एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर इक्कीस वीं सदी में चिकित्सा विज्ञान ने ऐसी ऊँचाइयाँ हासिल कर ली हैं, जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले तक असंभव मा नी जाती थी। जटिल सर्जरी, अत्याधुनिक कैंसर उपचार, अंगप्रत्यारोपण रोबोटिक तक नीक और जीवनरक्षक दवा ओं ने करोड़ों लोगों के जीवन को नई उम्मीद दी है। लेकिन इस वैज्ञानिक उपलब्धि के समानांतर एक गंभीर मानवीय प्रश्न आज भी पूरी दुनियाँ के सामने खड़ा है, क्या इलाज उपलब्ध होने मात्र से स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित हो जाती है? यदि किसी गरीब परिवार को अस्पताल में उपचार तो मिल जाए, लेकिन इलाज के दौरान रहने, भोजन, परिवहन, कागजी प्रक्रिया और देखभाल के खर्च के कारण वह कर्ज में डूब जाए, तो क्या इसे पूर्ण स्वास्थ्य न्याय कहा जा सक ता है? यही वह बिंदु है जहां दिनांक 23 अगस्त 2026 को महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश पर प्रस्ता वित सरकार, धर्मादायध्निजी अस्पतालों और स्वयंसेवी सं स्थाओं के बीच त्रिपक्षीय सा मंजस्य करार का विचार महत्व पूर्ण हो जाता है। यह पहल केवल चिकित्सा खर्च को कम करने की अवधारणा नहीं है, बल्कि मरीज के साथ आने वाले परिवार की सामाजिक, आर्थिक और मानवीय सुरक्षा को स्वास्थ्य व्यवस्था का हि स्सा मानने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सोच प्रस्तुत करती है। मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि इस माॅडल को भारत के हर राज्य केंद्र शासित प्रदेश ही नहीं दुनिया के हर देश ने अपनाना चाहिए क्योंकि विश्व स्तरपर स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला निजी खर्च है। गरीब और निम्न-मध्यम आय वाले परिवारों के लिए गंभीर बीमारी केवल चिकित्सकीय संकट नहीं होतीय वह आर्थिक संकट भी बन जाती है। किसी मरीज को कैंसर, हृदय रोग, किडनी की गंभीर बीमारी या किसी जटिल सर्जरी के लिए महान गर में जाना पड़े, तोअस्पताल का बिल केवल समस्या का एक हिस्सा होता है। परिवार को कई सप्ताह या महीनों तक किराये का कमरा, भोजन, स्थानीय परिवहन, जांचों के लिए आवाजाही और अन्य आ वश्यकताओं पर खर्च करना पड़ सकता है। ग्रामीण और दूर दराज के क्षेत्रों से आने वाले परिवारों के लिए यह बोझ और भी गंभीर हो जाता है। अने क मामलों में मरीज के इलाज की व्यवस्था किसी सरकारी योजना या अस्पताल की रि यायत से हो जाती है, लेकिन तीमारदारों की बुनियादी जरू रतें अनदेखी रह जाती हैं। यही वह खाली स्थान है जिसे महाराष्ट्र का त्रिपक्षीय मॉडल भरने की सटीकता से कोशि श करता है।
साथियों बात अगर हम इस माॅडल को समझने की करें तो इस माॅडल की मूल शक्ति इसकी त्रिपक्षीय संरच ना में है। पहला स्तंभ राज्य सरकार है, जो नीति, वित्तीय सहायता, डिजिटल सत्यापन, निगरानी और जवाबदेही का ढांचा तैयार करती है। मुख्य मंत्री वैद्यकीय सहाय्यता कक्ष जैसे तंत्र का उद्देश्य जरूरत मंद मरीजों को सरकारी चि कित्सा सहायता तक पहुंचा ने में मदद करना है। दूसरा स्तंभ धर्मादाय अथवा निजी अस्पताल हैं, जिनके पास वि शेषज्ञ चिकित्सक, आधुनिक उपकरण, आॅपरेशन थिएटर, आईसीयू और जटिल उपचार की क्षमता उपलब्ध है। तीसरा और सबसे मानवीय स्तंभ स्वयं सेवी संस्थाएं तथा चैरिटेबल संगठन (एनजीओस) हैं, जो मरीज और उसके परिवार को अस्पताल के बाहर की उन ज रूरतों से जोड़ सकते हैं जिन्हें पारंपरिक स्वास्थ्य व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज कर देती है। इस प्रकार सरकार की नीति, अस्पताल की चिकित्सा क्षमता और नागरिक समाज की मानवीय संवेदना एक सा झा व्यवस्था में जुड़ती है।
