एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी – गोंदिया (महाराष्ट)। वैश्विक स्तर पर हाल के दिनों में गुजरात के भावनगर जिले से सामने आई जहरीली शराब की त्रासदी ने एक बार फिर पूरे देश के सामने वह असहज प्रश्न खड़ा कर दिया है, जिसका उत्तर भारत वर्षों से तलाश रहा है जब शराब बंदी लागू है,जब कानून कठोर हैं, जब पुलिस, प्रशासन, आब कारी विभाग और खुफिया तंत्र मौजूद हैं, तब आखिर जहरी ली और अवैध शराब आम लोगों तक पहुंचती कैसे है?
बीती 20 अगस्त 2026 को उपलब्धनवीनतम रिपोर्टों के अनुसार भावनगर त्रासदी में मृतकों की संख्या सात से बढ़ कर आठ हो गई है और करीब 39 लोग उपचाराधीन बताए गए हैं। जांच में कथित रूप से मेथनॉल से तैयार जहरीली शराब, लोकप्रिय ब्रांड की न कली बोतलों और अंतरराज्यीय आपूर्ति नेटवर्क के संकेत मिले हैं। पुलिस ने 21 आरोपि यों को नामजद कर 13 गिर फ्तारियां किए जाने की भी जानकारी दी है।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि भावनगर की घटना इसलिए और गंभीर है क्योंकि गुजरात भारत के उन राज्यों में है जहां दशकों से शराबबंदी लागू है। शराब की बिक्री, खरीद और सेवन पर प्रतिबंध का मूल उ द्देश्य सामाजिक स्वास्थ्य, परिवारों की सुरक्षा और नशे से होने वाले अपराधों को नियंत्रित करना रहा है, लेकिन जमी न पर यदि प्रतिबंधित शराब भूमिगत बाजार में उपलब्ध हो जाए तो समस्या केवल शरा ब सेवन की नहीं रह जातीय वह अवैध अर्थव्यवस्था, संगठित अपराध, भ्रष्टाचार, नकली ब्रांड, रासायनिक विषाक्तता और प्रशासनिक विफलता का संयुक्त संकट बन जाती है। भावनगर में सामने आया क थित नकली आईएमएफएल नेटवर्क इसी खतरनाक तंत्र की ओर संकेत करता है। रिपोर्टों के अनुसार शराब कथित रूप से मध्य प्रदेश से कच्चे माल के साथ जुड़ी थी, जबकि नि र्माण भावनगर क्षेत्र में किए जाने की बात जांच में सामने आई है। डिस्क्लेमर यह पूरी जानकारी मीडिया से ली गई है। साथियों, लेकिन भावनगर की कहानी कोई अकेली कहा नी नहीं है। यह भारत में ज हरीली शराब की उन अनगिनत त्रासदियों की नई कड़ी है जिनमें गरीब और निम्न आय वर्ग के लोग सबसे अधिक प्रभावित होते रहे हैं। वर्ष 20 24 में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची में मेथनाॅल-मिश्रित अवै ध शराब ने ऐसा कहर बरपा या कि देश स्तब्ध रह गया। शुरुआती दिनों में मृतकों की संख्या तेजी से बढ़ी और अंततः सरकारी तथा मीडिया रिपोर्टों में 65 मौतों और 200 से अधिक लोगों के प्रभावि त होने की जानकारी सामने आई। इस त्रासदी में उल्टी, पेटदर्द, दस्त और गंभीर विषा क्तता के लक्षणों के बाद लोगों को अस्पताल पहुंचाया गया। जांच में मेथनाॅल की मौजूदगी सामने आई, जबकि अवैध शराब के नेटवर्क से जुड़े लोगों पर कार्रवाई की गई और प्रशास निक स्तर पर भी अधिकारियों के विरुद्ध कदम उठाए गए। कल्लाकुरिची से ठीक एक वर्ष पहले, मई 2023 में तमिलनाडु के विलुप्पुरम और चेंगलपट्टू जिलों में अवैध शराब पीने से 22 लोगों की मौत हुई थी। एक ही राज्य में लगातार दो वर्षों में ऐसी घटनाओं का सा मने आना इस बात का प्रमाण है कि समस्या किसी एक गांव, एक