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समय की कमी – छात्रों के लिए एक डिजिटल चुनौती

(राममिलन शर्मा)
रायबरेली। आज के तेज और अत्यधिक जुड़े हुए दौर में छात्रों के बीच समय की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। यह इसलिए नहीं कि समय कम हो गया है, बल्कि इसलिए कि ध्यान लगा तार बंट रहा है। हाल के अव लोकनों के अनुसार, छात्र प्रति दिन लगभग 4 से 6 घंटे डिजि टल उपकरणों पर बिताते हैं, जिनमें से करीब 30-40 प्रति शत समय गैर उत्पादक गति विधियों जैसे सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग और शार्ट वीडियो देखने में व्यर्थ हो जाता है। वहीं दूसरी ओर, शैक्षणिक दबाव इतना बढ़ चुका है कि छात्रों को 6-8 घंटे स्कूल और कोचिंग में देने पड़ते हैं, जिससे पुनरावृत्ति, आराम और व्यक्तिगत विकास के लिए बहुत कम समय बचता है। यह असंतुलन एक गहरी समस्या की ओर इशारा करता है। छात्रों के पास समय की कमी नहीं है, बल्कि वे उसके उपयोग पर नियंत्रण खो रहे हैं।
इस बदलाव में डिजिटल प्लेटफार्म की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आज के अधिकांश ऐप्स ऐसे एल्गोरिदम पर आधारित हैं जो कि उपयोगकर्ता की आदतों को समझकर उन्हें लंबे समय तक जोड़े रखने के लिए सामग्री प्रस्तुत करते हैं। जो कुछ मिनट का ब्रेक लगता है, वह कब घंटों में बदल जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। तकनीकी विशेषज्ञ ट्रिस्टन हैरिस के अनुसार, ये प्लेटफार्म मानव ध्यान के लिए प्रतिस्प र्धा करते हैं। छात्रों के लिए इसका मतलब है कि उनका कीमती समय अनजाने में ही खर्च हो जाता है, जिससे उन्हें हमेशा लगता है कि समय कम पड़ रहा है।
इस स्थिति को समझने के लिए रिया का उदाहरण महत्वपूर्ण है, जो एक हाई स्कूल की छात्रा है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी। पूरे दिन पढ़ाई और कोचिंग के बावजूद वह अपने असाइनमेंट समय पर पूरा नहीं कर पाती थी। जब उसने अप ने दिनचर्या का विश्लेषण किया, तो पाया कि वह रोजाना लग भग 2.5 घंटे मोबाइल पर बिता रही थी। स्क्रीन टाइम कम करने और एक निर्धारित समय -सारणी अपनाने के बाद कुछ ही हफ्तों में उसकी उत्पादकता बढ़ी और तनाव कम हुआ। यह उदाहरण आज के कई छात्रों की वास्तविकता को दर्शाता है
सर्वेक्षण भी इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं। 60 प्रतिशत से अधिक छात्र नियमित रूप से टालमटोल (चतवबतंेजपदंजपवद) करते हैं, जबकि लग भग 50 प्रतिशत छात्र खराब समय प्रबंधन के कारण खुद को तनावग्रस्त महसूस करते हैं। शोध यह भी बताते हैं कि जो छात्र एक व्यवस्थित अध्ययन योजना का पालन करते हैं, वे अन्य छात्रों की तुलना में 20दृ25 प्रतिशत बेहतर प्रद र्शन करते हैं। यह स्पष्ट कर ता है कि समय प्रबंधन और सफलता के बीच सीधा संबंध है, लेकिन डिजिटल विचलनों के कारण इसे बनाए रखना कठिन होता जा रहा है।
अत्यधिक डिजिटल उप योग का एक बड़ा प्रभाव ध्यान केंद्रित करने की क्षमता पर पड़ता है। लगातार छोटे और मनोरंजक कंटेंट देखने से दिमाग लंबे और जटिल कार्यों पर ध्यान लगाने में कमजोर हो जाता है। छात्र तुरंत संतु ष्टि पाने की आदत विकसित कर लेते हैं, जिससे पढ़ाई कठिन और बोझिल लगने लगती है। इसका परिणाम होता है देरी, अंतिम समय का दबाव और बढ़ता हुआ तनाव, जो समय की कमी की भावना को और मजबूत करता है।
इस समस्या का समाधान जागरूकता और सही प्रयास में है। छात्रों को यह समझना होगा कि हर स्क्रीन टाइम उपयोगी नहीं होता और छोटे -छोटे बदलाव बड़े परिणाम ला सकते हैं। अनावश्यक मोबाइल उपयोग को सीमित करना, प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना और दैनिक यो जना बनाना संतुलन स्थापित करने में मदद कर सकता है। यदि कोई छात्र प्रतिदिन केवल एक घंटा भी डिजिटल विचलन कम कर दे, तो वह साल भर में 365 से अधिक अतिरिक्त उत्पादक घंटे प्राप्त कर सकता है।
अंततः, समय की कमी वास् तविक नहीं है बल्किसमस्या उसके गलत उपयोग की है। यदि छात्र अपने ध्यान पर नियंत्रण पा लें, तो समय उनके लिए तनाव का कारण नहीं, बल्कि सफलता का एक मज बूत साधन बन सकता है।

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