गोंदिया (महाराष्ट्र)।
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत की न्यायिक व्यवस्था पर वर्षों से एक तंज बार-बार दोहराया जाता रहा है,तारीख पर तारीख। यह वाक्य केवल एक फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की उस पीड़ा का प्रतीक बन गया था जिसमें न्याय की उम्मीद अदा लतों की लंबी प्रक्रियाओं में उलझकर दम तोड़ देती है।
भारतीय लोकतंत्र में न्याय पालिका को संविधान का संर क्षक माना जाता है। नागरिक जब कार्यपालिका और विधा यिका से निराश होता है, तब उसकी अंतिम उम्मीद अदालतों पर टिकती है। यही कारण है कि न्यायपालिका की विश्वसनी यता केवल उसके निर्णयों से नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, समयबद्धता और उत्तरदायित्व से भी तय होती है। हाल के वर्षों में भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की संख्या, सुरक्षित रखे गए निर्णयों में देरी और अदालतों द्वारा आदेशों को समय पर वेबसाइट पर अप लोड न करने जैसी समस्याएँ लगातार चर्चा का विषय बनी हुई थीं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि अब इसी मानसिकता और न्या यिक देरी की संस्कृति पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णा यक प्रहार किया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत गंभीर शब्दों में कहा कि जस्टिस डिलेयड इज जस्टिस डिनाइड का सिद्धांत केवल मुकदमों की सुनवाई में देरी तक सीमित नहीं है। यदि अदालत निर्णय सुरक्षित रखकर महीनों तक उसे सार्वजनिक नहीं करती, या आदेश सुनाए जाने के बाद भी उसकी प्रति उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो यह भी न्याय में देरी के समान है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्रिमिनल रिट पिटीशन 169ध्2025 में 29 मई 2026 को स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी भी माम ले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना अनिवार्य होगा। यदि ऐसा नहीं होता है, तो संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को वह माम ला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखना होगा। यह निर्देश केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका में जवाब देही, पारदर्शिता और समय बद्ध न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक सटीक रूप से न्या यिक क्रांति माना जा रहा है।
साथियों, यह फैसला उस समय आया जब सुप्रीम कोर्ट पीला पाहन बनाम झारखंड राज्य मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया कि झारखंड हाईकोर्ट ने दिसंबर 2025 में फैसला सुनाने के बावजूद उसे न तो वेबसाइट पर अपलोड किया और न ही संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराया। इस मामले ने न्यायिक देरी और प्रक्रिया त्मक अपारदर्शिता की गंभीर समस्या को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। यह मामला केवल एक तकनीकी त्रुटि या प्रशासनिक लापरवाही का प्रश्न नहीं था, बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न बन चुका था।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अदा लत द्वारा राहत मिल चुकी है, लेकिन आदेश उपलब्ध ही नहीं कराया गया, तो वह राहत व्यवहारिक रूप से निरर्थक हो जाती है। विशेष रूप से तब जब मामला व्यक्तिगत स्वतं त्रता, जमानत या आपराधिक सजा से जुड़ा हो।
यही कारण था कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मुद्दे को अत्यंत गंभीरता से लिया और न्यायपालिका के भीतर मौजूद उस संरचनात्मक समस्या पर चोट की, जिसके कारण हजा रों मामलों में फैसले महीनों और वर्षों तक सुरक्षित रखे जाते रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश और एक जस्टिस की पीठ ने स्पष्ट किया कि न्याय में अनाव श्यक देरी संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अनुच्छेद 21 केवल जीवन और व्यक्ति गत स्वतंत्रता की रक्षा नहीं करता, बल्कि समय पर न्याय प्राप्त करने के अधिकार को भी संरक्षित करता है।
अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक जेल में बंद रहे और उसकी अपील पर फैसला सुरक्षित रखने के बाद लंबे समय तक सुनाया ही न जाए, तो यह न्यायिक प्रक्रिया स्वयं दंड में बदल जाती है। अदालत का यह अवलो कन भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहली बार सर्वोच्च स्तर पर इस स्पष्टता के साथ कहा गया कि न्यायिक देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का विषय है।
