एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर भारत इक्कीसवीं सदी में केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार नहीं रहा, बल्कि वह अब डिजिटल लोकतंत्र, डेटा संप्रभुता और नागरिक निजता के वैश्विक विमर्श का केंद्र बन चुका है। करोड़ों भारतीय नागरिकों का डिजिटल जीवन, उनकी बात चीत स्वास्थ्य जानकारी, आर्थिक लेन- देन,सामाजिक व्यवहार और वैचारिक झुकाव अब तकनीकी प्लेटफार्मों के सर्वरों में दर्ज हो रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न केवल तक नीकी याव्यावसायिक नहीं रह जाता, बल्कि सीधे-सीधे संवि धान, मानवाधिकार और राज्य की संप्रभु जिम्मेदारी से जुड़ जाता है। डिजिटल पर्सनल डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपी डीपी एक्ट), 2023 इसी ऐति हासिक जरूरत की उपज है, जो यह स्पष्ट करता है कि भारत में किसी भी नागरिक का डेटा अब अनियंत्रित कार्पोरेट शक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि डीपीडीपी अधिनियम 2023 का मूल उद्देश्य केवल डेटा चोरी रोकना नहीं है,बल्कि यह नागरिकों को यह अधि कार देता है कि उनका डिजि टल अस्तित्व भी उतना ही संर क्षित होजितना उनका भौतिक अस्तित्व। यह कानून स्पष्ट करता है कि डेटा किस उद्देश्य से, कितनी सीमा तक और कितनी अवधि के लिए प्रोसेस किया जा सकता है।
यह अधिनियम सूचित सह मति को केंद्रीय तत्व बनाता है,ताकि कोई भी कंपनी चाहे वह भारत की हो या विदेशी, यूजर को मानो या छोड़ो जैसी शर्तों में फँसाकर उसकी निज ता का सौदा न कर सके। इस दृष्टि से भारत पहली बार डेटा को केवल आर्थिक संसा धन नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित करता दिखता है। इसी पृष्ठ भूमि में व्हाट्सऐप और उसकी पैरेंट कंपनी मेटा का मामला केवल एक कंपनी की प्राइवेसी पालिसी तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह प्रश्न बन जाता है कि क्या वैश्विक टेक कंपनियाँ भारतीय संविधान के दायरे में काम करने को तैयार हैं या नहीं। वर्ष 2021 में व्हाट्सऐप द्वारा लाई गई टेक इट आर लीव इट प्राइवेसी पाॅलिसी ने भारतीय यूजर्स को दो ही विकल्प दिए, या तो नई शर्तें स्वीकार करें या सेवा छोड़ दें। यह नीति न केवल असमान शक्ति-संतुलन का उदाहरण थी, बल्कि इसने नाग रिकों की वास्तविक सहमति की अवधारणा को भी खोखला कर दिया। भारतीय प्रतिस्प र्धा आयोग (एनसीएलएटी) ने नवंबर 2024 में इस नीति को प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लं घन मानते हुए मेटा पर 213.14 करोड़ रूपए का जुर्माना लगाया। आयोग का स्पष्ट मत था कि व्हाट्सऐप ने अपनी डाॅमिनेंट पोजिशन का दुरुप योग करते हुए यूजर्स को ऐसी शर्तें मानने के लिए मजबूर किया, जिनका व्यावसायिक लाभ सीधे मेटा के विज्ञापन मॉडल को जाता था। यह जुर्माना केवल आर्थिक दंड नहीं था, बल्कि यह एक निया मकीय संदेश था कि भारत में डिजिटल बाजार अब फ्री -फार-आल नहीं रहेगा। हालाँकि, जनवरी 2025 में एनसीएलएटी ने एक विरोधा भासी रुख अपनाया।उसने डाॅमिनेंस के दुरुपयोग वाले निष्कर्ष को हटाते हुए भी जुर्माने को बरकरार रखा। यह निर्णय कानूनी दृष्टि से जटिल था, क्योंकि यदि डाॅमिनेंस का दुरुपयोग नहीं हुआ, तो फिर जुर्माने का आधार क्या है यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। इसी कानूनी असंगति को चुनौती देते हुए मेटा सुप्रीम कोर्ट पहुँची, लेकिन शायद उसे यह अनुमान नहीं था कि यह मामला केवल प्रतिस्पर्धा कानून तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीधे भारतीय संविधान की आत्मा से टकराएगा।
मंगलवार, 3 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने इस विवाद को ऐतिहासिक मोड़ दे दिया। मुख्य न्याया धीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने जिस कठोरता और स्पष्टता से व्हाट्सऐप-मेटा की प्राइवे सी प्रैक्टिस पर सवाल उठाए, उसने यह संकेत दे दिया कि अब अदालत इस मामले को केवल कॉर्पोरेट नीति के रूप में नहीं देख रही।
साथियों बात अगर हम 3फरवरी 2026 को हुई सुनाई को गहराई से समझने की करें तो केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर ने जब यह तर्क रखा कि व्हाट्सऐप की प्राइवेसी पाॅलिसी शोषणकारी है और यूजर्स के डेटा का व्यावसायिक उपयोग करती है, तब अदालत की प्रतिक्रिया असाधारण रूप से सखघ््त थी।
