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यदि 2047 का विकसित भारत वास्तव में सबका विकास, सबकी सुरक्षा और सबका स्वास्थ्य चाहता है, तो सर्पदंश के खिलाफ लड़ाई को भी विकास के एजेंडे का हिस्सा बनाना होगा

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी – गोंदिया। वैश्विक स्तर पर भारत 2047 तक विकसित भारत बनने की महत्वाकांक्षी यात्रा पर आगे बढ़ रहा है। डिजिटल इंडिया, आर्टिफिशि यल इंटेलिजेंस आधुनिक चि कित्सा, टेलीमेडिसिन डिजिट ल स्वास्थ्य रिकाॅर्ड और अत्या धुनिक संचार व्यवस्था के इस दौर में देश की विकास-गाथा तभी पूर्ण मानी जा सकती है, जब एक गरीब, ग्रामीण, आदि वासी अथवा दूरदराज के परि वार की जिंदगी भी उतनी ही मूल्यवान समझी जाए जितनी किसी महानगर में रहने वाले नागरिक की। इसी कसौटी पर सर्पदंश आज भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक असहज लेकि न अत्यंत गंभीर प्रश्न बनकर खड़ा है। अनुमानित रूप से भारत में हर वर्ष लाखों लोग सर्पदंश का सामना करते हैं और लगभग 50 हजार या उस से अधिक मौतों का अनुमान लगाया गया है उपलब्ध शोध भारत को वैश्विक सर्पदंश मृत्यु-भार के लगभगआधे से जोड़ता है? हालांकि सरकारी निगरानी के आंकड़े इससे बहुत कम हैं, और यही अंतर बताता है कि समस्या केवल मृत्यु की नहीं, बल्कि अंडर-रि पोर्टिंग, समय पर उपचार न मिलने और कमजोर निगरानी व्यवस्था की भी है।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह जानकारी देना चाहूंगा कि महाराष्ट्र सरकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने बीती दिनांक 18 अगस्त 2026 (मंगलवार) को सर्पदंश को आधिकारिक तौर पर अधि सूचित बीमारी घोषित किया है और इसका आधिकारिक नोटिफिकेशन (अधिसूचना) जारी हो चुका है। मार्च 2026 में संसद में दिए गए उत्तर के अनुसार उस समय आठ राज्यों, कर्नाटक, तमिलनाडु, मेघालय, नागालैंड त्रिपुरा, केरल, ओ डिशा और अब महाराष्ट्र में सर्पदंश को अधिसूचित किया गया है सवाल उठता है कि, केंद्री व बाकी राज्यों द्वारा इसको सूची में समाहित की घोषणा कब की जाएगी? क्या वहां किसी घटना का इंतजार किया जा रहा है? इस संकट की भयावहता को महाराष्ट्र के गडचिरोली जिले के धानोरा तालुका स्थित जपतलाई की अनुदानित आदिवासी आश्रम शाला की घटना ने एक बार फिर देश के सामने ला खड़ा किया है। अगस्त 2026 में इस आवासीय विद्यालय के छात्रा वास में रात के समय विषैले सांप के काटने से छह छात्राएं प्रभावित हुईं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार तीन छात्राओं 8, 12 और 14 वर्ष की मृत्यु हो गई, जबकि तीन अन्य छात्राओं का उपचार किया गया। घटना के बाद जिला प्रशासन ने जांच शुरू की और आश्रम शाला की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे। यह केवल तीन परिवारों की त्रासदी नहीं हैय यह उस भारत के साम ने खड़ा प्रश्न है जो 2047 में विकसित राष्ट्र बनने की आ कांक्षा रखता है। यदि हमारे आवासीय विद्यालयों में सो रहे बच्चों की सुरक्षा सर्पदंश जैसी रोकथाम योग्य और उप चार योग्य आपात स्थिति के सामने सुनिश्चित नहीं हो स कती, तो विकास के हमारे माॅडल को केवल डिजिटल कनेक्टिविटी से नहीं, बल्कि जीवन-सुरक्षा की अंतिम मील तक पहुंच से भी परिभाषित करना होगा। होली पर मेरी पूरी नजर लगी हुई थी महा राष्ट्र सरकार लगातार एक्शन ले रही थी और अब 18 अगस्त 2026 को अधिचित बीमारी की सूची में डालने का नोटि फिकेशन जारी किया जो स राहनीय कार्यवाही है।
साथियों बात अगर हम सर्पदंश की त्रासदी का दूसरा पहलू और भी चिंताजनक है इसको समझने की करें तो अंधविश्वास और उपचार में देरी। आज भी अनेक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सांप के काटने के बाद पीड़ित को अस्पताल ले जाने के बजाय ओझा, तांत्रिक, झाड़- फूंक या पारंपरिक उपचार के लिए ले जाने की प्रवृत्ति मौजूद है। इसके पीछे केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संस्था नों से दूरी, परिवहन की कमी, एंटी-स्नेक वेनम की उपलब्ध ता को लेकर अनिश्चितता और चिकित्सा व्यवस्था पर अविश्वास जैसे कारण भी हैं। परिणाम यह होता है कि वह महत्वपूर्ण समय, जिसमें मरीज को जीवनरक्षक चिकित्सा मिल सकती थी, समाप्त हो जाता है। इसलिए सर्पदंश को केवल सांप और इंसान के बीच की घटना मानना गलत होगाय यह स्वास्थ्य व्यवस्था, सामा जिक जागरूकता, शिक्षा, परि वहन, डिजिटल निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा बहुआयामी सार्वजनिक स्वा स्थ्य संकट है।
