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कृषि बाजार में अनुशासन, पारदर्शिता और गुणवत्ता संस्कृति को मजबूत करने यदि बीज विधेयक को कानून बनाकर प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वर्तमान डिजिटल प्रतिस् पर्धा युग में वैश्विक अर्थव्यव स्था के विस्तार के साथ- साथ नकली और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों का प्रसार भी एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय चुनौती बन चुका है। चाहे वह दवाइयाँ हों, खाद्य पदार्थ हों, कृषि आदान हों या तकनीकी उप करण, नकली माल का उपयोग उपभोक्ताओं के लिए केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उनके स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और जीवन की समग्र गुणवत्ता पर भी गहरा प्रतिकूल प्रभाव डाल ता है। विडंबना यह है कि जहां एक ओर उपभोक्ता इस बहुआयामी क्षति को झेलता है, वहीं दूसरी ओर इस गैर कानूनी गतिविधि से जुड़े तत्व भारी आर्थिक लाभ अर्जित करते हैं। यही कारण है कि आज विश्व स्तर पर यह स्वी कार किया जा रहा है कि नक ली उत्पादों से निपटने के लिए केवल सामान्य आपराधिक कानून पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र- विशेष के लिए विशेष और कठोर कानूनों की आवश्य कता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि कृषि क्षेत्र में इस समस्या का प्रभाव और भी अधिक गहरा है, क्योंकि यहां नुकसान केवल एक उपभोक्ता तक सीमित न होकर खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय कृषि प्रणाली तक फैल जाता है। नकली या घटिया बीजों का प्रयोग किसान की पूरी फसल, उसकी आय, ऋण चुकाने की क्षमता और अंततः उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
यही पृष्ठभूमि है, जिसमें भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित बीज विधेयक, 2025 को ला रही है। यह एक ऐसा विधायी प्रयास जो न केवल नकली बीजों पर अंकुश लगाने का लक्ष्य रखता है,बल्कि किसानों के अधिकारों की रक्षा करते हुए कृषि बाजार में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित कर ता है। बीज विधेयक, 2025 दरअसल 1966 के पुराने बीज अधिनियम का स्थान लेने के लिए लाया गया है, जो वर्तमान समय की जटिलताओं और बाजार की वास्तविकताओं के अनुरूप अपर्याप्त सिद्ध हो रहा था। पिछले कुछ दशकों में बीज उद्योग में निजी कंपनि यों, हाइब्रिड और उन्नत किस्मों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और डिजि टल आपूर्ति श्रृंखलाओं का तीव्र विस्तार हुआ है, लेकिन नियामक ढांचा उसी अनुपात में विकसित नहीं हो सका। इस अंतर का लाभ उठाकर नकली बीजों का संगठित कारोबार फलता-फूलता रहा, जिसके परिणामस्वरूप किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। नए विधेयक का मूल उद्देश्य इसी असंतुलन को सटीक रूप से दूर करना है।
साथियों बात अगर हम बीज विधेयक, 2025 को सम झने की करें तो इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह बीजों की गुणवत्ता को एक राष्ट्रीय मानक के अंतर्गत लाने का प्रयास करता है। विधेयक के अनुसार, बाजार में बेची जाने वाली सभी बीज किस्मों का अनिवार्य पंजीकरण आवश्यक होगा। इसका अर्थ यह है कि कोई भी बीज, चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा विक सित हो या निजी कंपनियों द्वारा, बिना नियामक स्वीकृति के किसानों तक नहीं पहुंच सकेगा। यह प्रावधान नकली और अप्रमाणित बीजों के लिए बाजार के दरवाजे बंद करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। इसके साथ ही, विधेयक बीज उत्पादकों, बीज प्रसंस्करण इकाइयों, डीलरों और पौध नर्सरियों के अनिवार्य पंजीकरण का प्रावधान करता है। यह व्यवस्था पूरी आपूर्ति श्रृंखला को निगरानी के दायरे में लाती है, जिससे यह सुनि श्चित किया जा सके कि किसी भी स्तर पर गुणवत्ता से सम झौता न हो। अंतरराष्ट्रीय अनु भव बताता है कि कृषि आदानों में पारदर्शी ट्रैकिंग और पंजी करण प्रणाली नकली उत्पादों को रोकने का सबसे प्रभावी साधन होती है, और इस दृष्टि से बीज विधेयक, 2025 भारत को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के समकक्ष खड़ा करता है।
साथियों बात अगर हम विधेयक को एक अन्य महत्व पूर्ण प्रावधान से समझने की करें तो, आपातकालीन परिस् िथतियों में बीज बिक्री मूल्यों का विनियमन है। प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु परिवर्तन जनित संकटों या महामारी जैसी स्थितियों में अक्सर बीजों की कृत्रिम कमी पैदा कर कीम तें बढ़ा दी जाती हैं। इसका सीधा बोझ किसान पर पड़ता है। बीज विधेयक सरकार को यह अधिकार देता है कि वह ऐसी असाधारण परिस्थि तियों में बीजों की कीमतों को नियंत्रित कर सके, जिससे किसानों का शोषण रोका जा सके। यह प्रावधान कृषि को केवल बाजार की शक्तियों के हवाले न छोड़कर सामाजिक न्याय के सिद्धांत से जोड़ता है। बीजों के प्रदर्शन का अनि वार्य लेबलिंग भी विधेयक का एक केंद्रीय तत्व है। लेबलिंग के माध्यम से बीज की किस्म, अंकुरण क्षमता, शुद्धता, उत्पा दन वर्ष और अन्य आवश्यक जानकारियाँ स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराई जाएंगी।