शराब विक्रेता या एक स्थानीय गिरोह तक सीमित नहीं है। यह उस आपूर्ति शृं खला का हिस्सा है जिसमें अ वैध उत्पादन, रसायनों का दु रुपयोग, वितरण स्थानीय सं रक्षण और मांग, सभी एक- दूसरे से जुड़े हुए हैं। साथि यों, गुजरात स्वयं इस संकट से बार-बार जूझता रहा है। जुलाई 2022 में बोटाद और आसपास के क्षेत्रों में जहरीली शराब की त्रासदी में सरका री आंकड़ों के अनुसार मृतकों की संख्या 42 तक पहुंची थी। उस मामले में औद्योगिक मेथनाॅल के इस्तेमाल की बात सामने आई थी और शुरुआती जांच में यह भी बताया गया था कि रासायनिक पदार्थ को शराब के रूप में इस्तेमाल किया गया। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है,क्योंकि मेथनॉल कोई सामान्य शराब नहीं हैय यह औद्योगिक रसायन है और मानव शरीर में जाने पर गंभीर विषाक्तता,दृदृष्टि-हानि, अंगों की विफलता और मृत्यु तक का कारण बन सकता है।
इसलिए जहरीली शराब की त्रासदी को केवल ‘नकली शराब’ कहकर समाप्त कर देना समस्या की वास्तविक गंभीरता को कम करके देख ना होगा। गुजरात के इतिहा स में इससे भी बड़ी त्रासदी जुलाई 2009 में सामने आई थी, जब अहमदाबाद में जह रीली शराब के सेवन से 136 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग अस्पताल पहुंचे थे। उस घटना के बाद अवैध शराब नेटवर्क पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई और कानून को और कठोर बनाने की चर्चा हुई। लेकिन डेढ़ दशक से अधिक समय बाद भी 2022 और अब 2026 की घटनाएं यह पूछने के लिए मजबूर क रती हैं कि क्या केवल कठोर कानून बनाना पर्याप्त है, अथ वा कानून के प्रभावी क्रियान्व यन के लिए पूरी प्रशासनिक प्रणाली को पुनर्गठित करने की आवश्यकता है?
साथियों, यह प्रश्न केवल गुजरात तक सीमित नहीं है। बिहार में वर्ष 2022 की छपरा – केंद्रित जहरीली शराब त्रा सदी में मृतकों की संख्या बाद में 80 से अधिक पहुंच गईय एक रिपोर्ट के अनुसार 17 दिसंबर तक आंकड़ा 81 तक पहुंच चुका था। बिहार में 2016 से शराबबंदी लागू होने के बावजूद इस तरह की घट नाओं का सामने आना भी उ सी विरोधाभास को रेखांकित करता है, कानून की किताब में प्रतिबंध और जमीन पर अ वैध आपूर्ति, दोनों साथ-साथ चल सकते हैं यदि प्रवर्तन व्य वस्था में गंभीर छेद हों। पंजाब में वर्ष 2020 की जहरीली श राब त्रासदी भी स्वतंत्र भारत की सबसे भयावह घटनाओं में गिनी जाती है। अमृतसर, तरनतारन और गुरदासपुर क्षे त्रों में अवैध शराब के सेवन से मृतकों की संख्या बाद की रिपोर्टों में 120 के आसपास पहुंची। रेउटर्स की शुरुआती रिपोर्ट में 86 मौतों की पुष्टि की गई थी, जबकि बाद की रिपोर्टिंग में आंकड़ा और बढ़ा। इतना ही नहीं, पंजाब में बाद के वर्षों में भी ऐसी घटनाएं सामने आती रहीं 2025 में अमृतसर के मजीठा क्षेत्र में कथित जहरीली शराब से दो दर्जन से अधिक मौतों ने फिर वही सवाल उठाया कि पिछली त्रासदियों से आखि र कितना सबक लिया गया।
