Breaking News

नया मसौदा दूरसंचार ;टेलीविजन, रेडियो और संबंधित सेवाएंद्ध नियम, 2026 एक ऐसे नियामक माडल की ओर बढ़ता है जो तकनीकी परिवर्तन के साथ कदम मिलाकर चल सके

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर आधुनिक युग में प्रौद्योगिकी, डिजिटलाइ जेशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटर नेट आधारित संचार और मी डिया उपभोग के तौर-तरीकों में जिस तीव्र गति से परिवर्तन हो रहा है,उसने सरकारों और नियामक संस्थाओं के सामने यह चुनौती खड़ी कर दी है कि वे समय -समय पर अपने कानूनों और नियमों को नई परिस्थितियों के अनुरूप अद्य तन करें। कोई भी कानून या विनियामक व्यवस्था स्थायी नहीं होती, क्योंकि तकनीक की प्रगति अक्सर उन परिस्थि तियों को बदल देती है जिनके आधार पर कानून बनाए गए थे। यही कारण है कि विश्व के अधिकांश विकसित और विकासशील देश अपने दूरसं चार मीडिया और डिजिटल संचार से जुड़े कानूनों का लगा तार पुनरीक्षण कर रहे हैं। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए प्रसारण और दूरसं चार क्षेत्र को अधिक पारदर्शी, सरल, डिजिटल और व्यव साय – अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। इसी क्रम में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने दूरसं चार अधिनियम, 2023 के अंत र्गत दूरसंचार (टेलीविजन, रेडि यो और संबंधित सेवाएं) नियम, 2026 का मसौदा सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया है और नागरिकों, उद्योग जगत, विशेषज्ञों तथा अन्य हितधार कों से 27 जुलाई तक सुझाव आमंत्रित किए हैं। मैं एडवो केट किशन सनमुखदास भाव नानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह पहल केवल नियमों में संशोधन भर नहीं है, बल्कि भारत के प्रसारण क्षेत्र को डिजिटल युग की आव श्यकताओं के अनुरूप पुनर्गठित करने का प्रयास है। इसलिए प्रत्येक नागरिक कार्य कर्तव्य है कि इस दिशा में उनके पास जो सुझाव हाईवे 27 जुलाई 2026 तक संबंधित प्लेटफार्म पर सबमिट करें। भारत में दूर संचार और प्रसारण क्षेत्र का नियमन लंबे समय तक 1885 के औपनिवेशिक कालीन टेली ग्राफ अधिनियम के आधार पर संचालित होता रहा। यह अधिनियम उस समय बनाया गया था जब न तो टेलीविजन अस्तित्व में था, न इंटरनेट और न ही डिजिटल मीडिया। स्वतंत्रता के बाद तकनीकी प्रगति के बावजूद कई दशकों तक विभिन्न सेवाओं को अलग – अलग दिशानिर्देशों और प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से नियंत्रित किया जाता रहा। परिणामस्वरूप एक जटिल नियामक ढांचा विकसित हुआ जिसमें टेलीविजन चैनलों, डी टीएच सेवाओं, एफएम रेडियो, सामुदायिक रेडियो, आईपीटीवी और अन्य प्रसारण सेवाओं के लिए अलग-अलग नियम लागू थे। इससे न केवल उद्योग के लिए अनुपालन संबंधी जटिल ताएं उत्पन्न होती थीं बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी समय लेने वाली और कई बार अस्प ष्ट हो जाती थीं।
साथियो, दूरसंचार अधि नियम, 2023 इस संदर्भ में एक ऐतिहासिक विधायी परिव र्तन के रूप में सामने आया था संसद द्वारा पारित यह अधि नियम औपनिवेशिक युग के टेलीग्राफ अधिनियम,1885 का स्थान लेने वाला व्यापक कानून है, जिसका उद्देश्य आ धुनिक दूरसंचार और प्रसारण पारिस्थितिकी तंत्र को एक सम कालीन कानूनी आधार प्रदान करना है। यह अधिनियम से वाओं की एक विस्तृत श्रृंखला को समाहित करता है और विभिन्न क्षेत्रों के प्रशासन के लिए संबंधित मंत्रालयों और विभागों को अधिकार प्रदान करता है। टेलीविजन,रेडियो और संबंधित प्रसारण सेवाओं के लिए सूचना एवं प्रसारण मं त्रालय इस अधिनियम के अंत र्गत प्रमुख प्रशासकीय प्राधि करण की भूमिका निभाता है।
