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क्या हम केवल महिला नेतृत्व संख्या बढ़ाना चाहते हैं? या वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना चाहते हैं? यही प्रश्न आज संसद के सामने है, और यही इस अधिनियम की वास्तविक परीक्षा भी

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)
वैश्विक स्तर पर भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सशक्त बनाने के उद्देश्य से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023(106वां संशोधन) (महिला आरक्षण वि धेयक) भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जा रहा है महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रति शत आरक्षण देकर नीति- नि र्माण में उनकी भागीदारी सुनि श्चित करता है। आलोचकों का मानना है कि इससे प्राक्सी नेतृत्व और वंशवादध्भाई- भती जावाद बढ़ सकता है, जबकि समर्थक इसे महिलाओं के सश क्तिकरण का ऐतिहासिक कदम मानते हैं।आलोचक तर्क देते हैं कि ग्रामीण या जमीनी स्तर पर पुरुष नेता अपनी पत्नियों या बेटियों को उम्मीदवार बना कर पर्दे के पीछे से शासन कर सकते हैं।यह भी आशंका जताई जा रही है कि पहले से स्थापित राजनीतिक परिवार अपनी महिला सदस्यों को सीटें दिलाने के लिए इसका इस्ते माल कर सकते हैं।
मैं एडवोकेट किशन सन मुखदास भावनानीं गोंदिया महा राष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि वैसे ग्रामीण स्तर पर प्राक्सी सरपंच के ऊपर सरकार ने एक्शन लिया है वैसा ही नियम नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में भी बनाना जरूरी है। 13 अप्रैल 2026 को पीएम ने राष्ट्रीय स्तर के महिला सम्मेलन में कहा कि लोकतंत्र में महिला आरक्षण अति आवश् यक है महिलाओं की भागी दारी लोकतंत्र को मजबूत कर ती है, मैं अत्यंत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि यह 21 वीं सदी के महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक है, यह निर्णय नारी शक्ति को समर्पित है, नारी शक्ति वंदन को समर्पित हैं। बता दें दशकों से लंबित इस मांग को संवैधानिक स्वरूप देकर यह अधिनियम महिला ओं को विधायिका में समान भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ाता है। किंतु इस ऐतिहा सिक पहल के साथ- साथ कई जमीनी चुनौतियां और संरचनात्मक समस्याएं भी सा मने आती हैं, जिनका समा धान किए बिना यह आरक्षण केवल संख्यात्मक प्रतिनिधि त्व तक सीमित रह सकता है, वास्तविक नेतृत्व तक नहीं पहुंच पाएगा? यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या इस अद्दिनियम से वंशवाद तथा प्राॅक्सी नेतृत्व शुरू नहीं हो जाएगा? क्या केवल आरक्षण देने से महिलाओं का वास्त विक नेतृत्व सुनिश्चित हो जाएगा? भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के अनुभव बताते हैं कि ऐसा जरूरी नहीं है। अनेक मामलों में चुनी हुई महिला प्रतिनिधि केवल एक औपचारिक चेहरा बनकर रह जाती हैं, जबकि वास्तविक निर्णय उनके पति, पिता, भाई या अन्य पुरुष रिश्तेदार लेते हैं। इस प्रवृत्ति को आम भाषा में सरपंच पति या प्राक्सी नेतृत्व कहा जाता है। यह समस्या केवल पंचायत स्तर तक सीमि त नहीं है, बल्कि कई बार राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में भी देखने को मिलती है। यह स्थिति लोक तंत्र की मूल भावना जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन के साथ एक प्रकार का समझौता है। जब एक महिला प्रतिनिधि केवल नाम मात्र की होती है और वास्त विक सत्ता किसी और के हाथ में होती है, तब यह न केवल महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य को विफल करता है, बल्कि मतदाताओं के विश्वास के साथ भी धोखा है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में ऐसे प्रावधान जोड़े जाएं जो इस प्राक्सी नेतृत्व को रोक सकें। 16 से 18 अप्रैल 2026 को होने वाले संसद के विशेष सत्र में भाग लेने वाले सांसदों का ध्यान मैं इस आर्टिकल के माध्यम से आकर्षित करना चाहता हूं कि वे इस विषय पर संज्ञान लेकर संसद में विचार विमर्श करें ऐसा मेरा निवेदन है?
