एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा संकट,ऊंची ब्याज दरों और पूंजी प्रवाह की अनिश्चि तताओं के दौर से गुजर रही है। अमेरिका- इजराइल- ईरा न संघर्ष, कच्चे तेल की कीम तों में उतार- चढ़ाव और उभ रती अर्थव्यवस्थाओं से विदेशी पूंजी के निकास ने अनेक देशों की मुद्राओं और वित्तीय बाजा रों पर दबाव बढ़ाया है। विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, तेल कीमतों में अस्थ् िारता तथा वैश्विक निवेशकों की जोखिम से बचने की प्रव ृत्ति ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई चुनौतियां पैदा कर दी हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। पिछले कुछ महीनों में विदेशी संस्था गत निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से पूंजी निकासी, डालर की मजबूती और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ा या। ऐसे समय में भारत सरकार द्वारा 5 जून 2026 को जारी आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026 केवल एक कर सुधार नहीं बल्कि एक व्यापक रण नीतिक आर्थिक कदम के रूप में देखा जा रहा है।
इस अध्यादेश के माध्यम से विदेशी पोर्टफोलियो निवे शकों तथा बैंक फार इंटर नेशनल सेटलमेंट्स (बीआईएस) को सरकारी प्रतिभूतियों से प्राप्त ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर पूर्ण आयकर छूट प्रदान की गई है, जो 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी मानी जाए गी। पहले विदेशी निवेशकों को दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ पर लगभग 12.5प्रतिशत तथा ब्याज आय पर 20 प्रति शत तकविदहोल्डिंग टैक्स का सामना करना पड़ता था, जब कि अब यह कर भार समाप्त हो गया है। यह निर्णय भारत को वैश्विक निवेश प्रतिस्पर्धा में अधिक आकर्षक बनाने, विदेशी पूंजी प्रवाह को बढ़ाने, रुपये पर दबाव कम करने, ऋण बाजार को गहरा करने तथा शेयर बाजार को नई मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यदि इस कर राहत का प्रत्यक्ष वित्तीय प्रभाव देखा जाए तो यह विदेशी निवेशकों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। उदाहरण के लिए यदि कोई विदेशी पेंशन फंड भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों में 1000 करोड़ रुपये का निवेश करता है और उसे 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज प्राप्त होता है, तो पहले 70 करोड़ रुपये की ब्याज आय पर 20 प्रतिशत तक कर देयता उत्पन्न होती थी, अर्थात लगभग 14 करोड़ रुपये कर के रूप में चले जाते थे। अब यह पूरी राशि निवेशक के पास रहेगी। इसी प्रकार यदि किसी विदेशी निवेशक को सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री से 100 करोड़ रुपये का दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ प्राप्त होता था तो लगभग 12.5 करोड़ रुपये कर के रूप में देने पड़ते थे।
नए प्रावधानों के बाद यह राशि भी पूर्णतः बच जाएगी। अर्थात एक बड़े संस्थागत निवेशक के लिए कुल कर बचत कई करोड़ रुपये प्रतिवर्ष तक पहुंच सकती है। यही कारण है कि वैश्विक पेंशन फंड, बीमा कंपनियां, संप्रभु द्दन कोष और दीर्घकालिक निवेशक भारत को अब पहले से कहीं अधिक आकर्षक निवेश गंतव्य के रूप में सटी कता से देख सकते हैं।
साथियों बात अगर हम इस सुधार का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य को समझने की करें तो, भारतीय ऋण बाजार को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है। विश्व के अनेक विकसित और उभरते देशों ने विदेशी निवेशकों को आक र्षित करने के लिए सरकारी बॉन्ड्स पर कर संबंधी रियायतें दी हुई हैं। भारत में अपेक्षाकृत अधिक कराधान विदेशी निवेशकों के लिए एक बाधा माना जाता था।