साथियों, सुप्रीम कोर्ट के सामने आया मामला अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े चार दोषियों की याचिका से संबंधित था। इन लोगों की आपराधिक अपील झारखंड हाईकोर्ट में वर्ष 2022 से लंबित थी, लेकिन फैसला नहीं सुनाया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि चार वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करवाना संविधान की भावना के खिलाफ है। अदालत ने इस तर्क को गंभी रता से स्वीकार किया और कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य व्यक्ति को राहत देना है, न कि उसे अंतहीन प्रतीक्षा में डाल देना। इसी संदर्भ में नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट्स से रिपोर्ट भी मांगी थी, जिसमें यह जानकारी देने को कहा गया था कि किन मामलों में फैसला कब सुरक्षित रखा गया, कब सुनाया गया और वेब साइट पर कब अपलोड किया गया। साथियों इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुल 12 व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए, जिनका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को समयबद्ध, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।
अदालत ने विशेष रूप से जमानत मामलों को लेकर कड़ा रुख अपनाया। पीठ ने कहा कि नियमित जमानत और अग्रिम जमानत जैसे मामलों में आदेश उसी दिन सुनाया और अपलोड किया जाना चाहिए। यदि कि सी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन तक अवश्य जारी करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि जमानत आदेश की सूचना तत्काल जेल प्रशासन तक पहुंचाई जाए ताकि आरोपी या दोषी व्यक्ति को उसी दिन अथवा अगले दिन रिहा किया जा सके, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में अनेक मामलों में जमानत मिलने के बावजूद कैदी कई दिनों तक जेल में बंद रहते हैं, केवल इसलिए कि आदेश की प्रति समय पर जेल तक नहीं पहुंचती।
सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों और विशेषकर मृत्युदंड से जुड़े मामलों के लिए भी अलग दिशा-निर्देश तय किए। अदालत ने कहा कि यदि माम ला गंभीर आपराधिक प्रकृति का है और आरोपी जेल में है, तो फैसला सुरक्षित रखने के सात दिनों के भीतर दोनों पक्षों से स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। लेकिन अन्य माम लों में एक महीने के बाद अति रिक्त दलीलें या स्पष्टीकरण मांगने की अनुमति नहीं होगी। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि न्यायिक प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे और फैसले देने में सटी कता से कृत्रिम देरी समाप्त हो। साथियों अदालत ने तकनीकी और प्रशासनिक सु धारों पर भी जोर दिया। अब हर महीने हाईकोर्ट की वेब साइट से स्वतः ई-मेल मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाएगा, जिसमें उन मामलों की सूची होगी जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसकी प्रति संबं धित बेंच को भी भेजी जा एगी। यदि किसी मामले का केवल आपरेटिव भाग सुनाया गया हो और 15 दिनों तक विस्तृत फैसला अपलोड न किया जाए, तो रजिस्ट्रार जन रल को मुख्य न्यायाधीश को इसकी सूचना देनी होगी।
इसके अतिरिक्त, यदि तीन महीने बीत जाने के बाद भी फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो कोई भी पक्षकार अदालत से आदेश सुनाने का अनुरोद्द कर सकेगा और ऐसे आवेदन पर दो दिनों के भीतर सुनवाई करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रकार का प्लान-बी भी निर्धारित किया है।
यदि फैसला तीन महीने और अतिरिक्त एक महीने यानी कुल चार महीने तक भी नहीं आता है, तो पक्षकार संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध कर सकता है कि मामला दूसरी बेंच को स्थानां तरित किया जाए। यह निर्देश न्यायिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्यों कि पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अनि श्चितकाल तक फैसला सुर क्षित रखना स्वीकार्य नहीं हो गा। इससे न्यायाधीशों की जवा बदेही भी तय होगी और मामलों के लंबित रहने की समस्या पर सटिका से अंकुश लग सकेगा।
साथियों अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि फैसले की प्रमाणित प्रति में तीन तिथियां स्पष्ट रूप से लिखी जाएं फैसला सुरक्षित रखने की तारीख, फैसला सुनाने की तारीख और वेबसाइट पर अप लोड करने की तारीख। हाई कोर्ट की वेबसाइट पर भी यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहेगी। इससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और वकीलों तथा पक्षकारों को अपने मामलों की वास्तविक स्थिति का पता चलता रहेगा। साथ ही, फैसला अपलोड होते ही संबंधित पक्षों और उनके वकीलों को ई-मेल के माध्यम से सूचना भेजना भी अनिवार्य किया गया है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने पूरे मामले को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने कभी भी किसी मामले को लंबे समय तक रिजर्व नहीं रखा और हमेशा तीन महीने के भीतर फैसला सुनाया।
उन्होंने कहा कि न्याय की कीमत पर देरी को जारी रहने नहीं दिया जा सकता। यह टिप्पणी केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि न्यायिक कार्य संस् कृति के लिए एक नैतिक संदेश भी है कि न्यायाधीशों की प्राथ मिक जिम्मेदारी समय पर निर्णय देना है।