साथियों, इस माॅडल का सबसे महत्वपूर्ण नवाचार यह है कि स्वास्थ्य सेवा को केवल अस्पताल के भीतर होने वाली चिकित्सा प्रक्रिया नहीं माना जाता। किसी गरीब परिवार के लिए अस्पताल तक पहुंचना ही एक चुनौती हो सकता है। महानगर में पहुंचने के बाद सही विभाग ढूंढना, डाॅक्टर तक पहुंचना, सरकारी सहायता के दस्तावेज तैयार करना, जांचों की तारीख समझना,दवाओं की व्यवस्था करना और रहने -खाने की समस्या से निपट ना अलग- अलग कठिनाइयां हैं। यदि एक पंजीकृत और ज वाबदेह एनजीओस मरीज के परिवार के लिए हेल्थ नेविगेट र की भूमिका निभाए, तो वह परिवार को व्यवस्था के भीतर रास्ता दिखा सकता है। इस व्यवस्था में विश्राम गृह, कम लागत या मुफ्त भोजन, स्था नीय परिवहन संबंधी सहाय ता, दस्तावेजी मार्गदर्शन और मानसिक संबल जैसी सेवाएं शामिल की जा सकती हैं। इससे उपचार की वास्तविक पहुंच केवल कागज पर नहीं, बल्कि जमीन पर मजबूत हो सकती है।
साथियों इसे एक उदाहर ण के रूप में ऐसा समझा जा सकता है कि कल्पना कीजिए कि महाराष्ट्र के किसी दूरस्थ गांव का एक गरीब परिवार अपने आठ वर्षीय बच्चे को ले कर मुंबई या पुणे के किसी बड़े अस्पताल पहुंचता है। बच्चे को गंभीर हृदय रोग है और लंबे उपचार की आवश्यकता है। पारंपरिक व्यवस्था में परि वार को इलाज की आर्थिक चिंता के साथ महानगर में र हने का संकट भी झेलना पड़ सकता है।लेकिन यदि एक प्रभावी त्रिपक्षीय प्रणाली पहले से सक्रिय हो, तो मरीज का सरकारी सहायता के लिए डिजिटल सत्यापन, अस्पताल में उपचार की उपलब्धता और परिवार के लिए सुरक्षित आ वास एवं भोजन एक समन्वित प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं। इससे परिवार को अलग – अलग संस्थाओं के चक्कर लगाने के बजाय एकीकृत स हायता मिल सकती है। इस उदाहरण का सबसे बड़ा सं देश यह है कि स्वास्थ्य सुरक्षा का अर्थ केवल मरीज को आॅपरेशन टेबल तक पहुंचाना नहीं, बल्कि उसे उपचार की पूरी यात्रा सुरक्षित और गरिमा पूर्ण तरीके से पूरी करने में सटिका से सक्षम बनाना है।
साथियों, इस माॅडल का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम धर्मा दाय अस्पतालों और सामा जिक संसाधनों का बेहतर उप योग है। भारत के अनेक हि स्सों में ऐसे अस्पताल और ट्र स्ट मौजूद हैं जिन्हें सार्वजनि क हित, धर्मादाय गतिविधियों या रियायती सरकारी सुविधा ओं के आधार पर सामाजिक दायित्व निभाने होते हैं। यदि गरीब मरीजों के लिए निर्धारि त सेवाओं की पारदर्शी निगरा नी हो, डिजिटल रिकाॅर्ड बना ए जाएं और पंजीकृत एनजी ओस को सामाजिक आॅडिट तथा सहायता व्यवस्था में जि म्मेदार भूमिका दी जाए, तो उपलब्ध चिकित्सा संसाधनों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। इसका अर्थ केवल अधिक मुफ्त बेड उपलब्ध कराना नहीं है इसका अर्थ है कि जिस सा माजिक दायित्व के लिए सं स्थागत सुविधाएं विकसित हुई हैं, उसका वास्तविक लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे।
