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भ्रष्टाचार के विरु( लड़ाई केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं सरकार, न्यायपालिका, प्रशासन मीडिया, उद्योग, नागरिक, समाज और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तरपर भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने या देने तक सीमित अपराध नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र, अर्थव्य वस्था न्याय व्यवस्था और नाग रिकों के विश्वास को भीतर से खोखला करने वाली ऐसी दीमक है जो धीरे- धीरे पूरे शासन तंत्र को कमजोर कर देती है। यदि कैंसर शरीर को अंदर से नष्ट करता है,तो भ्रष्टाचार राष्ट्र की संस्थाओं, नीतियों और नैतिक मूल्यों को उसी प्रकार क्षीण करता है। भारत का आम नागरिक जन्म प्रमाण पत्र से लेकर भूमि रिकार्ड, पुलिस, स्थानीय निकाय, कराधान, लाइसेंस, निर्माण अनुमति और अनेक सरकारी सेवाओं तक कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की पीड़ा का अनुभव करता है। कई लोग इसे “चाय-पानी” कहकर सामान्य मान लेते हैं, जबकि यही छोटी-छोटी रिश्वतें आगे चलकर बड़े भ्रष्टाचार की जड़ बन जाती हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते जनता के बीच यह जनजागरण करना चाहूंगा कि आज आवश्यकता केवल भ्रष्टाचार की शिकायत करने की नहीं, बल्कि उसे सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बनाने की है। अब ऐसे समय में ट्रांसपे रेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) 2026 भारत सहित पूरी दुनियाँ के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। यह रिपोर्ट भारत के लिए बहुत चिंता का विषय है। रिपोर्ट के अनुसार भारत 39 अंकों के साथ 91वें स्थान पर है। विशेष बात यह है कि 0 अंक का अर्थ अत्यधिक भ्रष्ट व्यव स्था तथा 100 अंक का अर्थ अत्यंत स्वच्छ और पारदर्शी शासन व्यवस्था है, भारत में बहुत भ्रष्टाचार है लेकिन मैं इस रिपोर्ट को देखकर हैरान हूं कि भारत में इतनी बड़ी लेवल पर भ्रष्टाचारी है, मैंने सोचा भी नहीं था यानें अब सारी जनता समझ रही है कि, यह स्थिति भारत की प्रतिष्ठा पर आघात व विकास में बहुत बड़ी बाधा है?यह रिपोर्ट केवल किसी देश की रैंकिंग नहीं बताती, बल्कि यह उस देश की प्रशासनिक विश्वसनी यता, निवेश वातावरण, शासन की गुणवत्ता और संस्थागत पारदर्शिता का वैश्विक संकेतक भी मानी जाती है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए यह केवल अंक या स्थान का प्रश्न नहीं,बल्कि उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा, निवेशकों के विश्वास और नाग रिकों की उम्मीदों का भी विषय है।
साथियों बात अगर हम भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक को समझने की करें तो, दुनियाँ के सबसे प्रतिष्ठित वैश्विक सूचकांकों में से एक है।इसे हर वर्ष ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल प्रकाशित करती है। यह रिपोर्ट सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की धारणा को 0 से 100 के पैमाने पर मापती है। 0 अंक का अर्थ अत्यधिक भ्रष्ट व्यव स्था तथा 100 अंक का अर्थ अत्यंत स्वच्छ और पारदर्शी शासन व्यवस्था है। इस सूच कांक की विशेषता यह है कि यह किसी एक संस्था की राय पर आधारित नहीं होता, बल्कि विश्व बैंक, विश्व आर्थिक मंच (डब्लूईएफ), एशियाई विकास बैंक सहित लगभग 13 स्वतंत्र वैश्विक स्रोतों और विशेषज्ञों के आकलन को समाहित करता है। इसलिए इसकी विश्वसनीयता अंतरराष् ट्रीय स्तर पर स्वीकार की जाती है।