साथियों बात अगर हम यहीं सर्पदंश को अधिसूचित बीमारी बनाने की आवश्यकता सामने आती है इसको समझने की करें तो, अधिसूचना का मूल महत्व यह है कि स्वास्थ्य संस्थानों में दर्ज होने वाले मा मलों और मौतों की व्यवस्थित सूचना सार्वजनिक स्वास्थ्य नि गरानी तंत्र तक पहुंचे। कर्नाटक ने फरवरी 2024 में इस दिशा में ऐतिहासिक पहल की और सर्पदंश के मामलों तथा मौतों की रिपोर्टिंग को अनिवार्य किया। राज्य के सरकारी और निजी अस्पतालों तथा चिकित्सा संस्थानों को मामलों को इंटे ग्राटेड हेल्थइनफार्मेशन प्लेट फार्म पर दर्ज करने का निर्देश दिया गया। कर्नाटक का अनु भव यह दिखाता है कि अधि सूचना के बाद आंकड़े बढ़ते दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि सर्पदंश अचानक बढ़ गया है बेहतर रिपोर्टिंग के कारण पहले छिपे हुए मामले सामने आने लगते हैं।
जुलाई 2026 की एक रिपोर्ट में कर्नाटक में 2023 से 2025 के बीच रिपोर्ट किए गए मामलों में तेज वृद्धि का उल्लेख करते हुए बताया गया कि बेहतर सर्वेलेंस और डेथ आॅडिट ने समस्या की वास्तवि क तस्वीर सामने लाने में मद द की। साथियों बात अगर हम भारत सरकार ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, इसको समझने की करें तो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 12 मार्च 2024 को नेशनल एक्शन प्लाॅन फाॅर प्रे वेंशन एंड कंट्रोल आॅफ स्ने क बाईट इनवेनोमिंग (एनएपी -एसई) लाॅन्च किया। इसका घोषित विजन 2030 तक सर्प दंश से होने वाली मौतों और विकलांगता को आधा करना है। योजना में उपचार की उप लब्धता, स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता-वृद्धि, रेफरल व्यवस्था, जन-जागरूकता और सर्पदंश की निगरानी जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र भी सर्पदंश निगरानी, स्वास्थ्यक र्मियों के प्रशिक्षण, जिला अ स्पतालों और सामुदायिक स्वा स्थ्य केंद्रों की आपात सेवाओं को मजबूत करने, एंटी-स्नेक वेनम की उपलब्धता की डि जिटल मैपिंग तथा सामुदायि क जागरूकता को प्रमुख रण नीतियों में रखता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रशासनि क प्रश्न है। यदि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर लक्ष्य निर्धा रित किया है कि 2030 तक मृत्यु और विकलांगता को आ धा करना है, तो इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देशभर में विश्वसनीय और तुलनीय डेटा भी चाहिए। साथियों, मार्च 2026 में लोकसभा में दिए गए सरकारी उत्तर के अनुसा र 2023, 2024 और 2025 में आईडीएसपी – आईएचआईपी के माध्यम से रिपोर्ट की गई सर्पदंश मौतें क्रमशः183, 37 0 और 431 थीं। उसी उत्तर में केंद्र सरकार ने बताया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपने संबंधित सार्वजनिक स्वास्थ्य कानूनों के अंतर्गत सर्प दंश को अधिसूचित बीमारी घोषित करने की सलाह दी गई है। इन आंकड़ों और अनु मानित वास्तविक भार के बीच का विशाल अंतर अपने आप में एक चेतावनी है, सरकारी सर्वेलेंस में दर्ज आंकड़े ही पूरी समस्या नहीं हैं। इसलिए केंद्र सरकार के लिए अब अग ला कदम केवल सलाह जारी करना नहीं, बल्कि राज्यों के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय, एक रूप और बाध्यकारी सर्वेलेंस फ्रेमवर्क तैयार करना होना चा हिए। स्वास्थ्य मुख्यतः राज्य का विषय होने के बावजूद सर्पदंश का प्रभाव राज्य की सीमाओं में सीमित नहीं है। सांपों का प्राकृतिक आवास, ग्रामीण आजीविका, कृषि क्षेत्र, जंगल, प्रवासी श्रमिक, आदि वासी आबादी और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, ये सभी अंतर राज्यीय आयाम रखते हैं। केंद्र सरकार राज्यों को उनके संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हुए एक स मान न्यूनतम मानक, डिजिटल रिपोर्टिंग प्रोटोकाॅल, उपचार प्रोटोकाॅल, एंटी-वेनम की उप लब्धता और इमरजेंसी रेफेर रल व्यवस्था के लिए स्पष्ट आॅपरेशनल फ्रेमवर्क दे सकती है।
