एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
(महाराष्ट्र)
गोंदिया – वैश्विक स्तर पर 18 जून 2026 को वैश्विक कूटनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ देखने को मिला,जब अमेरिकी राष्ट्रपति और ईरानी राष्ट्रपति ने बहुच र्चित 14-सूत्रीय इस्लामाबाद मेमोरेंडम आफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर गुरुवार सुबह डिजिटल हस्ताक्षर कर दिए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने 18 जून 2026 को इस समझौते पर आधि कारिक रूप से इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर किए, जिसके बाद यह तुरंत प्रभावी हो गया दोनों देशों के बीच इस अंतरिम समझौते के मुख्य मसौदे पर सहमति रविवार, 14 जून 20 26 को ही बन गई थी. इसके बाद 17 जून 2026 को अमेरि की अधिकारियों ने इसके 14 बिंदुओं को सार्वजनिक तौर पर मीडिया के सामने पढ़ा था, 18 जून 2026 से यह सम झौता लागू होते ही दोनों पक्षों के बीच अगले 60 दिनों के भीतर एक अंतिम और स्थायी शांति समझौते पर पहुंचने के लिए बातचीत की औपचारिक शुरुआत हो गई है, इसके साथ ही अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रहे सैन्य तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य संकट, आर्थिक प्रतिबंधों और परमाणु विवाद को नियंत्रित करने के लिए एक अंतरिम ढांचा औपचारिक रूप से लागू हो गया। यह समझौता तत्काल प्रभाव से युद्धविराम लागू करता है तथा अगले 60 दिनों के भीतर एक स्थायी शांतिसम झौते की दिशा में वार्ता का मार्ग प्रशस्त करता है।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह समझौता केवल दो देशों के बीच का द्विपक्षीय दस्तावेज नहीं है,बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक ऊर्जासुरक्षा अंतरराष् ट्रीय व्यापार, तेल बाजार, शेयर बाजारों, समुद्री परिवहन, पश् िचम एशिया की सामरिक स्थिर ता तथा विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है। यही कारण है कि न्यूयार्क से लेकर टोक्यो, लंदन से लेकर मुंबई और बीजिंग से लेकर ब्रुसेल्स तक वित्तीय संस्थान, निवेशक, तेल कंपनियां और रणनीतिक विशे षज्ञ इस समझौते पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं।
साथियों, समझौते का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु तत्काल और व्यापक युद्धविराम है।अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी पक्षों ने लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को समाप्त करने तथा भविष्य में एक-दूसरे के विरुद्ध बल प्रयोग न करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। पिछले कई महीनों से क्षेत्र में जिस प्रकार मिसाइल हमले, ड्रोन हमले, नौसैनिक अवरोद्द और प्राक्सी संघर्ष चल रहे थे, उनके कारण पूरा पश्चिम एशिया युद्ध के मुहाने पर पहुंच गया था। ऐसे समय में युद्ध विराम की यह घोषणा वैश्विक राहत का विषय बनी है। इस समझौते का दूसरा महत्वपूर्ण आधार दोनों देशों द्वारा एक- दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना है। पिछले चार दशकों से अमे रिका और ईरान के संबंध अवि श्वास, प्रतिबंधों, सैन्य धमकियों और वैचारिक संघर्षों से प्रभा वित रहे हैं। ऐसे में यह प्राव धान भविष्य के संबंधों के लिए एक नया कूटनीतिक आधार तैयार कर सकता है। तीसरा और सबसे चर्चित बिंदु 60 दिनों की वार्ता अवधि है। वास्तव में यह समझौता अंतिम शांति संधि नहीं है बल्कि एक अंत रिम व्यवस्था है।
अगले 60 दिनों में दोनों पक्ष परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबं धों की समाप्ति, सुरक्षा गारंटी, क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग जैसे जटिल मुद्दों पर अंतिम समझौते का प्रयास करेंगे। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि वास्त विक परीक्षा अभी शुरू हुई है। यदि वार्ता सफल रही तो पश्चिम एशिया में एक नया भू-राजनीतिक युग प्रारंभ हो सकता है, जबकि विफलता की स्थिति में तनाव पुनः उभर सकता है।
साथियों, वैश्विक अर्थव्य वस्था की दृष्टि से सबसे महत्व पूर्ण बिंदु होर्मुज जलडमरूम ध्य का पुनः खुलना है। विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। हाल के तना वों के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार- चढ़ाव आया। समझौते के अनुसार ईरान अगले 60 दिनों तक वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित और शुल्क-मुक्त आवाजाही सुनिश्चित करेगा, जबकि अमे रिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों में स्थिरता आने की संभावना बढ़ गई है।