साथियों बात अगर हम सरकार द्वारा उठाए गए सरपंच पति के खिलाफ एक्शन की करें तो जमीनी स्तर पर लोक तंत्र को मजबूत करने के लिए एक अहम कदम के तौर पर, पंचायती राज मंत्रालय ने प्राॅक् सी सरपंच को ना कहें कैंपेन शुरू किया है। इंटरनेशनल महिला दिवस 2026 पर शुरू की गई इस देशव्यापी पहल का मकसद सरपंच पति कल्चर को खत्म करना है, जो बहुत गहराई तक जड़ें जमा चुका है और यह पक्का करना है कि चुनी हुई महिला प्रतिनि धि अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल आजादी से करें। सरपंच पति या प्रधान पति उस प्रथा को कहते हैं जिसमें चुनी हुई महिला सरपंच का पति या पुरुष रिश्तेदार असल में एडमिनिस्ट्रेटिव और फैसले लेने की पावर रखता है, जिस से महिला सिर्फ केवल नाम मात्र की ही मुखिया बनकर रह जाती है जो लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।
साथियों बात अगर हम महिलाओं को सशक्त बनाने वास्तविक नेतृत्व देने का अप ना उद्देश्य सफल बनाने की करें तो मेरे विचार से इन पांच रणनीतियों पर संज्ञान लेने की सख्त जरूरत है, सबसे पहली रणनीति यह हो सकती है कि कानून में स्पष्ट रूप से प्राक्सी प्रतिनिधित्व की परिभाषा दी जाए और इसे दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। यदि यह प्रमाणित हो कि किसी महिला जनप्रति निधि के अधिकारों का प्रयोग कोई अन्य व्यक्ति कर रहा है, जैसे कि बैठकों में भाग लेना, निर्णय लेना, दस्तावेजों पर हस्ता क्षर करना, सीक्रेट दस्तावे देखना चुनीं हुई प्रतिनिधि के सिवाय उसका पति या कोई रिश्तेदार कर रहा है तो तो उस स्थिति में संबंधित व्यक्ति और महिला प्रतिनिधि दोनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। इसके तहत पद से अयोग्यता, जुर्माना और कारावास जैसी सख्त सजा का प्रावधान किया जा सकता है। दूसरी महत्व पूर्ण रणनीति है, क्षमता निर्माण (कैपेसिटी बिल्डिंग)। केवल सीट आरक्षित कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि निर्वाचित महि ला प्रतिनिधियों को प्रशास निक, विधायी और वित्तीय प्रक्रि याओं का प्रशिक्षण देना अनि वार्य किया जाना चाहिए।
इसके लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर विशेष प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए जा सक ते हैं, जहां महिलाओं को नेतृत्व कौशल, निर्णय लेने की क्षमता और संवैधानिक अधिकारों की जानकारी दी जाए। यदि महि लाएं आत्मवि श्वास और ज्ञान से सशक्त होंगी, तो वे किसी भी बाहरी हस्तक्षेप का सामना बेहतर तरीके से कर सकेंगी।
तीसरी रणनीति के रूप में डिजिटल पारदर्शिता और निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए। आज के डिजि टल युग में यह संभव है कि सभी सरकारी बैठकों, निर्णयों और फंड के उपयोग को आन लाइन रिकार्ड किया जाए। यदि किसी बैठक में महिला प्रतिनिधि की जगह कोई अन्य व्यक्ति उपस्थित होता है या निर्णय लेता है, तो इसे आसानी से ट्रैक किया जा सकता है। इसके साथ ही, नागरिकों को भी शिकायत दर्ज कराने का अधिकार दिया जाना चाहिए, जिससे वे किसी भी प्रकार के प्राक्सी नेतृत्व की सूचना संबंधित प्राधिकरण को दे सकें। चैथी रणनीति है, राज नीतिक दलों की जवाबदेही।
अक्सर देखा गया है कि राजनीतिक दल सुरक्षित सीटों पर अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए अपने परिवार की महिलाओं को उम्मीदवार बना देते हैं। इससे वंशवाद और प्राक्सी नेतृत्व दोनों को बढ़ावा मिलता है। इसलिए यह आवश्यक है कि राजनी तिक दलों के लिए भी आचार संहिता बनाई जाए, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि उम्मीदवारों का चयन केवल पारिवारिक संबंधों के आधार पर न हो, बल्कि उनकी योग्य ता, अनुभव और सामाजिक योगदान को प्राथमिकता दी जाए। पांचवीं और अत्यंत महत्व पूर्ण रणनीति है, सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन।