साथियों बात कर हम वर्ष 2026 की रिपोर्ट की करें तो इसमें वैश्विक तस्वीर चिंता पैदा करने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार दुनियाँ के दो- तिहाई से अधिक देशों का स्कोर 50 से कम है,अर्थात अधिकांश देशों में सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार गंभीर चुनौती बना हुआ है। यह स्पष्ट संकेत है कि भ्रष्टाचार केवल विकास शील देशों की समस्या नहीं, बल्कि विकसित देशों के लिए भी सतत चुनौती है।हालांकि कुछ देशों ने अपने मजबूत संस्थागत ढांचे, पारदर्शी प्रशा सन और कठोर जवाबदेही व्य वस्था के कारण उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। इस वर्ष भी डेन मार्क 89 अंकों के साथ सबसे स्वच्छ देशों में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। उसके बाद फिनलैंड, न्यूजीलैंड और नॉर्वे जैसे देश हैं। इन देशों की सफलता का आधार केवल कठोर कानून नहीं, बल्कि मज बूत संस्थाएं, पारदर्शी सरकारी प्रक्रियाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रभावी मीडिया, नागरिक सह भागिता और राजनीतिक ईमा नदारी है। दूसरी ओर दक्षिण सूडान, सोमालिया और वेनेजु एला सबसे अधिक भ्रष्ट देशों में शामिल हैं, जहां राजनी तिक अस्थिरता, कमजोर संस् थाएं और प्रशासनिक विफलता ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। साथियों, भारत की स्थि ति इस रिपोर्ट में विशेष चर्चा का विषय बनी है। रिपोर्ट के अनुसार भारत 39 अंकों के साथ 91वें स्थान पर है।
यह स्थिति यह दर्शाती है कि भारत ने डिजिटल प्रशासन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) आधार आधारित सेवाओं, सरकारी खरीद में डिजिटलीकरण तथा कई प्रशा सनिक सुधारों के माध्यम से कुछ सकारात्मक प्रगति अवश्य की है, किंतु सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार, राजनीतिक वित्त पोषण में पारदर्शिता की कमी, प्रवर्तन एजेंसियों की प्रभाव शीलता और प्रशासनिक जवा बदेही जैसे मुद्दे अब भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं। भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। विदेशी निवेश आक र्षित करने, वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने, डिजिटल अर्थव्यव स्था का नेतृत्व करने और विक सित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल आर्थिक सुधार पर्याप्त नहीं होंगे। निवेशक केवल बाजार का आकार नहीं देखते, बल्कि वे यह भी देखते हैं कि किसी देश में कानून का शासन कि तना मजबूत है, अनुबंधों का पालन कितना प्रभावी है और भ्रष्टाचार का स्तर कितना कम है। इसलिए भ्रष्टाचार का प्रश्न सीधे आर्थिक विकास से जुड़ा हुआ है।
साथियों, भारत में भ्रष्टा चार के अनेक रूप हैं। छोटे स्तर पर सरकारी कार्यालयों में सुविधा शुल्क, भूमि रिकार्ड में हेरफेर, पुलिस या स्थानीय प्रशासन में रिश्वत, ठेकों में अनियमितताएं, सरकारी खरीद में पक्षपात, कर चोरी के लिए मिलीभगत, लाइसेंस और पर मिट में अवैध भुगतान जैसी समस्याएं आज भी व्यापक रूप से चर्चा में रहती हैं।बड़े स्तर पर राजनीतिक वित्तपो षण, सार्वजनिक परियोजनाओं में लागत वृद्धि, प्रभाव का दुरुपयोग और सत्ता तथा व्य वसाय के बीच अपारदर्शी संबंद्द भी चिंता का विषय हैं। एक गंभीर सामाजिक समस्या यह भी है कि भ्रष्टाचार को अनेक लोग व्यवस्था का सामान्य हिस्सा मान चुके हैं। “काम जल्दी हो जाए” या “बिना परे शानी के काम निकल जाए” जैसी मानसिकता भ्रष्टाचार कोबढ़ावा देती है। जब रिश्वत देने वाला और लेने वाला दोनों इसे सामान्य व्यवहार मान लेते हैं, तब कानून भी सीमित प्रभाव छोड़ता है। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध सबसे बड़ा संघर्ष केवल सरकारी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। साथियों, हाल के वर्षों में भारत ने कई महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। ई-गवर्नेंस, डिजिटल भुगतान, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी), जीईएम (गवर्नमेंट ई-मार्किट प्लेस), आनलाइन टेंडर प्रणा ली, आधार आधारित सत्या पन, आयकर और जीएसटी का डिजिटलीकरण, आनलाइन सेवा वितरण और डिजिटल रिकार्ड प्रबंधन ने भ्रष्टाचार की अनेक संभावनाओं को कम किया है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से करोड़ों लाभार्थियों तक बिना बिचैलि यों के सरकारी सहायता पहुं चना एक महत्वपूर्ण उपलब्द्दि है। फिर भी केवल तकनीक समाधान नहीं है। यदि संस्था गत जवाबदेही कमजोर रहे, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई न हो, जांच एजेंसियों की स्व तंत्रता पर प्रश्न उठें और दोषि यों को शीघ्र दंड न मिले, तो तकनीकी सुधार भी सीमित प्रभाव ही छोड़ेंगे। इसलिए तकनीक के साथ मजबूत संस् थागत सुधार अनिवार्य हैं।
साथियों, राजनीतिक वित्त पोषण में पारदर्शिता आज सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है। लोकतंत्र में चुनाव आव श्यक हैं, किंतु चुनावी वित्तपोषण यदि अपारदर्शी रहेगा तो नीति निर्माण पर निजी हितों का प्रभाव बढ़ सकता है। इसलिए राजनी तिक दलों की आय, चुनावी चंदे और व्यय की पारदर्शिता लोकतांत्रिक शासन की विश्व सनीयता के लिए आवश्यक है। स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोक पाल, लोकायुक्त, केंद्रीय सत र्कता आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, सूचना आ योग, न्यायपालिका, सतर्कता तंत्र और स्वतंत्र मीडिया लोक तंत्र के प्रहरी हैं। यदि ये संस् थाएं निष्पक्ष, स्वतंत्र और संसा धन- संपन्न हों तो भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। सूचना का अधि कार (आरटीआई) ने भारत में पारदर्शिता बढ़ाने में ऐतिहा सिक भूमिका निभाई है।
अनेक घोटाले, अनियमित ताएं और प्रशासनिक कमियां इसी कानून के माध्यम से सामने आईं। इसलिए पारद र्शिता और सूचना तक नागरि कों की पहुंच को और मजबूत करना समय की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध नागरि कों की भूमिका सबसे महत्व पूर्ण है। यदि कोई नागरिक रिश्वत देने के बजाय शिका यत दर्ज कराए, डिजिटल पोर्टल का उपयोग करे, सबूत सुरक्षित रखे और कानूनी प्रक्रिया का पालन करे, तो व्यवस्था पर सकारात्मक दबाव बनता है। हर शिकायत तत्काल परिणाम नहीं देती, लेकिन सामूहिक नागरिक भागीदारी व्यवस्था में परिवर्तन का आधार बनती है। साथियों, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नैतिक शिक्षा, ईमानदारी, सार्वजनिक जीवन के मूल्यों और संवैधानिक कर्त व्यों पर अधिक बल दिया जाना चाहिए। भविष्य की पीढ़ी यदि ईमानदारी को सफलता का आधार मानेगी,तभी भ्रष्टाचार के विरुद्ध दीर्घकालिक परिव र्तन संभव होगा। कार्पोरेट क्षेत्र की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। रिश्वत देकर अनुबंद्द प्राप्त करना, कर चोरी, फर्जी बिलिंग या अनुचित प्रभाव का उपयोग करना भी भ्रष्टाचार का हिस्सा है। इसलिए मजबूत कार्पोरेट गवर्नेंस, स्वतंत्र आडिट, व्हिसलब्लोअर सुरक्षा और नैतिक व्यावसायिक आचरण आवश्यक हैं।
साथियों, भ्रष्टाचार का सब से अधिक नुकसान गरीब, म ध्यम वर्ग और छोटे उद्यमियों को होता है। जिनके पास संसाधन कम होते हैं,वे रिश्वत देने में अधिक कठिनाई मह सूस करते हैं। परिणामस्वरूप सामाजिक असमानता और बढ़ती है। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष वास्तव में सामाजिक न्याय का भी संघर्ष है। भारत यदि विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है, तो उसे आर्थिक विकास के साथ सुशासन को भी समान प्राथमिकता देनी होगी। विश्व स्तर पर प्रतिस्प र्धा केवल उत्पादन, तकनीक और निवेश से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, कानून के शासन और संस्थागत विश्वसनीयता से भी तय होती है।