साथियों, दूरसंचार (टेलीवि जन, रेडियो और संबंधित सेवाएं) नियम, 2026 का मसौदा इसी व्यापक सुधार प्रक्रिया का अगला चरण है। इसका मुख्य उद्देश्य उन विभिन्न दिशानि र्देशों को एकीकृत करना है जो अब तक अलग-अलग समय पर जारी किए गए थे और जिनके आधार पर प्रसा रण सेवाएं संचालित हो रही थीं। इनमें भारत में सैटेलाइट टेलीविजन चैनलों के अपलिं किंग और डाउनलिंकिंग के लिए 2022 की नीति, डीटी एच प्रसारण सेवाओं के लिए 2001 के दिशा-निर्देश, एच आईटीएस सेवाओं के लिए 2009 के दिशा-निर्देश, एफ एम रेडियो के चरण-प्प्प् विस् तार संबंधी नीति, सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित करने के लिए 2024 के संशोधित दिशा- निर्देश तथा आईपीटीवी सेवाओं के लिए 2008 के दिशा -निर्देश शामिल हैं। इन सभी को एक एकीकृत नियमावली के अंतर्गत लाने का प्रयास किया गया है ताकि उद्योग को अलग-अलग नियमों के बजाय एक स्पष्ट और सुव्यव स्थित ढांचा प्राप्त हो सके।
साथियों, वैश्विक दृष्टि से देखें तो यह कदम भारत को उन देशों की श्रेणी में स्थापित करता है जो नियामक आधुनि कीकरण को आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण साधन मानते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर और यूरोपीय संघ के अनेक देशों ने पिछले दशक में मीडिया और संचार क्षेत्र में लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं का डिजि टलीकरण, नियामक सरली करण और एकीकृत अनुमोदन प्रणालियों को अपनाया है।
भारत द्वारा प्रस्तावित नया ढांचा इसी वैश्विक प्रवृत्ति के अनुरूप दिखाई देता है, जहां सरकार का लक्ष्य नियंत्रण और सुविधा के बीच संतुलन स्था पित करना है। मसौदा नियमों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ईज आफ डूइंग बिजनेस अर्थात कारोबार करने में सुगमता को बढ़ावा देना है। अब तक प्रसारण सेवाओं के लिए विभिन्न प्रकार के आवेदन, अनुमतियां और अनुपालन प्रक्रियाएं अलग -अलग स्वरूप में संचालित होती थीं। प्रस्तावित नियमों के अंतर्गत अनेक दिशानिर्देशों को एकल नियामक ढांचे में समाहित कर दिया जाएगा। इससे निवेशकों, प्रसारण कंपनियों और सेवा प्रदाताओं के लिए नियमों को समझना और उनका पालन करना कहीं अधिक सरल हो जाएगा। विशे ष रूप से विदेशी निवेशकों और वैश्विक मीडिया कंपनि यों के लिए यह स्पष्टता भारत में निवेश को प्रोत्साहित कर सकती है। साथियों, नियमों का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू प्रशा सनिक प्रक्रियाओं का पूर्ण डि जिटलीकरण है। डिजिटल शासन आज विश्वभर में प्रशा सनिक दक्षता का प्रमुख आ धार बन चुका है। यदि अनु मतियां, आवेदन नवीनीकरण और अनुपालन प्रक्रियाएं डिजि टल माध्यम से संचालित होती हैं तो समय, लागत और मान वीय हस्तक्षेप में उल्लेखनीय कमी आती है। इससे भ्रष्टाचार की संभावनाएं घटती हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनती है। भारत सर कार के डिजिटल इंडिया अभि यान के संदर्भ में यह कदम प्रसारण क्षेत्र में डिजिटल प्रशा सन की दिशा में महत्वपूर्ण उप लब्धि माना जा सकता है। मसौदा नियमों में प्रस्तावित एक अन्य महत्वपूर्ण सुधार ग्रांट आफपरमिशन एग्रीमेंट पर हस् ताक्षर करने की अनिवार्यता को समाप्त करना है। अब तक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और निजी प्रसारकों के बीच अनुमति प्रदान करने के लिए औपचारिक समझौते किए जाते थे। यह प्रक्रिया कई बार अति रिक्त समय और प्रशासनिक बोझ उत्पन्न करती थी। नए प्रस्ताव के अनुसार इस आवश्य कता को समाप्त कर दिया जाए गा, जिससे अनुमति प्रक्रिया अधिक सरल और डिजिटल स्वरूप में परिवर्तित हो सकेगी। यह सुधार सरकार की उस सोच को प्रतिबिंबित करता है जिसमें कागजी प्रक्रियाओं को कम करके डिजिटल अनुमोदन प्रणाली को सटीकता से प्राथ मिकता दी जा रही है।
साथियों, पारदर्शी न्यायनि र्णय तंत्र की स्थापना भी इस मसौदे का एक महत्वपूर्ण आया म है। किसी भी नियामक व्यव स्था की सफलता केवल नियम बनाने में नहीं बल्कि उनके निष्पक्ष और पारदर्शी प्रवर्तन में निहित होती है। प्रसारण क्षेत्र में लाइसेंस, अनुपालन, विवाद और दंड संबंधी मामलों को लेकर समय- समय पर प्रश्न उठते रहे हैं। यदि एक स्पष्ट और पारदर्शी न्यायनिर्णय प्रणाली स्थापित होती है तो उद्योग और सरकार के बीच विश्वास बढ़ेगा तथा विवादों का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा। यह मसौदा नियम केवल उद्योग के लिए ही नहीं बल्कि उपभोक्ताओं और नागरिकों के लिए भी मह त्वपूर्ण है। मीडिया और प्रसा रण सेवाएं लोकतांत्रिक समाज में सूचना के प्रसार का प्रमुख माध्यम हैं। जब नियामक व्यव स्था अधिक स्पष्ट और आधु निक होती है तो सेवा प्रदाता ओं को नवाचार करने का अव सर मिलता है। परिणाम स्व रूप उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता वाली सेवाएं, अधिक विकल्प और प्रतिस्पर्धी मूल्य प्राप्त हो सकते हैं। डिजिटल प्लेटफार्म, आईपीटीवी और नई प्रसारण तकनीकों के विकास के साथ यह अपेक्षा की जा सकती है कि भविष्य में भार तीय उपभोक्ताओं को अधिक उन्नत मीडिया सेवाओं का लाभ मिलेगा।
