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संविधान के 73वें और 74वें संशोधन, अनुच्छेद 243-क्यू राज्य नगर पालिका अधिनियमों तथा जनगणना मानकों के ग्रामीण -शहरी प्रशासन के इन मानकों को तात्कालिक संशोधन की जरूरत

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारत आज दुनियाँ के सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाले देशों में शामिल है। देश के हजारों गाँव ऐसे हैं जो वास्तविकता में छोटे-बड़े शहरों का स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं, वहाँ बहुमं जिला इमारतें, औद्योगिक प्रति ष्ठान, निजी अस्पताल, शैक्ष णिक संस्थान, बाजार, बैंकिंग सुविधाएँ, इंटरनेट कनेक्टि विटी, पक्की सड़कें और लाखों की आबादी मौजूद है। इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में वे आज भी ग्राम के रूप में दर्ज हैं। इसके विपरीत कुछ क्षेत्रों में एक ही भौगोलिक क्षेत्र का एक भाग नगर परिषद अथवा नगर निगम में शामिल है जबकि दूसरा भाग ग्राम पंचायत के अधीन है। ऐसी स्थिति में एक ही क्षेत्र के नागरिकों को विकास योजना ओं बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के मामले में अलग-अलग व्यवहार का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति विकास नियोजन की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है और अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि गाँव और शहर निर्धारित करने के मानकों की व्यापक समीक्षा की जाए।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता के तौर पर गंभीरता से सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहूंगा कि मैंने कई शहरों में कई ऐसे स्थान देखें जहां पर रोड, नदी, नाले के इस तरफ शहर व उस तरफ गांव, जिस से वहां बिजली बिल, मकान टैक्स से लेकर जीवन शैली के हर स्टेज पर भेदभाव हो जाता है, वास्तव में किसी क्षेत्र को गाँव अथवा शहर घोषित करना केवल एक प्रशा सनिक औपचारिकता नहीं है,बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव होते हैं। किसी क्षेत्र का दर्जा यह तय करता है कि वहाँ विकास योजनाएँ किस प्रकार लागू होंगी, किस प्रकार का स्थानीय प्रशासन कार्य करेगा, नागरिकों को कौन-कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध होंगी किस प्रकार के कर लगाए जाएंगे, भूमि उपयोग की नीति क्या होगी तथा आधारभूत संरचना का विकास किस दिशा में होगा। यदि कोई क्षेत्र ग्राम पंचायत के अंतर्गत है तो उस पर ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का प्रभाव अधिक रहता है, जबकि नगर परिषद, नगरपा लिका अथवा नगर निगम क्षेत्र में शामिल होने पर शहरी वि कास योजनाएँ, सीवरेज व्यवस् था, नगर परिवहन, स्मार्ट अवसं रचना औरनियोजित विकास जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होने लगती हैं। इसलिए यदि किसी क्षेत्र की वास्तविक स्थिति और सरकारी वर्गीकरण में अंतर हो तो उसका सीधा प्रभाव नागरिकों के जीवन स्तर और विकास के अवसरों पर पड़ता है। साथियों, भारत में गाँव की कोई एक समान राष्ट्रीय कानूनी परिभाषा नहीं है। सामान्यतः गाँवों की पहचान राज्यों के राजस्व अभिलेखों और पंचायत कानूनों के आ धार पर की जाती है। संवि धान के भाग-प्ग् तथा पंचाय ती राज व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम पंचायतों का गठन किया जाता है और राज्य सरकारें अपने-अपने पंचायत अधिनि यमों के अनुसार गाँवों का प्रशा सन संचालित करती हैं।
किसी क्षेत्र को सामान्यतः तब ग्रामीण क्षेत्र माना जाता है जब वह राजस्व अभिलेखों में गाँव के रूप में दर्ज हो, ग्राम पंचायत के प्रशासनिक क्षेत्र में आता हो तथा नगर निकाय की सीमा से बाहर स्थित हो। परंतु पिछले कुछ दशकों में अनेक ऐसे गाँव विकसित हुए हैं जहाँ कृषि गतिविधि यों की जगह उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र ने ले ली है, फिर भी उनका प्रशासनिक दर्जा नहीं बदला है।
साथियों, भारत में शहरों का वर्गीकरण मुख्यतः दो श्रेणियों में किया जाता है, वैधानिक शहर (स्टेटुटरी टाउन) और जनगणना शहर (सेंसस टाउन)। वैधानिक शहर वे होते हैं जिन्हें राज्य सरकार किसी कानून के अंतर्गत नगर निगम, नगर परिषद, नगरपालि का अथवा नगर पंचायत के रूप में अधिसूचित करती है। इनकी स्थापना राज्य के नगर पालिका अधिनियमों केमम अंतर्गत होती है और इनके गठन का अंतिम अधिकार राज्य सरकार के पास होता है। नगर निगम, नगर परिषद, नगर पालिका तथा नगर पंचायत इसी श्रेणी में आते हैं।