साथियों, ट्रांसपेरेंसी इंटरने शनल की 2026 रिपोर्ट भारत के लिए निराशा का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सुधार का अव सर है। 91वीं रैंक यह संदेश देती है कि अभी लंबी यात्रा शेष है। यदि हम डिजिटल प्रशासन का विस्तार करें, शिकायत निवारण को प्रभावी बनाएं, स्वतंत्रसंस्थाओं को मज बूत करें, राजनीतिक वित्तपोषण में पूर्णपारदर्शिता लाएं, न्या यिक प्रक्रियाओं को तेज करें और नागरिकों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध सक्रिय भागीदार बनाएं, तो भारत की स्थिति आने वाले वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बेहतर हो सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।
यह सरकार, न्यायपालिका, प्रशासन, मीडिया, उद्योग, नागरिक समाज और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। जब तक रिश्वत देने वाला यह नहीं कहेगा कि “मैं सुवि धा शुल्क नहीं दूंगा”,तब तक रिश्वत लेने वाला भी समाप्त नहीं होगा। इसलिए समय की मांग है कि भ्रष्टाचार को सुविधा नहीं, अपराध माना जाए, मौन नहीं, शिकायत की जाए, समझौता नहीं, प्रतिरोध किया जाए। तभी भारत वैश्विक मंच पर केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि सुशासन, पार दर्शिता और नैतिक नेतृत्व का भी उदाहरण बन सकेगा। यही विकसित भारत की वास् तविक पहचान होगी। बल्कि न्याय और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। लोकतंत्र में कठोरता और संवैधानिक संतुलन दोनों साथ- साथ चलते हैं। साथियों, यदि भारत कोम भ्रष्टाचार माफिया, नशा तस्करी, साइबर अपराध, अवै ध खनन, भूमि कब्जा और संग ठित अपराध से मुक्त बनाना है, तो राज्यों और केंद्र के बीच एक समन्वित राष्ट्रीय रण नीति विकसित करनी होगी। इसमें अपराधियों की संपत्ति जब्ती, अवैध आय की पहचान, तकनी की निगरानी, अंतरराज्यीय डाटाबेस, वित्तीय खुफिया तंत्र और त्वरित न्याय प्रणाली प्रमु ख आधार बन सकते हैं।
साथियों, भारतीय संस्कृति में सतयुग और त्रेतायुग न्याय, सत्य, धर्म और लोककल्याण के प्रतीक माने जाते हैं। आ धुनिक लोकतांत्रिक भारत में इन आदर्शों का अर्थ किसी धार्मिक व्यवस्था की पुनर्स्था पना नहीं, बल्कि ऐसा शासन है जहाँ कानून सर्वोपरि हो, अपराधी कानून से भयभीत हों, निर्दोष नागरिक सुरक्षित हों, महिलाओं, बच्चों और व रिष्ठ नागरिकों को निर्भय वा तावरण मिले तथा न्याय सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हो। यही संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप ष्सुशासनष् की वास्त विक परिकल्पना है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह कहा जा सक ता है कि संगठित अपराध के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष केवल पुलिस का दायित्व नहीं, बल्कि सरकार, न्यायपालिका, जांच एजेंसियों, अभियोजन, नागरि क समाज और जागरूक ना गरिकों की साझा जिम्मेदारी है। जब कानून निष्पक्ष, त्वरित और प्रभावी ढंग से लागू होगा, जब अपराध सिंडिकेट का आ र्थिक और संगठनात्मक ढाँचा ध्वस्त होगा, जब आदतन अप राधियों के विरुद्ध कानून की कठोरता और न्यायिक प्रक्रिया की गति दोनों सुनिश्चित हों गी, तब भारत अधिक सुरक्षित, निवेश-अनुकूल, न्यायपूर्ण और विश्वासपूर्ण राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ सकेगा। यही विकसित भारत, सुशासन और संविधान आधारित न्याय व्यवस्था की सबसे मजबूत आधारशिला होगी।

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