साथियों तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र बिचैलियों और अनधि कृत दलालों की भूमिका को कम करना है।बड़े अस्पतालों के आसपास आने वाले ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर मरीज अक्सर जानकारी की कमी के कारण गलत लोगों के संपर्क में आ जाते हैं। उन्हें महंगी एम्बुलेंस, अनावश्यक जांच, संदिग्ध दवाओं अथवा गैरजरूरी सेवाओं के लिए भुग तान करना पड़ सकता है। यदि सरकारी सहायता, अस्प ताल की सेवाएं और पंजीकृत एनजीओस की सहायता एक पारदर्शी डिजिटल प्रणाली से जुड़ी हों, तो मरीज के पास आधिकारिक जानकारी का वि श्वसनीय स्रोत उपलब्ध होगा। इससे अनौपचारिक दलाली की गुंजाइश कम की जा सकती है। हालांकि यह तभी संभव होगा जब एनजीओस का च यन, वित्तीय पारदर्शिता शिका यत निवारण और स्वतंत्र आॅ डिट भी उतनी ही मजबूती से लागू किए जाएं।
साथियों, राष्ट्रीय स्तर पर इस माॅडल की उपयोगिता औ र भी व्यापक हो सकती है। भारत में आयुष्मान भारत प्र धानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी योजनाओं ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए अस्पताल उपचार की वि त्तीय सुरक्षा को मजबूत किया है। लेकिन चिकित्सा बीमा या सरकारी उपचार सहायता और परिवार की गैर-चिकित्स कीय जरूरतें दो अलग-अल ग प्रश्न हैं। इसलिए भविष्य की स्वास्थ्य नीति में उपचार खर्च के साथ श्पेशेंट एंड अटें डेंट सपोर्ट सिस्टमश् को भी जोड़ा जा सकता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, रा जस्थान, गुजरात, तमिलनाडु और अन्य राज्यों में यदि प्रमुख सरकारी, निजी और धर्मादाय अस्पतालों के साथ स्थानीय एनजीओस का सुव्यवस्थित नेटवर्क तैयार किया जाए, तो बड़े महानगरों की ओर होने वाले अनावश्यक मरीज पला यन को कम किया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध विशेषज्ञता का बेहतर उपयोग होगा और मरीजों को अपने राज्य में ही अधिक गरिमापूर्ण उपचार मिल सकेगा।
साथियो यह माॅडल महा नगरीय स्वास्थ्य संस्थानों पर दबाव कम करने की दिशा में भी उपयोगी हो सकता है। भारत में कुछ राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों पर अत्यधिक मरीज भार रहता है। यदि राज्यों में क्षेत्रीय कैंसर केंद्र, कार्डियक संस्थान, मेडिकल काॅलेज और सक्षम धर्मादाय अस्पतालों को एकीकृत रेफरल नेटवर्क से जोड़ा जाए तथा मरीजों और तीमारदारों के लिए सहायता केंद्र विकसित किए जाएं, तो स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्री करण संभव है। इससे मरीजों को केवल इसलिए हजारों कि लोमीटर दूर नहीं जाना पड़ेगा क्योंकि उनके स्थानीय स्वा स्थ्य तंत्र में जानकारी और स मन्वय की कमी है।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस अवधारणा की सं भावनाएं महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका जैसी बीमा-प्रधान स्वास्थ्य व्य वस्था हो अथवा यूरोप की सा र्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियां, गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीज के परिवार पर अप्रत्यक्ष आर्थिक और सामाजिक दबा व कहीं न कहीं मौजूद रहता है। विकसित देशों में भी कैंसर उपचार के दौरान परिवार के सदस्य को नौकरी से छुट्टी लेनी पड़ सकती है, परिवहन और आवास की समस्या हो सकती है तथा दीर्घकालिक देखभाल के कारण मानसिक तनाव बढ़ सकता है। विकास शील देशों में यह संकट और अधिक गहरा है, जहां स्वास्थ्य खर्च के साथ परिवहन, भोजन और आवास की लागत परिवा र को गरीबी की ओर धकेल सकती है। इसलिए सरकार, चिकित्सा संस्थान और नाग रिक समाज के बीच औपचा रिक साझेदारी की अवधारणा वैश्विक स्वास्थ्य नीति में उप योगी सिद्ध हो सकती है।
