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आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्याओं की घटनाएं केवल पशु क्रूरता का मामला नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय समाज के भीतर बढ़ती असहिष्णुता, प्रशासनिक विफलता और संवेदनहीनता का है भयावह संकेत

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर ईश्वर, अल्लाह, गाड नाम भिन्न हो सकते हैं, लेकिन सृष्टि का मूल भाव एक है, जीवन। भार तीय दर्शन में कहा गया है कि सृष्टि में 84 लाख योनियाँ हैं और प्रत्येक योनि का अपना एक विशिष्ट उद्देश्य, संतुलन और महत्व है। मानव को इस सृष्टि में सबसे बुद्धिजीवी प्राणी इसलिए माना गया क्योंकि उसे सोचने, समझने निर्णय लेने और करुणा दिखाने की क्षमता दी गई। किंतु जब यही मानव अपनी सुविधा,भय यास्वार्थ के लिए अन्य जीवों के जीवन का अंत करने लगे, तब सवाल केवल कानून का नहीं, बल्कि सभ्यता, नैतिकता और मानवता का बन जाता है। पिछले कुछ दिनों से तेलं गाना, विशेष रूप से हैदराबाद और याचाराम गांव से सामने आ रही आवारा कुत्तों की सा मूहिक हत्याओं की घटनाएं केवल पशु क्रूरता का मामला नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय समाज के भीतर बढ़ती असहि ष्णुता, प्रशासनिक विफलता और संवेदनहीनता का भयावह संकेत हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि प्रकृति में कोई भी जीव अनाव श्यक नहीं है। कुत्ते,बिल्ली हाथी, घोड़े ये सभी केवल पालतू या आवारा प्राणी नहीं, बल्कि जैविक संतुलन की मह त्वपूर्ण कड़ियाँ हैं। कुत्ते चूहे जैसे रोग वाहक जीवों की संख्या नियंत्रित करते हैं, इलाके की सुरक्षा का संकेत देते हैं और मनुष्य के सबसे पुराने साथी रहे हैं। विडंबना यह है कि जो मानव प्रकृति का रक्षक होना चाहिए था, वही आज सबसे बड़ा भक्षक बनता जा रहा है। जनवरी 2026 से अब तक तेलंगाना में 500 से अधिक कुत्तों की हत्या की खबरें सामने आ चुकी हैं। ताजा मामलों में याचाराम गांव में लगभग 100 कुत्तों को जहर देकर मार दिया गया, जबकि इससे पहले भी कई इलाकों में सामूहिक मौतें रिपोर्ट की गई थीं। पशु चिकित्सा विशे षज्ञों ने स्ट्राइकिन इंजेक्शन के उपयोग का संदेह जताया है, एक ऐसा न्यूरोटाक्सिन, जो कुछ ही मिनटों में कुत्ते को भीषण ऐंठन, असहनीय पीड़ा और श्वसन विफलता के जरिए मौत की ओर धकेल देता है। यह तरीका न केवल अमान वीय है, बल्कि गैरकानूनी और आपराधिक भी है।
साथियों बात अगर हम भारत में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत स्ट्रा इकिन का उपयोग पूर्णतः प्रति बंधित है, इसको समझने की करें तो इसके बावजूद यदि यह जहर खुलेआम इस्तेमाल हो रहा है,तो सवाल उठता है, क्या यह केवल कुछ व्यक्ति यों की क्रूरता है या प्रशास निक मिलीभगत और लापर वाही। किसी भी पंचायत, सर पंच या स्थानीय निकाय को कुत्तों को मारने का अधिकार नहीं है। यदि ऐसा किया गया है, तो यह सीधा-सीधा क्रिमि नल एक्ट है।
साथियों बातें कर हम बच्चे पर हमला-भय बनाम समा धान की राजनीति इस को समझने की करें तो हैदराबाद के सुराराम मार्केट मस्जिद के पास एक गली में आवारा कुत्तों द्वारा पांच वर्षीय बच्चेपर हमला हुआ, बच्चा घायल हुआ, उसे अस्पताल ले जाया गया। यह घटना गंभीर और चिंताज नक है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन प्रश्न यह है, क्या एक घटना का समाधान 100 कुत्तों को मार देना है? क्या भय का जवाब जहर और हत् या हो सकता है? सभ्य समाज में समाधान भावनात्मक उन्माद से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, कानूनी और मानवीय नीति से निकलता है।
साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और राज्यों की जवाबदेही को सम झने की करें तो 13 जनवरी को भारत के सर्वोच्च न्याया लय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह राज्यों की जवाबदेही तय करेगा, आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों की भूमि का पर भी विचार करेगा पीड़ि तों को मुआवजा देने के निर्देश दे सकता है न्यायालय ने यह भी माना कि पिछले पांच वर्षों में एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों का बेहद खराब क्रियान्वयन हुआ है। यानी समस्या कुत्तों की नहीं, शासन की असफलता की है। साथियों बात अगर हम इस मुद्दे पर कानूनी स्थिति – क्या कुत्तों को मारना वैध है? इसको समझने की करें तो स्पष्ट और निर्विवाद उत्तर नहीं।किसी भी स्वस्थ कुत्ते को मारना अपराध है, केवल गंभीर रूप से बीमार या रेबीज -ग्रस्त कुत्तों को ही, पशु चिकि त्सक की सलाह से मानवीय इच्छामृत्यु दी जा सकती है इसके अलावा हर हत्या पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के तहत दंडनीय अपराध है। याचाराम मामलाः-लोकतंत्र के नाम पर हिंसा-याचाराम गांव में आरोप है कि सरपंच ने चुनावी वादे निभाने के लिए कुत्तों को जहर दिलवाया। यह घटना लोक तंत्र की आत्मा पर तमाचा है। यदि जनप्रतिनिधि ही कानून तोड़ेंगे, तो आम नागरिक से संवेदनशीलता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? पुलिस द्वारा सरपंच, सचिव और अन्य पर केस दर्ज होना स्वागत योग्य कदम है, लेकिन सवाल यह है, क्या यह कार्रवाई मिसाल बनेगी या केवल औप चारिकता रह जाएगी। सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार दोनों ने स्पष्ट किया है कि एनिमल बर्थ कंट्रोल ही एकमात्र समा धान है। इसके अंतर्गतकुत्तों की नस, बंदीरेबीज टीकाक रण इलाके में वापस छोड़ना यह माडल न केवल कुत्तों की संख्या नियंत्रित करता है, बल्कि मानव-पशु संघर्ष को भी कम करता है। दुनियाँ के कई देशों में यह माडल सफ लता पूर्वक लागू है।
साथियों बात अगर हम डाॅग लवर्स नहीं, डाॅग राइट्स एक्टिविस्ट इसको समझने की करें तो अक्सर डाॅग लवर्स शब्द को व्यंग्य की तरह इस्ते माल किया जाता है, जबकि सच यह है कि ये लोग कानून और करुणा के रक्षक हैं। यही कार्यकर्ता हत्याओं को उजागर कर रहे हैं, पुलिस में शिकायत दर्ज करा रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कर रहे हैं यदि ये आवाजें न हों, तो बेजुबानों की चीखें कभी दर्ज ही न हों।
साथियों बात अगर हम इस विषय को अंतरराष्ट्रीय नजरिए से देखकर समझने की करें तो भारत की छवि पर असर पड़ता है। जब भारत विश्व गुरु, मानवाधिकार और करुणा आधारित सभ्यता की बात करता है, तब ऐसी घट नाएं हमारी वैश्विक छवि को गहरा नुकसान पहुंचाती हैं।
संयुक्त राष्ट्र और अंतररा ष्ट्रीय पशु अधिकार संगठन पहले से ही ऐसे मामलों पर नजर रखते हैं। यह केवल कुत्तों का मामला नहीं है, यह सवाल है कि हम किस तरह का समाज बनना चाहते हैं अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार रिपोर्ट शैली तेलंगाना राज्य में जनवरी 2026 से अब तक 500 से अधिक आवारा कुत्तों की कथित सामूहिक हत्या मानवाधिकार और पशु कल्याण मानकों के गंभीर उल्लंघन को दर्शाती है।
विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त सिद्धांत यह मान ते हैं कि पशुओं के साथ किया गया संगठित और क्रूर व्यवहार सामाजिक हिंसा के व्यापक पैटर्न की चेतावनी होता है। रिपोर्टों के अनुसार, कुत्तों को प्रतिबंधित न्यूरोटाक्सिन स्ट्राइ किन के माध्यम से मारा गया, जो भारत के घरेलू कानूनों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय पशु कल्याण मानदंडों का भी उल् लंघन है। यह घटनाएं ऐसे समय पर सामने आई हैं जब भारत का सर्वोच्च न्यायालय आवारा पशुओं के मानवीय प्रबंधन, राज्य की जवाबदेही और पीड़ितों के मुआवजे पर विचार कर रहा है। इन मामलों में निर्वाचित स्थानीय प्रतिनि िधयों की कथित संलिप्तता लोकतांत्रिक शासन, जवाब देही और कानून के शासन पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है, जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी चिंता का विषय है।
अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इस का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बेजुबानों की हत्या, इंसानियत की हार, तेलंगाना में जो हुआ, वह केवल 500 कुत्तों की मौत नहीं है, यह संविधान के मूल्यों, कानून के शासन और मानवीय करुणा की हत्या है। यदि हम आज बेजुबानों के लिए नहीं बोले, तो कल जब अन्याय किसी और पर होगा, तो आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा। सभ्यता की पहचान यह नहीं कि वह ताकतवर को कैसे बचाती है, बल्कि यह है कि वह सबसे कमजोर के साथ कैसा व्यवहार करती है।

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