किसी क्षेत्र की जनसंख्या, आर्थिक गतिविधियों, राजस्व क्षमता और नगरीय स्वरूप को देखते हुए राज्य सरकारें ऐसे निकायों की स्थापना करती हैं। दूसरी ओर जनग णना शहर की अवधारणा भारत की जनगणना द्वारा विकसित की गई है। जनगणना के अनु सार यदि कोई क्षेत्र तीन नि र्धारित मानकों को पूरा करता है तो उसे जनगणना शहर माना जाता है। पहला, उस क्षेत्र की आबादी कम से कम 5000 होनी चाहिए। दूसरा, वहाँ जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर होना चाहिए।
तीसरा पुरुष मुख्य कार्य बल का कम से कम 75 प्रति शत भाग कृषि के बजाय गैर- कृषि गतिविधियों में संलग्न होना चाहिए। इन मानकों को 1961 कीजनगणना के दौरान प्रमुख रूप से अपनाया गया था और आज भी काफी हद तक इन्हीं का उपयोग किया जाता है।
साथियों, यहीं से समस्या प्रारंभ होती है।1961 का भारत और 2026 का भारत पूरी तरह भिन्न हैं। छह दशक पहले देश की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित थी, औद्योगिकीकरण सीमित था, शहर अपेक्षाकृत छोटे थे और ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या का अनुपात बहुत अधिक था। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। महानगरों का विस्तार कई किलोमीटर दूर तक हो चुका है। अनेक गाँव महानग रों के उपनगर बन चुके हैं। लाखों लोग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हुए प्रतिदिन शह रों में जाकर रोजगार करते हैं। सेवा क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगि की डिजिटल अर्थव्यवस्था और आधुनिक परिवहन ने ग्रामीण एवं शहरीम जीवन के बीच की पारंपरिक दूरी को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। ऐसे में केवल जनसंख्या, घनत्व और गैर-कृषि रोजगार के आधार पर किसी क्षेत्र की वास्तविक प्रकृति का निर्धारण करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
साथियों, भारत के संविद्दा न में ग्रामीण और शहरीस्था नीय निकायों के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था की गई है। वर्ष 1992 में लागू 73वें संविधान संशोधन ने पंचायत राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इसके मा ध्यम से ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद जैसी संस्थाओं को सशक्त बनाया गया। इसी प्रकार 74वें संविधान संशोधन द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को संवैद्दा निक मान्यता प्रदान की गई, जिसके अंतर्गत नगर पंचायत, नगरपालिका और नगर निगम जैसी संस्थाओं को संवैधानिक आधार मिला। संविधान का अनुच्छेद 243-क्यू नगर पंचा यतों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों के गठन से संबं धित है। इस अनुच्छेद के अनुसार राज्य सरकारें स्था नीय परिस्थितियों, जनसंख्या, आर्थिक गतिविधियों, राजस्व क्षमता और नगरीय आवश्यक ताओं को ध्यान में रखते हुए किसी क्षेत्र को शहरी निकाय के रूप में अधिसूचित कर सकती हैं। यद्यपि संविधान ने व्यापक ढाँचा उपलब्ध करा या है, फिर भी शहर घोषित करने का अंतिम अधिकार राज् यों के पास है। प्रत्येक राज्य के नगर पालिका अधिनियम में नगर पंचायत, नगरपालिका अथवा नगर निगम के गठन के लिए अलग-अलग मानदंड निर्धारित हो सकते हैं।
सामान्यतः जनसंख्या जनसंख्या घनत्व, स्थानीय राजस्व, औद्योगिक एवं व्याव सायिक गतिविधियाँ, नगरीय अवसंरचना तथा प्रशासनिक आवश्यकता जैसे तत्वों को ध्यान में रखा जाता है। इसी कारण विभिन्न राज्यों में समान जनसंख्या वाले क्षेत्रों का दर्जा सटीक रूप से अलग- अलग हो सकता है।
