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डब्ल्यूईएफ वैश्विक राजनीति कूटनीति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी प्रभावी संवाद का केंद्र बन चुका है

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया (महाराष्ट्र)।
वैश्विक स्तर पर स्विट्जर लैंड के दावोस में 19 जनवरी 2026 से शुरू हुई वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम(डब्ल्यूईएफ) की 56 वीं वार्षिक बैठक एक ऐसे समय में आयोजित हो रही है, जब वैश्विक व्यवस्था एक गहरे संक्रमण काल से गुजर रही है। 23 जनवरी तक चलने वाली यह बैठक केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मे लन नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक मंच का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ दुनिया की आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी दिशा तय करने वाले निर्णयों की बुनियाद रखी जाती है। इस वर्ष की बैठक का केंद्रीय विषय,ए स्पिरिट आफ डायलाग (संवाद की भावना) अपने आप में इस बात का संकेत है कि दुनियाँ आज टकराव, ध्रुवीकरण और अविश् वास के दौर से निकलकर संवाद, सहयोग और सहमति की नई राह तलाश रही है।
दावोस की वार्षिक बैठक वर्ल्ड इकोनामिक फोरम का सबसे प्रमुख आयोजन है, जिसने पिछले पाँच दशकों से वैश्विक एजेंडा निर्धारण में एक अनूठी भूमिका निभाई है। यह मंच राजनीतिक नेतृत्व, वैश्विक कारपोरेट जगत, नाग रिक समाज, शिक्षाविदों, अंतर राष्ट्रीय संगठनों और उभरते युवा नेतृत्व को एक साथ लाकर उन मुद्दों पर चर्चा करता है, मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि जो किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी मानवता के भविष्य से जुड़े होते हैं। वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी क्रांति, भू-राजनी तिक संघर्ष और सामाजिक असमानताएँये सभी विषय दावोस की चर्चाओं के केंद्र में रहते हैं। वर्ल्ड इकोनाॅमिक फोरम का मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में स्थित है और इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य यही रहा है कि विश्व की जटिल समस्याओं का समा धान केवल सरकारों या बाजार के बल पर नहीं, बल्कि साम ूहिक प्रयासों और बहु-हित धारक सहयोग के माध्यम से ही संभव है। आसान शब्दों में कहें तो डब्ल्यूईएफ दुनियाँ के शीर्ष नेताओं, व्यापारिक दिग्गजों और बौद्धिक नेतृत्व को एक मंच पर लाकर वैश्विक, क्षेत्रीय और औद्योगिक नीतियों को आकार देने का प्रयास करता है। साथियों बात अगर हम दावोस 2026, भागीदारी का अभूतपूर्व विस्तार इसको सम झने की करें तो, दावोस 2026 की बैठक अपने पैमाने और प्रतिनिधित्व केलिहाज से भी ऐतिहासिक मानी जा रही है। इस वर्ष 130 से अधिक देशों से लगभग 3,000 नेताओं के शामिल होने की उम्मीद है। इनमें लगभग 400 राजनीतिक नेता शामिल हैं, जिनमें करीब 65 राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख तथा जी-7 के छह नेता भी भाग ले रहे हैं। यह आँकड़े इस बात को रेखांकित करते हैं कि दावोस अब केवल आर्थिक विमर्श का मंच नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति कूटनीति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी प्रभावी संवाद का केंद्र बन चुका है। राजनीतिक नेतृत्व के साथ- साथ लगभग 850 शीर्ष वैश् िवक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और कारपोरेट अ ध्यक्ष इस मंच पर मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग 100 यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स और अत् याधुनिक तकनीकी कंपनियों के अग्रणी भी इस बैठक में भाग ले रहे हैं। यह उपस्थिति इस बात का संकेत है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का भवि ष्य अब केवल पारंपरिक उद्यो गों तक सीमित नहीं, बल्कि नवाचार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और उभरती प्रौद्योगिकियों से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस वर्ष दावोस में सबसे अधिक निगाहें अमेरिकी राष्ट्रपति डोना ल्ड ट्रंप पर टिकी हुई हैं।
