Breaking News

महाराष्ट्र में खाद्य एवं औषधि प्रशासन का नेतृत्व करते हुए तुकाराम मुंडे व हरियाणा में आर.एस.भट्ट द्वारा द्वारा अपनाई गई निष्पक्ष, निर्भीक और भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीतिगत कार्य संस्कृति हर राज्य में जरूरी

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी –  गोंदिया (महाराष्ट्र)। वैश्विक स्तर पर भारत तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है, लेकिन यदि नागरिकों की थाली में परोसा जाने वाला भोजन ही सुरक्षित न हो तो विकास की चमक फीकी पड़ जाती है। बीती 3 जुलाई 2026 को महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत खाद्य सुरक्षा संबंधी आँकड़ों ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र एफडीए के पास 1 जून 2026 तक 13,474 खाद्य नमूनों का लंबित स्टाॅक (बैकलाॅग) परीक्षण के लिए उपलब्ध था। इसके बाद विभाग ने अभियान चलाकर 7,494 नमूनों का परीक्षण किया। जांचे गए 7,4 94 खाद्य नमूनों में से 4,091 नमूने (लगभग 54 प्रतिशत) जो लगभग आधे से अधिक हैं मानव उपभोग के लिए उपयुक्त नहीं पाए गए। यह आँकड़ा केवल महाराष्ट्र की चिंता नहीं है, बल्कि पूरे भारत के लिए चेतावनी है कि खाद्य सुरक्षा को अब केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जन स्वास्थ्य अभियान के रूप में देखा जाए। भारत में हर दिन करोड़ों लोग होटल, ढाबों, स्ट्रीट फूड,मिठाई की दुकानों, डेयरियों पैकेज्ड फूड, आनलाइन फूड डिलीवरी और स्थानीय बाजारों से खाद्य साम ग्री खरीदते हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यदि इन उत्पादों में मिलावट, गलत लेबलिंग, रसायनों का अत्यधिक उपयोग या स्वच्छता का अभाव है, तो इसका सीधा प्रभाव नागरिकों के स्वास्थ्य, बच्चों के विकास, बुजुर्गों की प्रतिरोधक क्षमता और देश की उत्पादकता पर पड़ता है। यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा केवल स्वास्थ्य विभाग का नहीं बल्कि राष्ट्रीय विकास का विषय भी है। महाराष्ट्र के आँकड़ों ने यह स्पष्ट किया है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। यदि निरीक्षण नियमित न हों, दोषियों पर त्वरित कार्रवाई न हो और नागरिकों में जाग रूकता न बढ़े, तो खाद्य सुरक्षा कानून कागजों तक सीमित रह जाते हैं। इसलिए अब समय है कि पूरे भारत में जीरो टाॅलरेंस टू फूड एडल्टरेशन की नीति लागू की जाए। इसी संदर्भ में महाराष्ट्र में खाद्य एवं औषधि प्रशासन का नेतृत्व करते हुए तुकाराम मुंडे द्वारा अपनाई गई कठोर प्रशासनिक कार्यशैली और हरियाणा में आर.एस. भट्ट द्वारा नियमों के सख्ती से पालन कराने वाली कार्यसंस्कृति अक्सर सार्वजनिक चर्चा का विषय रही है। इन अधिकारियों की पहचान किसी व्यक्ति-पूजा से नहीं, बल्कि इस विचार से जुड़ती है कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए, भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता होनी चाहिए और किसी भी प्रकार का दबाव प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित नहीं करना चाहिए। यही वह प्रशासनिक संस्कृति है, जिससे व्यवस्था में जनता का विश्वास मजबूत होता है।