अब जब यह बाधा समाप्त हो गई है तो भारतीय सरकारी प्रतिभूतियां वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक लाभकारी और प्रतिस्पर्धी बन जाएंगी। इससे भारतीय बान्ड बाजार की गहराई बढ़ेगी, लेन-देन की मात्रा में वृद्धि होगी और भारत की वित्तीय प्रणाली में दीर्घकालिक स्थिर पूंजी का प्रवाह सुनिश्चित होगा।यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब पिछले कुछ महीनों से वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण भारतीय रुपये पर दबाव देखा जा रहा था। तेल आयात पर अत्यधिक निर्भरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव भारतीय मुद्रा पर पड़ता है। यदि विदेशी निवे शक बड़ी मात्रा में डालर ले कर भारतीय सरकारी प्रति भूतियों में निवेश करते हैं तो विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि होगी और डालर की आपूर्ति बढ़ने से रुपये को समर्थन मिलेगा। यद्यपि किसी एक नीति के कारण रुपये में तत् काल और नाटकीय मजबूती की अपेक्षा नहीं की जा सक ती, लेकिन मध्यम और दीर्घ कालिक अवधि में यह कदम रुपये की स्थिरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सक ता है। मजबूत रुपया न केवल आयात लागत को नियंत्रित करता है बल्कि विदेशी निवेश कों के लिए मुद्रा जोखिम भी कम करता है, जिससे भारत में और अधिक निवेश आक र्षित होने की संभावना सटी कता से बनती है।
साथियों, भारतीय शेयर बाजार पर भी इस निर्णय का बहु आयामी प्रभाव पड़ सकता है। पहली दृष्टि में यह कदम बॉन्ड बाजार से जुड़ा दिखाई देता है,लेकिन वास्तव में ऋण और इक्विटी बाजार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जब विदेशी निवेशक सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के लिए भारत आते हैं तो उनके द्वारा लाया गया पूंजी प्रवाह वित्तीय प्रणाली की समग्र तरलता को बढ़ाता है। बेहतर तरलता का लाभ अंततः शेयर बाजार को भी मिलता है। विदेशी संस्था गत निवेशकों की लगातार बिकवाली से जो दबाव बाजार पर बनता है, उसमें कमी आने की संभावना है। यदि विदेशी पूंजी का प्रवाह स्थिर होता है तो बाजार की धारणा में सुधार होगा और घरेलू निवे शकों का विश्वास भी सटी कता से मजबूत होगा।
साथियों, सरकार द्वारा किए गए अन्य सुधार इस प्रभाव को और व्यापक बनाते हैं। भा रत के बाहर रहने वाले व्य क्तियों के लिए सूचीबद्ध भार तीय कंपनियों में निवेश की व्यक्तिगत सीमा को 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत तथा कुल सीमा को 24 प्रतिशत तक बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका अर्थ है कि विदेशी निवेशकों के पास अब भारतीय कंपनियों में अधिक हिस्सेदारी लेने का अवसर होगा। विशेष रूप से लार्ज- कैप और मिड-कैप कंपनियों में विदेशी निवेश बढ़ने की संभावना है। इससे बाजार में नई पूंजी आएगी, शेयरों की मांग बढ़ेगी और मूल्यांकन को समर्थन मिलेगा।इस नीति का एक और महत्वपूर्ण प्रभाव सरकारी बान्ड यील्ड पर पड़ सकता है। जब किसी परिसं पत्ति की मांग बढ़ती है तो उसकी कीमत बढ़ती है और यील्ड घटती है। यदि विदेशी निवेशकों की मांग बढ़ने से सरकारी प्रतिभूतियों की कीम तें ऊपर जाती हैं तो यील्ड में कमी आ सकती है। सरकारी बान्ड यील्ड को अक्सर पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बेंचमार्क माना जाता है। यील्ड कम होने का अर्थ है कि सरकार, बैंक और निजी कंपनियां अप ेक्षाकृत कम लागत पर धन जुटा सकेंगी। इससे कॉर्पोरेट क्षेत्र की पूंजी लागत घटेगी, निवेश बढ़ेगा और आर्थिक विकास को गति मिलेगी।
