(राजेश कुमार वार्मा)
आज हम सब लोग बाबा साहेब डा0 भीमराव अम्बेडकर जी को हार्दिक श्रद्धांजलि दे रहे हैं। लेकिन केवल श्रद्धांजलि से काम नहीं चलेगा हमें यह सोचना पड़ेगा कि बाबा साहब ने भारत के इस आलीशान संविधान को बनाने में कितना कठोर परि श्रम किया था, और समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व की भावना को सुदृढ करने के लिए उसे सामाजिक न्याय से जोड़ा था। लेकिन बाबा साहब के बनाए हुए संविधान के उद्देश्य और लक्ष्य की पूर्ति तब तक संभव नहीं है जब तक कि हम संविधान को सरकार में बैठे लोगों द्वारा तोड़े और मरोड़ जाने की प्रक्रिया पर चिंतन नहीं करते, और सरकार की इस निकृष्टतम काम हेतु निंदा नहीं करते।
वास्तविकता यह है कि विगत कुछ वर्षों में बाबा साहब का बनाया हुआ संविधान पूरी तरह अप्रासंगिक भले ना हुआ हो पर अपने असली स्वरूप की पहचान बहुत हद तक खो बैठा हैै। सरकार में बैठे लोग जिस तरह मनमाने ढंग से संविधान के लक्ष्य को नजर अंदाज कर रहे हैं और चाला की से संविधान के आत्मा को बदल रहे हैं, वह चिंतनीय है बाबा साहब भीमराव अंबेड कर ने संविधान बनने के बाद अपनी दूरदृष्टि का परिचय देते हुए चेतावनी में कहा था, कि हमारा संविधान बहुत अच् छा है लेकिन आने वाले समय में इसका प्रयोग करने वालों की नीत और नियत पर निर्भर करेगा की संविधान के उद्देश्यों का कितना लाभ आम जनता को मिलेगा।
संविधान अपने उद्देश्यों में कभी असफल नहीं होगा लेकि न जिनको संविधान लागू कर ने का दायित्व दिया गया है यह जो उनकी नियत साफ नहीं है तो वैसे असफल बना देंगे। बाबा साहब अंबेडकर की यह चिंता संविधान की गुणात्मकता को लेकर नहीं थी उनकी यह चिंता आने वाले समय में संविधान को लागू करने वालों की कुनियत पर थी, जो आज सामने दिखाई दे रही है।
लोकतंत्र की गुणवत्ता में आस्था के बिना देश का उद्धार या उद्धार की राजनीति जनता के साथ मजाक से ज्यादा कुछ नहीं होगी। सत्ता में बैठे लोग संविधान की अवमानना करके सामाजिक न्याय की संवैधानिक कल्पना को पीछे धकेल रहे हैं इस सरकार ने संविधान के सीने पर जो घाव लगाए हैं उन्हें बताने की जरूरत नहीं है, संविधान की सामाजिक न्याय की अवधारणा समाजवाद और सेक्युलरिज्म इस सरकार को स्वीकार नहीं है और यही सब संविधान की आत्मा हैं। लोकतांत्रिक ढंग से किए गए विरोध को यह अपराध की संज्ञा दे देते हैं, कुछ ऐसे कारण है जिससे यह चिंता और गंभीर हो जाती है कि जो संविधान के सीने पर जख्म दे रहे वही शातिर लोग, बाबा साहब अंबेड कर के व्यक्तित्व की प्रशंसा में गीत भी गा रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि बिना इसके उनकी नैया चुनाव में पार होने वाली नहीं है।
बाबा साहब अंबेडकर और उनका संविधान एक व्यक्ति एक वोट की कीमत समझते थे। बाबा साहब का मानना था की सामाजिक लोकतंत्र के बिना केवल चुनावी लोक तंत्र या राजनीतिक लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रहेगा लेकिन वर्तमान सरकार ने इस महान सिद्धांत से बचने का एक दूसरा रास्ता निकाल लिया है। सरकार की लोकतान्त्रिक बेईमानी के चलते वैधानिक और न्यायिक रूप से संविधान में जब कोई बदलाव करते हैं तो सामाजिक न्याय और सामा जिक लोकतंत्र का कोई अर्थ शेष नहीं बचेगा। बाबा साहब के संविधान के संकल्प का सपना भी नहीं बचेगा।