साथियों बात अगर हम भारत के विभिन्न राज्यों की स्थिति को समझने की करें तो देश के सभी राज्यों में समय-समय पर खाद्य सुरक्षा विभाग और एफएसएसएआ ई द्वारा नमूने लिए जाते हैं। हालांकि प्रत्येक राज्य हर वर्ष अलग-अलग संख्या में नमूने एकत्र करता है, इसलिए सीधे प्रतिशत की तुलना करना हमेशा उचित नहीं होता। पिछले वर्षों की आधिकारिक रिपोर्टों से यह स्पष्ट है कि लगभग सभी राज्यों में बड़ी संख्या में नमूने या तो सब – स्टैंडर्ड, मिब्रांडेड अथवा अनसेफ पाए गए हैं। विशेष रूप से निम्न राज्यों में समय-समय पर बड़ी संख्या में उल्लंघन सामने आए हैं महाराष्ट्र, गुजरात उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक तेलंगाना प0 बंगाल, दिल्ली पंजाब, हरियाणा, बिहार, ओडिशा असम, केरल इन राज्यों में दूध, मावा, मिठाइयाँ, मसाले, खाद्य तेल, नमकीन, पैकेज्ड फूड, पानी, पनीर, घी और स्ट्रीट फूड में सबसे अधिक अनियमितताएँ दर्ज की जाती रही हैं। त्योहारों के मौसम में यह संख्या सामान्यतः और बढ़ जाती है। यह भी ध्यान दे ने योग्य है कि फेल होने का अर्थ हमेशा जहरीला होना नहीं होता। कई नमूने मानकों से कम गुणवत्ता (सब-स्टैंडर्ड), गलत लेबलिंग (मिब्रांडिंग) या नियमों के उल्लंघन के कारण भी असफल घोषित किए जाते हैं। जबकि अनसेफ श्रेणी वा स्तव में स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा मानी जाती है।
साथियों बात अगर हम भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण भारत में खाद्य सुरक्षा का कानूनी ढांचा को समझने की करें तो फूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड्स एक्ट, 2006 हैँ, इसी कानून के अंतर्गत देशभर में खाद्य मानक निर्धारित किए जाते हैं और खाद्य कारोबारि यों के लिए लाइसेंस, निरीक्षण तथा दंड की व्यवस्था की गई है। इसके अंतर्गत कार्यरत प्रमुख संस्थाएँ हैं फूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड्स अथाॅरिटी आफ इंडिया, राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) राज्य खाद्य सुरक्षा आयुक्त (फूड सेफ्टी कमिश्नर) नामित अधिकारी, खाद्य सुरक्षा अधिकारी हैँ मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाएँ भी है, इन संस्थाओं का दायित्व केवल नमूने लेना नहीं बल्कि जनजागरूकता, प्रशिक्षण, लाइसेंसिंग, निगरानी और दोषियों पर सटीकता से अभियो जन भी है।
साथियों बात कर हम राज्यों में समान कार्रवाई की आवश्यकता को समझने की करें तो आज भारत में प्रत्येक राज्य का खाद्य सुरक्षा विभाग अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करता है। कहीं निरीक्षण अधिक हैं तो कहीं संसाधनों की कमी है। कहीं प्रयोगशालाएँ आधुनिक हैं तो कहीं रिपोर्ट आने में महीनों लग जाते हैं। इसी असमानता के कारण पूरे देश में खाद्य सुरक्षा का स्तर भी अलग- अलग दिखाई देता है। यदि प्रत्येक राज्य में समान एसओपी (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर) लागू हो, डिजिटल ट्रैकिंग हो, आनलाइन निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए तथा दोषियों की सूची सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए, तो व्यवस्था कहीं अधिक सटीकता से सटिका से पारदर्शी बन सकती है। साथियों बात अगर हम महाराष्ट्र और हरियाणा माॅडल महाराष्ट्र में खाद्य एवं औषधि प्रशासन का नेतृत्व करते हुए तुकाराम मुंडे द्वारा अपनाई गई कठोर प्रशासनिक कार्यशैली और हरियाणा में आर.