इससे किसानों को सूचित निर्णय लेने में मदद मिलेगी और धोखाधड़ी की संभावना न्यूनतम होगी।
वैश्विक स्तर पर यह माना जाता है कि सूचना की पारद र्शिता उपभोक्ता संरक्षण का सबसे मजबूत आधार है, और बीज विधेयक इसी सिद्धांत को कृषि क्षेत्र में लागू करता है। डिजिटल युग की आवश्य कताओं को ध्यान में रखते हुए विधेयक में ‘साथी पोर्टल’ पर अनिवार्य पंजीकरण का प्राव धान भी किया गया है। यह पोर्टल बीज से जुड़े सभी हितधारकों उत्पादकों डीलरों और नियामक एजेंसियों के बीच एक साझा डिजिटल मंच प्रदान करेगा।
इससे न केवल निग रानी और शिकायत निवारण की प्रक्रिया तेज होगी, बल्कि नीति-निर्माण के लिए विश्वस नीय डेटा भी उपलब्ध होगा। अंतरराष्ट्रीय कृषि शासन में डेटा-आधारित नियमन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, और इस दृष्टि से यह प्राव धान भारत को भविष्य के लिए तैयार करता है।
साथियों बात अगर हम बीज विधेयक, 2025 को ले कर एक महत्वपूर्ण आशंकाओं को समझने की करें तो,यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि कहीं यह किसानों की पारंपरिक प्रथाओं और अधि कारों को सीमित न कर दे। हालांकि विधेयक इस संदर्भ में अत्यंत स्पष्ट है। इसके प्रावधान किसानों और उनकी पारंपरिक किस्मों पर लागू नहीं होते।यह विधेयक पादप किस्मों के संरक्षण एवं किसान अधिकार अधिनियम, 2001 के अनुरूप किसानों के उन अधिकारों की रक्षा करता है, जिनके तहत वे बीजों को उगाने, बोने, सहेजने, आदान – प्रदान करने और बेचने के लिए स्वतंत्र हैं।
यह संतुलन इस विधेयक की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। इसके अतिरिक्त, जैविक विविधता अधिनियम, 2002 और पादप किस्मों के संरक्षण एवं किसान अधिकार अधिनियम, 2001 के अंतर्गत पहले से ही किसानों, सामुदा यिक बीज उत्पादकों और स्व देशी किस्मों की सुरक्षा के लिए जो प्रावधान मौजूद हैं यह विधेयक उनके साथ सामं जस्य स्थापित करता है।
इसका अर्थ यह है कि बीज विधेयक, 2025 किसी मौजूदा अधिकार को कमजोर नहीं करता, बल्कि नियमन और संरक्षण के बीच एक व्यावहा रिक संतुलन बनाता है।
साथियों बात अगर हम इस विधेयक को दंडात्मक प्राव धानों की दृष्टि से भी समझने की करें तो, यह विधेयक पुराने कानून की तुलना में अधिक प्रभावी है।
नकली बीजों की बिक्री पर 20 लाख रुपये तक का जुर्माना और कारावास का प्रावधान न केवल एक निवारक प्रभाव उत्पन्न करता है,बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी देता है कि कृषि क्षेत्र में धो खाधड़ी को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा। वैश्विक स्तर पर कृषि इनपुट्स की गुणवत्ता को लेकर जो सख्ती अपनाई जा रही है, भारत का यह कदम उसी दिशा में है।
साथियों बात अगर हम इस विधेयक को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझने की करें तो,बीज विधेयक, 2025 भारत को एक जिम्मेदार कृषि अर्थ व्यवस्था के रूप में स्थापित करता है। आज जब वैश्विक खाद्य सुरक्षा, जलवायु परि वर्तन और सतत विकास जैसे मुद्दे केंद्र में हैं, तब बीजों की गुणवत्ता और उपलब्धता निर्णा यक भूमिका निभाती है।
यह विधेयक न केवल घरेलू किसानों के हितों की रक्षा करता है, बल्कि भारत की कृषि आपूर्ति श्रृंखला को वैश्विक मानकों के अनुरूप बना कर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उसकी विश्वसनीयता भी बढ़ाता है। अतः अगर हम उप रोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बीज विधेयक, 2025 नकली माल के खिलाफ भारत की व्यापक नीति का कृषि क्षेत्र में ठोस प्रतिबिंब है। यह विधेयक एक ओर किसानों को ठगी और नुकसान से बचाने का प्रयास करता है, तो दूसरी ओर कृषि बाजार में अनुशा सन, पारदर्शिता और गुणवत्ता संस्कृति को मजबूत करता है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह न केवल किसानों के जीवन को खुशहाल बनाने में सहायक होगा, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यव स्था को भी दीर्घकालिक स्थि रता प्रदान करेगा। इस दृष्टि से बीज विधेयक, 2025 को केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत की कृषि नीति में एक संरचनात्मक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए।

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