साथियों, संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-3 काव्या पक उद्देश्य सभी के लिए स्वा स्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देना है। इस लक्ष्य की वास्त विक सफलता केवल अस्पता लों की संख्या या डाॅक्टरों की उपलब्धता से नहीं मापी जा सकती। स्वास्थ्य न्याय का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी है कि आर्थिक स्थिति के का रण कोई व्यक्ति उपचार से वंचित न हो और उपचार प्राप्त करने के बाद उसका परिवा र गरीबी में न धकेला जाए। इसी दृष्टि से त्रिपक्षीय माॅडल को एक संभावित पब्लिक – प्राइवेट-सिविल सोसाइटी हे ल्थ पार्टनरशिप के रूप में देखा जा सकता है अंतरराष्ट्रीय सं स्थाएं ऐसे माॅडलों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया, पार दर्शिता मानक, डिजिटल रेफ रल सिस्टम और सामा जिक आॅडिट के वैश्विक ढांचे सटी कता से विकसित कर सकती हैं। साथियों, इस माॅडल के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे पहली चुनौती है, जवाबदेही। यदि सरकार, अ स्पताल और एनजीओस तीनों जिम्मेदार हैं, तो किसी गलती की स्थिति में जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। दूसरी चुनौती है, एनजीओस का चयन। केव ल पंजीकरण पर्याप्त नहींय उनकी वित्तीय पारदर्शिता, का र्यक्षमता, मानव संसाधन और शिकायत निवारण प्रणाली की जांच जरूरी होगी। तीसरी चुनौती है, डिजिटल विभाजन। ग्रामीण और अशिक्षित मरीजों को केवल आॅनलाइन प्रणाली के भरोसे नहीं छोड़ा जा सक ता। उन्हें भौतिक सहायता केंद्र भी उपलब्ध कराने होंगे। चैथी चुनौती है डेटा सुरक्षा और मरीज की गोपनीयता। स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशी ल जानकारी को साझा करते समय मजबूत साइबर सुरक्षा और स्पष्ट सहमति व्यवस्था आवश्यक होगी। पांचवीं चुनौ ती यह है कि मुफ्त या रिया यती सेवाओं की गुणवत्ता किसी भी परिस्थिति में कम नहीं होनी चाहिए। इसलिए महाराष्ट्र की पहल को यदि व्यापक नीति का रूप देना है तो केवल एमओंयू पर हस्ताक्ष र करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए स्पष्ट पात्रता मान दंड, डिजिटल सिंगल-विंडो प्रणाली, अस्पतालों की सेवा- क्षमता का सार्वजनिक डैश बोर्ड, एनजीओस की स्वतंत्र आॅडिट व्यवस्था, मरीज शिका यत निवारण तंत्र, हेल्पलाइन, सामाजिक प्रभाव का वार्षिक मूल्यांकन और परिणाम आधा रित निगरानी आवश्यक होगी। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सहायता वास्त विक जरूरतमंद तक पहुंचे और किसी भी स्तर पर भ्रष्टा चार, पक्षपात या संसाधनों के दुरुपयोग की गुंजाइश न रहे।
एक मरीज, एक परिवार और तीन मजबूत सहारे – भारत से दुनियाँ तक स्वास्थ्य सुरक्षा की नई वैश्विक राह – क्या महाराष्ट्र का माॅडल बनेगा दुनियाँ के लिए ब्लूप्रिंट?