साथियों, इन घटनाओं को एक साथ देखने पर भारत के सामने एक भयावह पैटर्न उभरता है। एक राज्य में शराब बंदी है, दूसरे में शराब उपलब्ध है लेकिन गरीबों के लिए महं गी हैयकहीं अवैध शराब स स्ती होने के कारण बिकती है, कहीं प्रतिबंध के कारण भूमिगत बाजार बनता है और कहीं संगठित अपराधी लोक प्रिय ब्रांड की बोतलों में जह रीला तरल भरकर उपभोक्ता को भ्रमित करते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वास्तविक पीड़ित प्रायः वही लोग बनते हैं जिनके पास महंगी चिकि त्सा सुविधा, कानूनी सहाय ता और सामाजिक सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। जहरीली शराब केवल शरी र को नहीं मारतीय वह पूरे परिवार की आर्थिक रीढ़ तोड़ देती है। परिवार का कमाने वाला सदस्य मरता है तो पीछे बच्चों की शिक्षा, बुजुर्गों की देखभाल, कर्ज, भोजन और भविष्य सभी प्रश्न बनकर खड़े हो जाते हैं।
साथियों, इस संकट की जड़ में केवल उपभोक्ता को दोष देना आसान है, लेकिन पर्याप्त नहीं। निश्चित रूप सेअवैध शराब का सेवन गंभीर जोखिम है और लोगों को ऐसी शराब से दूर रहना चाहिए, प रंतु शासन का दायित्व केवल नागरिकों को चेतावनी देना नहीं है। शासन को यह सुनि श्चित करना होगा कि जह रीला उत्पाद बाजार तक प हुंच ही न सके। इसके लिए पुलिस और आबकारी विभाग की पारंपरिक छापेमारी व्यव स्था से आगे बढ़कर सप्लाई – चेन इंटेलिजेंस विकसित करनी होगी। मेथनाॅल और अन्य औद्योगिक रसायनों की खरीद-बिक्री, परिवहन और अंतिम उपयोग की डिजिटल निगरानी, संदिग्ध थोक खरी द की पहचान, नकली बोतलों और लेबलों केउत्पादन पर कार्रवाई तथा अंतरराज्यीय सूचना साझाकरण को अनि वार्य बनाया जाना चाहिए। भावनगर की घटना इस दृष्टि से विशेष चेतावनी है कि यदि जहरीली शराब कथित रूप से एक राज्य से दूसरे राज्य तक कच्चे माल के माध्यम से पहुंच सकती है और फिर स्था नीय स्तर पर तैयार होकर न कली ब्रांड के रूप में बाजार में जा सकती है, तो केवल जिला पुलिस की कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। यह अंतर राज्यीय संगठित अपराध की तरह जांच मांगती है। पुलिस, आबकारी, राजस्व, रसायन एवं उद्योग विभाग, स्वास्थ्य विभाग और साइबर/वित्तीय जांच एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करने की व्यवस्था आवश्यक है। जिस प्रकार मादक पदार्थों के नेट वर्क की जांच में वित्तीय लेन देन, मोबाइल संचार और स प्लाई चैन का विश्लेषण किया जाता है, उसी प्रकार अवै ध शराब के बड़े नेटवर्क पर भी सटीकता से किया जाना चा हिए। साथियों, एक और महत्वपूर्ण प्रश्न प्रशासनिक जवाबदेही का है। हर त्रासदी के बाद कुछ गिरफ्तारियां, कुछ निलंबन और कुछ छापेमारी होती हैयलेकिन कुछ महीनों बाद व्यवस्था फिर सामान्य हो जाती है। यही चक्र सबसे बड़ा खतरा है। आवश्यकता इस बात की है कि किसी क्षेत्र में अवैध शराब पकड़े जाने पर केवल विक्रेता नहीं, बल्कि उस क्षेत्र में लंबे समय तक चल रही अवैध भट्ठियों और वितरण नेटवर्क की प्रशास निक जवाबदेही भी तय हो। यदि किसी इलाके में वर्षों से अवैध शराब बिक रही है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि स्थानीय खुफिया तंत्र को इस की जानकारी क्यों नहीं हुई? यदि जानकारी थी तो कार्रवा ई क्यों नहीं हुई? और यदि कार्रवाई हुई तो नेटवर्क इतनी सटिका से दोबारा कैसे खड़ा हो गया?