साथियों, विशेष रूप से बैंकिंग, एनबीएफसी, इंफ्रास्ट्र क्चर और रियल एस्टेट क्षेत्र इस परिवर्तन से लाभान्वित हो सकते हैं। बैंक और वित्तीय संस्थान सरकारी प्रतिभूतियों के बड़े धारक होते हैं। यदि बॉन्ड कीमतें बढ़ती हैं तो उन्हें ट्रेजरी लाभ प्राप्त हो सकता है। वहीं कम ब्याज दरों का वातावरण कर्ज आधारित क्षेत्रों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट परियोजनाओं की वित्तीय लागत घटने से उनकी लाभप्रदता बढ़ सकती है। इससे इन क्षेत्रों की सूची बद्ध कंपनियों के वित्तीय परि णाम बेहतर होने की संभावना बनती है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा फुली एक्सेसिबल रूट के अंतर्गत 15, 30 और 40 वर्ष की नई सरकारी प्रतिभ ूतियों को शामिल करना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे दीर्घकालिक निवेशकों को अधिक विकल्प मिलेंगे। पेंशन फंड और संप्रभु धन कोष जैसे निवेशक लंबी अवधि की परि संपत्तियों को प्राथमिकता देते हैं। जब उन्हें भारत में लंबी अवधि की, सुरक्षित और कर- मुक्त सरकारी प्रतिभूतियां उप लब्ध होंगी तो उनका निवेश बढ़ने की संभावना स्वाभाविक है। इसी प्रकार शार्ट-टर्म निवे श सीमा, कंसंट्रेशन लिमिट और व्यक्तिगत सिक्योरिटी लि मिट जैसी कई बाधाओं को हटाने से निवेश प्रक्रिया अ धिक सरल और आकर्षक बने गी। हालांकि इस नीति के प्रभाव का मूल्यांकन करते सम य संतुलित दृष्टिकोण अपनाना भी आवश्यक है। केवल कर छूट देना पर्याप्त नहीं होता। विदेशी निवेशक राजनीतिक स्थिरता, नियामकीय पारद र्शिता, मुद्रास्फीति, विनिमय दर जोखिम और आर्थिक विका स की संभावनाओं को भी ध्यान में रखते हैं।
यदि वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां प्रतिकूल रहती हैं या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो अपेक्षित पूंजी प्रवाह सीमित भी रह सकता है। इसलिए इस नीति को व्या पक आर्थिक सुधारों और स्थिर नीतिगत वातावरण के साथ जोड़कर देखना चाहिए। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस् थाओं में से एक है। मजबूत जनसांख्यिकीय आधार, बढ़ता उपभोक्ता बाजार, डिजिटल परिवर्तन, बुनियादी ढांचे में निवेश और अपेक्षाकृत उच्च आर्थिक विकास दर भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक बनाते हैं। ऐसे में कर छूट और निवेश प्रक्रिया को सरल बनाने जैसे कदम भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थि ति को और मजबूत करते हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026 भारत की वित्तीय और निवेश नीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज आय और पूंजीगत लाभ को कर-मुक्त बनाकर भारत ने वैश्विक निवेशकों को स्पष्ट संदेश दिया है कि वह दीर्घ कालिक विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए गंभीर और प्रतिबद्ध है। इस निर्णय से विदेशी निवेशकों की कर बचत में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, भारतीय ऋण बाजार अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा, रुपये को संरचनात्मक समर्थन मिलेगा, कॉर्पोरेट क्षेत्र की पूंजी लागत घट सकती है और शेयर बाजार को नई मजबूती प्राप्त हो सकती है। यदि यह नीति अपेक्षित स्तर पर विदेशी पूंजी आकर्षित करने में सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल एशिया बल्कि विश्व के प्रमुख निवेश गंतव्यों में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत कर सकता है।
विदेशी निवेशकों को दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ पर लगभग 12.5 प्रतिशत तथा ब्याज आय पर 20 प्रतिशत तक विदहोल्डिंग टैक्स को किया जीरो