एस. भट्ट द्वारा नियमों के सख्ती से पालन कराने वाली कार्यसंस्कृति जैसी प्रशासनिक सख्ती सोशल इलेक्ट्राॅनिक प्रिंट मीडिया में चर्चित यदि इसी प्रकार की पारदर्शी, जवाबदेह और जीरो-टाॅलरेंस आधारित कार्यशैली देश के प्रत्येक विभाग के प्रत्येक आयुक्त, आयुक्तालय, जिलाधिकारी, पुलिस प्रमुख, परिवहन आयुक्त, खाद्य सुरक्षा आयुक्त, नगर आयुक्त, स्वास्थ्य आयुक्त और अन्य प्रशासनिक प्रमुख अपनाएँ, तो शासन व्यवस्था में अभूतपूर्व परिवर्तन संभव है। यह कहना एक नैतिक आदर्श है कि ऐसी व्यवस्था भारत को सतयुग जैसी सुशासन व्यवस्था की दिशा में ले जा सकती है अर्थात ऐ सी व्यवस्था जहाँ कानून का सम्मान हो, भ्रष्टाचार न्यूनतम हो और नागरिकों का हित स र्वोपरि हो। देश में समय-समय पर कुछ प्रशासनिक अधिका रियों ने कठोर, निष्पक्ष और परिणामोन्मुख कार्यशैली का उदाहरण प्रस्तुत किया है। ऐसी ही सख्त, पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासनिक शैली जिसे कई लोग तुकाराम मुंडे माॅडल जैसी कार्यसंस्कृति के रूप में देखते हैं खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में भी अपनाई जा सकती है। यदि प्रत्येक राज्य के एफडीए आयुक्त प्रतिदिन आकस्मिक निरीक्षण करें,बड़े फूड हब की नियमित जांच कराएँ, बार -बार नियम तोड़ ने वालों के लाइसेंस तत्काल निलंबित करें, दोषियों के नाम सार्वजनिक करें, मोबाइल फूड टेस्टिंग वैन बढ़ाएँ, प्रयोगशा लाओं की संख्या दोगुनी करें, त्योहारों से पहले विशेष अभि यान चलाएँ, तो मिलावट कर ने वालों में भय उत्पन्न होगा और उपभोक्ताओं का विश्वास भी बढ़ेगा।
साथियों बात अगर हम फूड हब के लिए राष्ट्रीय मानकों को समझने की करें तो, देशभर में बड़े फूड हब विकसित हो रहे हैं। इन स्थानों पर प्रतिदिन हजारों लोगों के लिए भोजन तैयार होता है। ऐसे प्रत्येक फूड हब के लिए अनिवार्य होना चाहिए एचए सीसीपी आधारित सुरक्षा प्रणाली, नियमित माइक्रो बायोलाॅजिकल परीक्षण कर्मचारियों का स्वास्थ्य परीक्षण, डिजिटल तापमान निगरानी, शुद्ध पेयजल, साफ रसोई कीट नियंत्रणसी, सीटीवी आधारित निगरानी, आनलाइन निरीक्षण रिपोर्ट, आधुनिक तकनीक का उपयोगआज आर्टिफिशल इंटेलीजेंस, एलओटी, क्यूआर कोड, ब्लाॅकचैन और डिजिटल ट्रैकिंग जैसी तकनीकें खाद्य सुरक्षा को नई दिशा दे सकती हैं। कल्पना कीजिए यदि प्रत्येक पैकेज पर क्यूर आर कोड स्कैन करते ही उपभोक्ता को निर्माण तिथि, प्रयोगशाला रिपोर्ट, लाइसेंस संख्या और निरीक्षण इतिहास दिखाई दे, तो मिलावट की संभावना सटीकता से स्वतः कम हो जाएगी।
साथियो, यह विषय किसी सरकार, किसी अधिकारी या किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि भारत के 140 करोड़ नागरिकों के जीवन का है। यदि देश का प्रत्येक सार्वजनिक अधिकारी, चाहे वह खाद्य सुरक्षा आयुक्त हो, स्वास्थ्य अधिकारी, परिवहन अधिकारी, नगर आयुक्त या किसी अन्य विभाग का प्रमुखकृकानून के प्रति वही निष्ठा, पारदर्शिता और शून्य सहनशीलता की कार्यसंस्कृति अपनाए जिसकी अपेक्षा नागरिक करते हैं, तो शासन व्यवस्था में व्यापक सुधार संभव है। सुशासन का अर्थ किसी एक व्यक्ति पर निर्भर व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसी संस्थागत संस्कृति है जहाँ नियम सब पर समान रूप से लागू हों, भ्रष्टाचार के लिए कोई स्थान न हो और नागरिक का स्वास्थ्य, सम्मान तथा अधिकार सर्वोच्च प्राथमिकता बने। यही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव होगी और यही वह मार्ग है जिस पर चलकर भारत एक अधिक स्वस्थ, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक विश्वसनीय राष्ट्र के रूप में सटीकता से स्थापित हो सकता है।