उनके नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति, व्यापार नीति और भू- राजनीतिक दृष्टि कोण को लेकर वैश्विक स्तर पर उत्सुकता और चिंता दोनों बनी हुई हैं। ट्रंप की मौजूदगी दावोस 2026 को न केवल मीडिया की दृष्टि से बल्कि वैश्विक नीति विमर्श के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बना देती है।
साथियों बात अगर हम संवाद का मंच भरोसे की बहाली की कोशिश इसको समझने की करें तो, वर्ल्ड इकोनाॅमिक फोरम स्वयं को संवाद,सहयोग और कार्रवाई के लिए एक निष्पक्ष मंच के रूप में प्रस्तुत करता है। यह मंच ऐसे समय में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है, जब दुनिया भू- राजनीतिक तनाव, युद्धों, व्या पारिक टकरावों और सामाजिक विभाजन से जूझ रही है।
डब्ल्यूईएफ का दावा है कि वह विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देकर विश्वास की बहाली का कार्य करता है,एक ऐसा विश्वास, जो हाल के वर्षों में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में बुरी तरह डगम गाया है। दावोस केवल विचार -विमर्श का मंच नहीं है, बल्कि यह देशों के लिए अपनी आर्थिक और निवेश क्षमता को वैश्विक समुदाय के सामने प्रस्तुत कर ने का अवसर भी देता है।
उदाहरण के तौर पर, 2026 में भारत दावोस में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। भारत न केवल अपने राष्ट्रीय विकास एजेंडे को प्रस् तुत कर रहा है, बल्कि गिफ्ट सिटी जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्ती य केंद्र और कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों की निवेश संभाव नाओं को भी वैश्विक निवेशकों के समक्ष प्रदर्शित कर रहा है। वर्ल्ड इकोनामिक फोरम की पहचान उसकी प्रतिष्ठित वैश्विक रिपोर्टों से भी जुड़ी हुई है। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट, ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट और ग्ला ेबल काम्पिटिटिवनेस रिपोर्ट जैसी रिपोर्टें न केवल नीति- निर्माताओं के लिए संदर्भ बिंदु बनती हैं, बल्कि वैश्विक मीडि या, शिक्षाविदों और निवेशकों के लिए भी दिशा-निर्देशक का काम करती हैं। ये रिपोर्टें वैश्विक असमानताओं जोखि मों और प्रतिस्पर्धात्मकता के रुझानों को उजागर कर सर कारों और संस्थानों को आत्ममं थन के लिए प्रेरित करती हैं।
साथियों बात कर हम संवाद की भावना- 2026 की थीम का गहन अर्थ को समझने की करें तो, दावोस 2026 की बैठक का मुख्य विषय संवाद की भावना अपने आप में वर्तमान वैश्विक परिस्थिति का प्रतिबिंब है। यह थीम इस बात पर केंद्रित है कि भू-राजनीतिक जोखिम, आर्थिक अनिश्चितता और सुरक्षा, संप्रभुता तथा वैश् िवक एकीकरण को लेकर बद लती धारणाओं के बीच अंतर राष्ट्रीय सहयोग को किस प्रकार नए सिरे से परिभाषित और मजबूत किया जा सकता है। आज दुनियाँ एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ एक ओर वैश्वीकरण के लाभों पर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी ओर राष्ट्र वाद और संरक्षणवाद का उभार देखने को मिल रहा है। ऐसे में संवाद केवल कूटनीतिक शब्द नहीं रह जाता, बल्कि यह वैश्विक स्थिरता और शांति की अनिवार्य शर्त बन जाता है।