साथियों बात अगर हम सर्पदंश को अधिसूचित कर ने का सबसे बड़ा लाभ सटी क डेटा है, इसको समझने की करें तो, जब सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों से मामलों की व्यवस्थित सूचना आएगी तो सरकार यह जान सकेगी कि कौन-से जिले, तह सील, गांव और मौसम सर्पदंश के लिहाज से अधिकसंवेदन शील हैं। इसके आधार परस्ने कबाईट हाॅटस्पाॅट्स का डि जिटल मानचित्र तैयार किया जा सकता है। यही डेटा यह तय करने में मदद करेगा कि किस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या जिला अस्पताल में कितना एंटी-स्नेक वेनम उपलब्ध हो ना चाहिए, कहां एम्बुलेंस नेट वर्क मजबूत करना है और किन क्षेत्रों में विशेष जन- जागरूकता अभियान चलाना है। सर्पदंश के बाद प्राथमिक उपचार के संबंध में भी देश व्यापी वैज्ञानिक जागरूकता अत्यंत आवश्यक है। पीड़ित को शांत रखना, काटे गए अंग की अनावश्यक मूवमेंट रोकना, अंगूठी, घड़ी और अन्य कसाव वाली वस्तुएं हटाना तथा उसे तत्काल ऐसे चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाना जहां उचित उप चार उपलब्ध हो, जीवन बचाने में महत्वपूर्ण है। इसके विपरी त घाव काटना, मुंह से जहर चूसना, बर्फ या बिजली का प्र योग करना, घरेलू लेप लगाना अथवा कसकर टूरनिक्वेट बांध ना नुकसानदायक हो सक ता है। सबसे महत्वपूर्ण संदेश स्पष्ट होना चाहिए, झाड़ – फूंक में समय न गंवाएंय सर्प दंश एक चिकित्सा आपात स्थिति है। एंटी-स्नेक वेनम और आवश्यक सपोर्टिंवे केयर तक शीघ्र पहुंच जीवन बचाने की कुंजी है।
साथियों बात अगर हम सर्पदंश की रोकथाम बहुत ही महत्वपूर्ण है इसको समझने की करें तो, खेतों, जंगलों और झाड़ियों में जाने वाले लोगों को उचित जूते पहनने, रात में टाॅर्च का इस्तेमाल करने, घास या झाड़ियों में कदम रखने से पहले सावधानी बर तने और घर के आसपास कूड़ा, लकड़ी, पत्थर तथा अनाव श्यक ढेर न जमा करने की जानकारी दी जानी चाहिए। चूहों कानियंत्रण भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे सांपों के लिए भोजन का स्रोत बन सकते हैं। स्कूलों और आश्रमशालाओं के लिए इससे आगे बढ़कर विशेष स्नेकबाईट सेफ्टी प्रोटोकाॅल बनाया जाना चाहिए, बेड/ सोने की सुरक्षित व्यवस्था, कमरे और परिसर की नियमित जांच, दरवाजों-खिड़कियों की सुरक्षा, रात में रोशनी, स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र से इमर जेंसी लिंकेज और कर्मचारियों की प्राथमिक चिकित्सा प्रशि क्षण अनिवार्य किया जा स कता है।
साथियों बात अगर हम डिजिटल भारत के पास इस समस्या से लड़ने के लिए सा धन भी मौजूद हैं, इसको स मझने की करें तो मोबाइल- आधारित रिपोर्टिंग, जीपीएस -इनेबलड हाॅटस्पाॅट मैपिंग, रियल टाइम दशबोर्ड्स अस्प तालों में एएसवी स्टाॅक अलर्ट स, एम्बुलेंस ट्रैकिंग, टेलीमेडि सिन कंसल्टेशन और स्थानीय भाषाओं में व्हाट्सएप्प अथवा अन्य डिजिटल जागरूकता अभियान सर्पदंश नियंत्रण को नई गति दे सकते हैं। कर्नाटक में रिपोर्टिंग और डेथ आॅडिट के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल सर्वेलेंस केवल आंकड़े जमा करने का माध्यम नहीं, बल्कि मृत्यु के कारणों और स्वास्थ्य-व्यवस्था की कमियों को पहचानने का उप करण भी प्रतिष्ठा से बन स कता है।
साथियों अब समय है कि भारत सर्पदंश को दुर्भाग्यपूर्ण ग्रामीण घटना समझने की मानसिकता से बाहर निकले और इसे राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखे। केंद्र सरकार को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सर्पदंश की अनिवार्य रिपोर्टिंग, मृत्यु की आॅडिट, एएसवी अवे लेबिलिटी, इमरजेंसी रेफेररल, हेअल्थी केयर – वर्कर ट्रेनिंग और कम्युनिटी अवेयरनेस के लिए न्यूनतम राष्ट्रीय मानक लागू हों। राज्यों को अपनी- अपनी विधिक व्यवस्था के त हत इसे अधिसूचित करने की दिशा में तेजी लानी चाहिए। इससे केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों का टकराव नहीं, बल्कि साझी सार्वजनिक स्वा स्थ्य जिम्मेदारी मजबूत होगी।

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