अगर हम पूरी दुनिया के चुनावी लोकतंत्र का इतिहास देखें तो पता चलेगा की अद्दि क से अधिक लोगों को वोट का अधिकार देना ही लोकतंत्र की सफलता का पैमाना माना गया है लेकिन हमारे नेताओं ने इसके ठीक उल्टा करके लोगों के आधिकाधिक वोट काट कर नया इतिहास रच दिया है। अभी तक हम गर्व से कहा करते थे कि भारत की नौकरशाही और लोकशा ही अधिक से अधिक लोगों को चुनाव में शामिल करके गौरव अनुभव करती है, पर आज हम देख रहे हैं कि घुस पैठियों के नाम पर एक धर्म विशेष के लोगों को बड़ी कुटि लता से वोट डालने से वंचित किया जा रहा है।कई लाख लोगों को वोटर लिस्ट से नि काल कर भी एक घुसपैठिया का नाम घमंडी लोक शाह नहीं बता पा रहे हैं ।
और इस गंभीर कुटिलता पर न्यायालय की चुप्पी उन बाबा साहब के बने हुए हुए संविधान पर और बड़ा खतरा दिखाई देता है। यह धोखेबाजी किसी एक संस्था तक सीमित नहीं है संविधान में सत्ता के संतुलन हेतु विधायिका, न्याय पालिका और कार्यपालिका को स्वतंत्रता से काम करने हेतु स्वायत्तता दी गई थी, जिससे सरकार पर अंकुश बनाए रखा जा सके, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इन स्वायत्तता प्राप्त संस्थाओं ने अपनी स्वायत्तता सरकार के यहां गिरवी रख दी है, विशे षकर भारत का चुनाव आयोग तो ऐसा लगता है की सरकार के इशारे पर ही कार्य करता है। आज बाबा साहब के जन्म दिन पर मुझे यह कहने में कोई आपत्ति नहीं है की बाबा साहब का इससे बड़ा कोई दूसरा अपमान नहीं हो सकता, कि संविधान की धारा 32, एक तरह से संविधान का हृदय माना जा सकती है, जिससे जनता को कुछ मूल अधिकार दिए गए और उन्हें अधिकारों की रक्षा हेतु न्या यालय को अनंत अधिकार सौंप गए अगर कोई संविधान निक ढंग से सरकार से सवाल कर ता है तो यह उसका संवैधा निक अधिकार है, ऐसे करने वालों को अपराधी कहकर जेल में डाल देना संविधान की मूल भावना का हनन है, और आज के दिन इस पर चिंता करना जरूरी है अगर आज के दिन इस पर चिंता नहीं की गई तो संविधान के अन्य धाराएं भी खतरे में पड़ जाएंगी जब संविधान की पवि त्रता खतरे में पड़ जाती है तब हम और हमारा देश ताना शाही से कुछ ही दूर पर खड़े दिखाई देते हैं।
किसी देश का संविधान और न्याय व्यवस्था, उस संवै धानिक लोकतंत्र का रक्षा कवच होता है अगर रक्षा कवच के साथ ही छेड़छाड़ की जा सकती है तो लोकतंत्र का अस् ितत्व खतरे में दिखाई पड़ेगा।
इसलिए हम सब आज के दिन बाबा साहब को श्रद्धां जलि अर्पित करें और संकल्प करें कि उनके बनाए हुए संवि धान और उसके मूल ढांचे की रक्षा हेतु कार्य करेंगे और उनका विरोध करेंगे जो संवि धान के असली स्वरूप से खिलवाड़ कर रहे हैं जय हिंद, आधुनिक भारत के निर्माता बाबासाहेब भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंबेडकर जो जाति और वर्ण व्यवस्था रूपी समाज का उन्मूलन कर, जातिविहीन एवं शोषणविहीन समाज की स्थापना लोकतंत्र के सहारे वंचित समाज को उनका वाजिब हक दिलाने के लिए करना चाहते थे, सदियों की सामाजिक और आर्थिक दासता को समाप्त करने का मजबूत प्रावधान भारतीय संविधान में समाज वाद की अवधारणा के आधार पर किया है। ंददपीपसंजपवद व िबंेजम ंदक तपककसमे पद भ्पदकनपेउ इत्यादि पुस्तकें लिखकर जाति और तथा कथित धर्म पर करारा प्रहार किया है। जिनका सूक्त ओर संदेश वाक्य कि ‘पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद समाज के दो दुश्मन हैं’।
ऐसे महानायक की 135वीं जयंती के अवसर पर आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