साथियों, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को इस समस्या को केवल कानून-व्यवस्था के प्रश्न के रूप में नहीं बल्कि पब्लिक हेल्थ और फूड-सेफ्टी जैसी बहु-क्षेत्रीय चुनौती के रूप में देखना होगा। जहरी ली शराब का संकट अचानक सामने आने वाली सामूहिक विषाक्तता है, इसलिए प्रत्येक जिले में त्वरित प्रतिक्रिया प्रो टोकाॅल होना चाहिए। अस्प तालों में मेथनॉल विषाक्तता की पहचान तत्काल उपचार, विष – विज्ञान प्रयोगशालाओं की क्षमता और चिकित्सकों के लिए प्रशिक्षण को मजबूत करना होगा। घटना के शुरु आती घंटों में जितनी तेजी से संदिग्ध शराब के नमूने सु रक्षित किए जाएं और मरीजों की पहचान हो, उतनी ही अ धिक जानें बचाई जा सकती हैं। इसके साथ ही उपभोक्ता जागरूकता को भीआधुनिक बनाया जाना चाहिए। केवल यह कहना कि अवैध शराब न पीएं पर्याप्त नहीं है। ग्रामीण और शहरी गरीब समुदायों तक स्थानीय भाषाओं में यह जानकारी पहुंचनी चाहिए कि मेथनॉल विषाक्तता के लक्षण क्या हैं,कब तत्काल अस्पताल जाना है, संदिग्ध शराब को छूने या पीने के बाद क्या कर ना है और किस प्रकार के उत्पादों से विशेष सावधानी बरतनी है। स्वास्थ्य व्यवस्था को भी यह समझना होगा कि जहरीली शराब की घटना में हर घंटा निर्णायक हो सक ता है। साथियों, सबसे महत्व पूर्ण बात यह है कि भावनगर, कल्लाकुरिची, बोटाद, बिहार और पंजाब की घटनाओं को अलग-अलग राज्य की राज नीतिक घटनाओं के रूप में देखने की भूल नहीं की जानी चाहिए। इनके बीच एक साझा राष्ट्रीय चुनौती दिखाई देती है, अवैध शराब का बाजार मांग, गरीबी, बेरोजगारी की मत, प्रतिबंध, संगठित अपराध, कमजोर निगरानी और भ्रष्टा चार के मिश्रण से पैदा होता है। इसलिए समाधान भी ब हुआयामी होना चाहिए। शरा बबंदी हो या नियंत्रित बिक्री दोनों माॅडलों में राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी नागरिकों की जान की सुरक्षा है। नीति का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह अवैध और जहरीले बाजार को कित ना कमजोर करती है, न कि केवल इस आधार पर कि कानून कितना कठोर है।आज भावनगर में आठ मौतों और दर्जनों लोगों के अस्पताल पहुं चने की खबर केवल गुजरात के लिए चेतावनी नहीं है यह पूरे भारत के लिए एक राष्ट्रीय अलार्म है। कल्लाकुरिची में 65 मौतें होने के बाद भी यदि कुछ समय बाद किसी दूसरे राज्य में वही कहानी दोहराई जाती है, तो समस्या केवल अपराधियों की नहीं रह जाती, यह संस्थागत सीख की कमी का संकेत बन जाती है। भारत को अब हर जहरीली शराब त्रासदी के बाद ‘कितने गिर फ्तार हुए’ पूछने से आगे बढ़ कर यह पूछना होगा कि कित ने नेटवर्क खत्म हुए, कितनी अवैध भट्टियां स्थायी रूप से बंद हुईं, मेथनाॅल की अवैध आपूर्ति कितनी रोकी गई, कितने अधिकारियों की जवा बदेही तय हुई और अगली त्रासदी रोकने के लिए क्या स्थायी व्यवस्था बनाई गई?
जहरीली शराब का काला साम्राज्य – एक तरफ शराबबंदी, दूसरी तरफ जहरीली शराब का कारोबार! क्या भारत का सिस्टम मिलावटखोर माफिया के आगे बेबस है?