साथियों बात अगर हम नागरिकों की भूमिका को समझने की करें तो सरकार अकेले खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकती। नागरिकों की सहभागिता भी आवश्यक है। हर उपभोक्ता को चाहिए, केवल लाइसेंसधारी विक्रेता से खरीदें, बिल अवश्य लें, संदिग्ध खाद्य पदार्थ की शिकायत करें, एक्सपायरी डेट देखें, पैकेजिंग पढ़ें। खुले खाद्य पदार्थ सोच-समझकर खरीदें, बच्चों को जागरूक बनाएं, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि असुरक्षित भोजन केवल बीमारी ही नहीं बढ़ाता, बल्कि कार्यक्षमता शिक्षा, पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डालता है। खाद्य जनित रोगों के कारण अस्पतालों पर भार बढ़ता है, परिवारों का खर्च बढ़ता है और उत्पादक कार्य दिवस कम होते हैं। इसलिए सुरक्षित भोजन पर किया गया निवेश वास्तव में मानव पूंजी में सटीक ही निवेश है।
साथियों बात अगर कर हम राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन की आवश्यकता को समझने की करें तो आज आवश्यकता है कि केंद्र और सभी राज्य मिलकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन प्रारंभ करें, जिसके अंतर्गत, प्रत्येक जिले में आधुनिक खाद्य प्रयोगशाला, प्रत्येक राज्य में मासिक सार्वजनिक रिपोर्ट, राष्ट्रीय डिजिटल डैशबोर्ड, त्वरित न्यायिक प्रक्रिया, भारी आर्थिक दंड, पुनरावृत्ति पर स्थायी लाइसेंस निरस्तीकरण, विद्यालयों और महाविद्यालयों में खाद्य सुरक्षा शिक्षा,नागरिक शिकायतों का समयबद्ध निवारण, जैसी व्यवस्थाएँ लागू की जाएँ।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे के, महाराष्ट्र विधानसभा में प्रस्तुत आँकड़े केवल एक राज्य की रिपोर्ट नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी हैं। यदि बड़ी संख्या में खाद्य नमूने मानकों पर खरे नहीं उत रते, तो यह संकेत है कि नि रीक्षण प्रणाली को और अ धिक वैज्ञानिक, कठोर और पारदर्शी बनाने की आवश्यक ता है।
साथ ही, किसी भी राज्य के आँकड़ों की व्याख्या करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि फेल नमूनों में सब-स्टैंडर्ड, मिब्रांडेड और अनसेफ जैसी अलग-अलग श्रेणियाँ शामिल हो सकती हैं इसलिए इन्हें एक समान स्वास्थ्य जोखिम मानना उचि त नहीं होगा। भारत को अब ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें प्रत्येक राज्य का एफडीए आयुक्त कठोर जवाब देही के साथ कार्य करे, निरी क्षण निरंतर हों, दोषियों पर बिना किसी दबाव के कार्रवाई हो, आधुनिक तकनीक का व्यापक उपयोग किया जाए और नागरिकों को भी खाद्य सुरक्षा अभियान का सक्रिय भागीदार बनाया जाए। जब कानून, प्रशासन, तकनीक और जनभागीदारी एक साथ आगे बढ़ेंगे, तभी हर भारतीय की थाली वास्तव में सुरक्षित होगी। यही स्वस्थ भारत, सक्षम भारत और विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव बनेगी।

ताजा खबरें