साथियों, हाल के वर्षों में भारत का मीडिया और मनोरं जन उद्योग विश्व के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक बनकर उभरा है। ओटीटी प्लेट फार्म, इंटरनेट आधारित टेलीवि जन, डिजिटल रेडियो और सैटेलाइट प्रसारण जैसी सेवा ओं ने पारंपरिक मीडिया परिदृश्य को बदल दिया है। ऐसे में पुराने नियमों और अलग- अलग दिशानिर्देशों पर आधा रित व्यवस्था लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकती थी। नया मसौदा इस वास्तविकता को स्वीकार करता है और एक ऐसे नियामक माडल की ओर बढ़ता है जो तकनीकी परिवर्तन के साथ कदम मिला कर चल सके। यह भी उल्ले खनीय है कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण ने हाल ही में दूरसंचार उपभोक्ता शिका यत निवारण विनियमन, 2026 का मसौदा भी सार्वजनिक कि या था। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार और नियामक संस् थाएं केवल उद्योग सुधार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उप भोक्ता संरक्षण और शिकायत निवारण व्यवस्था को भी मज बूत करने की दिशा में कार्य कर रही हैं। दूरसंचार और प्रसारण क्षेत्र में समानांतर रूप से हो रहे ये सुधार भारत के डिजिटल शासन माडल को अधिक उत्तरदायी और आधु निक बनाने का संकेत देते हैं।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय निवे शकों के दृष्टिकोण से देखें तो नियामक स्पष्टता और प्रक्रि यात्मक सरलता किसी भी बाजार की आकर्षण क्षमता को बढ़ाती है। भारत पहले से ही विश्व का सबसे बड़ा डिजिटल उपभोक्ता बाजार बनने की दिशा में अग्रसर है। यदि प्र सारण और दूरसंचार क्षेत्र में नियम अधिक पारदर्शी और पूर्वानुमेय बनते हैं तो विदेशी निवेश,तकनीकी सहयोग और नवाचार को बढ़ावा मिल सक ता है। इससे रोजगार सृजन, तकनीकी उन्नयन और आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी हालांकि किसी भी नए नियम की सफलता उसके क्रियान्व यन पर निर्भर करती है। इसलि ए सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रि या अत्यंत महत्वपूर्ण है। सर कार द्वारा नागरिकों, उद्योग प्रतिनिधियों विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से सुझाव आ मंत्रित करना सहभागी शासन की भावना को दर्शाता है। यह सुनिश्चित करता है कि अंतिम नियम केवल प्रशासनिक दृष्टि कोण से नहीं बल्कि व्यावहा रिक अनुभव और क्षेत्रीय आव श्यकताओं को ध्यान में रख कर तैयार किए जाएं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका का विश्लेषण करें तो हम पा एंगे कि दूरसंचार (टेलीविजन, रेडियो और संबंधित सेवाएं) नियम, 2026 का मसौदा भारत के प्रसारण और मीडिया क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार का संकेत है। यह मसौदा औपनिवेशिक युग की विरासत से निकलकर डिजिटल युग की आवश्यकताओं के अनुरूप एक आधुनिक, एकीकृत, पार दर्शी और व्यवसाय-अनुकूल नियामक ढांचा स्थापित करने का प्रयास करता है। एकल नियमावली, डिजिटल प्रक्रियाएं, सरलीकृत लाइसेंसिंग, जीओ पीए की समाप्ति और पारदर्शी न्यायनिर्णय तंत्र जैसे प्रावधान भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मीडिया एवं संचार बाजार के रूप में स्थापित कर ने में सहायक हो सकते हैं। यदि सार्वजनिक परामर्श के बाद इन नियमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो यह केवल प्रसारण उद्योग के लिए ही नहीं बल्कि डिजि टल भारत के व्यापक विजन के लिए भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है।

ताजा खबरें