साथियों, जब किसी क्षेत्र का प्रशासनिक वर्गीकरण उसकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता तो अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। सबसे पहली समस्या विकास निधि के आवंटन की होती है। शहर जैसी आबादी और आवश्यकताओं वाले क्षेत्रों को भी शहरी विकास योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप वहाँ सड़क, जल निकासी, सीवरेज, सार्व जनिक परिवहन और ठोस अप शिष्ट प्रबंधन जैसी सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता। दूसरी ओर ग्राम पंचा यतों की वित्तीय और प्रशास निक क्षमता इतनी नहीं होती कि वे तेजी से बढ़ते नगरीय क्षेत्रों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। इसके अतिरि क्त अनियोजित निर्माण, अवैद्द कालोनियों का विकास और भूमि उपयोग संबंधी अव्यवस्था भी बढ़ जाती है। ऐसे क्षेत्रों में प्रशासनिक भ्रम भी देखने को मिलता है। कई बार एक ही सड़क के दोनों ओर अलग -अलग प्रशासनिक व्यवस्थाएँ लागू होती हैं। एक ओर नगर परिषद की सीमा होती है तो दूसरी ओर ग्राम पंचायत का क्षेत्र। परिणाम स्वरूप नागरि कों को कर व्यवस्था, भवन निर्माण अनुमति, जलापूर्ति, संप त्ति पंजीकरण और अन्य सेवा ओं में असमानता का सामना करना पड़ता है। निवेशकों के लिए भी ऐसी स्थिति अनिश् िचतता पैदा करती है, क्योंकि भूमि उपयोग और विकास नियम स्पष्ट नहीं होते।
साथियों, इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या यह स्थिति विकासात्मक भेदभाव का उदाहरण है।
कानूनी दृष्टि से इसे प्रत्यक्ष भेदभाव नहीं कहा जा सकता क्योंकि सरकारें वर्तमान कानू नों और अधिसूचनाओं के आ धार पर कार्य करती हैं। फिर भी नीति निर्माण की दृष्टि से यह अवश्य कहा जा सकता है कि यदि कोई क्षेत्र वास्तविक रूप से शहरी बन चुका है और फिर भी उसे शहरी विका स योजनाओं तथा अवसंरचना निवेश से वंचित रखा जाता है तो वहाँ के नागरिक विकास के समान अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इसलिए यह स्थिति विकासात्मक असमान ता का रूप सटीकता से अव श्य धारण कर लेती है।
साथियों, विशेषज्ञों का मानना है कि अब गाँव और शहर के निर्धारण के लिए नए और आधुनिक मानकों की आवश्यकता है। केवल जनसं ख्या और रोजगार आधारित मानक आज की जटिल सामा जिक-आर्थिक वास्तविक ताओं को नहीं दर्शाते। भविष्य में निर्मित क्षेत्र (बिल्ट- अप एरिया), भूमि उपयोग का स्व रूप, आर्थिक एकीकरण, प्रति दिन शहरों में आने-जाने वाले लोगों की संख्या, परिवहन संपर्क, डिजिटल कनेक्टिवि टी, जल एवं सीवरेज सुविधा ओं की उपलब्धता तथा पर्या वरणीय वहन क्षमता जैसे मानकों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे किसी क्षेत्र की वास्तविक प्रकृति का अधिक वैज्ञानिक आकलन संभव होगा। डिजिटल युग में उपग्रह चित्रों, ड्रोन सर्वेक्षण और भू-स्थानिक सूचना प्रणाली के उपयोग से यह कार्य और अधिक सरल हो सकता है। उपग्रह आधारित विश्लेषण से यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि किसी क्षेत्र में निर्माण गतिवि धि कितनी बढ़ चुकी है, कृषि भूमि का कितना हिस्सा शह री उपयोग में परिवर्तित हो चुका है तथा वहाँ की जन संख्या का घनत्व और आर्थिक गतिविधियाँ किस स्तर तक पहुँच चुकी हैं।
यदि प्रत्येक पाँच वर्ष में ऐसे वैज्ञानिक सर्वेक्षण किए जाएँ तो ग्रामीण और शहरी वर्गीकरण को अधिक यथार्थ वादी बनाया जा सकता है। विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह सुधार अत्यंत आवश्यक है। आज भारत के अनेक तथाक थित गाँव आर्थिक दृष्टि से शहर बन चुके हैं, जबकि कई छोटे शहर अब महानगरीय क्षेत्रों का हिस्सा बन गए हैं। ऐसी स्थिति में 1961 के मा नकों पर आधारित वर्गीकरण व्यवस्था भविष्य की आवश्यक ताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं दिखाई देती।
विकास संसाधनों का न्या यसंगत वितरण, नियोजित शह रीकरण, बेहतर स्थानीय प्रशा सन और संतुलित क्षेत्रीय विकास तभी संभव होगा जब ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की परिभाषाओं को आधुनिक वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्परिभाषित किया जाए। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि यह कहा जा सकता है कि भारत में गाँव और शहर के निर्धारण की वर्तमान प्रणाली ने दशकों तक प्रशा सनिक स्थिरता प्रदान की है, किंतु बदलते समय में इस की व्यापक समीक्षा अपरिहार्य हो गई है। संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन, अनुच् छेद 243-क्यू , राज्य नगर पालिका अधिनियमों तथा जन गणना मानकों ने अब तक ग्रामीण- शहरी प्रशासन की आधारशिला रखी है, लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि इन पारंपरिक मान कों के साथ आधुनिक तकनी की, आर्थिक और सामाजिक संकेतकों को भी जोड़ा जाए। तभी भारत के वास्तविक शहरीकरण को सही पहचान मिल सकेगी और विकास का लाभ प्रत्येक नागरिक तक समान रूप से पहुँच सकेगा।

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