कानून केवल एक ढांचा प्रदान कर सकता है, लेकिन वास्त विक बदलाव समाज के दृष्टि कोण में परिवर्तन से ही आए गा। जब तक समाज महिलाओं को स्वतंत्र निर्णय लेने वाली नेता के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, तब तक किसी भी का नून का प्रभाव सीमित रहेगा। इसके लिए शिक्षा, मीडिया और सामाजिक अभियानों के माध्यम से यह संदेश फैलाना होगा कि महिला नेतृत्व केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्त विक और प्रभावी होना चाहिए। साथियों हम इस बात पर विचार करें कि अब प्रश्न यह भी उठता है कि क्या एक सक्षम और तेज स्वी महिला नेता बिना किसी पुरुष हस्तक्षेप के राजनीति में टिक पाएगी? इसका उत्तर है, हाँ, लेकिन इसके लिए एक सहायक पारिस्थितिकी की आवश्यकता है। यदि कानून मजबूत हो, प्रशिक्षण उपलब् ध हो, और समाज का समर्थन मिले, तो महिलाएं न केवल टिकेंगी बल्कि उत्कृष्ट नेतृत्व भी प्रदान करेंगी। भारत में पहले से ही कई उदाहरण हैं,जहां महिलाओं ने अपने दम पर राजनीति में अपनी पहचान बनाई है और प्रभावी निर्णय लिए हैं।
साथियों बात अगर हम नारी शक्ति वंदन अधिनियम को गहराई से समझने की करें तो सबसे पहले यह सम झना आवश्यक है कि इस अधिनियम के तहत महिलाओं को किन- किन चुनावों में 33.33 प्रतिशत आरक्षण मिले गा। इस कानून के अनुसार, भारत की संसद (लोकसभा) और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटें आर क्षित की जाएंगी। इसके साथ ही, अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत उप-आरक्षण सुनिश् िचत किया गया है। हालांकि यह आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा, बल्कि इसके लागू होने की शर्तें नि र्धारित की गई हैं पहली देश में अगली जनगणना पूरी हो दूसरी, उसके आधार पर परि सीमन की प्रक्रिया पूरी की जाए। अनुमानत यह प्रक्रिया 20 29 के आम चुनावों तक पूरी हो सकती है, जिसके बाद यह आरक्षण प्रभावी रूप से लागू होगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अधिनियम स्था नीय निकायों पर लागू नहीं होता, क्योंकि वहां पहले से ही 33 प्रतिशत से लेकर कई राज्यों में 50 प्रतिशत तक महिला आरक्षण लागू है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश् लेषण करें तो हम पाएंगे कि 16 से 18 अप्रैल 2026 को प्रस् तावित विशेष संसद सत्र केवल आरक्षण लागू करने का अवसर नहीं है, बल्कि इसे सार्थक और प्रभावी बनाने का भी एक ऐतिहासिक मौका है। संसद के माननीय सदस्यों को इस बात का संज्ञान लेना चाहिए कि यदि इस अधिनि यम में प्राक्सी नेतृत्व को रोकने के लिए ठोस प्रावधान नहीं जोड़े गए, तो यह कानून अपने मूल उद्देश्य से भटक सकता है। इसलिए यह समय की मांग है कि नारी शक्ति वंदन अधि नियम 2023 को केवल एक आरक्षण कानून के रूप में न देखा जाए, बल्कि इसे एक व्यापक सामाजिक-राज नीतिक सुधार के रूप में विक सित किया जाए।
इसमें कानू नी दंड, प्रशि क्षण, पारदर्शिता राजनीतिक जवाबदेही और सामाजिक परि वर्तन इन सभी पहलुओं को शामिल करना आवश्यक है। तभी यह अधिनियम भारत की महिलाओं को केवल सीट ही नहीं, बल्कि सत्ता और सम्मान भी दिला सकेगा।
इस ऐतिहा सिक मोड़ पर लिया गया निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा निर्धा रित करेगा क्या हम केवल संख्या बढ़ाना चाहते हैं, या वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना चाहते हैं? यही प्रश्न आज संसद के सामने है, और यही इस अधिनियम की वास्तविक परीक्षा भी।

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