साथियों, इस पूरे फैसले का संवैधानिक आधार भी अत् यंत महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान केअनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए ये दिशा -निर्देश जारी किए।
अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्या यालय को पूर्ण न्याय सुनिश् िचत करने के लिए विशेष आदेश पारित करने की शक्ति देता है। जब सामान्य कानून या प्रक्रियाएं न्याय दिलाने में अप र्याप्त साबित हों, तब सुप्रीम कोर्ट इस अनुच्छेद के तहत व्यापक निर्देश जारी कर सक ता है। यही कारण है कि यह फैसला केवल एक केस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश की न्यायिक प्रणाली के लिए बाध्यकारी मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में देखा जा रहा है। भारत में लंबित मामलों की भयावह स्थिति को देखते हुए यह फैसला और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में 92 हजार से अधिक मामले लंबित हैं, जबकि देशभर की अदालतों में 5.49 करोड़ से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं। हाई कोर्ट्स में ही 63 लाख से अ धिक मामले लंबित बताए गए हैं। कोविड-19 महामारी के बाद ई-फाइलिंग बढ़ने से मामलों की संख्या और तेजी से बढ़ी है। ऐसे में केवल नए जजों की नियुक्ति या अदालतों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि न्यायिक कार्यप्र णाली को अधिक कुशल और समयबद्ध बनाना भी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के ये निर्देश इसी व्यापक सुधार प्रक्रिया की शुरुआत माने जा रहे हैं।
साथियों न्यायिक विशेष ज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारतीय न्यायपालिका में प्रोसीजरल अकाउंटेबिलिटी का नया माडल स्थापित कर सकता है। अब न्यायालयों पर केवल निर्णय देने का नहीं, बल्कि समय पर निर्णय देने का भी दबाव होगा। इससे आम नागरिकों का न्यायपालि का पर भरोसा मजबूत होगा, क्योंकि न्याय की वास्तविक शक्ति तभी सिद्ध होती है जब वह समय पर उपलब्ध हो।
विशेष रूप से गरीब, आदि वासी, पिछड़े और जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों के लिए यह फैसला अत्यंत सटी कता से राहतकारी साबित हो सकता है। साथियों, अंतररा ष्ट्रीय स्तर पर भी न्यायिक पार दर्शिता और समयबद्ध फैसलों को लोकतांत्रिक शासन का महत्वपूर्ण मानक माना जाता है। विकसित देशों की न्याय प्रणालियों में मामलों की निग रानी, समयसीमा और डिजि टल पारदर्शिता पर विशेष बल दिया जाता है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय अब उसी दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा ता दिखाई दे रहा है। यह फैसला संकेत देता है कि भारतीय न्यायपालिका केवल मामलों की संख्या बढ़ने की शिकायत तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि स्वयं को अधिक उत्तरदायी और आद्दु निक बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल अदालतों के लिए प्रशासनिक निर्देश नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में न्याय की अवधारणा को पुनर्परिभाषित करने वाला ऐति हासिक हस्तक्षेप है। तारीख पर तारीख की संस्कृति के खिलाफ यह एक सशक्त संवै धानिक घोषणा है कि न्याय को अनिश्चित प्रतीक्षा में नहीं बदला जा सकता।
यदि इन दिशा-निर्देशों का ईमानदारी से पालन होता है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय न्यायपालिका की कार्यप्रणाली में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है। यह फैसला उन करोड़ों नाग रिकों के लिए उम्मीद का संदेश है जो वर्षों से अदालतों के चक्कर काटते हुए समय पर न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। नियंत्रित करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिस में नवाचार, उद्यमिता और आ र्थिक गतिविधियां स्वाभाविक रूप से विकसित हो सकें।
यदि यह माॅडल प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो भारत न केवल व्यापार सुगमता की रैंकिंग में आगे बढ़ेगा, बल्कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक विश्वसनीय उत्पादन और नवाचार केंद्र के रूप में स्था पित हो सकेगा। 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का भारत का सपना केवल जीडीपी के आँकड़ों से पूरा नहीं होगा। इसके लिए प्रशासनिक मान सिकता, नियामकीय संस्कृति और आर्थिक सोच में गहरे बद लाव आवश्यक होंगे।
आज भारत उसी परिवर्तन के द्वार पर खड़ा दिखाई देता है। डिजिटल युग की तेज रफ्तार दुनिया में अब वही राष्ट्र आगे बढ़ेंगे, जो अपने नागरिकों और उद्यमियों पर भरोसा करेंगे, नवाचार को स्वतंत्रता देंगे और शासन को बाधा नहीं बल्कि सहयोगी बना एंगे। भारत यदि इस दिशा में निरंतरता बनाए रखता है, तो आने वाले वर्षों में वह केवल दुनिया की सब से तेजी से बढ़ती अर्थ व्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका में जवाबदेही, पारदर्शिता और समयब( न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक न्यायिक क्रांति माना जा रहा है