मुख्य न्यायाधीश का कथन अगर हमारे संविधान का पालन नहीं कर सकते तो भारत छोड़ कर जाइए किसी भीवैश्विक टेक कंपनी के लिए अब तक की सबसे तीखी न्यायिक चेता वनी मानी जा सकती है। यह कथन केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं था,बल्कि यह भारत की डिजिटल संप्रभुता की स्पष्ट घोषणा थी। अदालत ने यह रेखांकित किया कि कोई भी सेवा प्रदाता भारत में व्यापार तभी कर सकता है, जब वह भारतीय संविधान, मौलिक अधिकारों और नागरि कों की गरिमा का सम्मान करे। अदालत ने यह भी कहा कि व्हाट्सऐप की प्राइवेसी पाॅलिसी इतनी चालाकी से तैयार की गई है कि एक आम नागरिक चाहे वह गरीब बुजुर्ग महिला हो,सड़क किनारे वेंडर हो या केवल तमिल बोलने वाली ग्रामीण महिला उसके निहिता र्थ कभी समझ ही नहीं सकती। यह टिप्पणी भारत की सामा जिक – आर्थिक विविधता को केंद्र में रखती है और यह स्वी कार करती है कि सूचित सह मति केवल अंग्रेजी में लिखे लंबे दस्तावेज से नहीं आती सहमति तभी वास्तविक मानी जाएगी, जब यूजर को पूरी तरह यह समझ हो कि उसका डेटा कैसे,क्यों और किसके साथ साझा किया जा रहा है।
साथियों बात अगर हम इस सुनवाई को और गहराई से समझने की करें तो सुनवाई के दौरान पीठ के अन्य माननीय जस्टिस ने बहस को और गह राई देते हुए कहा कि डीपी डीपी एक्ट भले ही प्राइवेसी की बात करता हो, लेकिन असली चिंता यूजर्स की बिहे वियरल टेंडेंसीज को लेकर है। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह प्रश्न उठाया कि जब डिजिटल फुटप्रिंट का उपयोग आनलाइन विज्ञापन और माइक्रो-टार्गेटिंग के लिए किया जा रहा है, तब यह केवल प्राइवेसी का मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि यह मानव व्यवहार के व्यावसायिक दोहन का मामला बन जाता है।यहटिप्पणी वैश्विक स्तर पर फेसबुक- कैम्ब्रिज एनालि टिका जैसे घोटालों की याद दिलाती है, जहाँ डेटा का उपयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया ओं को प्रभावित करने तक में किया गया। मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं का उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे ही कोई डाक्टर व्हाट्सऐप पर दवाइयों के नाम भेजता है, कुछ ही मिनटों में उन्हीं दवाओं के विज्ञापन दिखने लगते हैं।
यह उदाहरण इस बात की ओर इशारा करता है कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के दावों के बावजूद, मेटाडेटा और व्यव हारिक संकेतों का उपयोग किस हद तक व्यावसायिक प्रोफाइलिंग में किया जा रहा है। यह सवाल केवल तकनी की नहीं, बल्कि नैतिक और कानूनी भी है। मेटा के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सीमित डेटा शेयरिंग की अनु मति है और कंपनी की नीतियाँ अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनु रूप हैं।
लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी अगर आपको डेटा का कोई भी हिस्सा बेचने लायक लगेगा, तो आप उसे बेच देंगे? कार्पोरेट मंशा पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाती है? अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय उपभोक्ताओं की चुप्पी को उनकी सहमति नहीं माना जा सकता।
साथियों बात अगर हम यह पूरा विवाद वैश्विक परि प्रेक्ष्य में समझने की करें तो यह और भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यूरोप का जीडीपीआर, अमे रिका में राज्य-स्तरीय डेटा कानून और अब भारत का डीपीडीपी एक्ट ये सभी संकेत देते हैं कि दुनिया अब डेटा फ्री मार्केट से डेटा गवर्नेंस की ओर बढ़ रही है।
भारत, अपने विशाल यूजर बेस और लोक तांत्रिक मूल्यों के कारण,इस परिवर्तन में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त भूमिका यह संदेश देती है कि भारत केवल कानून बनाकर नहीं, बल्कि उन्हें लागू कराकर भी डिजिटल अधिकारों की रक्षा करेगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि अब यह मामला केवल व्हाट्सऐप या मेटा का नहीं है। यह सवाल है कि डिजिटल युग में नागरिक की गरिमा, निजता और स्वायत्तता को कौन परिभाषित करेगा कार्पोरेट एल्गोरिद्म या लोक तांत्रिक संविधान। 9 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई और तीन- जजों की बेंच का निर्णय भारत के डिजिटल भवि ष्य की दिशा तय कर सकता है। यदि अदालत नागरिकों के पक्ष में सख्त मानक तय करती है, तो यह न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक नया डेटा-न्याय मा डल प्रस्तुत करेगा। यह संघर्ष दरअसल डेटा साम्राज्य वाद और संवैधानिक संप्रभुता के बीच है। और इस बार, संकेत स्पष्ट हैं भारतीय संविधान पीछे हटने के मूड में नहीं है।
डीपीडीपी अधिनियम 2023 का मूल उद्देश्य केवल डेटा चोरी रोकना नहीं है, बल्कि नागरिकों को अधिकार देता है कि उनका डिजिटल अस्तित्व भी उतना ही संरक्षित हो जितना उनका भौतिक अस्तित्व
