोजमर्रा की जिंदगी में लौटने का संकेत था, जिससे वह बीमारी के कारण कुछ समय के लिए दूर हो गया था। अब वह स्कूल जाता है, पढ़ाई करता है और दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल ता है। उसका जुड़वां भाई नमन भी फिर अपने पुराने खेल साथी के साथ समय बिता रहा है।
अमन की कहानी बताती है कि बच्चों में लगातार कमजो री, वजन का न बढ़ना, बार-बार बीमार पड़ना या उनकी पढ़ाई और सामान्य गतिविधियों में बदलाव जैसे संकेतों को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। उ सकी शुरुआती बलगम जांच में टीबी की पुष्टि नहीं हुई थी, लेकिन चिकित्सकीय जांच और आगे की जांच प्रक्रिया से बी मारी की पहचान संभव हुई। समय पर जांच, उपचार की निरंतरता, फालोअप और परिवार की काउंसलिंग ने अमन को फिर अपनी सामान्य दिनचर्या में लौटने में मदद की। आज शाम जब बच्चे क्रिकेट खेलने मैदान की ओर निकलते हैं, तो अमन भी उनके साथ होता है अपने उसी पुराने साथी, अपने जुड़वां भाई नमन के साथ।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. मनोज कुमार शुक्ला कहते हैं, “बच्चों का स्वास्थ्य परिवार के साथ-साथ पूरे समाज की जिम्मेदारी है। टीबी का उप चार संभव है और नियमित उपचार पूरा करने पर बच्चे स्वस्थ होकर अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट सकते हैं।
अमन के मामले में उपचार के साथ परिवार को लगातार सहयोग और परामर्श मिला, जिससे वह आज दोबारा स्कूल और खेल की गतिविधियों से जुड़ सका है। स्वास्थ्य विभाग का प्रयास है कि टीबी से प्रभावित प्रत्येक बच्चे को सम य पर उपचार, आवश्यक सह योग और नियमित फॉलोअप मिले, ताकि बीमारी का असर उसकी पढ़ाई और सामान्य जीवन पर लंबे समय तक न रहे।” जिला क्षय रोग अधि कारी डा. अनुपम सिंह ने कहा, “बच्चों में टीबी की पहचान के लिए केवल खांसी जैसे सा मान्य लक्षणों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। वजन का अपेक्षित रूप से न बढ़ना, लंबे समय से कमजोरी या बार- बार बीमार पड़ना जैसे संकेतों को भी गंभीरता से लेना चाहिए। जांच के दौरान यदि प्रारंभिक जांच से टीबी की पुष्टि नहीं होती, लेकिन चिकित्सकीय संदेह बना रहता है, तो बच्चे की स्थिति के अनुसार आगे की जांच और रेफरल जरूरी है। अमन के मामले में गले में गांठ मिलने के बाद आगे की जांच से टीबी की पुष्टि हुई। ऐसे मामलों में समय पर रेफ रल, उपचार की शुरुआत और नियमित फालोअप टीबी नियं त्रण कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।”
जनपद में एक जनवरी से अब तक कुल 225 टीबी से ग्रसित बच्चे नोटिफा इड हुए। जिसमें 83 पल्मोनरी और 142 एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी से ग्रसि त बच्चे थे। कुल 109 लड़के और और 116 लड़कियां थीं।

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