दावोस 2026 में यह प्रयास किया जा रहा है कि मतभेदों के बावजूद साझा हितों की पहचान की जाए और सहयोग के नए मॉडल विकसित किए जाएँ। इस वर्ष की बैठक में वैश्विक नेता, वरिष्ठ राजनयिक, उद्योग विशेषज्ञ, थिंक टैंक और सामाजिक उद्यमी एक साथ मिलकर जलवायु परिव र्तन, आर्थिक असमानता, आपूर्ति श्रृंखला संकट, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी परिवर्तन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। इन चर्चाओं का उद्देश्य केवल समस्याओं की पहचान करना नहीं, बल्कि व्यावहारिक और क्रियान्वयन योग्य समाधानों की तलाश करना है। आधिकारिक वेब साइट के अनुसार, दावोस 2026 की चर्चाएँ लचीलेपन (रेजिलिएंस), प्रतिस्पर्धात्मकता और समावेशी विकास को बढ़ावा देने वाले रास्तों पर केंद्रित हैं। इसके साथ ही, भू – राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता को प्रबंधित करने की रणनीतियों पर भी गंभीर विमर्श हो रहा है। विशेष रूप से जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी परिवर्तनकारी तकनीकों के जिम्मेदार और नैतिक उपयोग पर जोर दिया जा रहा है, ताकि तकनीकी प्रगति मानव कल्याण के साथ तालमेल से आगे बढ़े।
साथियों बात अगर हम भारत की भूमिका-दावोस में उभरती शक्ति का प्रदर्शन इस को समझनें कि करें तो दावोस 2026 में भारत की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत न केवल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, बल्कि वह वैश्विक दक्षिण (ग्लो बल साउथ) की आवाज के रूप में भी उभर रहा है। इस वर्ष भारत से कई केंद्रीय मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री दावोस पहुँचे हैं, जो देश की बहु- क्षेत्रीय विकास रणनीति को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। रेलवे, सूचना एवं प्रसा रण, इलेक्ट्रानिक्स एवं आईटी, कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास, नवीकरणीय ऊर्जा और नागरिक उड्डयन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी इस बात कोदर्शाती है कि भारत दावोस को केवल निवेश आक र्षित करने का मंच नहीं, बल्कि नीति संवाद और वैश्विक साझेदारी के अवसर के रूप में देखता है।
भारत का फोकस बुनियादी ढांचे, डिजिटल परिवर्तन, हरित ऊर्जा और समावेशी विकास पर है, जो वैश्विक निवेशकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। भारत की रणनीति यह स्पष्ट संदेश देती है कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में केवल एक बाजार या श्रम शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक नवा चार-संचालित, नीति-सक्षम और जिम्मेदार वैश्विक साझेदार के रूप में अपनी भूमिका स्था पित करना चाहता है। गिफ्ट सिटी को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र के रूप में प्रस्तुत करना और राज्यों की निवेश नीतियों को सामने लाना इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि दावोस 2026 की 56वीं वार्षिक बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब दुनियाँ बहु-आयामी संकटों से घिरी हुई है। आर्थिक अनिश्चितता जलवायु संकट, तकनीकी असं तुलन और भू-राजनीतिक तनाव ये सभी चुनौतियाँ किसी एक देश के प्रयासों से हल नहीं हो सकतीं। ऐसे में ‘संवाद की भावना’ केवल एक थीम नहीं, बल्कि एक वैश्विक आवश् यकता बन जाती है। वर्ल्ड इकोनामिक फोरम का दावोस मंच यह याद दिलाता है कि मतभेदों और प्रतिस्पर्धा के बाव जूद सहयोग संभव है, बशर्ते संवाद के दरवाजे खुले रहें। दावोस 2026 की चर्चाएँ यदि वास्तविक नीतिगत बदलावों और ठोस अंतरराष्ट्रीय सह योग में तब्दील होती हैं, तो यह बैठक वैश्विक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में याद की जाएगी। भारत सहित सभी प्रमुख देशों के लिए यह अवसर है कि वे न केवल अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाएँ, बल्कि एक अधिक स्थिर, समावेशी और टिकाऊ वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाएँ।

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