साथियों, भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह प्रावधान विशेष महत्व रखता है। भारत अपने ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा पश्चि म एशिया से प्राप्त करता है। यदि होर्मुज मार्ग सुचारू रूप से खुला रहता है तो तेल कीमतों पर दबाव कम होगा, आयात लागत नियंत्रित रहेगी और मुद्रास्फीति को सीमित रखने में सहायता मिलेगी। इसके परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था, उद्योगों और उप भोक्ताओं को प्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। समझौते का छठा बिंदु 300 अरब डालर के पुन र्निर्माण एवं आर्थिक विकास फंड से जुड़ा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार यह प्रत्यक्ष युद्ध हर्जाना नहीं होगा, बल्कि अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों द्वारा सम र्थित निवेश एवं विकास ढांचा होगा। हालांकि इस प्रावधान को लेकर अभी भी कई प्रश्न बने हुए हैं, क्योंकि कुछ अमेरि की अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह राशि अमेरि की करदाताओं के धन से सीद्दे नहीं दी जाएगी बल्कि इसमें क्षेत्रीय निवेश, निजी पूंजी और ईरान की उपलब्ध संपत्तियों का उपयोग शामिल हो सकता है। ईरान के लिए यह आर्थिक जीवनरेखा साबित हो सकती है। वर्षों से चले आ रहे प्रतिबंद्दों ने उसकी अर्थव्यवस्था, मुद्रा, निवेश वातावरण और ऊर्जा क्षेत्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यदि निवेश प्रवाह शुरू होता है तो ईरान के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा उत्पादन, परिवहन नेटवर्क और औद्योगिक विकास को नया प्रोत्साहन सटीकता से मिल सकता है।
साथियों, सातवां और आठवां बिंदु परमाणु कार्यक्रम से संबंधित है। ईरान ने पुनः घोषणा की है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा तथा अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार के प्रबंधन और संवर्धन स्तर कम करने पर बातचीत करेगा। इस प्रक्रिया में इंटरनेशनल एटॉमिक एन र्जी एजेंसी की केंद्रीय भूमिका होगी। आईएईए प्रमुख ने भी इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा है कि अब तकनीकी स्तर पर कार्य शुरू होगा और निरीक्षण तथा सत्यापन प्रणा ली विकसित की जाएगी।यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि परमाणु मुद्दा ही अमेरिका- ईरान विवाद का मूल कारण रहा है। यदि दोनों पक्ष इस विषय पर स्थायी समाधान तक पहुंच जाते हैं तो यह केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था के लिए भी बड़ी उपलब्धि होगी।
समझौते में यह भी प्राव धान है कि अमेरिका ईरानी तेल निर्यात के लिए तत्काल छूट प्रदान करेगा और प्रति बंधों में चरणबद्ध ढील देगा। इसके अतिरिक्त ईरान की विदेशों में फ्रीज की गई संपत्ति यों को जारी करने की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी।
इससे अंतरराष्ट्रीय बाजा रों में ईरानी तेल की वापसी संभव होगी, जो वैश्विक आपूर्ति बढ़ाकर तेल कीमतों को स्थिर रखने में सटिका से योगदान दे सकती है।
साथियों, हालांकि इस समझौते के समक्ष कई गंभीर चुनौतियां भी हैं। पहली चुनौती विश्वास की है। अमेरिका और ईरान के बीच दशकों का अविश्वास कुछ हस्ताक्षरों से समाप्त नहीं हो सकता। दूसरी चुनौती क्षेत्रीय राजनीति की है। लेबनान, सीरिया, इराक, यमन और इजराइल से जुड़े मुद्दे अब भी संवेदनशील बने हुए हैं। यदि किसी भी मोर्चे पर तनाव बढ़ता है तो समझौते की स्थिरता प्रभावित हो सक ती है। तीसरी चुनौती घरेलू राजनीति की है। अमेरिका और ईरान दोनों देशों में ऐसे राजनीतिक समूह मौजूद हैं जो इस समझौते को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। अमेरिका में कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वाशिंगटन ने बहुत अद्दि क रियायतें दे दी हैं, जबकि ईरान में भी कुछ वर्ग इसे पर्या प्त नहीं मानते। चैथी चुनौती निगरानी और अनुपालन की है। समझौते में एक विशेष कार्यकारी निगरानी तंत्र स्था पित करने का प्रावधान है जो दोनों पक्षों की प्रतिबद्ध ताओं की निगरानी करेगा।
लेकिन वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या दोनों देश अपने वादों को समय पर और पारदर्शी ढंग से लागू करते हैं। साथियों, विश्व शेयर बाजारों ने इस समझौते को फिलहाल सकारा त्मक संकेत के रूप में लिया है। निवेशकों को उम्मीद है कि ऊर्जा आपूर्ति में स्थिरता, समुद्री व्यापार की बहाली और क्षेत्रीय तनाव में कमी से वैश्वि क आर्थिक अनिश्चितता घटे गी। हालांकि अधिकांश वित्तीय संस्थान अभी भी अगले 60 दिनों को निर्णायक अवधि मान रहे हैं। यदि वार्ता सफल रह ती है तो वैश्विक निवेश वाता वरण को बड़ा प्रोत्साहन मिल सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि कहा जा सकता है कि ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम आफ अंडरस्टैंडिंग’ युद्ध का अंतिम समाधान नहीं बल्कि शांति की दिशा में पहला मह त्वपूर्ण कदम है। यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक पुनरुद्धार की आशा जगाता है, लेकिन इसकी सफ लता पूर्णतः अगले 60 दिनों के घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। दुनिया की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या अम ेरिका और ईरान अपने ऐतिहा सिक अविश्वास को पीछे छोड़ कर स्थायी शांति की ओर बढ़ते हैं, या फिर यह समझौता भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के अनेक अधूरे प्रयोगों की सूची में शामिल हो जाएगा। वर्तमान परिस्थिति यों में इतना अवश्य कहा जा सकता है कि 17 जून 2026 का यह समझौता 21वीं सदी की महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाओं में से एक बन चुका है।
वास्तविक परीक्षा अभी शुरू हुई है, वार्ता सफल रही तो पश्चिम एशिया में एक नया भू- राजनीतिक युग प्रारंभ हो सकता है, विफलता की स्थिति में तनाव पुनः उभरेगा
